श्री ढाईद्वीप विधान
डॉ. प्रवीण कुमार जैन · विधान पूजा
साइट में विधान खोलेंमंगलाचरण
दोहा छन्द
तीनलोक के मध्य में, अगणित सागर द्वीप।सबके बीचों-बीच है, पहला जम्बूद्वीप ।।1।।द्वितीय धातकी खण्ड है, आधा पुष्कर द्वीप ।इन सबके ही योग से, बने अढ़ाई द्वीप ।।2।।इसमें जिन - मंदिर महा, प्रतिमाएँ हैं भव्य ।कृत्रिम है फिर भी लगे, अकृत्रिम सादृश्य ।।3।।
लक्ष्मीधरा छन्द
इसकी रचना ही है इतनी सुंदर अहो,देखकर सबके मन को ही ललचाती है।दर्श करने यहाँ जो भी आ जाता है,उसके चेहरे पे मुस्कान आ जाती है ।।4।।दृष्टि जिस ओर जाये, वहीं देख लो,प्रभु की नासाग्र मुद्रा नजर आती है।वीतरागी सदा शांत मुद्रा को लख,राग की कालिमा झट से छिप जाती है ।।5।।तेज इतना कि रोशन करे लोक को,चाँद की चाँदनी छिप के शरमाती है।ज्ञान की रोशनी में झलकते सभी,सारी सृष्टि भी इसमें समा जाती है ।।6।।मौन रहकर सभी कहते हैं तुम प्रभु,प्रभुता अंतर में इकदम नजर आती है।मान ले जीव इस क्षण इसी बात को,निजमें शांति सहजता में छा जाती है ।।7।।
दोहा छन्द
वीतराग सर्वज्ञता, अर हित का उपदेश ।इन्हीं गुणों को पूजना, है मेरा उद्देश्य ।।8।।ये गुण प्रभुवर आप में, इन्हें नमूँ मैं आज ।मुझमें भी ये प्रकट हों, भाऊँ भावना आज ।।9।।
पीठिका
दोहा छन्द
द्वीप अढाई जिनायतन, आकर्षक अति दिव्य।अंदर - बाहर से लगे, सुन्दर व अति भव्य ।।।।।
लक्ष्मीधरा छन्द
तर्ज - जिनधरम जिनधरम ......
बिम्ब ग्यारह सौ पैंसठ हैं, ढाईद्वीप में,उनकी पूजन करूँ अपने मन से सदा।ठानवे तीन सौ अकृत्रिम बिम्ब हैं,गीत उनके गुणों का मैं गाऊँ सदा ।।2।।बीस विद्यमान हैं यहाँ दो-दो जगह,तीस चौबीसी के सात सौ बीस हैं।शेष जो सात हैं पूज्य भगवन यहाँ,उनको लखकर सहज ये झुके शीश है ।।3।।सबके दर्शन करूँ और प्रक्षाल भी,सबकी पूजन करूँ और जयमाल भी।कर रहा मन मेरा आज कर लूँ विधान,जिससे मिल जाये निज आत्मवैभव निधान ।।4।।इसलिए सबको मैं छोड़कर आ गया,निःसही निःसही बोलकर आ गया।जग की अब तो नहीं कोई परवाह है,सारे संबंध मैं छोड़कर आ गया ।॥5॥मैं तो आ ही गया पूरी तैयारी से,अब विधी की शुरूआत करते अभी।ध्यान रखना है कोई भी गलती न हो,आओ मिलकर शुभारंभ करते सभी ।।6।।
दोहा छन्द
करते हैं आरंभ अब, शुभ विधान का काज।प्रभु गुण कीर्तन से मिले, गुण अनंत का राज ।।7।।
पूजन
# ग्यारह सौ पैंसठ जिनबिम्ब पूजन
अडिल्ल छन्द
आह्वानन अरहंतों का करता अभी,यही भावना उर में थापित हों सभी।प्रभु निकटता से पूजन आरंभ हो,भाव विशुद्धि मेरी अब प्रारम्भ हो।।
दोहा छन्द
निर्मल मेरे भाव हों, सुधरें मेरे काज।अष्टद्रव्य ले आ गया, पूजन करने आज।।
आह्वाननॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रा ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम् ।
स्थापनॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रा ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम् ।
सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रा ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । (पुष्पांजलि क्षिपामि/क्षिपेत्)
अडिल्ल छन्द
स्वाभाविक निर्मल जल लाया हूँ यहाँ,जन्म-मरण विनशाने आया हूँ यहाँ।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।1।।
जलॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चंदनगिरी से चंदन लाया हूँ प्रभो,भवाताप क्षय करने आया हूँ विभो।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।2।।
चंदनॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः संसारताप- विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
जो क्षत न हों ऐसे अक्षत लाया हूँ,अक्षयपद पाने को मैं ललचाया हूँ।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।3।।
अक्षतॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
पीले चावल वाले पुष्प चढ़ा रहा,कामभाव विध्वंस कराने आ गया।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।4।।
पुष्पॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभू आज नैवेद्य समर्पित करता हूँ,भूख व्याधि नश जाए ये अर्चन करता हूँ।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।5।।
