जिनेन्द्र वाणी

श्री अरनाथ जिन पूजा

कविवर वृन्दावन · तीर्थंकर पूजा

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स्थापना

छप्पय छंद वीररसरूपकालंकार

तप तुरंग असवार धार, तारन विवेक कर ।ध्यान शुकल असि धार, शुद्ध सुविचार सुबखतर ।भावन सेना धरम, दशों सेनापति थापे ।रतन तीन धरि सकति मंत्रि अनुभो निरमापे ।सत्तातल सोहं सुभटि धुनि, त्याग केतु शत अग्र धरि ।इहविध समाज सज राजको अरजिन जीते करम अरि ॥1॥

आह्वाननओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।

स्थापनओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः

सन्निधिकरणओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

अष्टक

छंद त्रिभंगी (अनुप्रयामक मात्रा 32-जगनवर्जित)कनमनिमय झारी, दृगसुखकारी, सुरसरितारी नीरभरी ।मुनिमनसम उज्जल, जनमजरादल, सोलं पदतल, धारकरी ।प्रभु दीनदयालं, अरिकुलकालं, विरदविशालं सुकुमालं ।हरि मम जंजालं, हे जगपालं, अरगुनमालं, वरमालं ॥1॥

जलओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं

भवताप नशावन, विरद सुपावन, सुनि मनभावन, मोदभयो ।तातैं घसिबावन, चंदनपावन, तरहिंचढावन,उमगिअयो । प्रभु॰

चंदनओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चंदनं

तंदुल अनियारे, श्वेतसँवारे, शशिदुति टारे, थार भरे ।पदअखयसुदाता, जगविख्याता, लखिभवताता पुंजधरे । प्रभु॰

अक्षतओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान्

सुरतरुके शोभित, सुरन मनोभित, सुमनअछोभित लैआयो ।मनमथके छेदन, आप अवेदन, लखि निरवेदन गुनगायौ । प्रभु॰

पुष्पओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं

नेवज सज भक्षक प्रासुक अक्षक,पक्षकरक्षक स्वच्छ धरी ।तुम करमनिकक्षक, भस्मकलक्षक, दक्षकपक्षक रक्षकरी । प्र॰

नैवेद्यओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं

तुम भ्रमतमभंजन मुनिमनकंजन, रंजन गंजन मोहनिशा ।रविकेवलस्वामी, दीपजगामी,तुमढिग आमी पुन्यदृशा । प्रभु॰

दीपओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं.

दशधूप सुरंगी गंधअभंगी वन्हि वरंगी माँहि हवै ।बसुकर्म जरावै धूमउड़ावै, ताँडव भावै नृत्य पवै । प्रभु॰

धूपओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं ।

रितुफल अतिपावन, नयनसुहावन, रसनाभावन, कर लीनें ।तुमविघनविदारक, शिवफलकारक,भवदधि तारक, चरचीनें । प्रभु॰

फलओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं

सुचि स्वच्छ पटीरं, गंधगहीरं, तंदुलशीरं, पुष्पचरुं ॥

वर दीपं धूपं, आनंदरूपं, लैं फल भूपं, अर्घकरं । प्रभु॰

अर्घ्यओं ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं

पंचकल्याणक

छन्द चौपाई (मात्रा 16)

फागुन सुदी तीज सुखदाई । गरभ सुमंगल ता दिन पाई ।मित्रादेवी उदर सु आये । जजे इन्द्र हम पूजन आये ॥1॥

गर्भ कल्याणकॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्ल तृतीयायां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घं ।

मँगसिर शुक्लचतुर्दशि सोहै । गजपुर जनम भयौ जग मोहै ।सुर गुरु जजे मेरुपर जाई । हम इत पूजैं मनवचकाई ॥2॥

जन्म कल्याणकॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लचतुर्दश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घं नि॰ ॥2॥

