श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ पूजा
तीर्थंकर पूजा
साइट में पूजा खोलेंस्थापना
अडिल्ल छन्द
ह्रूं कार अक्षरात्मक देव जो ध्यावते ।देव मनुष्य पशु कृत सो व्याधि नशावते ॥
कांसी तांबे पत्र पे शुद्ध लिखावते ।केशर चंदन तापर गंध रचावते ॥
दोहा
ऐसे अनुपम-यंत्र को, मन वच काय संभार ।जे भवि पूजें प्रीति धर, हों भवदधि से पार ॥1॥
यंत्र-स्थापना (चाल जोगीरासा)
है महिमा को थान शुद्ध वर-यंत्र कलिकुंड जानो ।डाकिनि शाकिनि अगनि चोर भय नाशत सब दुःख खानो ॥
नवग्रहों का सब दुःख नाशो रवि-शनि आदि पिछानो ।तिनका मैं स्थापन करहूँ त्रिविध-योग मन लानो ॥
आह्वाननॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंडदंडश्रीपार्श्वनाथ धरणेन्द्रपद्मावती सेवित अतुलबल-वीर्य-पराक्रमयुक्त सर्वविघ्न-विनाशक ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (आह्वाननम्)
स्थापनॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंडदंडश्रीपार्श्वनाथ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः! (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंडदंडश्रीपार्श्वनाथ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)
अष्टक
छन्द त्रिभंगी
गंगा का नीरं, अति ही शीरं, गंध गहीरं मेल सही ।भरि कंचनझारी, आनंदधारी, धार करो मनप्रीति लही ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
जलॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥
क्षीरोदधि नंदन, मलया चंदन, केशर और कर्पूर घसो ।भर सुवरण कलशा, मन अति हुलसा, भय व ताप का दुःख नशो ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
चंदनॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥
शशि-सम उजियारो, तंदुल प्यारो, अणि शुध इक सारो जुग लेवो ।हो गंध मनोहर, रतन थार भर, पुंज सुकर मद तज देवो ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
अक्षतॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥
बहु फूल सुवासं, मधुकर-राशं, करके आसं आवत हैं ।सुरतरु के लावो, पुण्य बढ़ावो, काम-व्यथा नश जावत हैं ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
पुष्पॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥
पकवान बनाये, बहु घृत लाये, खांड पगाये मिष्ट करे ।मन आनंद धारें, मंत्र उचारें, क्षुधारोग तत्काल टरे ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
नैवेद्यॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥
रतनन की जोतं, अति उद्योतं, तम क्षय होतं ज्ञान बढ़े ।अति ही सुख पावे, पाप नशावे, जो मन लावे पाठ पढ़े ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
दीपॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥
चंदन कर्पूरं, अगर सुचूरं, लौंगादिक दशगंध मिला ।वर धूप बनाकर, अगनि-माँहि धर, दुष्टकर्म तत्काल जला ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
धूपॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥
खर्जूर मंगावो, श्रीफल लावो, दाख अनार बदाम खरे ।पुंगीफल प्यारे, मन सुखकारे, अंतराय-विधि दूर करे ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
फलॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥
जल गंध सुधारा, तंदुल प्यारा, पुष्प चरू ले दीप भली ।दश धूप सुरंगी, फल ले अभंगी, करो अर्घ उर हर्ष रली ॥
कलिकुंड सुयंत्रं, पढ़कर मंत्रं, ध्यावत जे भविजन ज्ञानी ।सब विपति विनाशे, सुख परकाशे, होवे मंगल सुखदानी ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड दंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेन्द्र-पद्मावती-सेविताय अतुल बलवीर्य पराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय ह्म्ल्व् र्यूं भ्म्ल्व् र्यूं म्म्ल्व् र्यूं र् म्ल्व् र्यूं घ्म्ल्व् र्यूं झ्म्ल्व् र्यूं स्म्ल्व् र्यूं ख्म्ल्व् र्यूं अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥
जयमाला
छन्द त्रोटक
सर्वज्ञ परम गुणसागर हैं, तिन पद के हरि सब चाकर हैं ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं,कलिकुंड सुयंत्र नमूं वर हैं ॥1॥
नित ध्यान करें जो जन-मन ला, वर पूज रचें कर यंत्र भला ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूं वर हैं ॥2॥
