जिनेन्द्र वाणी

श्री महावीर पंचकल्याणक विधान

कविवर राजमल पवैया · विधान पूजा

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मंगलाचरण

अनुष्टुप्

मंगलं सिद्ध परमेष्ठी मंगलं तीर्थंकरम्।मंगलं शुद्धचैतन्यं आत्मधर्मोऽस्तु मंगलम्।।मंगलं वर्धमानाय मंगलं गौतम सुऋषि।मंगलं कुन्दकुन्दार्यो महामुनिवर मंगलम्।।

छंद-दोहा

मंगल पंच परम गुरु, जिन प्रतिमा जिनधाम।जय जगदम्बे दिव्यध्वनि, श्री जिनधर्म प्रणाम।।

छंद-चामर

वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञानरूप मंगलम्।गणधरादि सर्वसाधु ध्यानरूप मंगलम्।।जैनधर्म सार्व धर्म विश्व धर्म मंगलम्।वस्तु का स्वभाव ही अनाद्यनंत मंगलम्।।महावीर तीर्थेश अंतिम जिन मंगलम्।ज्ञानरूप ध्यानरूप श्री जिनेन्द्र मंगलम्।।सर्व सिद्ध अरहंत भगवंत मंगलम्।सर्व आचार्य उपाध्याय साधु मंगलम्।।सर्व जिन चैत्य चैत्यालय मंगलम्।सर्वज्ञ दिव्यध्वनि धर्म जिन मंगलम्।।आत्मकल्याण पुरुषार्थ भव्य मंगलम्।आत्मतत्त्व प्राप्ति का उपाय श्रेष्ठ मंगलम्।।श्री कुन्दकुन्द आचार्य देव मंगलम्।ज्ञान ध्यान पूर्ण वैराग्य भाव मंगलम्।।श्री महावीर पंचकल्याणक मंगलम्।पंचकल्याणक विधान पूज्य मंगलम्।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्

समुच्चय पूजा

स्थापना

छंद-ताटंक

महावीर, अतिवीर, वीर, सन्मति, प्रभु वर्धमान स्वामी ।नाम अनंत जपूँ सदैव ही गुण गाऊँ अन्तर्यामी ।।पूर्व भवों में प्रकृति तीर्थंकर का किया भावमय बंध ।भायीं भव्य भावना सोलह, जो हैं श्रेष्ठ पुण्य के छंद ।।तीर्थंकर यश प्रकृति उदय में, स्वामी आप हुए तीर्थेश ।अखिल विश्व कल्याण हेतु प्रभु महावीर हैं निर्ग्रथेश ।।गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, मोक्ष कल्याण पाँच शुभ मंगलमय ।इन्हें प्राप्त कर सिद्ध हुए प्रभु, पाया शाश्वत पद अक्षय ।।

छंद-सोरठा

अंतिम जिन तीर्थेश, महावीर भगवान् हैं ।गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, मोक्ष कल्याणक पूजिये ।।

आह्वाननॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्

(आह्वाननम्)

स्थापनॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः

(स्थापनम्)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

अष्टक

छंद-मानव

पावापुर भव्य सरोवर से शीतल जल प्रभु लाऊँ ।जन्मादि मरण त्रय ज्वाला दुखमय सम्पूर्ण बुझाऊँ ।।पूजूँ पाँचों कल्याणक श्री महावीर जिनवर के ।गुण गाऊँ बहु हर्षित हो नित अंतिम तीर्थंकर के ।।

जलॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

गिरि मेरु सुदर्शन चंदन शीतल सुगंधमय लाऊँ ।भव ताप सर्व हरने को निज की सुगंध महकाऊँ ।। पूजूँ..।।

चंदनॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

भू गर्भ जन्म कुण्डलपुर से अक्षत तंदुल लाऊँ।अक्षय पद प्राप्ति हेतु मैं उत्तम स्वभाव निज ध्याऊँ ।। पूजूँ..।।

अक्षतॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

तप भूमि नाथ वन सुन्दर उपवन से पुष्प मँगाऊँ ।चिर काम-रोग सब हरकर सम्पूर्ण शील गुण गाऊँ ।। पूजूँ..।।

पुष्पॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

दीक्षा वन शाल वृक्ष तल अनुभव रस सुचरु बनाऊँ ।चिर क्षुधा व्याधि क्षय करके परिपूर्ण तृप्त सुख पाऊँ ।। पूजूँ..।।

नैवेद्यॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

उपसर्ग भूमि उज्जयिनी जा ज्ञान-दीप उजियारूँ ।कैवल्य ज्ञान रवि पाने उपसर्गों पर जय पाऊँ ।। पूजूँ..।।

दीपॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

ऋजुकूला तट पर मैं भी निज शुक्ल ध्यान ही ध्याऊँ ।तप करूँ सदैव अनिच्छुक वसु कर्मों पर जय पाऊँ ।। पूजूँ..।।

धूपॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

विपुलाचल राजगृही पर तुव समवशरण निधि पाऊँ।प्रभु शुद्ध ध्यान फल उत्तम पाने का यत्न सजाऊँ।।पूजूँ पाँचों कल्याणक श्री महावीर जिनवर के।गुण गाऊँ बहु हर्षित हो नित अंतिम तीर्थंकर के।।

फलॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

पावापुर पावन भू पर अंतिम निज ध्यान लगाऊँ।सम श्रेणी में ऊपर जा पदवी अनर्घ्य निज पाऊँ।। पूजूँ..।।

अर्घ्यॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

छंद-मानव

प्रभु मात गर्भ में आए तो कमलासन ही राजे।निर्लिप्त उदर में रहकर बिन कष्ट दिए सुविराजे।।जब हुआ जन्म जिनवर का त्रिभुवन को मंगलकारी।इन्द्रादिक देवों ने आ उत्सव की, की तैयारी।।सुर क्षीर समुद्र कलश भर चरणों में प्रभु के लाये।इन्द्रों ने हर्षित होकर अभिषेक अपूर्व रचाये।।तुम प्रभु अंतिम तीर्थंकर हो श्रेष्ठ बालयति अंतिम।यह भव भी नाथ आपका महिमामय है शुभ अंतिम।।ऋजुकूला तट पर आकर दृढ़ शुक्ल ध्यान उर ध्याया।घातिया चार रज क्षय कर कैवल्य ज्ञान उपजाया।।जिन समवशरण की महिमा दिव्यध्वनि से शोभित है।जो भव्य जीव सुनते हैं वे भवदुख से शोभित हैं।।