मंगसिर सित चौदस दिन राजै । तादिन संजम धरे विराजै ।अपराजित घर भोजन पाई । हम पूजें इत चित हरषाई ॥3॥

अर्घ्यओं ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लचतुर्दश्यां निःक्रमणमंगलमण्डिताय श्रीअरनाथ जिनेन्द्राय अर्घनि॰ ॥3॥

कातिक सित द्वादसि अरि चूरे । केवलज्ञान भयो गुन पूरे ।समवसरन थिति धरमबखाने । जजतचरन हम पातकभाने ॥4॥

ज्ञान कल्याणकओं ह्रीं कार्तिकशुक्लद्वादश्यां ज्ञानमंगलमण्डिताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घं नि॰ ॥4॥

चैत शुकल ग्यारस सब कर्म । नाशि वास कियशिव-थलपर्म ।निहचल गुन अनंत भंडारी । जजों देव सुधि लेहु हमारी ॥5॥

मोक्ष कल्याणकओं ह्रीं चैत्रशुक्लएकादश्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीअरनाथ जिनेन्द्राय अर्घं निव॰ ॥5॥

जयमाला

दोहा छन्द (जमकपद तथा लाटानुवधन ।)बाहर भीतर के जिते, जाहर अर दुखदाय ।ता हर कर अरजिन भये, साहर शिवपुर राय ॥1॥

राय सुदरशन जासु पितु, मित्रादेवी माय ।हेमवरन तन वरष वर, नव्वै सहस सुआय ॥2॥

छन्द तोटक (वर्ण 12)

जय श्रीधरश्रीकरश्रीपति जी । जय श्रीवर श्रीभरश्रीमतिजीभवभीमभवोदधि तारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥3॥

गरभादिक मंगल सार धरे । जग जीवनि के दुखदंद हरे ।कुरुवंशशिखामनि तारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥4॥

करि राज छखंडविभूतिमई । तप धारत केवलबोध ठई ।गण तीस जहाँ भ्रगवारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥5॥

भविजीवनिको उपदेश दियौ । शिवहेत सबै जन धारि लियो ।जगके सब सांकट टारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥6॥

कहि वीसप्ररूपनसार तहाँ । निजशर्म सुधारस धार जहाँ ।गति चार हृषीपन धारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥7॥

खट कायतिजोग तिवेदमथा । पनवीसकषा वसुज्ञानतथा ।सुर संजमभेद पमारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥8॥

रस दर्शन लेश्यय भव्य जुगं । खट सम्यक् सैनिय भेद युगं ।जुग हार तथा सु अहारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥9॥

गुनथान चतुर्दस मारगना । उपयोग दुवादश भेद भना ॥

इमि वीस विभेद उचारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ।1॰इन आदिसमस्त वखान कियौ । भवि जीवनने उरधार लियौकितने शिववादिन धारन हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥11॥

फिर आपअघाति विनाशसबै । शिवधामविषै थितकीन तबै ।कृतकृत्य प्रभू जगतारन है । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥12॥

अब दीनदयाल दया धरिये । मम कर्म कलंक सबै हरिये ।तुमरे गुनको कछु पार न हैं । अरनाथ नमो सुखकारन हैं ॥13॥

घत्तानन्द छन्द (मात्रा 31)

जय श्रीअरदेवं, मुरकृतसेवं, समताभेवं, दातारं ।अरिकर्म विदारन, शिवसुखकारन, जयजिनवरजनत्रातारं ॥14॥

इति श्रीअरनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घं नि॰ स्वाहा ॥

छन्द आर्या (मात्रा 6॰)अरजिनके पदसारं, जो पूजै द्रव्यभावसों प्रानी ।सो पावै भवपारं, अजरामर मोच्छथान सुखखानी ॥15॥

इत्याशीर्वादः परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।

॥ जय जिनेन्द्र ॥

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  1. श्री अरनाथ भगवान की आरतीअठारहवें तीर्थंकर · चिह्न मछली