नंदीश्वर द्वीप पूजा
पं. द्यानतराय · पर्व पूजा
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सरब-परव में बड़ो अठाई परव है ।नंदीश्वर सुर जाहिं लेय वसु दरब है ॥
हमें सकति सो नाहिं इहाँ करि थापना ।पूजें जिनगृह-प्रतिमा है हित आपना ॥
आह्वाननॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)
स्थापनॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः! (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)
अष्टक
कंचन मणि मय भृंगार, तीरथ नीर भरा ।तिहुँ धार दई निरवार, जामन मरन जरा ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
जलॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥
भव तप हर शीतल वास, जो चंदन नाहीं ।प्रभु यह गुन कीजै साँच, आयो तुम ठाहीं ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
चंदनॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः भवताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥
उत्तम-अक्षत जिनराज, पुंज धरे सोहे ।सब जीते अक्ष समाज, तुम सम अरु को है ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
अक्षतॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥
तुम कामविनाशक देव, ध्याऊँ फूलन सों ।लहुँ शील लच्छमी एव, छूटूं सूलन सों ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
पुष्पॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥
नेवज इंद्रिय-बलकार, सो तुमने चूरा ।चरु तुम ढिंग सोहे सार, अचरज है पूरा ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
नैवेद्यॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥
दीपक की ज्योति प्रकाश, तुम तन माहिं लसे ।टूटे करमन की राश, ज्ञान कणी दरसे ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
दीपॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥
कृष्णागरु धूप सुवास, दश दिशि नारि वरें ।अति हरष भाव परकाश, मानों नृत्य करें ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
धूपॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥
बहुविधि फल ले तिहुँ काल, आनंद राचत हैं ।तुम शिव फल देहु दयाल, तुहि हम जाचत हैं ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
फलॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥
यह अरघ कियो निज हेत, तुमको अरपतु हूँ ।“द्यानत” कीज्यो शिव खेत भूमि समरपतु हूँ ॥
नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पूज करूँ ।वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥
जयमाला
दोहा
कार्तिक फाल्गुन साढ़ के, अंत-आठ-दिन माँहिं ।नंदीश्वर सुर जात हैं, हम पूजें इह ठाहिं ॥1॥
लक्ष्मी छंद
एक सौ त्रेसठ कोडि जोजन महा ।लाख चौरासिया एक-दिश में लहा ॥
आठमों द्वीप नंदीश्वरं भास्वरं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥2॥
चार-दिशि चार अंजनगिरी राजहीं ।सहस-चौरासिया एक दिशि छाजहीं ॥
ढोल सम गोल ऊपर तले सुन्दरं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥3॥
एक इक चार दिशि चार शुभ बावरी ।एक इक लाख जोजन अमल-जल भरी ॥
चहुँ दिशा चार वन लाख जोजन वरं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥4॥
सोल वापीन मधि सोल-गिरि दधिमुखं ।सहस दश महाजोजन लखत ही सुखं ॥
बावरी कोण दो माँहि दो रतिकरं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥5॥
शैल-बत्तीस इक सहस जोजन कहे ।चार सोलै मिलैं सर्व बावन लहे ॥
एक-इक सीस पर एक जिनमंदिरं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥6॥
बिंब अठ एक सौ रतनमयि सोहहीं ।देव देवी सरब नयन मन मोहहीं ॥
पाँचसै धनुष तन पद्म-आसन परं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥7॥
लाल नख-मुख नयन स्याम अरु स्वेत हैं ।स्याम-रंग भौंह सिर-केश छवि देत हैं ॥
वचन बोलत मनों हँसत कालुष हरं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥8॥
कोटि-शशि-भानु-दुति-तेज छिप जात है ।महा-वैराग-परिणाम ठहरात है ॥
वयन नहिं कहें, लखि होत सम्यक्धरं ।भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥9॥
सोरठा छन्द
नंदीश्वर-जिन-धाम, प्रतिमा-महिमा को कहे ।‘द्यानत’ लीनो नाम, यही भगति शिव-सुख करे ॥
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिशु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यः जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
॥ इत्याशीर्वादः पुष्पांजलिं क्षिपेत् ॥
॥ जय जिनेन्द्र ॥