जो कार्य तुरन्त करोगे शिव पथ पर आ जाओगे।समकित भी पा जाओगे ज्ञानी भी हो जाओगे।।चारित्र मिलेगा सम्यक् अनमोल स्वरूपाचरणी।संयम की द्युति पाओगे जो भव समुद्र दुखहरणी।।आ गया निकट शिव तट भी तू उतर ध्यान से चेतन।पाकर निज आत्मध्यान फल ध्रुव शिवसुख पा ले रे मन।अब तुझे न कुछ करना है हो निजानंद रस पायी।आनंद सिन्धु रस पीना फल पाया शिवसुखदायी।।पावापुर तट पर आकर प्रभु ने निज ध्यान लगाया।तत्काल सर्व भवज्वर हर फल महामोक्ष सुख आया।।पाँचों कल्याणक का फल प्रभु महावीर ने पाया।परिपूर्ण अतीन्द्रिय सुख का सागर उर में लहराया।।सम्राट पंच कल्याणक प्रभु महावीर को वन्दन।हे सन्मति प्रभु! सन्मति दो मैं भी काटूँ भव-बन्धन।।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

छंद-दोहा

जयमाला अर्पण करूँ महावीर भगवान्।जयति जयति जय जय प्रभो, पंचकल्याण महान्।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

गर्भ कल्याणक

पूजन एक ऐसा मधुर एवं सहज धार्मिक कर्म है, जिसमें सम्पूर्ण तत्त्वज्ञानभक्ति के संगीत में घुलकर बड़ा मधुर आस्वाद देता है। जहाँ तत्त्वज्ञान मेंमस्तिष्क की प्रधानता होती है, वहीं पूजा में हृदय मुख्य होता है, इसलिएभक्ति का यह अंग यद्यपि तत्त्वज्ञान के बिना कार्यकारी नहीं होता, फिर भीतत्त्वज्ञान का चिंतन भक्ति की कोमल भाव-धारा का उल्लंघन करके उदितनहीं होता। - बाबू जुगलकिशोर जी 'युगल' चैतन्य विहार, पृष्ठ 65-66

स्थापना

छंद-वीर

जन्म नगर की सुन्दर रचना करते हैं कुबेर सुर आन।गर्भ पूर्व छह मास रत्न वर्षा होती प्रारंभ सुजान।बारह योजन लम्बी नव योजन चौड़ी नगरी निर्वाण ।जन्म समय तक बरसाते हैं रत्न विविध स्वर्गों से आन।तीर्थंकर माता को होते सोलह स्वप्न विचित्र महान्।स्वप्न देख माता के उर में हुआ हर्ष उत्पन्न महान्।इन्द्रादिक सुर मात-पिता का आदर करने आते हैं।कुण्डलपुर वैशाली आकर जिन प्रभु के गुण गाते हैं।।

छंद-सोरठा

पूजूँ गर्भकल्याण, महावीर भगवान् का।षष्ठी शुक्ल अषाढ़, विनय सहित पूजन करूँ ।।

आह्वाननॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्

(आह्वाननम्)

स्थापनॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः

(स्थापनम्)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

छंद-गीतिका

जन्म-मृत्यु-जरा विनाशक नीर सम्यक् प्राप्त हो।जपूँ निज शुद्धात्मा नित आत्म रस उर व्याप्त हो।वीर प्रभु का गर्भ मंगल महोत्सव पूजूँ सदा।ज्ञान-ध्यान-विराग हो अब गर्भ ना चाहूँ कदा ।।

जलॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

भव विषम ज्वर पीर नाशक आत्मचंदन प्राप्त हो।आत्मध्यान करूँ सदा ही ज्ञान रस उर व्याप्त हो।। वीर..।।

चंदनॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

भव समुद्र विनष्ट अक्षत ज्ञान बिन होता नहीं।परम अक्षत पद कभी निज ध्यान बिन होता नहीं।। वीर..।।

अक्षतॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

काम-शर का घाव मिटता ज्ञान पुष्प सुवास से।शील गुण सम्पन्न मिलते आत्मा के पास से।। वीर..।।

पुष्पॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

क्षुधारोग विनाश हित निज आत्मचरु सेवन करूँ।स्वानुभव रस चरु स्वयं ले राग के बंधन हरूँ ।। वीर..।।

नैवेद्यॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मोहक्षय के हेतु उर में ज्ञान का दीपक धरूँ।ज्ञान केवल प्राप्त करके घातिया चारों हरूँ ।। वीर..।।

दीपॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

धर्मध्यानी रंग लेकर शुक्ल ध्यानी धूप लूँ ।अष्टकर्म विनाश करके आत्म सौख्य अनूप लूँ।। वीर..।।

धूपॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

ध्यान का फल मोक्ष फल है नित नया मिलता सदा।कृतकृत्य हो निजपद मिला तो मोक्ष पद मिलता सदा ।।वीर प्रभु का गर्भ मंगल महोत्सव पूजूं सदा।ज्ञान-ध्यान-विराग हो अब गर्भ ना चाहूँ कदा ।।

फलॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

ध्यान के ही अर्घ्य उत्तम बनाने का श्रम करूँ।पद अनर्घ्य अपूर्व पाकर भ्रमण चहुँगति का हरूँ ।। वीर..।।

