श्री सहज शान्ति विधान
पं. अभयकुमार शास्त्री, देवलाली · विधान पूजा
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(हरिगीत)
हे सहज शान्ति स्वरूप जिनवर ! शरण आया आपकी।तव शान्त छवि को निरख कर हो शान्त ज्वाला राग की।।सुख शान्तिदायक वचन शीतल आपकी ध्वनि में खिरें।मानो विषय-व्याकुल भविक के कर्ण में अमृत झरें।।1।।पर-द्रव्य में जो कल्पना प्रभु इष्ट और अनिष्ट की।है पंच इन्द्रिय-विषय में ही कल्पना सुख मिष्ट की।।चैतन्य ही सुख-शान्ति का अक्षय अनंत निधान है।यह ज्ञान अरु श्रद्धान सम्यक् शान्ति का सुविधान है।।2।।प्रभु ! परम शान्ति प्राप्त करने का विधान बता दिया।निज दृष्टि अर निज लीनता में शान्ति-पथ दर्शा दिया।।नासाग्र-दृष्टि शान्त मुद्रा निरख जग-जन भी प्रभो।सुख-शान्ति का अनुभव करें यदि आपकी पहचान हो।।3।।
दोहा
परम शान्ति की खोज में सारा जगत् अशान्त।निर्ग्रन्थों के पंथ में है यथार्थ सुख-शान्ति ।।4।।पंच प्रभु को नमन कर उनका ही गुणगान -करने का अवसर मिला रचकर शान्ति विधान।।5।।इस विधान को समझ कर मिटे जगत् की भ्रान्ति।परिणति में प्रकटे प्रभो! शाश्वत सम्यक् शान्ति।।6।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)
पूजा
स्थापना
(हरिगीत)
मैं सहज शान्तिस्वरूप सर्व जिनेन्द्र की पूजा करूँ।मैं शान्त शीतल वचन उनके अल्प मति-श्रुत में धरूँ।।निर्ग्रन्थता की भावना तब तक रहे मम चित्त में।जब मैं स्वयं निर्ग्रन्थ हो निर्ग्रन्थ-पथ पर चल पडूं।।1।।उत्तुंग भव्य जिनालयों को भाव से वन्दूँ सदा।अन्तर्मुखी जिनबिम्ब को दृग-ज्ञान में निरखूँ सदा।।स्याद्वादमय जिनवचन से निज शान्ति-स्वाद चखूँ सदा।सम्यक् सुदर्शन-ज्ञान-चारित का प्रवाह बहे सदा।।2।।क्षेत्र ऐरावत-भरत त्रय-कालवर्ती सकल जिन।पाँचों विदेही क्षेत्र में शाश्वत विराजें बीस जिन ।।पंच परमेष्ठी सु-छवि उर में करूँ स्थापना।अब शान्ति का संगीत गूँजे जगत् में यह भावना।।3।।
दोहा
सहज शान्तिदायक प्रभो ! आओ दृष्टि मँझार।उर सिंहासन राजिये करो परम उपकार।।4।।
आह्वाननॐ ह्रीं सहजशान्तिप्रदर्शक-सर्वजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । (इति आह्वानम्।) ॐ ह्रीं सहजशान्तिप्रदर्शक-सर्वजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
(इति स्थापनम् ।) ॐ ह्रीं सहजशान्तिप्रदर्शक सर्वजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितोभव भव वषट् । (इति सन्निधिकरणम् । इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)
वीरछन्द
रागादिक विकार विरहित है अतः शान्त चैतन्य स्वभाव।स्वानुभूतिमय निर्मल जल से जन्म-मरण का करूँ अभाव।।
जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान।।
जलॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-सर्वजिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
द्रव्य और गुण परिणति चिन्मय राग द्वेष दुर्गन्ध विहीन।अनुभव में जब विलसित होता भवाताप हो त्वरित विलीन।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान।।
चंदनॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक - सर्वजिनेन्द्रेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
खंड खंड इन्द्रियसुख इन्द्रिय-ज्ञान करे निज शान्ति विघात।प्रभो! अखंडित चिन्मय-रस में अक्षत सुख का हो उत्पाद।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान।।
अक्षतॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक - सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
चिर अतृप्त इस विषय-वासना से व्याकुल हूँ महा अशांत।स्वानुभूति की सुमन-सुरभि से हो प्रभु ! काम-वासना शांत।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान ।।
पुष्पॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक - सर्वजिनेन्द्रेभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
क्षुधा-व्याधि से विरहित जिन तुम स्वानुभूति रस में हो लीन।गुण अनन्तमय ज्ञायक का रस ज्ञेय-लुब्धता करे विलीन।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान ।।
नैवेद्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक - सर्वजिनेन्द्रेभ्यः क्षुधारोगविध्वंसनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान-ज्योति में सदा प्रकाशित त्रैकालिक ध्रुव ज्ञायक भाव।ज्ञान-दर्श उपयोग सभी का राग रहित चैतन्य स्वभाव।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान ।।
दीपॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
पर-कर्तृत्व वासना से ही जग के प्राणी महा अशान्त।ध्यान-ध्येयमय ध्रुव की धुनमय अनुभूति में शान्ति अनन्त।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान।।
धूपॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं नि.।
इष्ट-अनिष्ट कल्पना तरु में दुखमय फल का स्वाद अशान्त।पर-निरपेक्ष चिदानन्द अनुभव-स्वाद निराकुल शान्ति अनन्त।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान।।
फलॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं नि. स्वाहा।
जग-वैभव का मोह तजूँ प्रभु ! यही अर्घ्य अर्पित है आज।कैसे रहे अनर्घ्य कामना क्योंकि शान्ति का है साम्राज्य।।जिनशासन की शरण प्राप्त कर जग-जन जानें शान्तिविधान।सहज शान्तिमय सर्व जिनेश्वर का मैं करूँ आज गुणगान।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक - सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
।। अर्ध्यावलि ।।
दोहा
सहज शान्ति में हैं निमित जिनशासन स्तम्भ।अभिनन्दन करके करूँ अर्ध्यावलि प्रारम्भ।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)1. पंच परमेष्ठी के लिए अर्घ्य
रोला