नैवेद्यॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीप चढ़ाऊँ आज कि सब जग चमक उठे,मोहतिमिर नश जाय निजालय दमक उठे।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।6।।
दीपॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
धूप सुगंधित लेकर मैं तो आ गया,अष्टकर्म की धूम उड़ाने आ गया।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।7।।
धूपॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
फल उत्तम प्रभुजी को अर्पण मैं करूँ,मोक्ष मुझे मिल जाय निवेदन ये करूँ।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।8।।
फलॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्टद्रव्यमय अर्घ्य सँजोये हैं प्रभो,पद अनर्घ्य पाने को आया हूँ विभो।ग्यारह सौ पैंसठ वन्दूँ मैं चाव सौं,पूजूँ जिनबिम्बों को निर्मल भाव सौं।।9।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपजिनायतनस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा छन्द
अब मैं निर्मल भाव से, करूँ प्रभू गुणगान।पृथक्-पृथक् सबको नमूँ, बनूँ स्वयं भगवान् ।।10।।
(इति पुष्पांजलिं क्षिपेत्)विशेष -1. श्री ढाईद्वीप जिनायतन में कुल 1165 जिनबिम्ब विराजमान हैं। सभी प्रतिष्ठित वपूज्य हैं।2. जिनालय में जिस ओर देखते हैं, उस ओर वीतरागता के ही दर्शन होते हैं।3. जिनबिम्बों के भावपूर्वक दर्शन व पूजन करने से परिणाम विशुद्ध होते हैं।सभी जिनबिम्ब सम्यग्दर्शन में निमित्त हैं।ढाईद्वीप के 398 अकृत्रिम चैत्यालयों के लिए अर्घ्य(मध्यलोक में कुल 458 अकृत्रिम चैत्यालय हैं; किन्तु ढाईद्वीप में398 अकृत्रिम चैत्यालय होते हैं, उन्हीं के लिए यहाँ अर्घ्य समर्पित कर रहे हैं)
वीर छन्द
पंचमेरु के अस्सी हैं व अस्सी हैं वक्षारगिरि ।गजदंतों के बीस, एक सौ सत्तर हैं विजयार्ध गिरि ॥कुलाचलों के तीस कहे हैं, कुरुवृक्षों के दस जानो ।इष्वाकार चार के ऊपर चार जिनालय ही मानो ॥एक मानुषोत्तर पर्वत है, उस पर चार जिनालय हैं ।तीन शतक ठानवे जिनालय, पूरे ही मन-भावन हैं।।इनके दर्शन करने से ही, भाव सुनिर्मल हो जाते ।जिन-सम निजको लखने वाले भव सागर से तिर जाते ॥(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)(जो 398 जिनबिम्ब हैं, वे सब अरहंत परमात्मा के ही हैं।अब उनकी वीतरागी मुद्रा का वर्णन किया जा रहा है)
दोहा छन्द
तीन शतक व ठानवे, नमूं उन्हें मैं आज।रूप निहारूँ सभी का, सुधरें सारे काज।।1।।
मानव छन्द
अरहंत छवि है न्यारी व जिनमुद्रा अति प्यारी ।जो देखे एक नजर से, वो हो जाये बलिहारी ।।2।।ऊपर से नीचे तक सम-चतुरस्र रूप है धारा ।सर्वांग लखो उनको जब तो होवे शांति अपारा ॥3॥अरे तेज कांति इतनी है, तारामण्डल छिप जाता ।अर दिव्य-दृष्टि में उनकी, सारा ब्रह्माण्ड समाता ॥4॥जब वे कुछ भी नहीं कहते, न कहकर बहुत हैं कहते ।जो समझ जायें वे प्राणी, सम्यक्त्व बिना न रहते ॥5॥जब मौन रहें तब भी वे, हैं सबको प्रभू बताते ।अन्तर में सबके प्रभुता, ऐसा वे ज्ञान कराते ॥6॥निज हाथ पे हाथ रखे हैं, अब काम नहीं कुछ करना ।कृतकृत्य हुए सब करके, अब ज्ञाता-दृष्टा रहना ॥7॥अन्तर्मुख मुद्रा कहती, जग देख लिया है सारा।अब अपने में ही रहना, सारा संसार असारा ॥8॥स्पंद रहित नयनों में, त्रयवेद रहितता दिखती।अर भृकुटि रहित आँखों में, नहीं क्रोध भावना दिखती 11911आड़े-तिरछे अवलोकन, का काम नहीं आँखों में।आवरण नामद्वय कर्मों, का नाम नहीं जिनवर में ॥10॥अब होंठ बंद हैं दोनों, वे हमको यही बताते।आहार-पान इच्छा नहीं, इस ही का ज्ञान कराते ॥11॥नहीं अस्त्र-शस्त्र प्रभु के हैं, नहीं कोइ शत्रु असुरादि।इसलिए द्वेष नहीं उनके, अर नहीं कोइ क्रोधादि ॥12॥नहीं वस्त्र आदि हैं उनके, न वनिता व पुत्रादि।इसलिए इष्ट नहीं कोई, अर नहीं कोइ रागादि ॥13॥