अर्घ्यॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

छंद-दोहा

जयमाला वर्णन करूँ, परम गर्भकल्याण।महावीर की चरण रज, देती ज्ञान महान् ।।

छंद-चौपाई आँचलीबद्ध

महावीर का गर्भ कल्याण, अंतिम भव की है पहचान।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो ।।माँ त्रिशला के उदर महान्, आए तीर्थंकर भगवान् ।महाप्रभु हो, जय-जय नाथ परम विभु हो ।।मास पूर्व छह बरसे रत्न, जन्म समय तक बिना प्रयत्न ।महासुख हो, देखे नाथ परम विभु हो ।।नूतन नगर किया निर्माण, देवों ने स्वर्गों से आन।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो।मंगल वाद्य बजे नव मास, जन-जन में छाया उल्लास ।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो।सोलह स्वप्न रात में आय, माता त्रिशला लख हर्षाय ।महासुख हो, देखे नाथ परम विभु हो।पति से फल जाना अनुरूप, पुत्र जनम होगा सुखरूप।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो ।।इन्द्रादिक कुण्डलपुर आय, मात-पिता के बहुगुण गाय।महासुख हो, देखे नाथ परम विभु हो।भावी तीर्थंकर के गीत, सबने गाए परम पुनीत ।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो ।।घर-घर बँध गये तोरण द्वार, गीत गूंजते मंगलकार।महासुख हो, जय-जय नाथ परम विभु हो।छप्पन देवी सेवा हेतु, माता की बनतीं सुखकेतु।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो।।प्रश्न आदि करतीं नित नव्य, माता उत्तर देतीं भव्य ।महासुख हो, जय-जय नाथ परम विभु हो।श्री ह्री धृति कीर्ति सुबुद्धि, लक्ष्मी आदिक करतीं शुद्धि।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो।।वर्षा ऋतु आषाढ़ प्रसिद्ध, शुक्ल पक्ष षष्ठी सुप्रसिद्ध ।महासुख हो, देखे नाथ परम विभु हो ।।महा गर्भकल्याण मनोज्ञ, तीर्थंकर प्रभु के ही योग्य।महासुख हो, देखे नाथ परम सुख हो ।।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

छंद-दोहा

महावीर भगवान् का, पूजूँ गर्भकल्याण।गर्भवास भी क्षय करूँ, कृपा करो भगवान्।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

जन्म कल्याणक

स्थापना

छंद-जोगीरासा

जन्म महोत्सव महावीर का सबको ही सुखदाता।बजती देवों की दुन्दुभियाँ सबको आनन्द आता।।इन्द्र सुरासुर सब ही आते प्रभु अभिषेक रचाते।सुरगिरि पर ले जाते प्रभु को निज उर आनंद लाते ।।एक सहस्र अष्ट जल कलशा स्वर्णिम प्रभु पर करते।निज उर की कालुषता धोते सर्व पापमल हरते।।विविध प्रकार महोत्सव होते जग के मंगल दाता।परम जन्म कल्याण महोत्सव त्रिभुवन में विख्याता।।जन्म समय के दश अतिशय से शोभित हैं तीर्थंकर ।भव्यों के कल्याण हेतु आते हैं पूज्य जिनेश्वर ।।

छंद-दोहा

चैत्र शुक्ल की त्रयोदशि, जन्मे वीर महान्।कुण्डलपुर में हो रहे, घर-घर मंगल गान।।

आह्वाननॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट्

(आह्वाननम्)

स्थापनॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः

(स्थापनम्)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

छंद-विधाता

चढ़ाऊँ नीर क्षीरोदधि करूँ निज आत्म का चिन्तन ।जन्म-मरणादि दुख नाशें हरूँ अज्ञान के बंधन ।।जन्म कल्याण जिनवर का महा मंगलमयी पावन ।न्ह्वन महावीर का मनहर हुआ सुरगिरि पे मनभावन।।

जलॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु- विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चढ़ाऊँ ज्ञान चन्दन निज परम शीतल स्वभावी प्रभु ।ताप संसार का नाशें बनूँ भव दुख अभावी विभु।। जन्म..।।

चंदनॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

अतीन्द्रिय ज्ञान अक्षत ही चढ़ाऊँ आपको स्वामी।स्वपद अक्षय मिले मुझको भावना है यही नामी ।। जन्म..।।

अक्षतॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

परम गुण सम्पदा पाऊँ पुष्प निज शीलमय लाऊँ।काम की पीर विनशाऊँ अकामी निज स्वपद पाऊँ।। जन्म..।।

पुष्पॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

आत्म अनुभव स्वरस निर्मित सुचरु तुमको चढ़ाऊँ मैं।अनाहारी स्वपद पाने चरण अपने बढ़ाऊँ मैं ।। जन्म..।।

नैवेद्यॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

आत्म वैभव स्व दीपक की ज्योति जगमग जगे स्वामी।मोहतम नाश तत्क्षण हो ज्ञान कैवल्य हो नामी ।। जन्म.. ।।

दीपॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

आत्मध्यानी धूप लाऊँ शुक्लध्यानी बनूँ स्वामी।कर्म वसु नाश हों मेरे निरंजन पद मिले नामी।। जन्म..।।

धूपॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

ज्ञान-तरु फल प्रभो पाऊँ मुक्ति के मार्ग पर आकर ।मोक्षफल प्राप्त हो मुझको मिले शिव सौख्य रत्नाकर ।।जन्म कल्याण जिनवर का महा मंगलमयी पावन।न्ह्वन महावीर का मनहर हुआ सुरगिरि पे मनभावन ।।

फलॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्य निज भाव के लाऊँ स्वसुख पाऊँ स्वयं अपना ।अपद तजकर स्वपद पाऊँ करूँ संसार को सपना ।। जन्म..।।

