श्री आदिनाथ पंचकल्याणक विधान
कविवर राजमल पवैया · विधान पूजा
साइट में विधान खोलेंमंगलाचरण
छंद-अनुष्टुप्
मंगलं सिद्ध परमेष्ठी मंगलं तीर्थंकरम्।मंगलं शुद्धचैतन्यं आत्मधर्मोऽस्तु मंगलम्।।
छंद-दोहा
जयति पंच परमेष्ठी, जिनप्रतिमा जिनधाम।जय जगदम्बे दिव्यध्वनि, श्री जिनधर्म प्रणाम।।श्री चौबीस जिनेश प्रभु, उत्तम मंगल रूप।करुणा से दर्शा रहे, सबको आत्मस्वरूप।।
छंद-चामर
वीतराग श्री जिनेन्द्र ज्ञानरूप मंगलम्।गणधरादि सर्व साधु ध्यानरूप मंगलम्।।जैन धर्म सार्व धर्म विश्व धर्म मंगलम्।वस्तु का स्वभाव ही अनाद्यनंत मंगलम्।।वर्तमान चतुर्विंशति जिनेन्द्र मंगलम्।आदिनाथ पंचकल्याण भव्य मंगलम्।।सर्व अरहंत सिद्ध भगवंत मंगलम्।सर्व आचार्य उपाध्याय साधु मंगलम्।।सर्व जिन चैत्य चैत्यालय मंगलम्।श्री जिनेन्द्र दिव्यध्वनि धर्म जिन मंगलम्।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।(सामग्री चढ़ाते समय स्वयं क्षिपामि तथा दूसरों को निर्देश देते समय क्षिपेत् बोलना चाहिए।)
समुच्चय पूजा
स्थापना
छंद-दोहा
आदिनाथ भगवान् के, पूज्य पंच कल्याण।तीर्थंकर पद प्राप्त कर, पाया पद निर्वाण।।ऋषभदेव भगवान् की, महिमा अपरम्पार।जो भी ध्याता भाव से, हो जाता भव पार।।जिन प्रभु गर्भ कल्याण का, जागा हृदय प्रमोद।जन्म कल्याण समय हुआ, बहुत हर्ष आमोद ।।तप कल्याणक के समय, जागा उर वैराग्य।वीतराग मुनि प्रभु हुए, जागा सबका भाग्य।।परम ज्ञान कल्याण ही, दाता केवलज्ञान।समवसरण रचना हुई, गूंजे जय जय गान।।योग अभाव हुआ स्वतः, हुआ मोक्ष कल्याण।सहज सौख्य दातार हैं, पाँचों ही कल्याण।।भक्ति सहित पूजन करूँ, करूँ आत्म-उत्थान।विनयपूर्वक अब रचूँ, पंच कल्याण विधान।।
आह्वाननॐ ह्रीं गर्भजन्मतपोज्ञानमोक्षपंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (आह्वानम्)
स्थापनॐ ह्रीं गर्भजन्मतपोज्ञानमोक्षपंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं गर्भजन्मतपोज्ञानमोक्षपंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
अष्टक
छंद-मानव
जन्मादि रोग त्रय क्षय हित, निर्मल स्वभाव जल लाऊँ।भव व्याधि सर्वथा नाशें, परिपूर्ण मोक्ष-सुख पाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
जलॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु- विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
संसार ताप ज्वर क्षय हित, चंदन स्वभावमय लाऊँ।शुभ अशुभ भाव सब नशकर, शीतलता उर प्रकटाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
चंदनॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय संसारताप- विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
भवसागर पार प्राप्ति हित, अक्षत स्वभाव निज ध्याऊँ।अक्षय पद प्राप्त करूँ प्रभु, निज गुण अखंड प्रकटाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
अक्षतॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
शुचिमय स्वभाव पुष्पों की, निर्मल सुगंध उर लाऊँ।कामाग्नि बुझाऊँ स्वामी, गुण शील शीघ्र प्रकटाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
पुष्पॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
निज अनुभव रसमय चरु ला, जठराग्नि तुरंत बुझाऊँ।तत्काल निराहारी बन, परिपूर्ण तृप्त हो जाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
नैवेद्यॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मिथ्यात्व मोह-तम हरने, निज ज्ञान-ज्योति उर लाऊँ।कैवल्य ज्ञान निधि प्रकटा, आनंद अतीन्द्रिय पाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
दीपॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज ध्यान धूप ले पावन, अपने स्वरूप को ध्याऊँ।वसु कर्मों को ईंधनवत्, सम्पूर्ण तुरंत जलाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
धूपॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
पाँचों प्रत्यय क्षय करके, सुखमयी मोक्ष-फल पाऊँ।भव-फल विषमयी त्याग कर, आनंद मग्न हो जाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
फलॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
भव भावों की अर्ध्यावलि, तज कर निज को ही ध्याऊँ।पदवी अनर्घ्य पाऊँ मैं, ध्रुव सिद्ध स्वपद प्रकटाऊँ।।
श्री आदिनाथ जिनवर के, पाँचों कल्याण मनाऊँ।आत्मत्व शक्ति प्रभु के सम, प्रकटा निज वैभव पाऊँ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
छंद-सोरठा
पूजूँ पंच कल्याण, ऋषभदेव भगवान् के।गाऊँ मंगल गान, शरण आपकी प्राप्त कर।।
छंद-वीर