अनन्त चतुष्टय भूषित अरहन्तों को वन्दूँ।मोक्षमार्ग के नेता जिनवर को अभिनन्दूँ।।त्रिविध कर्ममलरहित सिद्ध मम ज्ञान-मुकुर में-झलकें सदा, किन्तु वे प्रभु हैं स्व-चतुष्ट्य में।।1।।साधु संघ के नायक श्री आचार्य-प्रवर हैं।गुण छत्तीस सुपालक, भविजन को हितकर हैं।।द्वादशांग के ज्ञाता श्री पाठक मुनिवर हैं।संपूरण श्रुत-सार निजातम बोध प्रवर हैं।।2।।शुद्धातम के साधक परम दिगम्बर गुरु हैं।ज्ञान ध्यान तप-लीन परिग्रह से विरहित हैं।।ऐसे पंच प्रभु नित मेरे उर में बसते ।परम शान्त मुद्रा दर्शन को नयन तरसते ।।3।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-पंचपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
2. चौबीस तीर्थंकरों के लिए अर्घ्य
वीरछन्द
ऋषभ अजित सम्भव अभिनंदन परिणति में चैतन्य विलास।सुमति पद्म एवं सुपार्श्व जिन ज्ञानानन्द में करें विलास।।चन्द्रकिरण-सम चन्द्रप्रभ जिन सुविधिनाथ हैं शान्तिविधान।शीतल वचन-किरण से शीतलनाथ प्रकाशित करें निधान।।1।।श्री श्रेयांस-रु वासुपूज्य जिन मोक्षमार्ग के नेता हैं।विमल अनन्त-रु धर्मनाथ जिन विश्व तत्त्व के ज्ञाता हैं।।शान्ति-कुन्थु-अर जिनवर चक्री-कामदेव सह तीर्थंकर।अन्तर्बाह्यारम्भ परिग्रह तजकर वेश दिगम्बर धर।।2।।
मोह-मल्ल को करें पराजित मल्लिनाथ मुनिसुव्रत देव।धर्म धुरा धारक नमि जिनवर नेमिनाथ देवों के देव ।।भव्यजनों को निज-सम करने वाले पारस पार्श्व जिनेन्द्र।महावीर प्रभु शासन-नायक शीश झुकाते हैं शत इन्द्र ।।3।।रज-मल और जरा मरणान्तक जो मुझसे हैं वन्द्य सदा।चौबीसों जिनवर तीर्थंकर मेरे उर में बसें सदा।।वर्तमान अवसर्पिणि युग में भरतक्षेत्र में ले अवतार।जग को शान्तिविधान बताया नमन करूँ मैं बारम्बार ।।4।।
दोहा
धन्य धन्य चौबीस जिन किया परम उपकार।परम शान्ति शिवमार्ग का दे जग को उपहार।।5।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-चतुर्विंशतिजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
3. विद्यमान बीस तीर्थंकरों के लिए अर्घ्य
दोहा
पाँच विदेही क्षेत्र में सदा विराजें बीस।तीर्थंकर जिनवर प्रभो! नित्य नमाऊँ शीश।।1।।
चौपाई
सीमन्धर निज सीमा धारी युगमन्धर युग-धर्म प्रचारी।दर्शन-ज्ञान बाहु-बल धारी बाहु सुबाहु त्रिलोक निहारी।।2।।संजातक चैतन्य स्वभावी प्रभू स्वयंप्रभ प्रभा निराली।वृषभानन का चेतन आनन वीर्य-अनन्त निराकुल आनंद।।3।।सूर्यप्रभ की प्रभा बखानी कीर्ति-विशाल महा विज्ञानी।वज्रधार मोहारि प्रहारी चन्द्रानन शशि-सम गुणधारी।।4।।भद्रबाहु भद्रनि सुख-राशी भोग-भुजंग भुजंगम नाशी।ईश्वर निज ऐश्वर्य दिखाते नेमप्रभ ध्रुव धुन में रहते।।5।।
वीरसेन हैं मोह-विजेता महाभद्र भद्रों के नेता।नमो यशोधर यश के धारी अजितवीर्य त्रिभुवन उपकारी।।6।।
रोला
बीस नामधारी जिनेन्द्र वर्तें विदेह में।जब कोई जिन सिद्धालय में जाय विराजें ।।उसी नाम के अन्य जिनेश्वर समवसरण में।तीर्थ प्रवर्तन करते शान्ति-विधान बताते।।7।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-विंशतिजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
4. जिनवाणी के लिए अर्घ्य
वीरछन्द