अर्घ्यॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

छंद-दोहा

जयमाला वर्णन करूँ, श्रीयुत् जन्म कल्याण।पुनः जन्म धारूँ नहीं, दो आशीष महान्।।

छंद-वीर

मति-श्रुत-अवधिज्ञान के धारी जन्म समय से थे महावीर।अन्तिम जन्म लिया था प्रभु ने सारे जग की हरने पीर।तीर्थंकर का जन्म जान हर्षित हो इन्द्रादिक सारे।ऐरावत गज सज्जित करके लाए जय-जय उच्चारे ।।नगरी की त्रय प्रदक्षिणा दी हर्षित इन्द्राणी आयी।निद्रा लीन किया माता को वह प्रसूति गृह में आयी।प्रथम किए जिनप्रभु के दर्शन गोदी में ही ले आयी।मायामयी शिशु वहाँ लिटाकर जिन-शिशु को बाहर लाई ।।सुरपति ने नेत्र सहस्र बना बहुबार जिनेश्वर को निरखा।गोदी में ले बैठ गया वह उसने जिन बल भी परखा।।मेरु सुदर्शन पर पहुँचा वह पाण्डुक वन आया हर्षित।पाण्डुक शिला विराजित कर वह भाव विभोर हुआ प्रमुदित ।।क्षीरोदधि से एक सहस्र जल कलश मँगाये मंगलमय।जिन अभिषेक रचाया प्रभु का पाया अनुपम भाग्योदय ।।इन्द्राणी ने वस्त्राभूषण पहना प्रभु श्रृंगार किया।इक भवावतारी इस शचि ने अपना बेड़ा पार किया।।सुरपति फिर कुण्डलपुर आये मात-पिता को नमन किया।ताण्डव नृत्य किया फिर अद्भुत सबके मन को मोह लिया ।।बोला विनय सहित माता से ये त्रिभुवन के स्वामी हैं।प्राणाधार हमारे हैं ये, ये ही जग में नामी हैं।।इनको रखना लाड़-प्यार से बहुत सावधानी पूर्वक ।ये बालक त्रिभुवन के पति हैं धनी हमारे हैं सार्थक ।।विदा हो गया इन्द्र अनेक दिविज नगरी में छोड़ गया।प्रभु की सेवा करने को वह प्रभु से सबको जोड़ गया।चरणों में लख सिंह चिह्न प्रभु महावीर का घोषित कर।वर्धमान प्रभु नाम रखा उसने उर में हर्षित होकर।।प्रभु के इक अंगुष्ठ भाग में अमृत थापित किया त्वरित ।भोजन भूषण आभूषण स्वर्गों से ही आते थे नित।।तरुण हुए जब महावीर माँ ने विवाह करना चाहा।गृह बंधन में बाँध वीर को भव का सुख देना चाहा।।महावीर ने नहीं किया स्वीकार आग्रह माता का।बालयति ही रहे वीर प्रभु कहा न माना माता का।।इस प्रकार प्रभु तीस वर्ष के हुए विरागी रहे सदा।निज स्वभाव का चिन्तन करते रहते थे दिन-रात सदा।।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

छंद-दोहा

महावीर भगवान् का, पूजा जन्म कल्याण।जन्म न धारूँ अब प्रभो, विनय सुनो भगवान्।।पुष्पाजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

तप कल्याणक

स्थापना

छंद-रोला

महावीर का तप कल्याणक महिमाशाली।पूजन करके होऊँगा मैं बहु गुणशाली।मंगसिर कृष्णा दशमी को वैराग्य सुहाया।तप धारण का भाव हृदय वैराग्य सुहाया।गए नाथ वन शाल वृक्ष तल तप उर आया।।दीक्षाधारी महावीर ने निज को ध्याया ।।पंचमुष्टि कचलोच किया प्रभु ने हर्षित हो।पंच महाव्रत धारे प्रभु ने बहु पुलकित हो।।विविध भाँति के अतिशय हुए स्वतः ही पावन ।पूजूं तप कल्याण हृदय से मैं मनभावन ।।

छंद-सोरठा

प्रभु का तप कल्याण, अखिल जगत् कल्याणमय।भव तन भोग उदास, प्रभु ने धारे महाव्रत ।।

आह्वाननॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट्

(आह्वाननम्)

स्थापनॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः

(स्थापनम्)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

छंद-चौपाई आँचलीबद्धउत्तर तप ही शिव सुखदाय, जन्म-जरादिक रोग नशाय ।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो।महावीर का तप कल्याण, ज्ञान प्रदाता महा महान्।महा प्रभु हो, जय-जय नाथ परम विभु हो।।

जलॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, भव ज्वर यह सम्पूर्ण मिटाय ।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो। महावीर.....

चंदनॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, अक्षय पद निज सौख्य प्रदाय ।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो। महावीर.....

अक्षतॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, हरता काम व्याधि दुखदाय।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो। महावीर.....

पुष्पॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, निराहार पद तृप्ति प्रदाय ।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो। महावीर.....

नैवेद्यॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, संशय मोह विभ्रम नश जाय।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो। महावीर.....

दीपॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, ध्यान धूप वसु कर्म नशाय ।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो। महावीर.....

धूपॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, महा मोक्ष फल सौख्य प्रदाय ।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो।महावीर का तप कल्याण, ज्ञान प्रदाता महा महान्।महा प्रभु हो, जय-जय नाथ परम विभु हो ।।

फलॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम तप ही शिव सुखदाय, पद अनर्घ्य दाता सुखदाय।परम गुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो।महावीर का तप कल्याण, ज्ञान प्रदाता महा महान्।महा प्रभु हो, जय-जय नाथ परम विभु हो।।

अर्घ्यॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

छंद-दोहा

जयमाला वर्णन करूँ, श्रेष्ठ सुतप कल्याण।निज स्वरूप विश्रान्ति से, पाऊँ तप कल्याण।।

