जिनेन्द्र वाणी

विषापहार स्तोत्र (भाषा)

पाठ एवं स्तोत्र

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आप सुप्रसिद्ध द्विसंधान काव्य के कर्ता महाकवि थे । इस काव्यके प्रत्येक पद्य के दो अर्थ होते हैं । पहला रामायण से सम्बद्ध औरदूसरा महाभारत से । इसी कारण इस काव्य को राघव पाण्डवीयभी कहते हैं । काव्यमीमांसा जैसे महानग्रन्थ के कर्ता राजशेखर नेधनंजय की बड़ी प्रशंसा की है ।आपकी एक रचना धनंजय नाममाला है जो एक महत्वपूर्णशब्दकोष है । इस विपापहार स्तोत्र में भगवान् ऋषभदेव कीस्तुति है । यह स्तुति गंभीर, प्रौढ़ और अनूठी उक्तियों से भरपूर है ।यह ग्रन्थ कवि की चतुराई से भरा हुआ है, । हृदय समुद्र को मथकरनिकाला हुआ अमृत हैं । इसमें शब्दों का माधुय एवं अर्थों का गांभीर्यदेखने को मिलता है । इस काव्य में स्थान-स्थान पर अलंकारों कीछटा छिटकी हुई है । धनंजय का समय विद्वानों ने आठवीं शताब्दीनिश्चित किया है ।कविराज धनंजय पूजन में लीन थे । उनके सुपुत्र को सर्प ने डसलिया । घर से कई बार समाचार आने पर भी वह निस्पृह भाव सेपूजन में पूर्णतया तन्मय रहे और पुत्र की कोई सुध नहीं ली । बच्चेको विष चढ़ रहा था, उनकी पत्नी ने कुपित होकर बच्चे को मन्दिरमें उनके सामने लाकर रख दिया । पूजन से निवृत होकर उन्होंनेतत्काल भगवान् के सम्मुख ही विषापहार स्तोत्र की रचना की,इधर स्तोत्र की रचना हो रही थी उधर पुत्र का विष उतर रहाथा । स्तोत्र पूरा होते होते बालक निर्विष होकर उठ बैठा । इससेधर्म की अपूर्व प्रभावना हुई । इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ लेने के लिएश्रद्धा और मनोयोग आवश्यक है । इसके पाठ में सुख शान्तिमिलती है और सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं ।विषापहार भाषा

कृत भाषानुवाद

दोहा

नमो नाभिनंदन बली, तत्त्व-प्रकाशनहार ।तुर्यकालकी आदिमें, भये प्रथम अवतार ॥1॥

काव्य वा रोला छंद

निज आतममें लीन ज्ञानकरि व्यापत सारे ।जानत सब व्यापार संग नहिं कछू तिहारे ॥

बहुत कालके हो पुनि जरा न देह तिहारी ।ऐसे पुरुष पुरान करहु रक्षा जु हमारी ॥1॥

पर करिके जु अचिंत्य भार जगको अति भारो ।सो एकाकी भयो वृषभ कीनो निसतारो ॥

करि न सके जोगिंद्र तवन मैं करिहों ताको ।भानु प्रकाश न करैं, दीप तमहरैं गुफाको ॥2॥

स्तवन करनको गर्व तज्यो सक्रो बहु ज्ञानी ।मैं नहिं तजौं कदापि स्वल्पज्ञानी शुभध्यानी ॥

