सुगंध दशमी व्रत पूजा
पर्व पूजा
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दोहा
वृषभदेव को आदि दे, शीतल जिन पर्यन्त ।मंगलकर जिनवर नमूँ, होवे भव का अन्त ॥1॥
जिन शासन में व्रत कहे, एक शतक वसु जान ।उनके उत्तम फल कहे, गति विधि को पहचान ॥2॥
व्रत सुगंध दशमी महा उनमें एक सुजान ।जिनकी महिमा अमित है, श्रुतगोचर सुख खान ॥3॥
यह व्रत मुझको स्वपद दे, पर पद में रति भान ।जिस प्रभाव शिवपद लहूँ, पाऊँ भव अवसान ॥4॥
वृषभ आदि शीतल जिना, यहाँ पधारो आप ।अहो हमारे मन बसो, मिटे जगत संताप ॥5॥
आह्वाननॐ ह्रीं श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ।
स्थापनॐ ह्रीं श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।
अष्टक
उज्ज्वल निर्मल नीर क्षीर सम, कंचन भृंग भरा लायो ।जन्म जरा मृत्यु रोग निवारक, प्रभु सम्मुख लेकर धायो ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
जलॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥
घिस केसर घनसार विमिश्रित, कदली नन्दन शुद्ध मना ।भव आताप निवारण कारण, जिन चरणन में ला वरना ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
चंदनॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यः संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥
अक्षत उज्ज्वल परिमल खासे, बासमती सुखदास गिना ।अक्षत पद पाने के हेतु, श्री जिनवर सम्मुख धरना ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
अक्षतॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥
कमल केतली जुही चमेली, अरु गुलाब चम्पा लाके ।समर शूल निर्मूल करन को, प्रभु के चरण धरूँ आके ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
पुष्पॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥
नानाविधि पकवान मनोहर, रसना रंजित शुद्ध किये ।क्षुधा वेदनी दूर करन को, श्री जिनवर पूजा करिये ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
नैवेद्यॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥
कंचन भाजन में मणि दीपक, लेकर प्रभु आगे आयो ।मोह तिमिर के नाशकरन को, इतर नहीं कोई पायो ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
दीपॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥
अगर- तगर कृष्णागुरु आदिक, चूर दशांग बनाया है ।श्री जिनवर सम्मुख खेने से, अष्टकर्म नशवाया है ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
धूपॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यो ज्ञानावरणाद्यष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥
श्रीफल लौंग बदाम सुपारी, एला केला मन भाये ।मोक्ष महाफल पावन कारन, श्रीजिनवर सम्मुख लाये ॥
वृषभ आदि शीतल जिनेन्द्रलौ, जो भविजन पूजे ध्यावे ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्म नाश शिवपुर जावे ॥
फलॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥
जल चंदन आदिक वसुविधि के, द्रव्य मनोहर भर थारी ।पद अनर्घ के हेतु चढ़ाऊँ, श्री जिनवर पद दे तारी ॥
वृषभ आदि शीतलजिनेन्द्र-लौ, जो भविजन पूजें ध्यावें ।कर सुगन्ध दशमी व्रत भविजन, कर्मनाश शिवपुर जावें ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥
जयमाला
दोहा
वृषभदेव को आदि दे, शीतल जिन पर्यन्त ।ये दश ही जिनराज मम, करो भवार्णव अंत ॥
पद्धरि छन्द
जय वृषभनाथ वृषको प्रकाश, कर तारे भविजन ताप नाश ।हे अजित जिनेश्वर कर्मनाश, प्रगटायो केवल भानु खास ॥
जिन संभव भवहर्ता सुजान, उपदेश दिया जिन तत्त्वज्ञान ।अभिनंदन आनंदकरन जान, जिन पूजे होवे कर्म हान ॥
सुमति जिन सुमति देन हार, जिससे उतरे संसार पार ।पद्मप्रभ जिनपदकमल जान, भविजन जिनसे वे नित्य आन ।जय जय सुपार्श्व भवपाश नाश, हे प्रभुवर हमरी भरी आश ।चंद्रप्रभ इंदुवत महान, आल्हाद करन हारे सुजान ॥
जय पुष्पदंत भगवान आप, पुष्पक को मार्यो अति प्रताप ।शीतलता पाने हे जिनेन्द्र, आया हूँ मैं तुम चरण शरण ॥
तुम पूजे मम सब दुःख जाय, रोगादिक सब नशते सुभाय ।तुमने प्रभु केवलज्ञान पाय, सब लख्यो चराचर सुक्खदाय ॥
इन्द्रादिदेव आये महान तुम पूजा कीनी दुःखहान ।यह व्रत सुगंध दशमी महान करते ही होवे पाप हान ॥
फिर उद्यापन कीजे महान जिससे पावे व्रत फल महान ।वर धूप दशांगी लो बनाय दस धूप घटों में दो खिवाय ॥
दश स्तोत्र पढ़े मनवचनकाय, अभिषेक दशम जिनवर कराय ।उपकरण देय दश ही प्रकार, दश छत्र चंवर चंदवा लगार ॥
पाठकगण को दो शास्त्र सार, कर पात्र दान मन हर्ष धार ।कर यथाशक्ति तब ही बनाय, नहि शक्ति को अपनी छिपाय ॥
व्रत थकी होय आनंद ठाट, दश दिशि में हो कीरति विराट ।मिल रहे भोग सब व्रत प्रभाव, सामग्री भोगादिक बनाय ॥
दुर्गति नाशे नहिं रोग होय, सुर सेव करे चक्रेश होय ।वर पुत्र मित्र बान्धव मनोग्य, व्रत के प्रभाव से मिले योग्य ॥
ये व्रत सुगन्ध दशमी महान, पालो भविजन सुखका निधान ।इससे पावे यदि स्वर्गवास, इससे हो भवि शिव निवास ॥
व्रत से दुख दारिद्र रोग शोक, मिट जाता मिलता सब सुयोग ।इससे पावे भवि स्वर्गवास, इससे ही होवे शिव निवास ॥
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं सुगन्धदशमीव्रताचरणे श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रभ्यो जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
दोहा
भव्य जीव मन वचन से, व्रत करिये सुप्रमाणइस भव यश पर सुख मिले, अंत लहे निर्वाण ॥
इत्याशीर्वादः पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्
॥ जय जिनेन्द्र ॥