जिनेन्द्र वाणी

श्री अनंतनाथ जिन पूजा

कविवर वृन्दावन · तीर्थंकर पूजा

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स्थापना

छन्द कवित्त

पुष्पोत्तर तजि नगर अजुध्या जनम लियो सूर्याउर आय ।सिंघसेन नृप के नन्दन, आनन्द अशेष भरे जगराय ॥

गुन अनन्त भगवन्त धरे, भवदन्द हरे तुम हे जिनराय ।थापतु हों त्रय बार उचरिकैं, कृपासिन्धु तिष्ठहु इत आय ॥

आह्वाननॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।

स्थापनॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिन ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।

सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

अष्टक

छन्द गीता तथा हरिगीता

शुचि नीर निरमल गंगको लैं, कनकभृंग भराइया ।मल करम धोवन हेत मनवचकाय धार ढराइया ॥

जगपूज परमपुनीत मीत, अनन्त संत सुहावनों ।शिवकंतवंत महंत ध्यावों, भ्रन्ततंत नशावनों ॥

जलॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलम् नि॰ स्वाहा ।

हरिचन्द कदलीनन्द कुंकुम, दन्दताप निकन्द है ।सब पापरजसंतापभंजन, आपको लखि चन्द है ॥जग॰ ॥

चंदनॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दनम् नि॰ स्वाहा ।

कनशाल दुति उजियाल हीर, हिमालगुलकनितें घनी ।तसु पुंज तुम पदतर धरत, पद लहत स्वच्छ सुहावनी ॥जग॰ ॥

अक्षतॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतम् नि॰ स्वाहा ।

पुष्कर अमरतर जनित वर, अथवा अवर कर लाइया ।तुम चरनपुष्करतर धरत, सरशूल सकल नशाइया ॥जग॰ ॥

पुष्पॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पम् नि॰ स्वाहा ।

पकवान नैना घ्रानरसना को प्रमोद सुदाय हैं ।सो ल्याय चरन चढ़ाय रोग, छुधाय नाश कराय हैं ॥जग॰ ॥

नैवेद्यॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि॰ स्वाहा ।

तममोह भानन जानि आनन्द, आनि सरन गही अबै ।वर दीप धारों बारि तुमढिग, सुपरज्ञान जु द्यो सबैं ॥जग॰ ॥

दीपॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपम् नि॰ स्वाहा ।

यह गन्ध चूरि दशांग सुन्दर, धूम्रध्वज में खेय हों ।वसुकर्म भर्म जराय तुम ढिग, निज सुधातम वेय हों ॥जग॰ ॥

धूपॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपम् नि॰ स्वाहा ।

रसथक्क पक्क सुभक्क चक्क, सुहावनें मृदु पावनें ।फलसार वृन्द अमंद ऐसो, ल्याय पूज रचावनें ॥जग॰ ॥

फलॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलम् नि॰ स्वाहा ।

शुचि नीर चन्दन शालिशंदन, सुमन चरु दीवा धरों ।अरु धूप जुत मैं अरघ करि, करजोरजुग विनति करों ॥जग॰ ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि॰ स्वाहा ।

पंचकल्याणक

छन्द सुन्दरी तथा द्रुतविलम्बित

असित कातिक एकम भावनों, गरभको दिन सो गिन पावनों ।किय सची तित चर्चन चावसों, हम जजें इत आनन्द भावसों ॥

गर्भ कल्याणकॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णैक प्रतिपदायां गर्भमंगलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जनम जेठवदी तिथि द्वादशी, सकल मंगल लोकविषैं लसी ।हरि जजें गिरिराज समाजतें, हम जजें इत आतम लाजतें ॥

जन्म कल्याणकॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णद्वादश्यां जन्ममङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

भवशरीर विनश्वर भाइयो, असित जेठदुवादशि गाइयो ।सकल इन्द्र जजे तित आइकें, हम जजें इत मंगल गाइकें ॥

तप कल्याणकॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णद्वादश्यां तपोमङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