प्रथम तीर्थंकर इस युग के आदिनाथ को करूँ प्रणाम।धर्म-चक्र का किया प्रवर्तन प्रथम नित्य वन्दूँ वसु याम।।पिता नाभिराजा की आज्ञा मान आप हो गए नरेश।असि मसि कृषि वाणिज्य शिल्प विद्या का दिया सरस उपदेश।।तुव उपदेश श्रवण कर प्राणी करते थे जीवन यापन।लौकिक ज्ञान कला तुमसे पा सुखी हुआ सबका जीवन।।नन्दा और सुनन्दा दोनों रानी सेवा करती थीं।विविध प्रमोदों के द्वारा वे हृदय आपका हरती थीं।।किन्तु आप तो नीर-कमलवत् पृथक् सभी से रहते थे।क्षायिक समकित के स्वामी थे अतः विरागी रहते थे।।मति श्रुत अवधिज्ञान के स्वामी जनम समय से ही थे आप।उर में यही भावना करते थे कब हरूँ जगत् संताप।।नीलांजना मरण को लख कर एक दिवस जागा वैराग्य।आत्म-चिन्तवन हृदय सुहाया मानो जागा निज सौभाग्य।।सतत भावना द्वादश भायीं उदासीन हो गया हृदय।निर्णय किया आपने तत्क्षण पाऊँगा निज आत्मनिलय।।
राज्य-पाट तज वन जा पहुँचे तजे परिग्रह सब चौबीस।स्वयं दीक्षित हुए महाव्रत धरकर स्वामी हुए मुनीश।।तोड़ अब्रह्म रूप पर्वत को आत्मब्रह्म में लीन हुए।लाख चुरासी उत्तर गुण हित निज स्वभाव में तल्लीन हुए।।एक सहस्र वर्ष तप करके केवल ऋद्धि पाई अनुपम।स्व-पर प्रकाशक ज्ञान हो गया नष्ट किया भवतम विभ्रम।।दे उपदेश भव्य जीवों को निज सत्पथ ही दरशाया।सिद्ध-समान सभी प्राणी हैं सब जीवों को बतलाया।।गिरि कैलाश शिखर अष्टापद अंतिम शुक्ल ध्यान ध्याया।अंतिम योग नाश करते ही महा मोक्ष निज पद पाया।।आज आपकी पूजन करके मुझको भी निज ज्ञान हुआ।देह भिन्न है जीव भिन्न है पूर्ण भेद विज्ञान हुआ।।मैं भी तुव पथ पर चलकर प्रभु करूँ आत्मा का कल्याण।आप कृपा से मुझे प्राप्त हो सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं पंचकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
छंद-दोहा
आदिनाथ का ध्यान धर, नाशें भ्रम अज्ञान।पुद्गल जड़ तन से पृथक्, करूँ स्वयं का भान।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
गर्भ कल्याणक
हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! जिस मनुष्य ने आपको देखकर भी अपनी आत्मा कोकृतकृत्य नहीं माना, वह मनुष्य नियम से संसाररूपी समुद्र में मज्जन तथा उन्मज्जनकरेगा। अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य समुद्र में उछलता तथा डूबता है, उसी प्रकार वहमनुष्य बहुत काल तक संसार में जन्म-मरण करता हुआ भ्रमण करेगा।- श्री जिनेन्द्र स्तवन, श्लोक 17, आचार्य पद्मनन्दि
स्थापना
छंद-दोहा
आदिनाथ भगवान् का, हुआ गर्भकल्याण।इन्द्रादिक सुर नत हुए, गाए मंगल गान।।गर्भ पूर्व से जन्म तक, हुआ बहुत आनन्द।कैसे वर्णन कर सकूँ, मैं तो हूँ मति मन्द ।।
छंद-रोला
मैं तो हूँ मति मंद किन्तु फिर भी गुण गाऊँ।आदिनाथ प्रभु की पूजन करके हर्षाऊँ।।श्रेष्ठ गर्भ कल्याण महोत्सव आज मनाऊँ।इसके फल से नहीं गर्भ में फिर प्रभु आऊँ।।
छंद-दोहा
कृष्ण दूज आषाढ़ की, हुआ गर्भ कल्याण।मरुदेवी माँ के उदर, आए श्री भगवान्।।
आह्वाननॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (आह्वानम्)
स्थापनॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
छंद-सखी
जल शुद्ध भाव का लाऊँ, प्रभु के चरणाग्र चढ़ाऊँ।जन्मादि रोग त्रय नाशें, निज आत्मस्वरूप प्रकाशूँ।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
जलॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा- मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
यह शुद्ध भाव चन्दन है, प्रभु चरणों में अर्पण है।भव-ज्वर सम्पूर्ण मिटाऊँ, संसार-ताप विनशाऊँ।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
चंदनॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय संसारताप- विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
निज शुद्ध भाव अक्षत लूँ, ध्रुव अक्षय पद शाश्वत लूँ।भव-भाव न उर में लाऊँ, यह भव-समुद्र तर जाऊँ।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
अक्षतॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
निज भाव पुष्प उर लाऊँ, कामाग्नि बुझा सुख पाऊँ।दुख काम-बाण विनशाऊँ, गुण लाख चुरासी पाऊँ।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
पुष्पॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
निज शुद्ध भाव चरु लाऊँ, तुमको ही निशदिन ध्याऊँ।चिर क्षुधा रोग विनशाऊँ, परिपूर्ण तृप्त हो जाऊँ।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
नैवेद्यॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज ज्ञान-दीप उजियारूँ, मिथ्यात्व तिमिर विनशाऊँ।निज शुद्ध भाव उर लाऊँ, कैवल्य ज्ञान निधि पाऊँ।।
प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
दीपॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज ध्यान-धूप ला मनहर, सत्पथ पर आऊँ जिनवर।शुभ अशुभ विभाव हरूँ मैं, वसु कर्म विनाश करूँ मैं।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
धूपॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज शुद्ध भाव फल लाऊँ, ध्रुव महामोक्ष फल पाऊँ।निज शुक्ल ध्यान के बल से, जुड़ जाऊँ मोक्षमहल से।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
फलॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ भाव सभी निर्बल हैं, देते न कभी शिव-फल हैं।शुद्धात्म ध्यान ही ध्याऊँ, पदवी अनर्घ्य निज पाऊँ।।प्रभु ऋषभ गर्भकल्याणक, पूजूँ आनन्द प्रदायक।जय आदिनाथ गुणधारी, भव पातक सर्व निवारी।।
अर्घ्यॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
छंद-मत्तसवैयासर्वार्थसिद्धि के सुख तुमने तैंतिस सागर तक पाये थे।फिर तज करके वे सारे सुख माँ मरुदेवी उर आये थे।।छह मास पूर्व देवों ने आ नगरी की रचना की सुन्दर।नव राजभवन निर्माण किया रच कोट खाई उपवन मनहर।।
छह मास पूर्व से रत्नों की वर्षा होती प्रतिदिन त्रिकाल।जो जन्म समय तक होती है पाकर जन-जन होते निहाल।।हो गया अयोध्या नगर धन्य घर-घर में तोरण द्वार सजे।शहनाई गूँजी मृदु स्वर में नगरी में मंजुल वाद्य बजे।।छप्पन कुमारि देवियाँ श्रेष्ठ माता की सेवा को आयीं।सुरि श्री ही धृति कीर्ति बुद्धि लक्ष्मी सेवा कर हर्षायीं।।इन्द्रादिक देवों ने आकर नृप नाभिराय के गुण गाये।चौदहवें कुलकर पिता नाभि हो गये धन्य जिन प्रभु पाये।।माता मरुदेवी के पावन चरणों में सभी देव आये।हे मात! धन्य हो गईं आप तीर्थंकर सुत तव उर आये।।प्रभु मात-पिता का आदर कर सुरपति ने बहु सम्मान किया।फिर स्वर्ग गये सुर सभी हर्ष से पुलकित जय जय गान किया।।माता उर मध्य विराजित हो कमलासन रहे आदि प्रभु जी।त्रिवली न मात की भंग हुई वे रहे उदर में निर्मल ही।।
ॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छंद-सोरठा
गर्भकल्याण महान्, आदिनाथ का पूज कर।गर्भ-जन्म के कष्ट, मैं भी नाशूँ हे प्रभो।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
जन्म कल्याणक
पूजन एक ऐसा मधुर एवं सहज धार्मिक कर्म है, जिसमें सम्पूर्णतत्त्वज्ञान भक्ति के संगीत में घुलकर बड़ा मधुर आस्वाद देता है। जहाँतत्त्वज्ञान में मस्तिष्क की प्रधानता होती है, वहीं पूजा में हृदय मुख्य होताहै, इसलिए भक्ति का यह अंग यद्यपि तत्त्वज्ञान के बिना कार्यकारी नहींहोता, फिर भी तत्त्वज्ञान का चिंतन भक्ति की कोमल भाव-धारा काउल्लंघन करके उदित नहीं होता। – बाबू जुगलकिशोर जी 'युगल'चैतन्य विहार, पृष्ठ 65-66
स्थापना
छंद-मानव
जन्मे श्री आदिनाथ प्रभु, जगती में आनंद छाया।त्रिभुवन के जीवों ने सुख, अन्तर्मुहूर्त में पाया।।माता मरुदेवी रानी, ने तीर्थंकर सुत पाये।अंतिम चौदहवें कुलकर, पितु नाभिराय हर्षाये।।जय घोष हुआ नगरी में, नृप देते दान किमिच्छिक।बज उठी स्वर्ग में भेरी, आनंद हुआ सर्वाधिक।।मेरे उर हर्ष समाया, प्रभु जन्म जान मंगलमय।पूजूँ मैं जन्मकल्याणक, हर्षित होकर महिमामय।।
छंद-दोहा
चैत्र कृष्ण नवमी दिवस, हुआ जन्म कल्याण।मेरु सुदर्शन पर हुआ, प्रभु अभिषेक महान्।।
आह्वाननॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (आह्वानम्)
स्थापनॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
छंद-ताटंक
परम पारिणामिक भावों का निर्मल जल लाऊँ पावन।जन्म जरा मृतु रोग नाश कर निज पद पाऊँ मनभावन।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
जलॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा- मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों का चंदन शीतलता दायक।आत्मभावना भाने वाला पाता है समकित क्षायिक।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
चंदनॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय संसारताप- विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों के अक्षत अक्षय पद दाता।सर्व शुभारंभ आस्रव घातक संवर ही निज सुख लाता।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
अक्षतॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों के पुष्प निर्जरा लाते हैं।पूर्व बद्ध कर्मों को ये ही पूर्णतया विनशाते हैं।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
पुष्पॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों के सुचरु क्षुधा दुखनाशक हैं।अनाहार निज पद के दाता आत्मस्वरूप प्रकाशक हैं।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
नैवेद्यॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों की दीप-ज्योति सुखकारी है।केवलज्ञान प्रदाता है यह चहुँगति भवदुखहारी है।।
आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
दीपॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों की ध्यान-धूप सुखदायक है।अष्ट कर्म रज क्षय करती है पूर्ण सिद्ध पद दायक है।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
धूपॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों के फल पाने का है उत्साह।महा मोक्ष फल पाने का मैं करूँ प्रयत्न सदैव अथाह ।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
फलॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
परम पारिणामिक भावों के अर्घ्य अपूर्व बनाऊँगा।निज अनर्घ्य पदवी पाने को निज का ध्यान लगाऊँगा।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भवदुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार।।
अर्घ्यॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
छंद-दोहा
जयमाला वर्णन करूँ, जन्म कल्याण महान्।आदिनाथ प्रभु का करूँ, बार-बार जयगान।।
छंद-ताटंक
मति-श्रुत अवधिज्ञान के धारी आदिनाथ का जन्म हुआ।नगर अयोध्या हुआ प्रफुल्लित घर-घर में आनंद हुआ।।
सिंहासन हिल उठा इन्द्र का अवधिज्ञान से जान लिया।।ऋषभदेव का जन्म जान कर उर में बहु आनंद किया।।भेरी बजा सर्व देवों को जन्म सूचना दी तत्काल।।ऐरावत गज सजा इन्द्र ने जोड़ी सेना सप्त विशाल।।तत्क्षण नगर अयोध्या आया दी प्रदक्षिणा तीन प्रधान।।नगर अयोध्या के द्वारे पर ठहर गया तब इन्द्र महान्।।इन्द्राणी ने प्रसूति गृह में जा जिन प्रभु दर्शन पाये।।माता को निद्रा में लय कर मन में शचि बहु हर्षाये।।गोदी में लेकर जिन प्रभु को नगर द्वार पर वह आयी।।सौंप इन्द्र को ऐरावत पर भाग्योदय पा हर्षायी।।सुरपति ने जिन प्रभु को निरखा सहस्र नेत्र कर बारम्बार।।तो भी तृप्ति न पायी उसने मन में छाया हर्ष अपार।।त्वरित सुदर्शन मेरु शिखर पर पाण्डुक वन ले गया सुरेन्द्र।।पाण्डुक शिला विराजित करके वन्दे त्रिभुवनजयी जिनेन्द्र।।एक सहस्र अष्ट कलशों में क्षीरोदधि जल मंगवाया।।फिर सौधर्म ईशान इन्द्र ने प्रभु को हर्षित नहलाया।।प्रभु तन का जल इन्द्राणी ने स्वच्छ किया बहु सुख पाया।।बालक जिन श्रृंगार श्रेष्ठ कर उर में बहुत मोद छाया।।सप्त सैन्य दल सहित इन्द्र चल नगर अयोध्या में आया।।मात-पिता को आदर से प्रभु को सौंपा बहु हरषाया।।अनुपम नाटक-नृत्य इन्द्र ने किया अनूठा बारम्बार।।मात-पिता को वन्दन करके विनय सहित बोला वच चार।।ऋषभनाथ है नाम प्रभु का चिह्न वृषभ है मंगलकार।।लाड़-प्यार से इनको रखना ये ही सबके तारणहार।।
ये ही प्रभु त्रिभुवन के स्वामी और हमारे प्राणाधार।कोटि-कोटि जीवों को ये ही ले जाएँगे भवदधि पार।।पुत्र आपके धनी हमारे ये त्रिभुवन के स्वामी हैं।होने वाले तीर्थंकर हैं ये ही अन्तर्यामी हैं।।फिर नन्हें-नन्हें देवों को छोड़ा खेल हेतु प्रभु संग।उन्हें नमन कर स्वर्ग गया वह धन्य हो गया जन्म प्रसंग।।प्रभु को षट्रस निर्मित भोजन स्वर्ग लोक से आते थे।वस्त्राभूषण प्रथम स्वर्ग के मानस्तम्भ से आते थे।।इस प्रकार बढ़ते-बढ़ते प्रभु तरुण हुए स्व राज्य पाया।नंदा और सुनंदा से रच ब्याह अनोखा सुख पाया।।नंदा से सौ पुत्र हुए इक पुत्री ब्राह्मी गुणशाली।तथा सुनंदा बाहुबली सुता सुन्दरी छविशाली।।नंदा के सुत ज्येष्ठ भरत थे भावी चक्रवर्ती बलवान।नाभिराय मरुदेवी के गृह होते थे आनंद महान्।।एक दिवस नृप नाभिराय ने ऋषभदेव को राज्य दिया।भार मुक्त हो नाभिराय ने सारा ही साम्राज्य दिया।।आगे की कथनी तपकल्याणक में वर्णित होगी पावन।आदिनाथ का जीवन तो है मंगलमय अति मनभावन।।आदिनाथ का जन्म महोत्सव त्रिभुवन को है मंगलकार।भव-दुख क्षय करने का बल सबको देता है अपरम्पार ।।
ॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छंद-सोरठा
जन्मकल्याण प्रसिद्ध, आदिनाथ का पूज कर।नाशूँ सर्व विकार, आत्मज्ञान की शक्ति से।।पुष्पाजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
तप कल्याणक
स्थापना
छंद-दोहा
आदिनाथ तीर्थेश का, तप कल्याण महान्।इन्द्रादिक सुर नत हुए, गूँजा जय जय गान।।सम्यक् तप मैं भी करूँ, शुद्ध हृदय से नाथ।शुद्ध अनिच्छुक तप करूँ, मैं भी बनूँ स्वनाथ।।चैत्र कृष्ण नवमी दिवस, तप कल्याण महान्।सर्व परिग्रह त्याग कर, दीक्षा ली भगवान्।।
आह्वाननॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (आह्वानम्)
स्थापनॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
छंद-जोगीरासा
शुद्ध आत्म-जल की धारा पा जन्म मरण दुख नाशूँ।अविकारी निज पद पाऊँ मैं ज्ञान स्वरूप प्रकाशूँ ।।आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
जलॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा- मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म-चन्दन की पावन सुरभि हृदय में लाऊँ।भव आतप ज्वर पूर्ण मिटाऊँ स्वस्थ दशा प्रकटाऊँ ।।आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
चंदनॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय संसारताप - विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म-अक्षत गुणधारी पद अखण्ड के दाता।राग भाव सब क्षय करते हैं अक्षय सौख्य प्रदाता ।।
आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
अक्षतॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म के ज्ञान-पुष्प से निज को आज सजाऊँ।काम-बाण की पीर विनाशूँ निष्कामी हो जाऊँ।।आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
पुष्पॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय कामबाण - विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म के सुचरु बनाऊँ, क्षुधारोग विनशाऊँ।पर का ग्रहण भाव विघटा, पद अनाहार प्रकटाऊँ।।आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
नैवेद्यॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म-दीपक की पावन जगमग ज्योति जगाऊँ।मोह महा मिथ्यात्व-तिमिर हर भ्रम अज्ञान भगाऊँ ।।आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
दीपॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म की ध्यान-धूप ला अष्ट कर्म विनशाऊँ।बनूँ निरंजन भाव-द्रव्य-नोकर्म रहित हो जाऊँ।।आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
धूपॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म-फल पाने को मैं शुद्ध आत्मा ध्याऊँ।शुद्ध भाव के उत्तम फल ले महा मोक्ष फल पाऊँ ।।
आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
फलॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
शुद्ध आत्म के सुगुण अनन्तों के ही अर्घ्य बनाऊँ ।स्वपद अनर्घ्य प्रकट कर अपना शाश्वत ध्रुव सुख पाऊँ।।आदिनाथ का तप कल्याणक उर वैराग्य जगाता।पूर्ण अनिच्छुक बनने का ही भाव हृदय में आता ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
छंद-दोहा
जयमाला वर्णन करूँ, तप कल्याण महान्।जिन मुनि बन प्रभु-सम करूँ, स्वयं आत्मकल्याण।।
छंद-वीर
प्रभु वैराग्य हृदय आते ही आये सब लौकान्तिक देव।धन्य आपका यह विराग क्षण धन्य-धन्य तुम हो जिनदेव।।मात-पिता से तप की आज्ञा लेकर त्यागा राजभवन।बाहर आये हर्षित होकर करने वन की ओर गमन।।इन्द्रादिक सुर आये लेकर सुदर्शना पालकी विशाल।पहले मनुज उठाते जो व्रत लेते प्रभु के संग तत्काल।।फिर विद्याधर लेकर चलते वे भी व्रत लेते उस काल।फिर इन्द्रादिक सुर ले जाते काँधे पर हो स्वयं निहाल।।फिर विचारते तप धारण में सुर पर्याय सदा असमर्थ।हे प्रभु! हम भी करें तपस्या पायें नर पर्याय समर्थ।।
लाख तिरासी पूर्व आयु में प्रभु के मन जागा वैराग्य।जिनदीक्षा भगवती धार ली प्राप्त किया निर्मल सौभाग्य।।पंचमुष्टि कचलोंच किया अरु पंच महाव्रत धार लिया।तज चौबीस परिग्रह प्रभु ने आत्मस्वरूप विचार किया।।छह महीने का ले करके उपवास गये प्रभुजी वन में।आत्म-तपस्या में रत रहकर समय बिताया चिन्तन में।।छह महीने के बाद चले वे भोजन के हित नगरी में।विधि पूर्वक आहार न पाया वापस आये फिर वन में।।इस प्रकार छह महिने बीते किन्तु न पाया शुद्धाहार।अन्तराय से विरहित भोजन मिला न कभी एक भी बार।।नगर हस्तिनापुर में आये राजभवन के सुन्दर द्वार।नृप श्रेयांस प्रसन्न हो गये विधि आहार जान सुखकार।।झट से पड़गाहा जिन प्रभु को त्वरित इक्षु रस दान दिया।प्रभु कर में आहार दिया भव-सिन्धु सेतु निर्माण किया।।पंचाश्चर्य हुए तत्क्षण ही देवों ने मंगल गाये।धन्य पात्र ! अरु धन्य दान-दाता ! सबने ही सुख पाये।।मौन तपस्वी आदिनाथ प्रभु चले गये फिर वन की ओर।अष्टापद कैलाश शिखर को गये हुई मुक्ति की भोर।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं तपकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
छंद-सोरठा
भव-तन भोग उदास, आदिनाथ प्रभु हो गये।पाया तप कल्याण, मैं भी धारूँ शुद्ध तप।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
ज्ञान कल्याणक
स्थापना
छंद-दोहा
परम ज्ञान कल्याण की, महिमा अपरम्पार।आदिनाथ प्रभु ने लिया, पूर्ण ज्ञान शिवकार।।स्व-पर प्रकाशक ज्ञान पा, आप हुए अरहंत।पद सर्वज्ञ महान् पा, आप हुए भगवंत।।विनय सहित पूजन करूँ, श्रेष्ठ ज्ञान कल्याण।आप कृपा से हे प्रभो! पाऊँ सम्यग्ज्ञान।।फागुन वदि एकादशी, हुआ ज्ञान कल्याण।कर्म घातिया नष्ट कर, पाया केवलज्ञान।।
आह्वाननॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (आह्वानम्)
स्थापनॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
छंद-मानव
रत्नत्रय जल के बल से, ही यथाख्यात आता है।जन्मादि रोग क्षय करता, शिवसुख तरु उपजाता है।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव।।
जलॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा- मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय के चंदन से, उर शीतलता आती है।भव-ताप नष्ट होता है, पल में अशान्ति जाती है।।