आँखों में सुरमा नहीं है, न होठों पर कोइ लाली।न हार गले में उनके, न कानों में है बाली ॥14॥श्रृंगार नहीं है कोई, न आभूषण पहने हैं।न मुकुट लगा मस्तक पर, न हाथों में गहने हैं ॥15॥नहीं फूल आदि पैरों में, न लेप लगा चंदन का ।परिपूर्ण शुद्धता लखकर, उर भाव हुआ वंदन का ॥16॥नग्नत्व दशा है पूरी, जिससे अपरिग्रह दिखता।धन-वैभव सामग्री का, संबंध नहीं कुछ दिखता ।॥17॥अंतर में इतने गुण हैं, उन्हें कैसे कह पाऊँगा।अर शक्ति नहीं है इतनी, उन्हें कैसे गिन पाऊँगा ॥18॥पर भक्ति भावना ऐसी, गुणगान करूँगा पूरा।कुछ कमी न रहने दूँगा, न काम रहेगा अधूरा ॥19॥अब लक्ष्य यही है मेरा, प्रभु सम ही मैं बन जाऊँ।उन सम निज को मैं लखकर, अपने स्वभाव को पाऊँ ।।20।।
दोहा छन्द
प्रभु सम मैं भी अब बनूँ, यही भावना आज ।गुण अनंत साम्राज्य में, करूँ शीघ्र मैं राज ।।21।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपस्थ - अष्टनवत्यधिकत्रिशतम् अकृत्रिमचैत्यालयेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
तथ्य -1. संसार में यदि कुछ देखने योग्य है तो वो एक मात्र जिनमुद्रा ही है।2. जानने व समझने योग्य है तो एकमात्र मात्र जिनमुद्रा ही है।3. जो जिनमुद्रा को देखकर निज को देखता है, वह स्वयं जिनेन्द्र परमात्मा बनजाता है।विद्यमान बीस तीर्थकरों के लिए अर्घ्य(अब ढाईद्वीप में जो साक्षात् विराजमान 20 तीर्थंकर हैं,उनका स्थान, स्वरूप तथा उनके दर्शन करने का फल कहते हैं)
अडिल्ल छन्द
ढाई द्वीप में शोभित पाँच विदेह हैं,उनमें विहरमान प्रभु बीस सदेह हैं।सदा विचरते अतः कहाते विद्यमान,सौ इन्द्रों से पूजनीय वे हैं महान् ।।1।।जम्बूद्वीप में चार जिनेश्वर राजते,खण्ड धातकी में हैं आठ विराजते ।पुष्करार्ध में भी हैं आठ विराजमान,समवसरण में हैं अति ही शोभायमान ।।2।।उनके दर्शन पूजन को हम आ गए,रूप निरखते ही वे हमको भा गए ।दर्श करूँ मैं भक्तिभाव से बार-बार,भव सागर से तिर जाऊँ बस एक बार ॥3॥(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
वीर छन्द
जम्बूद्वीप में देह रहित हो जाने का स्थान विदेह।पूरव पश्चिम द्विविध दिशा से, मुक्तिवधू वरते स्वयमेव ।।4।।पूर्व दिशा में उत्तर तट पर, सीमंधर स्वामी भगवान् ।उसी दिशा में दक्षिण तट पर, युगमंधर हैं शोभावान ॥5॥पश्चिम में उत्तर तट पर, श्री बाहु जिनेन्द्र विराज रहे ।दक्षिण तट पर श्री सुबाहुजी, समवसरण में साज रहे ॥6॥अंतरंग व बाह्य लक्ष्मी, से शोभित हैं सब जिनराज ।जो पूजे निर्मल भावों से सुधर जाते हैं उसके काज ॥7॥खण्ड धातकी पूरव पश्चिम, दो भागों में बँटा हुआ ।पर्वत इष्वाकार बीच में, दक्षिण उत्तर सटा हुआ ॥8॥पूर्व धातकी खण्ड द्वीप में संजातक भगवान् हैं ।प्रभु स्वयंप्रभ ऋषभानन व अनंतवीर्य विद्यमान हैं ॥9॥खण्ड धातकी पश्चिम दिशि में चार जिनेश्वर शोभावान ॥प्रभु सूरिप्रभ अर विशाल-कीर्ति का मैं करता गुणगान ॥10॥प्रभू वज्रधर व चन्द्रानन भगवन की छवि न्यारी है।मुखमण्डल को ध्यान से देखो मुद्रा अति ही प्यारी है ।।11।।पुष्करार्ध के इसी तरह द्वय भाग सदा से बने हुए ।कारण इष्वाकार बीच में दक्षिण उत्तर तने हुए ॥12॥पूर्व भाग में चन्द्रबाहु अर, प्रभू भुजंगम हैं जानो ।ईश्वर स्वामी नेमीप्रभु को, सर्वहितंकर हैं मानो ॥13॥पश्चिम में हैं वीरसेन व महाभद्र स्वामी भगवान् ।और देवयश अजितवीर्य की, दिव्य देशना है गतिमान ।।14।।समवसरण की महिमा न्यारी, सबको आकर्षित करती।वीतरागता छवि प्रभू की, राग-द्वेष कल्मष हरती ॥15॥
इक सौ सत्तर तीर्थंकर, ज्यादा से ज्यादा हो सकते।ढाई द्वीप में एक साथ, इससे ज्यादा न हो सकते ॥16॥किन्तु न्यूनतम बीस सदा हैं, उनसे कम नहिं होते हैं।दिव्यवाणी से भाव्यजनों के सारे कल्मष धोते हैं ।।17।।आयु पूर्व कोटि है सबकी, धनुष पाँच सौ काया जान।एक जाएँ जब मोक्ष तभी, दूजे हो जाते हैं विद्यमान ॥18॥दिव्यध्वनि खिरती रहती है, मोक्षमार्ग न रुकता है ।षट् द्रव्यों व नव तत्त्वों का, वर्णन चलता रहता है ॥19॥जीव सदा ही तत्त्वलाभ लें, आत्मतत्त्व दर्शन करते ।कुछ तो दीक्षा लेकर मुनि बन, निज में ही केली करते ।।20।।कुछ होकर एकाग्र आत्म में, केवलज्ञान प्राप्त करते ।कुछ की दिव्यध्वनि खिरती है, कुछ केवली मौन रहते ।।21।।कुछ जल्दी ही गुणस्थान, चौदहवें में हैं आ जाते ।अ इ उ ऋ लृ समय बिताकर, सिद्ध प्रभू हैं बन जाते ।।22।।यही जानकर उन बीसों के, दर्शन को मन ललचाता ।दिव्यध्वनि प्रत्यक्ष सुनूँ, यह भाव सदा मुझको आता ॥23॥प्रभुवर जैसा मार्ग बताते, उसी मार्ग से जाऊँगा ।अर्घ्य चढ़ाऊँ यही भावना, पद अनर्घ्य को पाऊँगा ।।24।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसीमंधरादि-विद्यमान-विंशति-तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