अर्हत् वचनों से प्रसूत गणधर विरचित हैं द्वादश अंग।विविध अनेक अर्थ गर्भित हैं धारें सुधी मुनीश्वर गण।।अग्र-द्वार शिवपुर का, मिलता व्रताचार फल, ज्ञेय-प्रदीप।त्रिभुवन सारभूत श्रुत को मैं नितप्रति वन्दूँ भक्ति सहित।।1।।जिन-ध्वनि से निःसृत वचनों को इन्द्रभूति आदिक गणधर-सुनकर धारण करें प्रकाशित, द्वादशांग को करूँ नमन।।कोटि एक सौ बारह एवं लाख तिरासी अट्ठावन-सहस पाँच पद भूषित अंग-प्रविष्ट ज्ञान को करूँ नमन।।2।।अंग-बाह्य श्रुत में पद हैं कुल आठ करोड़ और इक लाख-आठ हजार एक सौ पचहत्तर पद को नित नमता माथ।।अरहन्तों से कहा गया जो गणधर देवों ने गूँथा।भक्ति सहित श्रुतज्ञान महोदधि को मैं नमस्कार करता।।3।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-द्वादशांगजिनवाणीभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
5. त्रिलोकवर्ती अकृत्रिम चैत्यालयों के लिए अर्घ्य
रोला
तीन लोक के कृत्रिम और अकृत्रिम सारे।जिनमन्दिर को नितप्रति अगणित नमन हमारे।।उनमें जिनवर की अन्तर्मुख छवि को निरखूँ।जिन में निज का निज में जिन - प्रतिबिम्ब निहारूँ।।1।।अकृत्रिम जिनबिम्बों की महिमा अति प्यारी।अकृत्रिम शुद्धात्म तत्त्व का रूप दिखाती।।रत्नमयी जिनबिम्ब पारदर्शी अति शोभें।मणि-स्फटिक समान स्व-पर परिणति झलकाते।।2।।कर्मोदय रंगीन झलक चेतन में दिखती।निर्मल मणि संयोग-निमित से रंगमय दिखती।।ये रागादि विभाव ज्ञान-दर्पण में झलकें।ज्ञान-मुकुर¹ को ज्ञानी छवि² से भिन्न निहारें।।3।।अन्तर्मुख मुद्रा में ज्ञानी निज को निरखें।निर्मल ज्ञान-स्वभावी चिन्मय शाश्वत वर्ते।।रत्नत्रय सन्देश रत्नमय जिन-बिम्बों का।अभिनन्दन मैं करूँ चिदानन्द प्रतिबिम्बों का।।4।।
दोहा
अहो ! भव्य जिन-गेह में बरसे शान्ति अपार।परिणति में बहती प्रभो ! साम्य सुधा-रसधार।।5।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-अकृत्रिमचैत्यालयेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
6. पंचमेरु एवं गजदन्त जिनालयों के लिए अर्घ्य
रोला
पाँच मेरु पाँचों विदेह में शाश्वत राजे।सोलह-सोलह जिनमन्दिर की महिमा भासे।।
रत्नमयी जिनबिम्ब एक शत आठ सुशोभित ।इनमें निज प्रतिबिम्ब निरखकर भविजन हर्षित।।1।।मेरु चतुर्दिश हैं गजदन्त बीस जिनमन्दिर।जिनमें अन्तर्मुख मुद्रामय प्रतिमा शोभित ।।भक्ति सहित मैं करूँ समर्पित जिन-चरणों में।श्रद्धा-सुमन चढ़ाऊँ दर्शन-ज्ञान-चरण में।।2।।
वीरछन्द
मेरु सुदर्शन विजय अचल मन्दर विद्युन्माली अभिराम।जम्बू धातकि पुष्करार्ध में शाश्वत उन्नत दिव्य ललाम।।भद्रशाल नन्दन सुमनस पाण्डुक वन की शोभा न्यारी।दर्शन-ज्ञान-चरित्र वीर्य आराधन भविजन को प्यारी।।3।।।दर्शन-ज्ञान-चरित्र-वीर्य-तप आचारों का दें सन्देश।पूजित-पंचम-परम भाव की आराधन का दें उपदेश।।पंचमेरु गजदन्तों के जिनवर चरणों में करूँ नमन।अर्घ्य समर्पित जिन चरणों में प्रकटें दर्शन-ज्ञान-चरण।।4।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-पंचमेरु-गजदन्तजिनालयेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