अधिक अर्थ कौ कहूं यथाविधि बैठि झरोकै ।जालांतरधरि अक्ष भूमिधरको जु विलोकै ॥3॥

सकल जगतको देखत अर सबके तुम ज्ञायक ।तुमको देखत नाहिं नाहिं जानत सुखदायक ॥

हो किसाक तुम नाथ और कितनाक बखानै ।तातैं थुति नहिं बनै असक्ती भये सयानै ॥4॥

बालकवत निजदोप थकी इहलोक दुखी अति ।रोगरहित नुम कियो कृपाकरि देव भुवनपति ॥

हित अनहितकी समझ माहिं है मंदमती हम ।सब प्राणिनके हेत नाथ तुम बालवैद सम ॥5॥

दाता हग्ना नाहिं भानु सबको बहकावत ।आजकल के छलिकरि निनप्रति दिवस गुमावत ॥

हे अच्युन ! जो भक्त नमै तुम चरनकमलको ।छिनक एकमें आप देत मनवांछित फलको ॥6॥

तुमसो सन्मुख रहै भक्तिसौं सो सुख पावे ।जो सुभावतैं विमुख अपतैं दुखहि बढ़ावै ॥

सदा नाथ अवदात एक द्युतिरूप गुसाईं ।इन दोन्यों के हेत स्वच्छ दरपणवत झाईं ॥7॥

है अगाध जलनिधी समुदजल है जितनो ही ।मेरू तुंगसुभाव सिखरलों उच्च भन्यो ही ॥

वसुधा अर सुरलोक एहु इसभांति सई है ।तेरी प्रभुता देवभुवनकूं लंघि गई है ॥8॥

है अनवस्थाधर्म परम सो तत्त्व तुमारे ।कह्यो न आवागमन प्रभू मतमाहिं तिहारे ॥

इष्ट पदारथ छांडि आप इच्छति अदृष्टकौं ।विरुधवृत्ति तव नाथ समंजस होय सृष्टकौं ॥9॥

कामदेवको किया भस्म जगत्राता थे हीं ।लीनी भस्म लपेटि नाम संभू निजदेही ॥

सूतो होय अचेत विष्णु वनिताकरि हारयो ।तुमकौं काम न गहै आप घट सदा उजारयो ॥1॰ ॥

पापवान वा पुन्यवान सो देव बतावै ।तिनके औगुन कहैं नाहिं तू गुणी कहावै ॥

निज सुभावतैं अंबुराशि निज महिमा पावै ।स्तोक सरोवर कहे कहा उपमा बढ़ि जावै ॥11॥

कर्मनकी थिति जंतु अनेक करै दुखकारी ।सो थिति बहु परकार करै जीवनकी ख्वारी ॥

भवसमुद्रके माहिं देव दोन्योंके साखी ।नाविक नाव समान आप वाणी मैं भाखी ॥12॥

मुखकौं तो दुख कहै गुणनिकूं दोष विचारै ।धर्मकरनके हेत पाप हिरदै विच धारै ॥

तेलनिकासन काज धूलिको पेलै घानी ।तेरे मतसों बाह्य इसे जे जीव अज्ञानी ॥13॥

विष मोचै ततकाल रोगकौं हरै ततच्छन ।मणि औषधी रसाण मंत्र जो होय सुलच्छन ॥

ए सब तेरे नाम सुबुद्धी यों मन धरिहैं ।भ्रमत अपरजन वृथा नहीं तुम सुमिरन करिहैं ॥14॥

किंचित भी चितमाहिं आप कछु करो न स्वामी ।जे राखैं चितमाहिं आपको शुभ-परिणामी ॥

हस्तामलवत लखैं जगत् की परिणति जेती ।तेरे चितके बाह्य तोउ जीवैं सुखसेती ॥15॥

तीनलोक तिरकाल माहिं तुम जानत सारी ।स्वामी इनकी संख्या थी तितनीहि निहारी ॥

जो लोकादिक हुते अनंते साहिब मेरा ।तेऽपि झलकते आनि ज्ञानका ओर न तेरा ॥16॥

है अगम्य तवरूप करै सुरपति प्रभु सेवा ।ना कछु तुम उपकार हेत देवनके देवा ॥

भक्ति तिहारी नाथ इंद्रके तोषित मनको ।ज्यों रवि सन्मुख छत्र करै छाया निज तनको ॥17॥

वीतरागता कहा कहा उपदेश सुखाकर ।सो इच्छा प्रतिकूल वचन किम होय जिनेसर ॥

प्रतिकूली भी वचन जगतकूं प्यारे अतिही ।हम कछु जानी नाहिं तिहारी सत्यासतिही ॥18॥

उच्चप्रकृति तुम नाथ संग किंचित न धरनतैं ।जो प्रापति तुम थकी नाहिं सो धनेसुरन तैं ॥

उच्चप्रकृति जल विना भूमिधर धुनी प्रकासै ।जलधि नीरतैं भरयौ नदी ना एक निकासै ॥19॥

तीनलोकके जीव करो जिनवरकी सेवा ।नियम थको करदंड धरयो देवनके देवा ॥

प्रातिहार्य तौ बनै इंद्र के बनै न तेरे ।अथवा तेरे बनै तिहारे निमित परेरे ॥2॰ ॥

तेरे सेवक नाहिं इसे जे पुरुपहीन धन ।धनवानोंकी ओर लखत वे नाहिं लखत पन ॥

जैसै तमथिति किये लखत परकास-थिती कूं ।तैसे सूझत नाहिं तमथिती मंदमतीकूं ॥21॥

निज वृध स्वासोसास प्रगट लोचन टमकारा ।तिनको वेदत नाहिं लोकजन मूढ़ विचारा ॥

सकल ज्ञेय ज्ञायक जु अमूरति ज्ञान सुलच्छन ।सो किमि जान्यो जाय देव तव रूप विचच्छन ॥22॥