विशेष -1. सम्पूर्ण ढाईद्वीप में सदाकाल कम से कम विहरमान 20 व ज्यादा से ज्यादा 170 तीर्थकरहोते हैं।2. धन्य हैं वे जीव जो साक्षात् तीर्थंकर की वाणी का लाभ प्रत्यक्ष लेते हैं।3. सबसे ज्यादा धन्य वे हैं, जो तीर्थंकर की वाणी का लाभ लेकर उस वाणी के मर्म कोजानकर स्वयं ही संसार सागर से तिर जाते हैं।सातसौ बीस तीर्थंकरों के लिए अर्घ्य( अब ढाईद्वीप में 5 भरत व 5 ऐरावत सम्बन्धी दस क्षेत्रों कीत्रिकाल चौबीसी के कुल 720 तीर्थंकरों के लिए अर्घ्य समर्पित करते हैं)
वीर छन्द
ढाई द्वीप में पंच भरत व पंचैरावत क्षेत्र महान् ।सभी जगह चौबीसों भगवन दो सौ चालिस महिमावान ॥तीन काल में सात शतक व बीस तीर्थंकर हो जाते ।उनके मार्ग पे चलने वाले मुक्ति वधू को पा जाते ॥(पुष्पांजलिं क्षिपेत्)(प्रत्येक चौबीसी के लिए पृथक् - पृथक् अर्घ्य )
वीर छन्द
बहुत दिनों से अखियाँ तरसीं, प्रभुवर दर्शन पाने को ।निर्वाणादि चौबीसों प्रभु के गुण कीर्तन गाने को ॥भगवद् दर्शन पाते ही, निज दर्शन की अब चाह जगी ।अर्घ्य चढ़ाकर पद अनर्घ्य, पाने की सम्यक् राह मिली ।।1।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीजम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-निर्वाणादि-चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वर्तमान के चौबीसों प्रभु को मैं करता वंदन आज ।आदिनाथ से महावीर तक का करता अभिनन्दन आज ॥मार्ग आपका पाने को, मैं आज शरण में आया हूँ ।अष्ट द्रव्यमय अर्घ्य चढ़ाने, प्रभु चरणों में लाया हूँ।॥2॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीजम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-ऋषभादि-चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भरत क्षेत्र में होने वाले महापद्म आदि तीर्थेश ।शत इंद्रों से वंदनीय वे, हो जायेंगे सर्व जिनेश ॥उनकी भक्ति पूजन का तो भाव अभी उमगाया है ।हर्षित मन हो अर्घ्य चढ़ाने, भक्त शरण में आया है ॥3॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीजम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-महापद्मादि-चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ऐरावत के भूतकाल के पंचरूप आदि जिनराज ।त्रिजग वंद्य त्रैलोक्य-दर्शि, उनने बतलाया वस्तुस्वभाव ॥कोई किसी का कर्ता नहिं, यह बात सदा से नक्की है ।प्रभु दर्शन से निर्णय होता, यही भावना पक्की है ॥4॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीजम्बूद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-पंचरूपादि-चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्चा का जब भाव जगा तो चर्चा हुई सभी के बीच ।ढाई द्वीप के दर्शन करने को मेरा मन लाया खींच ॥बालचन्द्र आदि जिनवर तो वीतरागता धारी हैं ।मोक्षमार्ग बतलाने वाले हम उनके आभारी हैं ॥5॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीजम्बूद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-बालचंद्रादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सिद्धार्थादि भगवंतों को मैं करता हूँ अभी प्रणाम ।भाविकाल में सिद्ध बनेंगे, ऐसा मैं आगम से जान ॥
आया हूँ मैं यही पूछने किस पथ से तुम जाओगे ?और बताओ मुक्ति-वधू से किस विधि से मिलवाओगे ?।।6।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीजम्बूद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-सिद्धार्थादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जल फल आठों द्रव्यों से मैं अर्घ्य बनाकर लाया हूँ ।पद अनर्घ्य पाने की इच्छा, तुम्हें बताने आया हूँ ॥रत्नप्रभ आदि जिनवर ने वस्तु-स्वरूप बताया है ।इसी बात का निर्णय करने भक्त शरण में आया है ॥7॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वधातकीखण्डद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-रत्नप्रभादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्टकर्म के नाश हेतु यह अष्ट द्रव्यमय अर्घ्य बना ।