श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव ।।
चंदनॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय संसारताप - विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय का अक्षत धन, अक्षय पद प्रदान करता।आनंद अतीन्द्रिय देता, भव-पीड़ा महान् हरता।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव।।
अक्षतॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय पुष्प अनूठे, चिर काम-व्यथा के नाशक।अकषायी पद देते हैं, गुण शील महान् प्रकाशक।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव।।
पुष्पॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय कामबाण - विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय के पावन चरु, अनुभव रस निर्मित लाऊँ।चिर क्षुधा व्याधि को हर कर, परिपूर्ण सौख्य उपजाऊँ।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव।।
नैवेद्यॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय दीप ज्योतिमय संशय अज्ञान विनाशक।कैवल्य ज्ञान रविदायक अविनाशी स्व-पर प्रकाशक।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव।।
दीपॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय ध्यान धूप में कर्मों का ईंधन जलता।पद नित्य निरंजन मिलता शाश्वत सुख का तरु फलता।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव ।।
धूपॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय का सम्यक् फल है महामोक्ष फल दाता।जो एक समय में शिव-सुख देता शिवपुर ले जाता।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव।।
फलॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रय अर्घ्य बनाऊँ निज शुद्ध भाव के द्वारा।पदवी अनर्घ्य ध्रुव पाऊँ नाशैं यह भव-दुखकारा।।श्री आदिनाथ जिनवर का, यह ज्ञान कल्याण महोत्सव।है मोक्षमार्ग का दाता, ध्रुव सौख्य प्रदाता अभिनव।।
अर्घ्यॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
छंद-दोहा
प्रभो ज्ञान कल्याण की, गरिमा अपरम्पार।सकल परिग्रह त्याग कर, आप हुए अविकार ।।पुरिमताल कैवल्य भू, निकट सुगिरि कैलाश।शुक्लध्यान की प्रभा से, पाया ज्ञान प्रकाश।।
छंद-ताटंक
अपरिग्रही अनिच्छुक हो प्रभु धर्मध्यान में रत रहते।निज अनुभव रस धार प्राप्त कर सतत आत्म-सर में बहते।।
धर्मध्यान चारों ही ध्याये श्रेणी चढ़ने को आतुर ।उपशम श्रेणी चढ़ जाते हैं अष्टम गुणस्थान पाकर।।फिर क्षायिक श्रेणी चढ़ते हैं करते कर्म घातिया घात।चौ कषाय जय करते ही पा लेते केवलज्ञान प्रभात।।पद अरहन्त प्रकट होते ही पाते हैं सर्वज्ञ स्व-पद।निजानन्द रस लीन स्वयं ही तज देते हैं सर्व अपद ।।समवसरण की रचना होती त्रिभुवनजयी महान् विशाल।छ्यालीस गुणधारी प्रभुजी करते हैं संसार निहाल।।कोटि-कोटि रवि-शशि हर्षित हो जिनवर की छवि रहे निहार।इन्द्रादिक सुर बहु हर्षित हैं श्री जिनवर के चरण पखार।।दिव्यध्वनि सुनने को आतुर इन्द्रादिक सुर मुनि गणधर।इन्द्र सहस्र नाम पढ़ करके संस्तुति करता है शिवकर।।संस्तुति पूरी होते ही दिव्यध्वनि खिरने लगती है।अज्ञानी जीवों की निद्रा मोहमयी सब भगती है।।भव्य जीव प्रमुदित होते हैं सुन जिन-मुद्रा की वाणी।अप्रतिबुद्ध जीव हो जाते सदा-सदा को ही ज्ञानी।।द्वादश सभा सुशोभित होतीं होता दिव्यध्वनि उपदेश।मोक्षमार्ग सबको मिल जाता निकट भव्य धरते मुनि वेश।।अपनी पूर्ण योग्यता से पाते हैं सभी जीव निर्वाण।श्रावक ही सच्चे मुनि बनकर पा लेते हैं मोक्ष महान्।।सम्यक् तप फल सब ही पाते जो करते हैं आतम ध्यान।आत्मध्यान की महाशक्ति से कर लेते हैं सब कल्याण।।तीर्थंकर की महा कृपा से होता ज्ञान-तीर्थ प्रारंभ।क्षय होता मिथ्यात्व मोह का अरु क्षय होता सबका दंभ।।पहले तो मिथ्या भ्रम क्षय करने का देते प्रभु उपदेश।फिर अविरति को क्षय करने का देते हैं पावन सन्देश।।
फिर प्रमाद को जय करने की सुविधि बताते हैं स्वामी।फिर सम्पूर्ण कषाय नाश की विधि बतलाते हैं नामी।।फिर योगों के अभाव करने का उपाय बतलाते हैं।इस प्रकार पाँचों प्रत्यय जय की विधि ही सिखलाते हैं।।आदिनाथ ने इसी भाँति से पाया ज्ञान कल्याण महान्।एक लाख पूर्व तक जिन उपदेश दिया प्रभु ने अम्लान।।
छंद-सोरठा
परम ज्ञान कल्याण, ज्ञान प्रदायक भव्य को।विनयपूर्वक नाथ, जयमाला वर्णन करी।।
ॐ ह्रीं ज्ञानकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जयमालापूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छंद-दोहा
भक्ति सहित पूजा प्रभो, आज ज्ञान कल्याण।पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हित, करूँ आत्मश्रद्धान ।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
मोक्ष कल्याणक