तिनके घर ऋद्धि अनेक भरें, मनवाँछित कारज सर्व सरें ।सब विघ्नविनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूं वर हैं ॥3॥
सुर वंदित हैं तिनके चरणं, उर धर्म बढ़े अघ को हरणं ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूं वर हैं ॥4॥
भय चोर अगनि जल साँप मही, सब व्याधि नशें छिन में जु सही ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूं वर हैं ॥5॥
सब बंध खुले छिन माँहि लखो, अरि मित्र होंय गुरु साँच अखो ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूँ वर हैं ॥6॥
अतिसार संग्रहणी रोग नसें, बंझा नारी लह पुत्र हँसें ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूँ वर हैं ॥7॥
सब दूर अमंगल होय जान, सुख संपत दिन-दिन बढ़त मान ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूं वर हैं ॥8॥
इस यंत्र की जे पूजा करंत, सुर नर सुख लह हों मुकतिकंत ।सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुंड सुयंत्र नमूं वर हैं ॥9॥
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हंकलिकुंडदंड श्रीपार्श्वनाथाय-ध्रणेन्द्र-पद्मावती -सेविताय अतुल बलवीर्य-पराक्रमाय सर्व-विघ्नविनाशनाय जयमाला-पूर्णार्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य-मंत्र
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं श्रीपार्श्वनाथाय ध्ररणेन्द्र-पद्मावती सेविताय ममेप्सितं कार्य कुरु कुरु स्वाहा ॥
गीता छन्द
नागेंद्र प्रभु के चरण नमते मुकुटप्रभा महा बढ़ी ।बढ़ो पुण्य अपार सब दुःखकार अघ प्रकृति घटी ॥
ध्याये श्री कलिकुंड दंड प्रचंड पारसनाथ जी ।तिनकी सुनो जयमाल भविजन कहूँ नवा के माथ जी ॥1॥
त्रोटक छंद
विधि-घाति हनो वर-ज्ञान लह्यो, सब ही पदार्थ को भेद कह्यो ।नित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥2॥
कुमती वसु मान विनाशत हैं, मुकती का मारग भाषत हैं ।नित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥3॥
दुर्गति मारग का नाश करे, एकांत-मिथ्यात विवाद हरे ।नित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥4॥
निराकुल निर्मल शील धरे, निर्मैल मुक्तिलक्ष्मी को वरे ।नित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥5॥
नहीं क्रोध मान छल लोभ पाप, अष्टादश दोष विमुक्त आप ।नित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥6॥
हैं अजर अमर गुण के भंडार, सब विघ्न विनाशक परम सारनित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥7॥
नागेंद्र नरेंद्र सुरेंद्र आय, नमिहें आनन्दित चित्त लाय ।नित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥8॥
दिनेंद्र मुनेंद्र निशेन्द्र आय, पूजत नित मन में हर्ष धार ।नित यंत्र नमूं कलिकुंड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ॥9॥
घत्ता छन्द
सब पापनिवारण, संकटटारण, कलिकुंडप्रभु पारस परचंड ।जग में यश पावें, संपति पावें, लहें मुक्ति जो सुख अखंड ॥
प्रतिदिन जो वंदें, मन आनंदें, हों बलवंत पाप सब दूर ।सबविघ्न विनाश, लहें सुख संपति, दुष्टकर्म होवें चकचूर ॥1॰ ॥
श्री पारस स्वामी, अन्तर्यामी, ध्यान लगायो वनमांही ।चर-कमठ जु आयो, क्रोध बढ़ायो, उपसर्ग जु कीनो अधिकार्इ ॥
जिन मेरु-समाना, अचल महाना, लख नागेंद्र ने पूज कियो ।फणमंडप कीनो, सुरबल हीनो, है प्रभु को निज-शीश लयो ॥11॥
सोरठा
पूजन ये सुखकार, जे भवि करिहें प्रीतिधर ।विधि बलवंत अपार, हनकर शिवसुख को लहें ॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड श्रीपार्श्वनाथाय धरणेंद्र-पद्मावती-सेविताय अतुल-बलवीर्य-पराक्रमाय ममात्मविद्यां रक्ष-रक्ष पर विद्यां छिंद-छिंद भिंद-भिंद स्फ्रां-स्फ्रीं-स्फ्रूं-स्फ्रौं-स्फ्रः हूं फट् स्वाहा ॥1॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं श्रीपार्श्वनाथाय धरणेंद्र-पद्मावती-सेविताय ममेप्सितं कार्यं कुरु-कुरु स्वाहा ॥2॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंड-दंड-स्वामिन्नतुल- बलवीर्य-पराक्रमाय ममात्मविद्यां रक्ष-रक्ष पर विद्यां छिंद छिंद भिंद भिंद स्फ्रां स्फ्रीं स्फ्रूं स्फ्रौं स्फ्रः हूँ फट् स्वाहा ॥3॥
॥ इत्याशीर्वादः पुष्पांजलिं क्षिपेत् ॥
॥ जय जिनेन्द्र ॥