श्री युगादि के चरणों में, अर्पण करने का भाव बना ॥अर्घ्य करूँ मैं तुमको अर्पण, निज में समर्पण हो जाये ।मुक्ति वधू तैयार खड़ी है, उससे वरण अब हो जाये ॥8॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वधातकीखण्डद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-युगादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जैसे द्रव्य और गुण पर्यायें होती हैं जिनवर कीं ।उसीतरह मम आतम की हैं, यही विधि निज दर्शन की ।।नमन करूँ सिद्धार्थादि को, जिनने बतलायेंगे विधि महान् ।ज्ञान चक्षु से जब यह जानूँ, प्राप्त करूँ मैं सम्यग्ज्ञान ॥9॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वधातकीखण्डद्वीप भरतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-सिद्धार्थादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
झलके लोकालोक ज्ञान में, ज्ञान की ऐसी महिमा है ।जो होना वह सब निश्चित है, प्रभुवर का यह कहना है ॥वज्र स्वामी आदि प्रभु से मैं यही कामना करता हूँ ।ऐसी दृढ़ता पाने को मैं अर्घ्य समर्पित करता हूँ ॥10॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वधातकीखण्डद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-वज्रस्वामी-आदि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जन-जन व कण-कण स्वतंत्र हैं प्रभुवर हमें बताते हैं ।सभी स्वयं में स्वयं पूर्ण हैं, ऐसा ज्ञान कराते हैं ॥प्रभू अपश्चिम आदि जिनेश्वर को नमता मैं बारंबार ।अर्घ्य चढ़ाकर यही प्रार्थना, हो जाऊँ भवसागर पार ।।11।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वधातकीखण्डद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-अपश्चिमादि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भावि काल में होने वाले प्रवरवीर आदि भगवान् ।लोकालोक के ज्ञाता होंगे दिव्यध्वनि होगी गतिमान ॥भविजीवों को लाभ मिलेगा, वे भव से तिर जायेंगे ।उनको अर्घ्य चढ़ाने वाले, पद अनर्घ्य को पायेंगे ॥12॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वधातकीखण्डद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-प्रवरवीरादि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
भूतकाल में वृषभादि ने मुक्तिरमा का वरण किया ।आत्मसाधना की व कराई, राग-द्वेष का शमन किया ॥अनेकांत व स्याद्वाद मय वाणी का संचार हुआ ।अर्घ्य चढ़ाऊँ प्रभू आपको, जग का बेड़ा पार हुआ ।॥13॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमधातकीखण्डद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-वृषभादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मनुज आदि पर्यायों में जो मूढ़ वे मिथ्यादृष्टि हैं ।द्रव्य दृष्टि करने वाले ही, सच्चे सम्यग्दृष्टि हैं ॥द्रव्य दृष्टि की विधि समझने श्री चरणों में आया हूँ ।विश्व चन्द्र जी आदि को मैं अर्घ्य चढ़ाने लाया हूँ ।॥14॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमधातकीखण्डद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-विश्वचन्द्रादि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पंचभाव में परम पारिणामिक का आश्रय जो लेते ।मुक्तिमार्ग को पाकर फिर वे मुक्ति वधू को वर लेते ॥
इसी विधि से रक्तकेशजी आदि शिवपुर जायेंगे ।अर्घ्य चढ़ाऊँ उनको वे तो यही मार्ग बतलायेंगे ॥15॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमधातकीखण्डद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-रक्तकेशादि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