निरखो अंग-अंग जिनवर के, जिनसे झलके शान्ति अपार ॥ टेक ॥चरण-कमल जिनवर कहें, घूमा सब संसार ।पर क्षणभंगुर जगत् में, निज आत्मतत्त्व ही सार ।।यातैं पद्मासन विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार।।1।।हस्त-युगल जिनवर कहें, पर का कर्ता होय ।ऐसी मिथ्याबुद्धि से ही, भ्रमण चतुरगति होय ।।यातें पद्मासन विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ।।2।।लोचन द्वय जिनवर कहें, देखा सब संसार ।पर दुखमय गति चतुर में, ध्रुव आत्मतत्त्व ही सार ।।यातें नासादृष्टि विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ।।३।।अन्तर्मुख मुद्रा अहो, आत्मतत्त्व दरशाय ।जिनदर्शन कर निजदर्शन पा, सत्-गुरु वचन सुहाय ।।यातें अन्तर्दृष्टि विराजे जिनवर, झलके शान्ति अपार ।।4।।
स्थापना
छंद-ताटंक
महामोक्ष पद आदिनाथ ने पाया आत्मध्यान द्वारा।शुक्ल ध्यान चारों ही ध्याये अष्ट कर्म दल संहारा।।मिला ध्यान फल मोक्ष गये प्रभु उर सिद्धत्व स्वगुण पाया।सादि-अनंतानंत काल को पूर्ण आत्मवैभव पाया।।त्रिलोकाग्र तनुवातवलय में आप विराजे महा प्रभो।सिद्धचक्र से संबंधित हो पूर्ण सुखी हो गये विभो।।भाव पूर्वक पूजन करता परम मोक्ष कल्याणक की।आदिनाथ प्रभु के चरणों की भव्यों के उद्धारक की।।
छंद-दोहा
माघ कृष्ण की चतुर्दशी, हुआ मोक्ष कल्याण।आदिनाथ प्रभु हो गये, परम सिद्ध भगवान्।।
आह्वाननॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् (आह्वानम्)
स्थापनॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्) । पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
छंद-चौपाई
निज सम्यक् जल मोक्ष प्रदाता। जन्म-जरादिक दुख का घाता।।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
जलॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा- मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् चंदन सुखदाता। भवज्वर यह सम्पूर्ण मिटाता।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
चंदनॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय संसारताप- विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् अक्षत गुणदाता। जीव अखंड पूर्ण पद पाता।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
अक्षतॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् पुष्पों का उपवन। काम-बाण दुख हरता चिद्घन।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
पुष्पॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय कामबाण - विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् चरु तृप्ति प्रदायक। क्षुधारोग सम्पूर्ण विनाशक।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
नैवेद्यॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग- विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् स्व दीप उजियारा। मिथ्या-तम का नाशनहारा।।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
दीपॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् स्व धूप ध्यानमय। अष्ट कर्म हर्तार ज्ञानमय।।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
धूपॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् तरु फल सुखकारी। दाता महा मोक्ष फल भारी।।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
फलॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
निज सम्यक् गुण अर्घ्य बनाऊँ। पद अनर्घ्य अविनश्वर पाऊँ।।आदिनाथ प्रभु के गुण गाऊँ। श्रेष्ठ मोक्ष कल्याण मनाऊँ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
छंद-दोहा
जयमाला वर्णन करूँ, परम मोक्ष कल्याण।निज स्वरूप की कृपा से, पाऊँ मोक्ष कल्याण ।।
छंद-वीर
मोक्ष प्राप्त करने की सारी विधि प्रभु ने झट की सम्पूर्ण।एक समय में त्रिलोकाग्र जा पाया त्रैकालिक सुख पूर्ण।।पहले योग अभाव किया फिर प्रकृति बहत्तर कर दीं नाश।अन्तिम समय नाश तेरह भी पाया उत्तम मोक्ष प्रकाश।।अ इ उ ऋ लृ उच्चारण में जितना भी लगता काल।उतने में सब क्रिया पूर्ण कर पाया निज पद महा विशाल।।सिद्ध-चक्र में हुए विराजित एक समय में ही सत्वर।सादि-अनंतानंत काल तक आप रहेंगे अजर अमर।।लाख चौरासी उत्तर गुण के संग पाये गुण सर्व अनंत।नित्य निरंजन पद प्रकटाया काल अनादि अनंतानंत।।भव-रज धोयी निजपद पाया तथा हो गये सिद्ध महंत।जिन शासन के महान् रक्षक महामहिम त्रिभुवन भगवंत।।तन कपूरवत् उड़ा मात्र नख-केश रहे इस धरती पर।सम श्रेणी में नाथ विराजे आनन्दामृत वर्षा कर।।प्रभु तन मायामयी रचा देवों ने विनय सहित तत्क्षण।असुरकुमार सुरों ने मुकुटानल से भस्म किया उस क्षण।।प्रभु तन की भस्मी सबने ही निज-निज मस्तक पर धारी।जय हो आदिनाथ स्वामी की जय ध्वनि पावन उच्चारी।।हमने भी प्रभु को वंदन कर आत्मशक्ति पायी पावन।महा मोक्षकल्याण मनाया सारे जग को मनभावन।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जयमाला - पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
