श्री मल्लिनाथ जिन पूजा
कविवर वृन्दावन · तीर्थंकर पूजा
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छन्द रोकड
अपराजिततें आय नाथ मिथलापुर जाये ।कुंभरायके नन्द, प्रजापति मात बताये ॥
कनक वरन तन तुंग, धनुष पच्चीस विराजै ।सो प्रभु तिष्ठहु आय निकट मम ज्यों भ्रमभाजै ॥
आह्वाननओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् ।
स्थापनओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः ।
सन्निधिकरणओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् !
अष्टक
छन्द जोगीरासा (मात्रा 28)
सुर-सरिता-जल उज्जल लै कर, मनिभृङ्गार भराई ।जनम जरामृत नासनकारन, जजहुं चरन जिनराई ॥
राग-दोष-मद-मोहहरनको, तुम ही हो वरवीरा ।यातैं शरन गही जगपतिजी, वेग हरौ भवपीरा ॥1॥
जलओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं ।
बावनचंदन कदलीनंदन, कुंकुमसंग घसायौ ।लेकर पूजौं चरनकमल प्रभु, भवआताप नसायौ ॥ राग॰ 2
चंदनओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चंदनं ।
तंदुलशशिसम उज्जल लीनें, दीनें पुंज सुहाई ।नाचत राचत भगति करत ही, तुरित अखैपद पाई । राग॰ 3
अक्षतओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् ।
पारिजातमंदार सुमन, संतान जनित महकाई ।मार सुभट मदभंजनकारन, जजहुं तुम्हें शिरनाई ॥
राग-दोष-मद-मोहहरन को, तुम हो हो वर वीरा ।यातें शरन गही जगपतिजी, वेग हरो भवपीरा ॥4॥
पुष्पओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं ।
फेनी गोझा मोदनमोदक, आदिक सद्य उपाई ।सो लै छुधा निवारन कारन जजहुं चरन लवलाई । राग॰ 5
नैवेद्यओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं ।
तिमिरमोह उरमंदिर मेरे, छाय रह्यो दुखदाई ।तासु नाश कारन को दीपक, अद्भुतजोति जगाई । राग॰ 6
दीपओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं ।
अगर तगर कृष्णागर चंदन चूरि सुगंध बनाई ।अष्टकरम जारनको तुमढिग, खेवत हौं जिनराई । राग॰ 7
धूपओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं ।
श्रीफल लौंग बदाम छुहारा, एला केला लाई ।मोक्ष महाफलदाय जानिकै, पूजौं मन हरखाई । राग॰ 8
फलओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं ।
जल फल अरघ मिलाय गाय गुन, पूजों भगति बढाई ।शिवपदराज हेत हे श्रीधर, शरन गहो मैं आई । राग॰ 9
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं ।
पंचकल्याणक
लक्ष्मीधरा छन्द (12 वर्ण)
चैतकी शुद्ध एकैभलीराजई । गर्भकल्यानकल्यानको साजई ।कुंभराजा प्रजापति माता तने । देवदेवी जजें शीश नाये घने ।
गर्भ कल्याणकओं ह्रीं चैत्र शुक्लप्रतिपदि गर्भागम-मंगल-मण्डिताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घं ।
मार्गशीर्षेसुदीग्यारसीराजई । जन्मकल्यानकोद्यौस सोछाजईइन्द्रनागेंद्रपूजें गिरेंद्रे जिन्हें । मैंजजौंध्यायकेंशीशनावों तिन्हें
जन्म कल्याणकओं ह्रीं मार्गशीर्ष-शुक्लैकादश्यां जन्म-मंगल-प्राप्ताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घं ।
मार्गशीर्षेसुदीग्यारसीकेदिना । राजको त्याग दीक्षाधरीहैजिनादान गोछीर को नंदसेनें दयौ । मैंजजोंजासुके पंचचर्जे भयो
तप कल्याणकओं ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लैकादश्यां तपो-मंगल-मण्डिताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घं ।
पोषकीश्यामदूजीहनेघातिया ।केवलज्ञानसाम्राज्यलक्ष्मीलियाधर्मचक्री भये सेव शक्री करैं । मैं जजों चर्न ज्योंकर्मवक्री टरैं