नाभिराय के पुत्र पिता प्रभु भरत तने हैं ।कुलप्रकाशिकै नाथ तिहारो तवन भनै हैं ॥

ते लघुधी असमान गुननकौं नाहिं भजैं हैं ।सुवरन आयो हाथि जानि पाषान तजैं हैं ॥23॥

सुरासुरनको जीति मोहने ढोल बजाया ।तीनलोक में किये सकल वशि यों गरभाया ॥

तुम अनंत बलवंत नाहिं ढिग आवन पाया ।करि विरोध तुमथकी मूलतैं नाश कराया ॥24॥

एक मुक्तिका मार्ग देव तुमने परकास्या ।गहन चतुरगतिमार्ग अन्य देवनकूं भास्या ॥

‘हम सब देखनहार’ इसीविधि भाव सुमिरिकै ।भुज न विलोको नाथ कदाचित गर्भ जु धरिकै ॥25॥

केतुविपक्षी अर्कतनो फुनि अग्नि तनो जल ।अंबुनिधीअरि प्रलयकालको पवन महाबल ॥

जगतमाहिं जे भोग वियोग विपक्षी हैं निति ।तेरो उदयो है विपक्षतैं रहित जगतपति ॥26॥

जाने विन हूँ नवत आपको जो फल पावै ।नमत अन्यको देव जानि सो हाथ न आवै ॥

हरी मणीकूं काच, काचकूं मणी रटत है ।ताकी बुधिमें भूल, मूल्य मणिको न घटत है ॥27॥

जे विवहारी जीव वचनमें कुशल सयाने ।ते कषायकरि दग्ध नरनको देव बखानैं ॥

ज्यों दीपक बुझि जाय ताहि कह ‘नंदि’ भयो है ।भग्न घड़ेको कहैं कलस ए मँगलि गयो है ॥28॥

स्यादवाद संजुक्त अर्थको प्रगट बखानत ।हितकारी तुम वचन श्रवनकरि को नहिं जानत ॥

दोषरहित ए देव शिरोमणि वक्ता जगगुरु ।जो ज्वरसेती मुक्त भयो सो कहत सरल सुर ॥29॥

विन वांछा ए वचन आपके खिरैं कदाचित ।है नियोग ए कोपि जगतको करत सहजहित ॥

करै न वांछा इसी चंद्रमा पूरो जलनिधि ।सीतरश्मिकूं पाय उदधि जल बढ़ै स्वयंसिधि ॥3॰ ॥

तेरे गुण गंभीर परम पावन जगमाईं ।बहुप्रकार प्रभु हैं अनंत कछु पार न पाईं ॥

तिन गुणानकों अंत एक याही विधि दीसै ।ते गुण तुझ ही मांहि और में नाहिं जगीसै ॥31॥

केवल थुति ही नाहिं भक्तिपूर्वक हम ध्यावत ।सुमरन प्रणमन तथा भजनकर तुम गुण गावंत ॥

चिंतवन पूजन ध्यान नमनकरि नित आराधैं ।की उपाव करि देव-सिद्धि-फलको हम साधैं ॥32॥

त्रैलोकी नगराधिदेव नित ज्ञानप्रकाशी ।परमज्योति परमातम-शक्ति अनंती भासी ॥

पुन्य पापतैं रहित पुन्यके कारण स्वामी ।नमों नमों जगवंद्य अवंचक नाथ अकामी ॥33॥

रस सुपरस अर गंध रूप नहिं शब्द तिहारे ।इनिकै विषय विचित्र भेद सब जाननहारे ॥

सब जीवन-प्रतिपाल अन्य करिहैं अगम्य गन ।सुमरन-गोचर नाहिं करौं जिन तेरो सुमिरन ॥34॥

तुम अगाध जिनदेव चित्त के गोचर नाहीं ।निकिंचन भी प्रभू धनेश्वर जाचत साईं ॥

भये विश्वके पार दृष्टिसों पार न पावै ।जिनपति एम निहारि संतजन सरनै आवै ॥35॥

नमो नमो जिनदेव जगतगुरुशिक्षादायक ।निजगुणसेती भई उन्नती महिमा लायक ॥

पाहन-खंड पहार पछै ज्यों होत और गिर ।त्यों कुलपर्वत नाहिं सनातन दीर्घ भूमिधर ॥36॥

स्वयं प्रकाशी देव रैन दिनकूं नहिं बाधित ।दिवस रात्रि भी छतै आपकी प्रभा प्रकाशित ॥

लाघव गौरव नाहिं एकसो रूप तिहारो ।काल-कलातैं रहित प्रभूसूं नमन हमारो ॥37॥

इहविधि बहु परकार देव तव भक्ति करी हम ।जाचूं कर न कदापि दीन ह्वै रागरहित तुम ॥

छाया बैठत सहज वृक्षके नीचे ह्वै है ।फिर छायाको जाचत यामैं प्रापति क्वै है ॥38॥

जो कुछ इच्छा होय देनकी तौ उपगारी ।द्यो बुधि ऐसी करूँ प्रीतिसौं भक्ति तिहारी ॥

करो कृपा जिनदेव हमारे परि ह्वै तोषित ।सनमुख अपनो जानि कौन पंडित नहिं पोषित ॥39॥

यथा-कथंचित भक्ति रचैं विनयी-जन केई ।तिनकूं श्रीजिनदेव मनोवांछित फल देहीं ॥

पुनि विशेष जो नमत संतजन तुमको ध्यावै ।सो सुख जस ‘धन-जय’ प्रापति है शिवपद पावै ॥4॰ ॥

श्रावक माणिकचंद सुबुद्धी अर्थ बताया ।सो कवि ‘शांतीदास’ सुगम करि छंद बनाया ॥

फिरि फिरिकै ऋषि रूपचंद ने करी प्रेरणा ।भाषा स्तोतर की विषापहार पढ़ो भविजना ॥41॥

॥ जय जिनेन्द्र ॥