7. नन्दीश्वर जिनालयों के लिए अर्घ्य
रोला
मध्यलोक में द्वीप आठवाँ नन्दीश्वर है।चारों दिशि में तेरह तेरह जिन-मन्दिर हैं।।कोटि एक सौ त्रेसठ योजन की दूरी है।किन्तु हमारी परिणति में भक्ति पूरी है।।1।।एक-एक अंजनगिरि दधिमुख चार-चार है।आठ-आठ रतिकर अन्तर्मुख सुखाकार हैं।।
रत्नमयी जिनबिम्ब चिदातम भिन्न दिखाते।मानो जग को परम शान्ति सन्देश सुनाते ।।2।।कार्तिक फागुनऽषाढ़ आठ अन्तिम दिन आते।भक्तिभाव से सुरगण भी पूजन को जाते।।यद्यपि शक्ति नहीं नन्दीश्वर तक जाने की।आगम-आश्रित मति श्रुत में प्रभुमूर्ति झलकती ।।3।।द्रव्य और गुण-पर्यायों से प्रभु को जानूँ।चिन्मय परिणति में चैतन्य स्वभाव पिछानूँ।।मोह-ग्रन्थि हो विलय जिनेश्वर के दर्शन से।परिणति होवे धन्य चिदातम-स्पर्शन से।।4।।
दोहा
निज अकृत्रिम भाव को दर्शाते जिनबिम्ब।आओ भविजन देख लो ! परम शान्त रस पिण्ड।।5।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक- नन्दीश्वरद्वीपस्थ-जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
8. अन्तर्मुख मुद्रावन्त जिनबिम्बों के लिए अर्घ्य
दोहा
परिणामों की स्वच्छता के प्रतीक जिनबिम्ब।क्योंकि इन्हीं में निरखकर निरखूँ निज चिद्द्बिम्ब।।1।।सहज अकर्ता भाव का देते ये संदेश।चिन्मय चेतनभाव ही ज्ञानी का परिवेश।।2।।यद्यपि ये पाषाण या धातु विनिर्मित होंय।अन्तर्मुख मुद्रा लखें भवि मिथ्यामल धोंय।।3।।सम्यग्दर्शन के निमित वीतराग जिनबिंब।स्वानुभूति में विलसता चिदानंद ध्रुव बिंब ।।4।।
प्रतिमा सन्मुख हम करें जिनवर का गुणगान।जग जन को बतला रही देखो शान्ति-विधान।।5।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-सर्वजिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
9. रत्नत्रय धर्म के लिए अर्घ्य
वीरछन्द
जैसे धन का अभिलाषी, धनवानों की सेवा करता।उनकी श्रद्धा और ज्ञान कर उनका पथ ही अनुसरता।।मात्र मुक्ति की अभिलाषा से जीवराज को मैं जानूँ।श्रद्धा-ज्ञान-चरित्र भाव से शिवपुर-पथ निश्चित मानूँ।।1।।साध्यभूत निष्कर्म अवस्था इसी मार्ग से होती प्राप्त।अन्य मार्ग से अनुपपत्ति है कहते सदा जिनेश्वर आप्त।।भेदों के मिश्रण में भी अनुभूति मात्र मैं ज्ञानस्वरूप।भेद-ज्ञान की कला कुशलता देखूँ निज चेतन चिद्रूप।।2।।अपने को अनुभूति मात्र मैं जानूँ - ऐसी करूँ प्रतीति।हो निःशंक प्रवृत्ति आत्म में, साध्य-सिद्धि की यही सुरीति।।यह अनुभूति स्वरूप आत्मा ज्ञान-तरंगों में उछले।पर से है एकत्व जिसे उस मूढ़ बुद्धि को नहीं मिले।।3।।ज्ञानमात्र में व्याप्त चिदातम चिन्मय परिणति में विलसे।यथा सिन्धु जलमय लहरों में मानो आनन्द से उछले।।उदय क्षयोपशम उपशम क्षायिक भावों को सापेक्ष लखूँ।ज्ञानमात्र सामान्य किरण में ज्ञायक दिनकर को निरखूँ।।4।।
दोहा
दर्श-ज्ञान-चारित्रमय एक मुक्ति का मार्ग।साध्य-सिद्धि की यह विधि अन्य सभी उन्मार्ग।।5।।