ज्ञान कल्याणकओं ह्रीं पौषकृष्णाद्वितीयायां केवलज्ञान-प्राप्ताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घं ।
फाल्गुनी सेत पांचै अघाती हते । सिद्धआलै वसे जाय सम्मेदतेंइन्द्रनागेंद्र कीन्हीक्रियाआयकें । मैंजजोंसो मही ध्यायकेंगायकें
मोक्ष कल्याणकओं ह्रीं फाल्गुन-शुक्ल-पंचम्यां मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घं ।
जयमाला
घत्तानन्द छन्द (31 मात्रा)
तुम नमित सुरेशा, नर नागेशा, रजतनगेशा, भगतिभरा ।भवभयहरनेशा, सुखभरनेशा, जै जै जै शिव-रमनिवरा ॥1॥
पद्धरि छन्द (मात्रा 16 लघ्वन्त) ।जय शुद्ध चिदातम देव एव । निरदोष सुगुन यह सहज टेव ।जय भ्रमतमभंजन मारतंड । भविभवदधितारनको तरंड ॥2॥
जय गरभजनममंडितजिनेश । जय छायकसमकितबुद्धभेस ।चौथे कियसातोंप्रकृति छीन । चौअनंतानु मिथ्यात तीन ॥3॥
सप्तम किय तीनों आयु नास । फिर नवें अंश नवमेंविलास ।तिनमाहिप्रकृतिछत्तीस चूर । या भांति कियौ तुमज्ञानपूर ॥4॥
पहिले महँ सोलह कहें प्रजाल । निद्रानिद्रा प्रचलाप्रचाल ।हनि थानगृद्धिकोंसकल कुव्व । नर तिर्यंग्गति गत्यानुपुव्व ॥5॥
इक वे ते चौ इन्द्रीय जात । थावर आतप उद्योत घात ।सूच्छम साधारन एम चूर । पुनि दुतिय अंश वसु करौदूर ॥6॥
चौ प्रत्याप्रत्याख्यान चार । तीजे सु नपुंसक वेद टार ।चौथे तियवेद विनाशकीन । पांचै हास्यादिक छहों छीन ॥7॥
नरवेद छठें छय नियत धीर । सातयें संज्वलन क्रोधचीर ।आठवें संज्वलन मानभान । नवमें माया संज्वलन हान ॥8॥
इमि घात नवें दशमें पधार । संज्वलनलोभ तित हूँ विदार ।पुनि द्वादशके द्वयअंशमाहि । सोरह चकचूर कियोजिनाहि 9निद्रा प्रचला इकभागमाहि । दुति अंश चतुर्दश नाश जाहि ।ज्ञानावरनी पन दरश चार । अरि अंतराय पांचों प्रहार ।1॰इमि छय त्रेशठ केवल उपाय । धरमोपदेश दीन्हो जिनाय ।नवकेवललब्धि विराजमान । जय तेरमगुनतिथि गुनअमान ॥
गत चौदहमें द्वै भाग तत्र । क्षय कीन बहत्तर तेरहत्र ।वेदनी असाताको विनाश । औदारि विक्रियाहार नाश ॥12॥
तैजस्य कारमानो मिलाय । तन पंचपंच बंधन विलाय ।संघात पंच घाते महंत । त्रय आंगोपांग सहित भनंत ॥13॥
संठान संहनन छह छहेव । रसवरन पंच वसु फरस भेव ।जुगगंध देवगति सहित पुव्व । पुनि अगुरुलघूउस्वासदुव्व 14परउपघातक सुविहाय नाम । जुत अशुभगमन प्रत्येक खामअपरजथिर अथिरअशुभसुभेव । दुरभागसुसुर दुस्सुरअभेव ॥15॥
अन आदर और अजस्य कित्त । निरमान नीचगोतौ विचित्त ।ये प्रथम वहत्तर दिय खपाय । तव दूजे में तेरह नशाय 16पहले सातावेदनी जाय । नरआयु मनुषगति को नशाय ।मानुषगत्यानु सु पूरवीय । पंचेंद्रिय जात प्रकृति विधीय 17त्रसवादर परजापति सुभाग । आदरजुत उत्तमगोत पाग ।जमकीरती तीरथप्रकृति जुक्त । ए तेरहछयकरि भये मुक्त18जय गुनअनंत अविकार धार । वरनत गनधर नहिंलहत पारताको मैं वंदौं वारवार । मेरी आपत उद्धार धार ॥19॥
सम्मेदशैल सुरपति नमंत । तब मुक्तथान अनुपम लसंत ।वृन्दावन वंदत प्रीतिलाय । मम उरमें तिष्ठहु हे जिनाय 2॰
घत्तानंद
जयजय जिनस्वामी, त्रिभुवननामी, मल्लविमलकल्यानकराभवदंदविदारन आनंदकारन, भविकुमोदनिशिईश वरा 21
अर्घ्यओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
शिखरिणी ।जजें हैं जो प्रानी दरब अरु भावादि विधिसों,करै नानाभांती भगति थुति औ नौति सुधिसौं ।लहै शक्री चक्री सकल सुख सौभाग्य तिनको,तथा मोक्ष जावै जजत जन जो मल्लिजिनको ॥22॥
इत्याशीर्वादः । पुष्पाञ्जलि क्षिपेत् ।
॥ जय जिनेन्द्र ॥