जिनेन्द्र वाणी

विसर्जन पाठ

नित्य पूजा क्रम

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बिन जाने वा जान के, रही टूट जो कोय ।तुम प्रसाद तें परम गुरु, सो सब पूरन होय ॥

पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान ।और विसर्जन हू नहीं, क्षमा करो भगवान् ॥

मंत्रहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन जिनदेव ।क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव ॥

तुम चरनन ढिंग आय के, मैं पूजूँ अति चाव ।आवागमन रहित करो, रमूँ सदा निज भाव ॥

पुष्पांजलिम् क्षिपेत्

मङ्गलं भगवान् वीरो, मङ्गलं गौतमो गणी ।मङ्गलं कुंदकुंदाद्यो, जैन धर्मोस्तु मङ्गलं ॥

सर्वमंगल माँगलयम्, सर्व कल्याण कारकं ।प्रधानं सर्व धर्माणाम्, जैनम् जयतु शासनं ॥

॥ जय जिनेन्द्र ॥