परम शान्ति पथ कह रहे अमृतचन्द्राचार्य।आत्मख्याति में भर दिया समयसार का सार।।6।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-रत्नत्रयधर्माय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
10. दशलक्षण धर्म के लिए अर्घ्य
रोला
जिनशासन में धर्म कहा है साम्य भाव को।राग-द्वेष से रहित वीतरागी स्वभाव को।।किन्तु हमें परिचय अनादि से क्रोधादिक का।गुरु इनके अभाव से लक्षण कहें धर्म का।।1।।क्रोध मान माया अरु तृष्णा के अभाव में।क्षमा मार्दव आर्जव शौच प्रकट होते हैं।।सत्य और संयम तप त्याग अकिंचन संग में।ब्रह्मचर्यमय चारित मुनिवर की परिणति में।।2।।चारित-तरु का बीज कहा है सम्यक् श्रद्धा।जिसे तत्त्व-अभ्यास-नीर से सींचा जाता।।निज स्वभाव की दृष्टि पूर्वक बढ़े लीनता।तो साधक शिवपथ पर आगे कदम बढ़ाता।।3।।
दोहा
क्षमा आदि दशधर्म में साम्य सुधारस पान।जिनशासन में है यही सम्यक् शान्ति-विधान।।4।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री परमशान्तिप्रदर्शक-दशलक्षणधर्माय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि.।
11. सोलह कारण भावनाओं के लिए अर्घ्य
चौपाई
सम्यग्दर्शन के संग प्रकटे, अति विशिष्ट शुभ परिणति उछले।कहें भावना सोलह कारण, तीर्थंकर पद भी प्रकटावन।।1।।
दरशविशुद्धि मोह-मल धोती, विनय मान-दुर्भाव नशाती।शीलवन्त नर रहें निराकुल, ज्ञानाभ्यासी पावें अनुभव।।2।।संवेगी उत्साह बढ़ावे, दानी दान देय हरषावे।तपसी अभिलाषा विनशावे, साधुसमाधि सुमन में लावे।।3।।वैयावृत्ति सुधर्म सहाई, अर्हत्-भक्ति कषाय नशाई।सूरि-भक्ति आचार बढ़ावे, पाठक-भक्ति सुश्रुत प्रकटावे।।4।।प्रवचन-भक्ति आनंदकारी, षट् आवश्य रतनत्रय धारी।धर्म-प्रभाव विशुद्धि बढ़ावे, वत्सल तीर्थंकर पद पावे।।5।।सहज भावना सोलह होतीं, पुण्य प्रकृतियाँ इनसे बँधती।क्योंकि पराश्रित रागरूप हैं, रत्नत्रय में निमित्तभूत हैं।।6।।
दोहा
शुभ विकल्प ये भावना बाँधें पुण्य महान्।वीतराग परिणाम ही सम्यक् शान्ति-विधान।।7।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-षोडशकारणभावनाभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
12. निर्वाण क्षेत्रों के लिए अर्घ्य(मरहठा माधवी)नभ प्रदेश में पाँचों द्रव्यों की शाश्वत अवगाहना।शुद्ध जीववत् व्योम अरूपी पर का हो स्पर्श ना।।चौदह राजु उतंग लोक त्रय सिद्ध रहें लोकाग्र में।तीर्थंकर भी योग रोध कर जा बसते लोकान्त में।।1।।धन्य धरा वह जहाँ ध्यान धर तीर्थंकर-मुनि सिद्ध हों।वही धरा निर्वाण क्षेत्र है जग में सदा प्रसिद्ध हों।।भरत भूमि में सम्मेदाचल शाश्वत भू निर्वाण की।तीर्थंकर सह मुनि अनंत के शाश्वत सिद्ध प्रयाण की।।2।।
इस युग में कैलाश गिरि से सिद्ध हुए आदीश जी।नेमीश्वर गिरनार गिरि पावापुर से महावीर जी।।वासुपूज्य जी चम्पापुर से हुए अयोगी सिद्ध हैं।सहज शान्ति दर्शक ये पाँचों सिद्ध भूमि सुप्रसिद्ध हैं।।3।।
दोहा