छंद-मानव

प्रभु महावीर के उर में वैराग्य भाव जब आया।तब तीस वर्ष की वय में आनंद अतीन्द्रिय पाया।।फिर मात-पिता से प्रभु ने आज्ञा माँगी नतमस्तक।भव-तन-भोगों से मैं तो अब गया सदा को ही थक ।।हर्षित हो आज्ञा दो माँ हे पिता ! कृपा अब कर दो।मेरे मन की अभिलाषा अंतिम यह पूरी कर दो।।माता ने बहुत मनाया सुत तेरा ब्याह रचाऊँ ।प्रभु बोले माता मेरी अब बंधन नहीं बढ़ाऊँ ।।मैं मुक्ति वधू से परिणय करने ही वन जाऊँगा।हे पिता ! आपकी आज्ञा से तप का बल पाऊँगा।।फिर माता-पिता ने आज्ञा दी प्रभु को पुलकित होकर।तब चले प्रभू गद्गद हो अन्तर में हर्षित होकर।।लौकान्तिक सुर सब आए जो हैं इक भव अवतारी।हैं ब्रह्म स्वर्ग पंचम के ये महाशील गुणधारी।।प्रभु का गुणगान किया बहु जयगीत बहुत ही गाए।फिर धन्य-धन्य उच्चारण कर बहु आनंद उठाए।।प्रभु के कल्याणक उत्सव में कभी न ये आते हैं।प्रभु के वैराग्य समय आ वैराग्य गीत गाते हैं।।इन्द्रों ने सजा पालकी प्रभु को उस पर पधराया।जो संयम धारे प्रभु सम उनने ही प्रथम उठाया।।पहले नर विद्याधर ने हर्षित हो उसे उठाया।सौभाग्य नहीं देवों का संयम सामर्थ्य न पाया।।फिर इन्द्रादिक ने प्रमुदित पालकी उठाई पावन।थी चन्द्रप्रभा वह पालकी सुर निर्मित अति मनभावन ।।पहुँचे सब सुवन नाथ में तरु शाल तले प्रभु आए।दीक्षा धारी तत्क्षण ही सबने ही मंगल गाए।।प्रभु केश लोच के केशों को रत्न पिटारे रखकर।क्षीरोदधि किये प्रवाहित इन्द्रों ने बहु वर्षा कर।।उपवास तीन धारण कर प्रभु गए तपस्या करने।रागादि विभावी भावों को पूर्णतया जय करने।।

त्रय दिवस बाद प्रभु आए आहार हेतु नगरी में।पारणा खीर का करके पल भर न रहे नगरी में ।।नृप बकुल धन्य जो प्रभु को आहार दिया अविकारी।भव सागर सेतु बनाया लख पंचाश्चर्य सुखारी।।चहुँ दिशि में मोर पपीहे बहु पक्षी गान सुनाते।नर-सुर-पशु सारे हर्षित प्रभु के जयगीत हैं गाते ।।बारह वर्षों तक तप कर निज शुक्लध्यान को ध्याया।ऋजुकूला तट पर आकर कैवल्य ज्ञान निज पाया।।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

छंद-दोहा

महावीर भगवान् का, पूजा तपकल्याण।मैं भी तप धारण करूँ, बल दो हे भगवान्।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

ज्ञान कल्याणक

निरखो अंग-अंग जिनवर के, जिनसे झलके शान्ति अपार ।। टेक ।।चरण-कमल जिनवर कहें, घूमा सब संसार ।पर क्षणभंगुर जगत् में, निज आत्मतत्त्व ही सार ।।यातें पद्मासन विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ।।। ।।हस्त-युगल जिनवर कहें, पर का कर्ता होय ।ऐसी मिथ्याबुद्धि से ही, भ्रमण चतुरगति होय ।।यातें पद्मासन विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ।।2 ।।लोचन द्वय जिनवर कहें, देखा सब संसार ।पर दुखमय गति चतुर में, ध्रुव आत्मतत्त्व ही सार ।।यातैं नासादृष्टि विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ।।३।।अन्तर्मुख मुद्रा अहो, आत्मतत्त्व दरशाय ।जिनदर्शन कर निजदर्शन पा, सत्-गुरु वचन सुहाय ।।यातें अन्तर्दृष्टि विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ।।4 ।।

स्थापना

छंद-चौपाई

महावीर का ज्ञान कल्याण। शिव सुख देता श्रेष्ठ प्रधान ।समवशरण रचना छविमान। ऋजुकूला तट हुई महान्।दिन वैशाख शुक्ल दश ज्ञान। प्रकटा प्रभु को केवलज्ञान।आए इन्द्र सुरासुर ज्येष्ठ। विविध सुसज्जा शोभित श्रेष्ठ।अंतरीक्ष राजे महावीर । हरी सकल भव्यों की पीर।दश अतिशय प्रकटे तत्काल । देवोंकृत चौदह सुविशाल।प्रातिहार्य वसु भव्य महान्। यह सुखदायी दृश्य महान्।छत्र चॅवर भामण्डल श्रेष्ठ । रत्नजड़ित सिंहासन ज्येष्ठ ।तरु अशोक करता क्षय शोक। पुष्पवृष्टि दर्शन अवलोक।जिन दिव्यध्यनि श्रेष्ठ महान्। करती है सबका कल्याण।मंगल द्रव्य अष्ट सुखकार। भव्य जीव सब रहे निहार।जय-जय जयति ज्ञान कल्याण। पूजूँ भाव सहित धर ध्यान ।।

आह्वाननॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्

(आह्वाननम्)

स्थापनॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः

(स्थापनम्)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

छंद-मानव

सद्धर्म तत्त्व जल वर्षा पा धन्य हुआ मैं स्वामी।जन्मादि रोग त्रय हारी विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।।श्री महावीर को वन्दूँ नित ज्ञान कल्याण मनाऊँ।घातिया नाश हित तुम सम कैवल्य ज्ञान निधि पाऊँ।।

जलॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व चंदन की पाऊँ सुगंध निज स्वामी।संसार ताप ज्वर क्षय की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।।श्री महावीर को वन्दूँ नित ज्ञान कल्याण मनाऊँ।घातिया नाश हित तुम सम कैवल्य ज्ञान निधि पाऊँ ।।

चंदनॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व अक्षत गुण मैं उत्तम पाऊँ स्वामी।ध्रुव अक्षय पद पाने की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।। श्री .. ।।

अक्षतॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व उपवन के पाऊँ मैं पुष्प अकामी ।चिर काम-बाण दुख क्षय की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।। श्री .. ।।

पुष्पॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व रस निर्मित अनुभव चरु लाऊँ स्वामी।चिर क्षुधा रोग हरने की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।। श्री .. ।।