भव कष्टों से बचने हेतु, अष्ट कर्म को नष्ट किया ।अष्टम वसुधा पाई प्रभु ने सुख अनंत को प्रकट किया ॥अष्ट द्रव्यमय अर्घ्य बनाकर, प्रभु चरणों में अर्पण है ।श्री सुमेरु आदि भगवन को मेरा शत-शत वंदन है ॥16॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमधातकीखण्डद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-सुमेरु-आदि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जगत् स्वयं परिणमनशील है, इसका कौन विधायक है ।होने वाला ही होता है, इसकी नियति नियामक है ।।श्री साधित आदि तीर्थंकर, मुझको यह दृढ़ करवा दो ।अर्घ्य समर्पित श्री चरणों में मुक्ति वधू से मिलवा दो ॥17॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमधातकीखण्डद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-साधितादि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गुणस्थान होते चौदह हैं,आप होयेंगे इनसे पार ।घाति-अघाति कर्म नशेंगे, गुण प्रकटेंगे अष्ट प्रकार ॥श्री रवीन्दु आदि जिनवर के चरणों में मैं नमन करूँ ।पाप-पुण्य मय कर्म को तजकर, सिद्धालय में गमन करूँ ।।18।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमधातकीखण्डद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-रवीन्दु-आदि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इक क्षण में निजरस को पीकर, मिथ्यामल को धोया था ।दीक्षा लेकर निज उपवन में सर्व कर्ममल खोया था ॥दमनेन्द्रादि आज विराजे, सिद्धालय में हुए महान् ।अर्घ्य चढ़ाकर प्रभू मार्ग से पहुँचूँगा मैं शिवपुर थान ॥19॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वपुष्करार्धद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-दमनेन्द्रादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
समय-समय के परिवर्तन में हर पर्याय सुनिश्चित है ।फेरफार उसमें न होता, क्योंकि पूर्ण व्यवस्थित है ॥जगन्नाथजी आदि जिनेश्वर यही बात बतलाते हैं ।इसे मानने वाले भविजन, भव समुद्र तिर जाते हैं ।॥20॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वपुष्करार्धद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-जगन्नाथादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री बसंतध्व आदि नाम के होने वाले भावि जिनेश ।तीन लोक के नाथ बनेंगे, होगा उनका सद् उपदेश ॥जो मन थिरकर सुनेंगे भविजन रत्नत्रय को पायेंगे ।अल्पकाल में मुक्ति प्राप्तकर, सिद्धक्षेत्र बस जायेंगे ॥21॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वपुष्करार्धद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-बसंतध्वादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जीव जुदा पुद्गल भी जुदा है, जिनने ऐसा माना था ।राग आग है, इसे बुझाना, जिनने ऐसा ठाना था ।।कृतिनाथ आदि जिनवर वे सुख अनंत के धारी हैं ।अर्घ्य चढ़ाऊँ भगवंतों को, जो सब मंगलकारी हैं ।॥22॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वपुष्करार्धद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-कृतिनाथादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कोई छोटा बड़ा नहीं है, द्रव्यदृष्टि से एक समान ।जीव त्रिकाली ज्ञाता है बस और नहीं उसको कुछ काम ॥वर्तमान के शंकरादि की, दिव्य ध्वनि में यह आया ।नमन करूँ सब भगवंतों को, सत्स्वरूप है समझाया ॥23॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वपुष्करार्धद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-शंकरादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूँ, सब ज्ञानानन्द स्वभावी हैं ।सब हैं अपने में स्वयं पूर्ण, शिवपथ के ही सब राही हैं ।॥
श्री यशोधरादि ऐसा ही जान, मोक्ष में जायेंगे ।अर्घ्य चढ़ाकर हम भी उन सम, मोक्षमार्ग फल पायेंगे ।।24।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपूर्वपुष्करार्धद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-यशोधरादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भक्त निहारें प्रभु ओर, पर प्रभु निहारें स्व की ओर ।शिक्षा मिलती इससे कि सब जीव निहारें निज की ओर ॥पद्मचन्द्रजी आदि जिनेश्वर ने यह मंगल काम किया ।नमूँ सभी चौबीसों को मैं, उनने हमें सन्मार्ग दिया ॥25॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमपुष्करार्धद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-पद्मचन्द्रादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अप्रमत्त जो नहीं हुआ अर सप्रमत्त भी नहीं हुआ ।शुद्ध त्रिकाली ज्ञायक जैसा था वह तो वैसा ही रहा ॥श्री सर्वांग आदि जिनवर सब, यही बात बतलाते हैं ।ऐसी श्रद्धा करने वाले, निश्चित शिवपुर जाते हैं ।॥26॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमपुष्करार्धद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-सर्वांगादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दुनिया के भगवान् निराले, सबको भक्त बनाते हैं ।प्रभू आप सम कोई न जग में, भगवन हमें बताते हैं ॥अर्घ्य चढ़ाकर यही प्रार्थना, भक्त नहीं भगवान् बनूँ ।प्रभू प्रभावक आदि जिनेश्वर का मैं मंगलगान करूँ ।॥27॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमपुष्करार्धद्वीपे भरतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-प्रभावकादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निश्चय से मैं एक शुद्ध व ममता रहित निराला हूँ ।दर्शज्ञान से पूर्ण सदा अपने में रहने वाला हूँ ॥इसी बात की श्रद्धा हेतू जिन चरणों में आया हूँ ।उपशांतादि भगवंतों को अर्घ्य चढ़ाने लाया हूँ ।॥28॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमपुष्करार्धद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भूतकालीन-उपशांतादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो जाने निज आत्म शुद्ध, वह शुद्ध स्वयं हो जाता है ।जो जाने निज को अशुद्ध, वह तो अशुद्धता पाता है ॥गांगेयक आदि जिनवर तो सबको शुद्ध बताते हैं ।उनको नमने वाले भविजन, सभी शुद्ध हो जाते हैं ।॥29॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमपुष्करार्धद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ वर्तमानकालीन-गांगेयकादि-चतुर्विंशति- तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ऐरावत के भाविकाल के प्रभू अदोषिक आदि जिनेश ।पश्चिम पुष्करार्ध में होंगे, होगा उनका सद् उपदेश ॥तत्त्वज्ञान की वर्षा होगी, भविजन लाभ उठायेंगे ।भवाताप से तप्त जीव, भवसिंधु पार हो जायेंगे ॥30॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपश्चिमपुष्करार्धद्वीपे ऐरावतक्षेत्रस्थ भविष्यत्कालीन-अदोषिकादि- चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ध्यातव्य1. ढाईद्वीप में 5 भरत व 5 ऐरावत क्षेत्र की त्रिकाल चौबीसी संबंधी 720 तीर्थंकरहोते हैं।2. वे कोई नया मार्ग नहीं बताते, किन्तु अनादि काल से लेकर अनंत सर्वज्ञभगवंतों ने जो बताया हुआ है, उसका ही निरूपण करते हैं।3. उनकी दिव्यध्वनि में सभी जीवों के लिये कल्याणकारी वस्तुस्वरूप कीपहचान कराने वाले अमृतमयी वचन निकलते हैं।4. उनके उपदेश में अकर्तावाद, वस्तु का परिणमन व अपरिणामी स्वभाव, द्रव्य-गुण-पर्याय का स्वरूप, वस्तुस्वातंत्र्य व जीव एकमात्र ज्ञायकभावरूप है,इत्यादि निरूपण रहता है।5. जो जीव उन भगवंतों को जानते हैं, उनकी वाणी के मर्म को पहचानते हैं, उनकेसमान 'मैं स्वयं हूँ।' ऐसा स्वीकारते हैं, वे स्वयं भगवान् बन जाते हैं।
श्री सीमंधर स्वामी के लिए अर्घ्य(विष्णुपद छन्द) (तर्ज - 'कहाँ गए चक्री जिन जीता ......')जम्बूद्वीप में वैदेही पर देह सहित जानो ।पूर्व विदेह में विहरमान श्री सीमंधर मानो ॥देह के अंदर आत्म समुंदर निराकार जानो ।ज्ञान तरंगें उछलें प्रतिपल उनको पहचानों ॥दिव्यध्वनि में अमृत बरसे प्रतिपल पीना है ।नहीं देह में, निज देही में सदा ही जीना है ॥इसी भाव को दृढ़ करने, मैं प्रभू शरण आया ।अष्टद्रव्यमय अर्घ्य चढ़ाने प्रभू चरण लाया ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री आदिनाथ भगवान् के लिए अर्घ्य
वीर छन्द
जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में, षट्खण्डों में आर्य प्रधान ।उसमें सुंदर नगरी अयोध्या में जन्मे श्री ऋषभ महान् ।।राजभोग भोगे उनने पर, तृप्ति न उनको मिल पायी ।नर्तकी नीलांजना की मृत्यु, से कुछ बात समझ आयी ।।धरा दिगम्बर वेश उन्होंने, निज उपवन में गुस हुए।निज स्वरूप में तृप्त हुए तो, अती शीघ्र ही मुक्त हुए ॥ऐसे प्रभु आदि तीर्थंकर, की पूजन करने आया ।मुक्ति मिले बस यही लक्ष्य ले, अर्घ्य चढ़ाने हूँ लाया ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसीमंधरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
नोट : ढाईद्वीप जिनालय में तल भाग में आदिनाथ भगवान् के दो जिनबिम्ब हैं।भरत - बाहुबली के लिए अर्घ्य
