जिनेन्द्र वाणी

विद्यमान बीस तीर्थंकर पूजा

पं. द्यानतराय · नित्य पूजा क्रम

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स्थापना

दोहा

दीप अढ़ाई मेरु पन, अरु तीर्थंकर बीस ।तिन सबकी पूजा करूँ, मन-वच-तन धरि शीस ॥

आह्वाननॐ ह्रीं श्री विद्यमान विंशति-तीर्थकराः! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।

स्थापनॐ ह्रीं विद्यमान विंशति-तीर्थंकराः! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।

सन्निधिकरणॐ ह्रीं विद्यमान विंशति-तीर्थंकराः! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

अष्टक

इन्द्र फणीन्द्र नरेन्द्र वंद्य, पद निर्मल धारी,शोभनीक संसार, सारगुण हैं अविकारी ।क्षीरोदधि सम नीर सों (हो), पूजौं तृषा निवार,सीमंधर जिन आदि दे, बीस विदेह मंझार ।श्री जिनराज हो, भव तारण जहाज श्री महाराज हो ।

जलॐ ह्रीं श्री विद्यमान विंशति-तीर्थंकरेभ्यः जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥

तीन लोक के जीव, पाप आताप सताये,तिनको साता दाता, शीतल वचन सुहाये ।बावन चंदन सों जजूं, (हो) भ्रमन-तपन निरवार, सीमंधर…

चंदनॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः भवतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥

यह संसार अपार महासागर जिनस्वामी,तातैं तारे बड़ी, भक्ति-नौका जग नामी ।तन्दुल अमल सुगंध सों (हो) पूजौं तुम गुणसार, सीमंधर…

अक्षतॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥

भविक-सरोज-विकास, निंद्य-तम-हर रवि से हो,जति-श्रावक-अचार कथन को तुम ही बड़े हो ।फूल सुवास अनेक सों (हो) पूजौं मदन प्रहार,सीमंधर…

पुष्पॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥

काम नाग विषधाम, नाशको गरुड़ कहे हो,क्षुधा महादव-ज्वाल, तासको मेघ लहे हो ।नेवज बहुघृत मिष्ट सों (हो), पूजौं भूख विडार, सीमंधर…

नैवेद्यॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥

उद्यम होन न देत, सर्व जग मांहिं भर्यो है,मोह महातम घोर, नाश परकाश कर्यो है ।पूजौं दीप प्रकाश सों (हो) ज्ञान ज्योति करतार,सीमंधर…

दीपॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥

कर्म आठ सब काट, भार विस्तार निहारा,ध्यान अग्नि कर प्रकट सरब कीनो निरवारा ।धूप अनूपम खेवतें (हो) दुःख जलै निरधार,सीमंधर…

धूपॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥

मिथ्यावादी दुष्ट लोभऽहंकार भरे हैं ।सब को छिन में जीत, जैन के मेरु खरे हैं ।फल अति उत्तम सों जजौं (हो) वांछित फलदार, सीमंधर…

फलॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥

जल फल आठों द्रव्य, अरघ कर प्रीति धरी है,गणधर इन्द्रनि हू तैं, थुति पूरी न करी है ।द्यानत सेवक जानके (हो) जगतैं लेहु निकार,सीमंधर…

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥

जयमाला

सोरठा

ज्ञान सुधाकर चंद, भविक खेतहित मेघ हो ।भ्रम-तम-भान अमंद, तीर्थंकर बीसों नमौं ॥

चौपाई

सीमंधर ‘सीमंधर स्वामी’, ‘जुगमंधर’ जुगमंदिर नामी ।बाहु ‘बाहु जिन’ जग जन तारे, करम ‘सुबाहु’ बाहुबल धारे ॥1॥

जात ‘सुजातं’ केवलज्ञानं, ‘स्वयंप्रभ’ प्रभु स्वयं प्रधानं ।‘ऋषभानन’ ऋषि भानन तोषं, ‘अनंतवीरज’ वीरजकोषं ॥2॥

‘सौरीप्रभ’ सौरीगुणमालं, सुगुण विशाल ‘विशाल’ दयालं ।‘व्रजधार’ भवगिरि वज्जर हैं, ‘चंद्रानन’ चंद्रानन-वर हैं ॥3॥

‘भद्रबाहु’ भद्रनि के करता, ‘श्रीभुजंग’ भुजंगम हरता ।‘ईश्वर’ सब के ईश्वर छाजैं, ‘नेमिप्रभ’ जस नेमि विराजैं ॥4॥

‘वीर सेन’ वीरं जग जाने, ‘महाभद्र’ महा भद्र बखाने ।नमौं ‘जसोधर’ जसधरकारी, नमौं ‘अजितवीरज’ बलधारी ॥5॥

धनुष पांचसौ काय विराजै, आयु कोडि पूरब सब छाजै ।समवशरण शोभित जिनराजा, भव-जल-तारनतरन जिहाजा ॥6॥

सम्यकरत्नत्रय निधिदानी, लोकालोकप्रकाशक ज्ञानी ।शतइन्द्रनिकर वंदित सोहैं, सुन नर पशु सबके मन मोहैं ॥7॥

दोहा

तुमको पूजैं, वंदना, करैं, धन्य नर सोय ।द्यानत सरधा मन धरै, सो भी धरमी होय ॥

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः जयमाला महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

इत्याशीर्वादः पुष्पाजलिं क्षिपेत् ।

॥ जय जिनेन्द्र ॥