नैवेद्यॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व दीपक की ही ज्योति जगाऊँ स्वामी।मोहान्धकार भ्रम क्षय की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।। श्री .. ।।

दीपॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व की पावन ध्रुव धूप प्राप्त हो स्वामी।आठों कर्मों के क्षय की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।। श्री .. ।।

धूपॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व तरु फल का ही फल पाऊँ हे स्वामी।विधि महा मोक्ष फल पाने की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।। श्री .. ।।

फलॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

सद्धर्म तत्त्व अर्ध्यावलि अन्तर में लाऊँ स्वामी।पदवी अनर्घ्य पाने की विधि पाऊँ अन्तर्यामी ।। श्री ..।।

अर्घ्यॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

छंद-दोहा

जयमाला वर्णन करूँ, परम ज्ञान कल्याण।निज स्वरूप की कृपा से, पाऊँ केवलज्ञान ।।श्रेष्ठ लोक में समवसृत, कल्पद्रुम छविमान।आठों प्रातिहार्य वसु, मंगल द्रव्य महान्।।

छंद-चौपाई गीतिका

वर्धमान महान् का यह ज्ञान कल्याणक महान्।ज्ञानप्रद अज्ञान हर शिव सौख्य का साधन प्रधान।।निकट ऋजुकूला सुतट पर किया अविकल शुक्ल ध्यान।कर्म घाति विनाश चारों ले लिया कैवल्य ज्ञान।।देव दुन्दुभियाँ बजीं बहु धर्म सबको भा गया।समवशरण त्वरित रच लख हर्ष उर में छा गया।।जुड़ी द्वादश सभा सुन्दर निकट गंध कुटी महान्।इन्द्र समवशरण आए तथा गाए गीतगान ।।किन्तु दिव्यध्वनि बिना ही हो गया प्रभु का विहार।दिवस छ्यासठ तक न पाया जिन वचन का श्रेष्ठ सार।।राजगृह के निकट विपुलाचल सुगिरि प्रभु आ गए।समवसृत के मध्य जिनवर विराजे सुर आ गए।।

हुए गौतम प्रथम गणधर त्वरित दिव्यध्वनि खिरी।भव्य भाग्य महान् जागा विमल जिनवाणी झरी ।।उन्हीं ने झेली उसे जो जीव भव्यासन्न थे।प्राप्त कर उपदेश प्रभु का हृदय मध्य प्रसन्न थे।।दिवस था श्रावण वदी एकम महान् जगत् प्रसिद्ध।तीर्थंकर वीर की ध्वनि सुन हुए बहु जीव सिद्ध।।गीत सुनकर आ गए प्रभु शरण भवदधि पार के।गए शिवपुर दिव्यध्वनि सुन सुख तजे संसार के ।।कल्पवृक्ष समवशरण में दस प्रकार सु हैं प्रधान।एक शत वसु महा ध्वज गाते जिनेश्वर गुण महान्।।अष्ट प्रातिहार्य हैं शुभ महा मंगलमयी श्रेष्ठ ।समवशरण में सुशोभित हैं किन्तु प्रभु तो परम ज्येष्ठ।।छत्र त्रय चौंसठ चॅवर तरुवर अशोक सुदुन्दुभि ।रत्न सिंहासन प्रकाशक पुष्प वर्षा दिव्यध्वनि ।।श्रेष्ठ परमौदारिकी तन भव्य छवि प्रभु की मनोज्ञ ।अन्तरीक्ष विराजते हैं दे रहे उपदेश योग्य ।।अष्ट मंगल द्रव्य शोभित छत्र ध्वज कलशा चॅवर।स्वर्ण ठोना स्वर्ण झारी स्वच्छ दर्पण विजन वर ।।भूमि के ऊपर समवसृत गगन में शोभायमान ।धनुष पाँच हजार ऊपर भूमि से रचना महान्।।सोपान बीस सहस्र उत्तम स्वतः चालित दर्शनीय।अंतरीक्ष में चतुर्मुख प्रभु सदा ही हैं वन्दनीय ।।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

छंद-दोहा

महावीर भगवान् का, पूजूँ ज्ञानकल्याण।मैं भी पाऊँ हे प्रभो, केवलज्ञान महान्।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

मोक्ष कल्याणक

स्थापना

छंद-दोहा

महा मोक्ष कल्याण की, महिमा अपरम्पार ।महावीर प्रभु हो गए, भवसागर के पार।।मावस कार्तिक कृष्ण की, हुआ मोक्ष कल्याण।धन्य-धन्य यह जग हुआ, गाए मंगलगान ।।आयु बहत्तर वर्ष में, पाया पद निर्वाण।भव्य हुई दीपावली, जय जय जय भगवान्।।

छंद-शार्दूलविक्रीडित

उत्तम निर्मल आत्मज्ञान हो प्रभु, शिव सौख्य होवे सदा।मिट जाए अज्ञान भाव मेरा, दुख हो नहीं उर कदा ।।अवसर पाकर करूँ ज्ञान अपना, शिवमार्ग को प्राप्त हो।अन्तर में हो परम शान्ति स्वामी, अनुभव स्वरस व्याप्त हो।।

आह्वाननॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्

(आह्वाननम्)

स्थापनॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः

(स्थापनम्)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

छंद-मानव

जल लाऊँ सिद्ध स्वभावी त्रय रोग नाश करने को।जन्मादि रोग की पीड़ा आया हूँ प्रभु हरने को ।।

मैं मोक्ष कल्याण मनाऊँ श्री महावीर स्वामी का।जयगान करूँ त्रिभुवन पति जिनवर अन्तर्यामी का।।

जलॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु - विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

चंदन हो सिद्ध स्वभावी भव ताप नाश करने को।भवज्वर सम्पूर्ण विनाशें मैं सर्व ताप हरने को।। मैं.. ।।

चंदनॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

अक्षत स्वभाव के चरु ही उत्तम धवलोज्ज्वल लाऊँ ।अक्षय पद निज प्रकटाऊँ परमात्म परम पद पाऊँ ।। मैं.. ।।