यद्यपि ढाई द्वीप का कण-कण भू-निर्वाण।तीर्थंकर की साधना-दर्शक क्षेत्र महान्।।4।।भविजन निज शुद्धात्म का निर्विकल्प धर ध्यान।शाश्वत सुख का पंथ यह पायें शान्ति-विधान।।5।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री परमशान्तिप्रदर्शक-समस्तनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
13. अतिशय क्षेत्रों के लिए अर्घ्य(मरहठा माधवी)
गर्भ जन्म तप केवल कल्याणक जिस पावन भूमि में।होते हैं अतिशय महान् ये अतिशय क्षेत्र प्रसिद्ध हैं।।नगर अयोध्या और बनारस कुण्डलपुरी महान् हैं।भव्यजीव इस भू पर आकर करते जिन-गुणगान हैं।।1।।किन्तु अज्ञजन चमत्कार को ही अतिशय हैं मानते।इनसे मनोकामना पूरी होती - ऐसा जानते।।अणु अणु सदा स्वतन्त्र परिणमे ज्ञान ज्ञेय को जानता।किन्तु अछूता रहे सदा यह चमत्कार चैतन्य का।।2।।इस युग में क्रमबद्ध परिणमन और वस्तु स्वातंत्र्य का-शिक्षण देने वाले केन्द्र अनेक यही अतिशय महा।।कलि में ज्ञानतीर्थ ये विकसित, जिनशासन की शान हैं।क्योंकि इन्हीं में भव्य जानते सम्यक् शान्ति-विधान हैं।।3।।
दोहा
वन्दन अतिशय क्षेत्र को निज महिमा पहिचान।चमत्कार चैतन्य का जानूँ शान्ति-विधान।।4।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदर्शक-समस्त-अतिशयक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(हरिगीत)
उपकार जिनवर का अहो ! सुख-शान्ति-पथ दरशा रहे।कारण अशान्ति का प्रभो! मुझ अज्ञ को समझा रहे।।मिथ्यात्व और कषाय से हूँ दुखी प्रभु तुमने कहा।किन्तु पर-संयोग को ही दुक्ख कारण मानता।।1।।यह देह ही मैं हूँ तथा मेरे कुटुम्बी जन सभी।संयोग सब हैं भिन्न मुझसे यह नहीं जाना कभी।।सारे जगत् को सुखी एवं दुखी हम ही कर सकें।इस मान्यता से नाथ! मेरी दृष्टि पर में ही रहे।।2।।और ये पर-द्रव्य ही सुख-दुक्ख मुझको दे सकें।यह मानने से राग-द्वेष-कषाय अग्नि सदा जले।।जिस तरह मैं इक वस्तु हूँ गुण और पर्यायों सहित।बस उस तरह सब वस्तुएँ शोभित स्वयं वैभव सहित।।3।।कोई किसी पर-द्रव्य के परिणाम को कैसे करे?क्योंकि सब ही द्रव्य निज गुण-परिणमन को ही वरें।।कोई किसी का स्पर्श भी कर सके नहिं परमार्थ से।इसलिए नहिं पर-द्रव्य का कर्ता कहा प्रभु! आपने।।4।।सब द्रव्य-गुण पर्याय को प्रभु! आप युगपत् जानते।तो स्वतः सिद्ध हुआ प्रभो ! सब कार्य स्व-समय में हुए।।सब कार्य का प्रभु समय अरु पुरुषार्थ झलके ज्ञान में।तो कौन किस पर्याय का किस तरह कर्ता हो सके।।5।।
पर-द्रव्य के परिणाम का कर्तृत्व तो अति दूर है।प्रत्येक द्रव्य स्व-कार्य का कर्ता स्वयं भरपूर है।।किन्तु निज परिणाम भी होते सहज क्रमबद्ध हैं।परमार्थ से परिणाम का भी नहीं कर्ता द्रव्य है।।6।।यह सहज दृष्टि ज्ञान ही सुख-शान्ति का आधार है।प्रभु! आपके वचनामृतों का एक ही यह सार है।।कर्तृत्व एवं विषय-सुख की वासना मेटूँ प्रभो !पुरुषार्थ सम्यक् शान्ति का अब सहज ही प्रकटे विभो।।7।।
दोहा
सम्यक् श्रद्धा ज्ञान का अर्पित है प्रभु अर्घ्य।सहज शान्ति सुविधान का पाऊँ पद अन्अर्घ्य।।8।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदायक-सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमाला- पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