छंद-दोहा
पूर्ण अर्घ्य अर्पण करूँ, पूजूँ मोक्ष कल्याण।मैं भी पाऊँ मोक्ष प्रभु, पाऊँ सौख्य महान्।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
समापन
अंतिम महार्घ्य
छंद-समान सवैया
ऋषभ जिनेश्वर आदिनाथ प्रभु वृषभदेव को सादर वंदन।ध्यान मात्र से भक्त जनों के मिट जाते हैं भवदुख क्रंदन।।नाभिराय चौदहवें कुलकर माता मरुदेवी के नंदन।आदि ब्रह्म आदीश्वर स्वामी महादेव भवताप निकंदन।।त्रिभुवन वंदित सकल सुरासुर पूजित जिनपति जगदानंदन।शत इन्द्रों से पूज्य महीपति शाश्वत शिव आनंदानंदन।।कर्मभूमि में प्रथम आपने धर्मचक्र का किया प्रवर्तन।वीतराग सर्वज्ञ ध्यानमय दर्शन ज्ञान चेतना लक्षण।।प्रथम तीर्थंकर जिनेन्द्र प्रभु वृषभ चिह्न लक्षण आनंदघन।सर्व ज्ञेय पति ज्ञाता दृष्टा मेरे भी दुख नाशो भगवन।।हे विकटेश्वर हे परमेश्वर हे जगदीश्वर चिन्मय चिद्यन।संकटहारी मंगलकारी भव-दुख हर्ता सहजानंदन।।मन-वच-काय त्रियोग पूर्वक भाव पुष्प करता हूँ अर्पण।भेदज्ञान विज्ञान ज्योति पा करूँ निजातम का अभिनन्दन।।
अर्घ्यॐ ह्रीं गर्भ-जन्म-तपो-ज्ञान-मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथ- जिनेन्द्राय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
महाजयमाला
छंद-चौपाई
आदिनाथ अविकल अविनाशी, राग-द्वेष परभाव विनाशी।कर्मभूमि के प्रथम जिनेश्वर, परम पवित्र पूज्य तीर्थंकर।।नाभिराय मरुदेवी नंदन, नगर अयोध्या जन्मे भगवन।सुरपति ऐरावत पर आया, गिरि सुमेरु अभिषेक रचाया।।
राज्य अवस्था में सुख पाये, असि मसि कृषि वाणिज्य सिखाये।मति श्रुत अवधिज्ञान के धारी, पावन पूज्य सुयश विस्तारी।।नीलांजना मरण को लखकर, उर छाया वैराग्य सुहितकर।लौकान्तिक देवों ने आकर, तप कल्याण किया हर्षा कर।।स्वयं दीक्षित नाथ हुए तुम, निज स्वरूप के साथ हुए तुम।शुक्ल ध्यान धर केवल पाया, पूर्ण ज्ञान का रवि मुस्काया।।लोकालोक ज्ञेय के ज्ञायक, परम अतीन्द्रिय सौख्य प्रदायक।मोक्षमार्ग का कर उद्घाटन, किये असंख्य जीवों को पावन।।चौरासी गणधर के नायक, स्याद्वाद के नाथ विधायक।मुक्त हुए कैलाश शिखर से, इन्द्रादिक सुर नर सब हरषे।।सिद्ध शिला पर आप विराजे, गुण अनंत प्रकटा कर साजे।अतुल अनादि अनंत अकामी, परम सिद्ध प्रभु शिवपुरधामी।।हे प्रभु! मेरे अन्तर्यामी, मेरी विनय सुनो हे स्वामी।सब प्रकार के संकट हर लो, निज समान मुझको भी कर लो।।परिणामों में उज्ज्वलता हो, लेश न भव की चंचलता हो।निर्मल निश्चल निज को ध्याऊँ, प्रभु अरहंत अवस्था पाऊँ।।
छंद-दोहा
आदिनाथ को नमन करूँ, करूँ स्वयं का ध्यान।स्व-पर भेद-विज्ञान से, पाऊँ पद निर्वाण।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं गर्भ-जन्म-तपो-ज्ञान-मोक्षकल्याणकविभूषित श्री आदिनाथ- जिनेन्द्राय महाजयमाला-पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
समुच्चय महार्घ्य
छंद-ताटंक
निज भावों का महा अर्घ्य ले पाँचों परमेष्ठी ध्याऊँ।जिनवाणी जिनधर्म शरण पा देव-शास्त्र-गुरु उर लाऊँ ।।तीस चौबीसी बीस जिनेश्वर कृत्रिमाकृत्रिम चैत्य ध्याऊँ।सर्व सिद्ध प्रभु पंचमेरु नन्दीश्वर गणधर गुण गाऊँ ।।
सोलहकारण दशलक्षण रत्नत्रय नव सुदेव पाऊँ ।चौबीसों जिन भूत भविष्यत वर्तमान जिनवर ध्याऊँ ।।तीन लोक के सर्व बिम्ब जिन वन्दूँ जिनवर गुण गाऊँ।अविनाशी अनर्घ्य पद पाऊँ निज आतम गुण प्रकटाऊँ ।।
छंद-दोहा
महा अर्घ्य अर्पण करूँ, पूर्ण विनय से देव।आप कृपा से प्राप्त हो, परम शान्ति स्वयमेव ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सर्वपूज्यपदेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शान्ति पाठ
छंद-गीतिका
सुख-शान्ति पाने के लिए पुरुषार्थ मैंने प्रभु किया।श्रेष्ठ आदिनाथ विधान महान् मैंने प्रभु किया।।अब नहीं चिन्ता मुझे है कभी होऊँगा अशान्त ।आज मैंने स्वतः पाया ज्ञान का सागर प्रशान्त ।।विश्व के प्राणी सभी चिर-शान्ति पायें हे प्रभो।मूलभूत निजात्मा का ज्ञान ही पायें विभो ।।मूल भूल विनष्ट करके नाथ मैं ज्ञानी बनूँ ।भक्ति रत्नत्रय हृदय हो पूर्णतः ध्यानी बनूँ ।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।(नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें।)
क्षमापना पाठ
छंद-दोहा
भूल-चूक कर दो क्षमा, हे त्रिभुवन के नाथ ।आप कृपा से हे प्रभो, मैं भी बनूँ स्व नाथ ।।अल्प नहीं है हे प्रभो! पूजन विधि का ज्ञान ।अपना सेवक जानकर, क्षमा करो भगवान् ।।
पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।
॥ जय जिनेन्द्र ॥