अक्षतॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

निज पुष्प शीलमय लाऊँ कामाग्नि बुझा के स्वामी।चौरासी लाख शील गुण प्रकटाऊँ अन्तर्यामी ।। मैं.. ।।

पुष्पॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

निज अनुभव रसमय चरु की महिमा से शोभित होऊँ।पद निराहार निज पाऊँ चिर क्षुधा-व्याधि मैं खोऊँ ।। मैं.. ।।

नैवेद्यॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निज ज्ञान ज्योतिमय दीपक अंतर में हे प्रभु लाऊँ।मोहाग्नि बुझाऊँ स्वामी कैवल्य ज्ञान निधि पाऊँ ।। मैं.. ।।

दीपॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धों सम बनने को ही निज धूप ध्यानमय लाऊँ।वसुकर्म ज्वाल की ज्वाला निज बल से नाथ बुझाऊँ।। मैं.. ।।

धूपॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

निज आत्मज्ञान फल अनुपम ध्रुव मोक्ष महाफल पाऊँ।फिर सादि अनंत काल तक शाश्वत आनंद उठाऊँ ।।मैं मोक्ष कल्याण मनाऊँ श्री महावीर स्वामी का।जयगान करूँ त्रिभुवन पति जिनवर अन्तर्यामी का।।

फलॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्ध्यावलि चरण चढ़ाऊँ निज शुद्ध भाव की पावन ।पदवी अनर्घ्य प्रभु पाऊँ जो है मुनिवर मनभावन ।। मैं.. ।।

अर्घ्यॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

छंद-दोहा

जयमाला वर्णन करूँ, परम मोक्षकल्याण।निज स्वरूप की कृपा से, पाऊँ मोक्षकल्याण।।

छंद-वीर

मोक्ष प्राप्त करने की सारी विधि प्रभु ने झट की सम्पूर्ण ।एक समय में त्रिलोकाग्र पाया त्रैकालिक सुख आपूर्ण।।पहले योग अभाव किया फिर प्रकृति बहत्तर कर दीं नाश।अन्तिम समय नाश तेरह भी पाया उत्तम मोक्ष प्रकाश।।अ इ उ ऋ लृ उच्चारण में जितना लगता है काल।उतने में सब क्रिया पूर्ण कर पाया निजपद महाविशाल ।।सिद्धचक्र में हुए विराजित एक समय में ही सत्वर ।सादि अनंतानंत काल तक आप रहेंगे अजर अमर ।।

लाख चौरासी उत्तर गुण के संग पाये गुण सर्व अनंत।नित्य निरंजन पद प्रकटाया काल अनादि अनंतानंत।।भव रज धोयी निजपद पाया तथा हो गए सिद्ध महंत।जिनशासन के महान् रक्षक महामहिम त्रिभुवन भगवंत।।तन कपूरवत् उड़ा मात्र नख केश रहे इस धरती पर।सम श्रेणी में नाथ विराजे आनंदामृत वर्षा कर।।प्रभु तन मायामयी रचा देवों ने विनय सहित तत्क्षण।असुरकुमार सुरों ने मुकुटानल से भस्म किया उस क्षण।।प्रभु तन की भस्मी सबने ही निज-निज मस्तक पर धारी।जय हो महावीर स्वामी की जय ध्वनि पावन उच्चारी।।हमने भी प्रभु को वन्दन कर आत्मशक्ति पायी पावन।महा मोक्ष कल्याण मनाया सारे जग को मन भावन।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीरजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

छंद-दोहा

पूर्ण अर्घ्य अर्पण करूँ, पूजूँ मोक्षकल्याण।मैं भी पाऊँ मोक्ष प्रभु, पाऊँ सौख्य महान्।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

समापन

अंतिम महार्घ्य

छंद-वसंततिलका

श्री वर्धमान प्रभु को मैं नित्य ध्याऊँ,आनन्द सिन्धु पावन में ही समाऊँ।निज आत्मतत्त्व का ही श्रद्धान भाऊँ,परिपूर्ण ज्ञान सागर मैं शीघ्र पाऊँ।।

अर्घ्यॐ ह्रीं गर्भ-जन्म-तपो-ज्ञान-मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीर-जिनेन्द्राय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

महाजयमाला

छंद-मानव

आनंद अतीन्द्रिय सागर का तट जब भी प्रभु पाया।उसमें न प्रवेश किया प्रभु ना तट पर कभी नहाया।।रागों की कलकल नदियाँ दुर्गन्धित मुझको भायीं।परिणाम चतुर्गति दुख पा मेरी आत्मा मुरझायी।।मोहादि विकारी भावों से मैंने बहु दुख पाये।अविकारी भाव न भाये भव-राग हृदय में आये।।पर परिणति सदा बजाती रागों की बंसी दुखमय।मैं भी उस पर मोहित हो तजता निज वैभव दुखमय।।षट् ऋतुएँ अपने-अपने क्रम से आती रहती हैं।आमंत्रण शिव-सुख का दे झर-झर जाती रहती हैं।।निज आत्मज्ञान की ऋतु भी लाती निज ज्ञान बसंती।स्वयमेव निकट आती है आनंद धार रसवंती।फिर भी परभावों का रस मैं नित्य पिया करता हूँ।करता हूँ भाव मरण मैं भव कष्ट लिया करता हूँ।।कर्मों की सकल प्रकृतियाँ प्रतिपल मुझको दुख देतीं।फिर इस चेतन को मोहित करके अनंत दुख देतीं।।यह सब अनादि से ही प्रभु होता आया है प्रतिदिन।पर चेतन कभी न चेता खोये सारे ही पल छिन।।अब आत्मबोधि का अवसर चेतन ने फिर पाया है।इसका स्वकाल आया है उर में समकित भाया है।।अब इसके अच्छे दिन भी आये हैं स्वयं सिमट कर।भव तट इसने पाया है भव भावों से ही हटकर।।