वीर छन्द
भरतचक्री ने षट्खण्डों के रागभाव को त्यागा था ।बाहुबली ने अन्तर्बल से, निज आतम को साधा था ॥सिद्धालय में आज विराजे, दोनों अव्याबाध सुखी ।अर्घ्य चढ़ाऊँ यही भावना, हो जाऊँ मैं आत्म-मुखी ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री भरत - बाहुबलि - जिनेन्द्राभ्याम् अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री पार्श्वनाथ भगवान् के लिए अर्घ्य(चामर छन्द) (तर्ज - 'नीर गंध अक्षतान् ....')जन्मे वाराणसी में, वंश इक्ष्वाकु था ।दिवस पौष कृष्ण एकादशी का ही था ॥आयु तीस में हुआ, उनको जातिस्मरण ।दीक्षा ली वन गए, हुए आत्म में मगन ॥शिखर सम्मेद में, स्वरूप गुप्त हो गए ।तिथि सप्तमी के दिन, आप मुक्त हो गए ॥ऐसे पार्श्वनाथ को नमन करूँ सहस्र बार ।मार्ग आपका चुनूँ तो मिले मुझको मुक्ति द्वार ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्री महावीर स्वामी के लिए अर्घ्य
वीर छन्द
वर्तमान की चौबीसी के अंतिम शासन नायक हैं।सप्त तत्त्व षट् द्रव्य व्यवस्था के ही प्रभु परिचायक हैं।।राग रहित अठ कर्म विजेता, विश्व तत्त्व के ज्ञाता हैं।मोक्षमार्ग बतलाने वाले, सर्व सुखों के दाता हैं।।ऐसे वर्धमान स्वामी की, पूजन करने आया हूँ।पद अनर्घ्य पाने को प्रभु मैं अर्घ्य चढ़ाने लाया हूँ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
दोहा छन्द
विधि - विधान की भावना पूर्ण हो रही आज।सर्व जिनेंद्रों को नमूँ, पाऊँ शिवपद राज।।1।।
रोला छन्द
मेरा तो लाखों जन्मों का पुण्य फला है,और करोड़ों जन्मों का तो पाप गला है।इसीलिए तो इतने सारे भगवंतों के,दर्शन-पूजन करने का सौभाग्य मिला है।।2।।
जिधर देख लो उधर राग का नाम नहीं है,नजर घुमाओ कहीं द्वेष का काम नहीं है।मन करता है दृष्टि यहाँ से नहीं हटाऊँ,इन सबको मैं छोड़ यहाँ से कहीं न जाऊँ॥3॥यहाँ के सारे भगवन सबको प्रभू बताते,बिन बोले ही हमको मुक्ति मार्ग दिखाते।भक्त नहीं, भगवान् बनो, बस इतना ही ना,बने बनाये भगवन हो, यह ज्ञान कराते।।4।।एक समय था जग के हमने भगवन देखे,राग-द्वेष के चिह्न वहाँ, जी भर-भर देखे।किन्तु तृप्ति तो मिली न मुझको उनमें पलभर,राग-द्वेष से कर्मों का भर लिया समुंदर।।5।।उसी समुंदर को खाली करने का अवसर,ढाईद्वीप की पावन भू पर आज मिला है।सभी वीतरागी भगवानों के दर्शन से,कर्म समुंदर सूख रहा है, सूख रहा है॥6॥ऐसे भगवानों की महिमा निशि-दिन गाओ,गुणों के सागर भगवानों के गीत सुनाओ।उन्हीं की भक्ति, उन्हीं की पूजन प्रतिदिन करना,मन में उनके सिवा किसी को कभी न रखना।।7।।बड़े भाग्य से मिले हैं हमको ऐसे भगवन,भगवन बनने का ही वे तो मार्ग बताते।और जगत् की सभी कल्पनाओं का खंडन,करके सबको सच्चे सुख का मार्ग दिखाते।।8।।दुनिया के भगवान् सभी को दास बनाते,भगवन 'आतम दास' प्रभू हमको समझाते।
उसी आत्मा की शरणा में जो कोइ जाता,अल्पकाल में वही आत्म, भगवन बन जाता।।9।।अरे जगत् के लोग प्रभु से भोग माँगते,लाड़ी बाड़ी गाड़ी का संयोग माँगते।उन्हीं भरोसे नैया पानी में खे देते,प्रभु पार कर देंगे ऐसा भाव संजोते ॥10॥प्रभु कहें संयोगों में सुख नहीं रखा है,जीव मात्र ने इनको अगणित बार भखा है।प्रभु भरोसे नैया तुम तो कभी न खेना,वरना वह तो डूब जाएगी, डूब जाएगी।।11।।सच तो यह है जग में सुख तो रंच नहीं है,जैसे जल में घी व रज में तेल नहीं है।अम्मा की सुइ जहाँ गिरी है, वहाँ मिलेगी,निज में सुख है, वह तो निज आतम में मिलेगा।।12।।ग्यारह सौ पैंसठ भगवन सब हमें बताते,निज में रहकर सबको निजका ज्ञान कराते।निज को अपना मानो, निज में ही रम जाओ,आत्मक्षेत्र में सिद्धक्षेत्र में जा बस जाओ।।13।।
दोहा छन्द
इस सारे ब्रह्माण्ड में शरण बताओ कौन ?एक आत्मा, फिर प्रभु, तृतीय शरण है मौन।।14।।ढाईद्वीप में आयकर, धन्य हुआ मैं आज।विधि-विधान पूरा किया, सच्चे मन से आज।।15।।आज बनी है भावना, वह पूरी कर पाऊँ।ग्यारह सौ पैंसठ यहाँ, छ्यासठवाँ हो जाऊँ।।16।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्रीढाईद्वीपस्थ-पंचषष्टिरधिकैकादशशत-जिनेन्द्रेभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
॥ जय जिनेन्द्र ॥