असित चैत अमावसको सही, परम केवलज्ञान जग्यो कही ।लही समोसृत धर्म धुरंधरो, हम समर्चत विघ्न सबै हरो ॥

ज्ञान कल्याणकॐ ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यायां ज्ञानमङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

असित चैत अमावस गाइयो, अघतघाति हने शिव पाइयो ।गिर समेद जजे हरि आयकें, हम जजें पद प्रीति लगाइकें ॥

मोक्ष कल्याणकॐ ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यायां मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

छन्द दोहा

तुम गुण वरनन येम जिम, खंविहाय करमान ।तथा मेदिनी पदनिकरि, कीनों चहत प्रमान ॥

जय अनन्त रवि भव्यमन, जलज वृन्द विहसाय ।सुमति कोक तियथोक सुख, वृद्ध कियो जिनराय ॥

छन्द नयमालनी, चंडी तथा तामरस

जै अनन्त गुनवंत नमस्ते, शुद्ध ध्येय नित सन्त नमस्ते ।लोकालोक विलोक नमस्ते, चिन्मूरत गुनथोक नमस्ते ॥

रत्नत्रयधर धीर नमस्ते, करमशत्रु करि वीर नमस्ते ।चार अनन्त महन्त नमस्ते, जय जय शिवतियकंत नमस्ते ॥

पञ्चाचार विचार नमस्ते, पञ्च कर्ण मदार नमस्ते ।पञ्च पराव्रत-चूर नमस्ते, पञ्चमगति सुखपूर नमस्ते ॥

पञ्चलब्धि-धरनेश नमस्ते, पञ्च भाव सिद्धेश नमस्ते ।छहों दरव गुनजान नमस्ते, छहों काल पहिचान नमस्ते ॥

छहों काय रच्छेश नमस्ते, छह सम्यक् उपदेश नमस्ते ।सप्तविशनवनवह्नी नमस्ते, जय केवल अपरन्हि नमस्ते ॥

सप्ततत्व गुनभनन नमस्ते, सप्त शुभ्रगति हनन नमस्ते ।सप्तभंग के ईश नमस्ते, सातों नय कथनीश नमस्ते ॥

अष्ट करम मलदल्ल नमस्ते, अष्ट जोग निरशल्ल नमस्ते ।अष्टम धराधिराज नमस्ते, अष्ट गुननिसिरताज नमस्ते ॥

जय नवकेवल प्राप्त-नमस्ते, नव पदार्थथिति आप्त नमस्ते ।दशों धरमधरतार नमस्ते, दशों बंधपरिहार नमस्ते ॥

विघ्न महीधर विज्जु नमस्ते, जय ऊरधगतिरिज्जु नमस्ते ।तन कनकदुति पूर नमस्ते, इख्वाकज गनसूर नमस्ते ॥

धनु पचासतन उच्च नमस्ते, कृपासिधु गुन शुच्च नमस्ते ।सेही अंग निशंक नमस्ते, चितचकोर मृग अंक नमस्ते ॥

राग-दोष-मदटार नमस्ते, निजविचार दुखहार नमस्ते ।सुर सुरेश-गन-वृन्द नमस्ते. ‘वृन्द’ करो सुखकन्द नमस्ते ॥

छन्द घत्तानन्द

जय जय जिनदेवं सुरकृतसेवं, नित कृतचित्त हुल्लासधरं ।आपदउद्धारं समतागारं, वीतराग विज्ञानभरं ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

छन्द मदावलिप्तकपोल तथा रोड़क

जो जन मनवचकाय लाय, जिन जजैं नेह धर ।वा अनुमोदन करैं करावै पढ़ै पाठ वर ॥

ताके नित नव होय, सुमंगल आनन्ददाई ।अनुक्रमतैं निरवान, लहै सामग्री पाई ॥

पुष्पांजलि क्षिपेत, इत्याशीर्वादः ।

॥ जय जिनेन्द्र ॥

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  1. श्री अनंतनाथ भगवान की आरतीचौदहवें तीर्थंकर · चिह्न सेही