पूँजी अनंत गुण वाली इसने उत्तम पायी है।अविरति भी हुई तिरोहित संयम की ऋतु आयी है।।सन्मार्ग मिला चेतन को भव के विकार हरने को।अनुभव रस भी पाया है अन्तर घट के भरने को।।कैवल्य ज्ञान वीणा के स्वर उर में महक रहे हैं।रागों के राग सकल ही चेतन से बहक रहे हैं।।चेतन मन आनन्दित है इसने महान् निधि पायी।सर्वज्ञ दशा प्रकटा कर निर्वाण दशा भी पायी।।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं गर्भ-जन्म-तपो-ज्ञान-मोक्षकल्याणकविभूषित श्री महावीर-जिनेन्द्राय महाजयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

गीत

आनन्द सिन्धु अपना निज आत्मा है।निज आत्मा त्रिकाली शुद्धात्मा है।।शिव सौख्य बाधक बहिरात्मा है।शिव सौख्य साधक अन्तरात्मा है।।मेरा सुचेतन परमात्मा है।ये तो सदा से सिद्धात्मा है।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

समुच्चय महार्घ्य

छंद-वीर

श्री अरहंत देव को पूजूँ श्री सिद्ध प्रभु को पूजूँ।आचार्यों के चरणाम्बुज श्री उपाध्याय के पद पूजूँ।।सर्व साधु पद पूजूँ श्री जिन द्वादशांग वाणी पूजूँ।तीस चौबीसी बीस विदेही जिनवर सीमंधर पूजूँ।।कृत्रिम अकृत्रिम तीन लोक के जिनगृह जिनप्रतिमा पूजूँ।।पंचमेरु नंदीश्वर पूजूँ तेरह द्वीप चैत्य पूजूँ।।सोलह कारण दशलक्षण रत्नत्रय धर्म सदा पूजूँ।भूत-भविष्यत्-वर्तमान की त्रय जिन चौबीसी पूजूँ।।श्री वृषभादिक वीर जिनेश्वर ऋषि गणधर स्वामी पूजूँ।श्री जिनराज सहस्रनाम श्री मोक्षशास्त्र आदि पूजूँ।।श्री पंचकल्याणक पूजूँ विविध विधान महा पूजूँ।गौतम स्वामी कुन्दकुन्द आचार्य, समयसार पूजूँ।।चम्पापुर पावापुर गिरनारी कैलाश शिखर पूजूँ।श्री सम्मेद शिखर पर्वत जिनवर निर्वाण क्षेत्र पूजूँ।।तीर्थंकर की जन्मभूमि अतिशय अरु सिद्ध क्षेत्र पूजूँ।श्री जिनधर्म श्रेष्ठ मंगलमय महा अर्घ्य दे मैं पूजूँ।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सर्वपूज्यपदेभ्यो महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

हमारे चौबीसों ही तीर्थंकर अपनी पिछली पर्यायों में हमारे समान ही पामरपर्यायों में थे; पर उन्होंने स्वयं को जाना, पहिचाना, स्वयं का अनुभव किया;स्वयं में ही समा गये; परिणामस्वरूप तीर्थंकर बने, सर्वज्ञ हुये। भले ही इसप्रक्रिया के सम्पन्न करने में दस-पाँच भव लग गये हों; पर उन्होंने अपनेपरमात्मस्वरूप को प्राप्त कर ही लिया ।भगवान् महावीर ने यह महान् कार्य अपने दस भव पहले शेर की पर्याय मेंआरम्भ किया था और भगवान् पार्श्वनाथ ने यह कार्य हाथी की पर्याय में आरम्भकिया था। इससे सिद्ध होता है कि जैनदर्शन मात्र नर से नारायण बनाने वाला दर्शननहीं, अपितु पशु से परमेश्वर बनाने वाला वीतरागी दर्शन है।– चिंतन की गहराईयाँ, पृष्ठ १४१'क्रमबद्धपर्याय' की श्रद्धा एक ऐसी संजीवनी है, जो हर स्थिति में धैर्य कोकायम रखती है, शान्ति प्रदान करती है, कर्तृत्व के अहंकार को तोड़ती है, ज्ञाता-दृष्टा बने रहने की पावन प्रेरणा देती है; अधिक क्या, यों कहिये न, कि जीवन कोसफल सार्थक बना देती है।– चिंतन की गहराईयाँ, पृष्ठ १९८

शान्ति पाठ

छंद-दोहा

परम शान्ति पाऊँ प्रभो, पाऊँ सम्यक् धर्म।रत्नत्रय की भक्ति से, नाशें सारे कर्म ।।सकल जगत् में शान्ति हो, सुखी रहें सब जीव।षट्कायिक के जीव सब, दुखी न होंय कदीव।।जीव मात्र पर क्षमा रख, पालूँ अपना धर्म।शुद्धात्मा का ध्यान धर, पाऊँ निश्चय धर्म ।।है सुभावना हे प्रभो, घर-घर मंगलाचार।पूर्ण शान्ति हो विश्व में, हो सबका उद्धार।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।(नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें।)

क्षमापना पाठ

छंद-दोहा

भूल-चूक कर दो क्षमा, हे त्रिभुवन के नाथ ।आप कृपा से हे प्रभो, मैं भी बनूँ स्वनाथ ।।अल्प नहीं है हे प्रभो, पूजन विधि का ज्ञान ।अपना सेवक जानकर, क्षमा करो भगवान् ।।

पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।हे प्रभो! हे जिनेन्द्र ! जिस मनुष्य ने आपको देखकर भी अपनी आत्मा कोकृतकृत्य नहीं माना, वह मनुष्य नियम से संसाररूपी समुद्र में मज्जन तथा उन्मज्जनकरेगा। अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य समुद्र में उछलता तथा डूबता है, उसी प्रकार वहमनुष्य बहुत काल तक संसार में जन्म-मरण करता हुआ भ्रमण करेगा।- श्री जिनेन्द्र स्तवन, श्लोक 17, आचार्य पद्मनन्दि

॥ जय जिनेन्द्र ॥

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  1. महावीर जयंती की तिथियाँ2026: 30 मार्च