जिनेन्द्र वाणी

श्री नमिनाथ जिन पूजा

कविवर वृन्दावन · तीर्थंकर पूजा

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स्थापना

श्री नमिनाथ जिनेन्द्र नमौं विजयारथ नन्दनविख्यादेवी मातु सहज सब पाप निकन्दन ॥

अपराजित तजि जये मिथिलापुर वर आनन्दनतिन्हें सु थापौं यहाँ त्रिधा करि के पदवन्दन ॥

आह्वाननॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं

स्थापनॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं

सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं

अष्टक

सुरनदी जल उज्ज्वल पावनं, कनक भृंग भरौं मन भावनंजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदांबुज प्रीति लगाय के ॥

जलॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा

हरिमलय मिलि केशर सों घसौं, जगतनाथ भवातप को नसौंजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

चंदनॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा

गुलक के सम सुन्दर तंदुलं, धरत पुञ्जसु भुंजत संकुलंजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

अक्षतॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा

कमल केतुकी बेलि सुहावनी, समरसूल समस्त नशावनीजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

पुष्पॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा

शशि सुधासम मोदक मोदनं, प्रबल दुष्ट छुधामद खोदनंजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

नैवेद्यॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं निर्वपामीति स्वाहा

शुचि घृताश्रित दीपक जोइया, असम मोह महातम खोइयाजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

दीपॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा

अमरजिह्व विषें दशगंध को, दहत दाहत कर्म के बंधकोजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

धूपॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा

फलसुपक्व मनोहर पावने, सकल विघ्न समुह नशावनेजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

फलॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा

जल फलादि मिलाय मनोहरं, अरघ धारत ही भवभय हरंजजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

पंचकल्याणक

गरभागम मंगलचारा, जुग आश्विन श्याम उदाराहरि हर्षि जजे पितुमाता, हम पूजें त्रिभुवन-त्राता ॥

गर्भ कल्याणकॐ ह्रीं आश्विनकृष्णा द्वितीयां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

जनमोत्सव श्याम असाढ़ा, दशमी दिन आनन्द बाढ़ाहरि मन्दर पूजे जाई, हम पूजें मन वच काई ॥

जन्म कल्याणकॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णा दशम्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

तप दुद्धर श्रीधर धारा, दशमी कलि षाढ़ उदारानिज आतम रस झर लायो, हम पूजत आनन्द पायो ॥

तप कल्याणकॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णा दशम्यां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

सित मंगसिर ग्यारस चूरे, चव घाति भये गुण पूरेसमवस्रत केवलधारी, तुमको नित नौति हमारी ॥

ज्ञान कल्याणकॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लैकादश्यां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

वैसाख चतुर्दशि श्यामा, हनि शेष वरी शिव वामासम्मेद थकी भगवन्ता, हम पूजें सुगुन अनन्ता ॥

मोक्ष कल्याणकॐ ह्रीं वैशाखकृष्णा चतुर्दश्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

जयमाला

आयु सहस दश वर्ष की, हेम वरन तनसारधनुष पंचदश तुंग तनु, महिमा अपरम्पारजय जय जय नमिनाथ कृपाला, अरिकुल गहन दहन दवज्वालाजय जय धरम पयोधर धीरा, जय भव भंजन गुन गम्भीराजय जय परमानन्द गुनधारी, विश्व विलोकन जनहितकारीअशरन शरन उदार जिनेशा, जय जय समवशरन आवेशाजय जय केवल ज्ञान प्रकाशी, जय चतुरानन हनि भवफांसीजय त्रिभुवनहित उद्यम वंता, जय जय जय जय नमि भगवंताजै तुम सप्त तत्व दरशायो, तास सुनत भवि निज रस पायोएक शुद्ध अनुभव निज भाखे, दो विधि राग दोष छै आखेदो श्रेणी दो नय दो धर्मं, दो प्रमाण आगमगुन शर्मंतीनलोक त्रयजोग तिकालं, सल्ल पल्ल त्रय वात वलायंचार बन्ध संज्ञागति ध्यानं, आराधन निछेप चउ दानंपंचलब्धि पंचभाव शिव भौनें, छहों दरब सम्यक् अनुकौनेहानिवृद्धि तप समय समेता, सप्तभंग वानी के नेतासंयम समुद् घात भय सारा, आथ करम मद सिध गुन धारानवों लबधि नवतत्व प्रकाशे, नोकषाय हरि तूप हुलाशेदशों बन्ध के मूल नशाये, यों इन आदि सकल दरशायेफेर विहरि जगजन उद्धारे, जय जय ज्ञान दरश अविकारेजय वीरज जय सूक्षमवन्ता, जय अवगाहन गुण वरनंताजय जय अगुरुलघू निरबाधा, इन गुनजुत तुम शिवसुख साधाता कों कहत थके गनधारी, तौ को समरथ कहे प्रचारीता तैं मैं अब शरने आया, भवदुख मेटि देहु शिवरायाबार बार यह अरज हमारी, हे त्रिपुरारी हे शिवकारी ॥

पर-परणति को वेगि मिटावो , सहजानन्द स्वरुप भिटावो‘वृन्दावन’ जांचत शिरनाई, तुम मम उर निवसो जिनराईजब लों शिव नहिं पावौं सारा, तब लों यही मनोरथ म्हाराजय जय नमिनाथं हो शिवसाथं, औ अनाथ के नाथ सदमता तें शिर नायौ, भगति बढ़ायो, चीह्न चिह्न शत पत्र पदम

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

श्री नमिनाथ तने जुगल, चरन जजें जो जीवसो सुर नर सुख भोगकर, होवें शिवतिय पीव ॥

इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)

॥ जय जिनेन्द्र ॥

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  1. श्री नमिनाथ भगवान की आरतीइक्कीसवें तीर्थंकर · चिह्न नीलकमल