महार्घ्य
हरिगीतिका
मैं देव श्री अरहन्त के पद-पंकजों का भ्रमर हूँ।मैं जन्म-मरण विमुक्त सिद्धों की शरण में अमर हूँ।।आचार्यवर शिवपंथ में कर पकड़ कर ले जा रहे।पाठक हमें जिन-आगमों का सार हैं समझा रहे।।1।।मैं साधु-पद में साधना की भावना नित भा रहा।अरहंत-रवि की वचन-किरणों में निजातम लख रहा।।उत्तम क्षमादिक धर्म दश-विध की सदा आराधना-के संग में हों सहज सोलह-कारणों की भावना।।2।।त्रैलोक्य के कृत्रिम अकृत्रिम जिनालय की वंदना।निर्वाण अतिशय क्षेत्र में हो आत्मा की साधना।।
सम्यक् सुदर्शन ज्ञान चारित परिणमन में प्रकट हों।हे नाथ! सारे जगत् को सज्ञान हो श्रद्धान हो।।3।।
दोहा
सर्व पूज्य पद उर धरूँ ज्ञान-सुधा-रस धार।स्वाश्रित निज परिणाम में प्रकटे शान्ति अपार।।4।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सहजशान्तिप्रदायक-सर्वपूज्यपदेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शान्ति पाठ
हरिगीतिका
पर-द्रव्य में एकत्व अरु कर्तृत्व के अभिप्राय से।आकुलित हूँ चिरकाल से नहिं शान्ति पर की आश से।।राग की ज्वाला निरंतर जल रही पर्याय में।विकट भव-वन में भ्रमा हूँ विषय-सुख की चाह में।।1।।नासाग्र दृष्टि शान्त मुद्रा आज लखकर आपकी।सहज ही सब विलय हों अब वासनाएँ पाप की।।मैं शान्ति का हूँ पिण्ड आनन्दकन्द ज्ञायक भाव हूँ।प्रभु-दर्श कर जानूँ स्वयं को मात्र चिन्मय भाव हूँ।।2।।मैं स्वयं शान्तिस्वरूप हूँ पर्याय में भी शान्ति हो।श्रद्धान हो सज्ञान हो किंचित् नहीं कुछ भ्रान्ति हो।।हे नाथ! अब मैं आपके ही चरण-पथ पर बढ़ चलूँ।आप-सम निज रूप लखकर आप-सी वृत्ति लहूँ।।3।।सर्व जिनवर शान्तिदायक शान्ति-निर्झर हैं स्वयं ।इस शान्ति-निर्झर में नहायें यही भाते भाव हम।।
अज्ञान-वश अपराध प्रभु ! जो ज्ञात या अज्ञात हैं।करिए क्षमा जिनराजजी अब नशें सब भवताप हैं।।4।।
दोहा
पूजन विधि सर्जित हुई, भक्तिभाव में नाथ।किन्तु विसर्जित अब करूँ, कभी न बिछुड़े साथ ।।5।।करूँ विसर्जन मैं अतः, क्षमा चाहता नाथ।दर्शन-ज्ञान-चरित्र में, सदा रहे तव साथ।।6।।(नौ बार णमोकार मन्त्र के माध्यम से पंच परमेष्ठी का स्मरण करें।)क्षमा-याचना
रोला
पूजन में भी चंचल चित्त भटकता रहता।विषय-कषायों के निमित्त में उलझा रहता।।विविध क्रियाकाण्डों में भी मैं चित्त रमाता।और अनेक विकल्प-जाल जो ज्ञात न होता।।भक्ति-रंग में रँगा हुआ प्रभु ! मेरा अंतर ।किन्तु रागवश होते हैं अपराध निरन्तर।।ज्ञान आपका सहज जानता मम अन्तर को।मन-वच-तन से क्षमा माँगता नमूँ आपको।।
अनुष्टुप्
मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी।मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्।।सर्वमंगल-मांगल्यं, सर्वकल्याण-कारकम् ।प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयतु शासनम् ।।
॥ जय जिनेन्द्र ॥