श्री नवदेव पूजन विधान
विराग शास्त्री, जबलपुर · विधान पूजा
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दोहा
नव देवों को नमन कर, करूँ आत्म का ध्यान ।जिन सम मेरी दृष्टि हो, पाऊँ पद निर्वाण ।।
वीर
अखिल विश्व में तीन लोक हैं, मध्यलोक सुंदर मनहर।मध्य लोक के भरत क्षेत्र में, आर्यखंड भूमि सुंदर ॥छह कालों की सहज व्यवस्था, जिन शासन बतलाता है।सुखमा आदि कालों का यह, चक्र निरंतर चलता है॥प्रथम काल है सुखमा-सुखमा, उत्तम भोग भूमि जानो।आयु सुख बल हैं अति भारी, कल्पवृक्ष नगरी मानो ॥जो चाहो वह मिल जाता है, कल्पवृक्ष देते वरदान।चार कोड़ा कोड़ी सागर का, पहला काल अनूठा जान ॥द्वितीय काल सुखमा बतलाया, तीन कोड़ा कोड़ी सागर।प्रथम काल से हीन कहा यह, आयु बुद्धि सुख अरु बल ॥तृतीय काल है सुखमा - दुखमा निम्न भोग भूमि जानो।दो कोड़ा कोड़ी सागर का, वस्तु व्यवस्था पहचानो ॥तीर्थंकर श्री आदिनाथ प्रभु, इसी काल में जन्मे थे।शिक्षा असि मसि कृषि विद्या की, शिल्प वणिज की देते थे ॥चौथा काल है दुखमा – सुखमा, पूर्ण कर्म भूमि का काल।एक कोड़ा-कोड़ी सागर में, किंचित न्यून कहें यह काल ॥नोट- चौथे काल का समय 42000 वर्ष कम एक कोड़ा-कोड़ी सागर का होता है।
आत्म साधना पूरी करते, मोक्ष प्राप्त करते भविजन ।त्रेसठ महाशलाका पुरुषों से, धरती होती पावन ॥पंचम दुखमा धर्म हानि, संयोग सभी होते हैं क्षीण ।आयु बुध्दिबल और संहनन, क्रमशः होते रहते हैं हीन ॥रत्नत्रय तो पा लेते हैं, पर निर्वाण नहीं पाते ।दुख रोग संघर्ष बढें सब, ऐसा जिनवर बतलाते ॥षष्ठम काल है दुखमा – दुखमा, यह अति ही दुखदायक जान ।धर्म भाव का अंश न होता, पाप-भाव होता बलवान ॥पापोदय से अंधे लंगड़े, रोग ग्रसित हों अज्ञानी।दुर्गंधित तन धारण करते, मांसाहार करें प्राणी ॥पशु समान आचरण करें सब, कैसे तुमको बतलाएं ।ऐसे दुखों को भोगे जिय, कहते जिव्हा थक जाए ॥चिंतामणि सम दुर्लभ नर तन, जिन कुल जिन शरणा पाई ।अहो भाग्य जिनवाणी कहती, आत्मशरण ही सुखदाई ॥श्री गुरुवर संबोधन करके, लक्ष्य हमारा बतलाते ।इस असार संसार विपिन में, एक शरण निज दिखलाते ॥पंच परम परमेष्ठी जिनश्रुत, जिनवाणी है मंगलकार ।धन्य-धन्य जिनबिम्ब जगत् में, जिन शासन है अति सुखकार ॥नव देवों की शरण प्राप्त कर, सार्थक करना यह नर देह ।आत्म ज्ञान श्रद्धानपूर्वक, चलो चलें अब अपने देश ॥
पुष्पांजलि क्षिपेत्नोट - पांचवे और छठवें काल का समय 21000 वर्ष – 21000 वर्ष का होता है।
हरिगीतिका
आत्मा में सावधानी ही सदा कर्तव्य है,जीव जो नित आत्मरत, उनका सुखद भवितव्य है ।आत्मा को जानिए, अरु आत्मा में हूजिए,जो निरखते आत्मा, उनको सदा ही पूजिये ॥आत्मा की दृष्टि होवे, आत्मा का ज्ञान हो,आत्मा में लीन जो, निश्चित गमन शिव ठान हो ।आत्मा ही विश्व में, श्रद्धेय है इक सार है,आत्मा के भान बिन, निस्सार यह संसार है ॥नव देवताओं की सहज, नित भक्ति से अर्चा करें,उनकी शरण से भान निज पा, भव विकट सागर तरें ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
अखिल विश्व में एक निज, ज्ञेय ध्येय श्रद्धेय ।ज्ञायक के श्रद्धान से, मिले मुक्ति पाथेय ॥
परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्।भव्येन प्रातरुत्थाय जिनबिम्बस्य दर्शनम् ।विधाय स्वशरीरस्य क्रियते शुद्धिरुत्तमा ।भव्य जीवों के द्वारा प्रातः उठकर अपने शरीर की उत्तम प्रकार से शुद्धि करकेजिनबिम्ब के दर्शन किए जाते हैं, क्योंकि जो जीव प्रतिदिन प्रातः काल शारीरिकशुद्धि करके सर्वप्रथम जिनबिम्ब का दर्शन करते हैं, वे भव्य अल्पकाल में मुक्तिप्राप्त करेंगे।– श्री अभ्रदेव विरचित व्रतोद्योतन श्रावकाचार
नवदेव पूजन
# श्री नवदेव पूजन
(स्थापना)नव देवों का सुमिरन कर निज ध्याइये।नव तत्वों में एक निजातम पाईये ॥नव देवों का सम्यक् दृढ़ श्रद्धान हो।नव देवों से विकसित निज उद्यान हो ॥नव देवों को अंतर में पधराइये।तिनकी भक्ति प्रसाद परम पद पाइए ॥
आह्वाननॐ ह्रीं श्री नवदेवजिन समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
स्थापनॐ ह्रीं श्री नवदेवजिन समूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री नवदेवजिन समूह ! अत्र मम सन्निहितो भव – भव वषट्, सन्निधिकरणम्।
परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्।
सखी
यह जन्म मरणमय जीवन, यह मोह महातम माया,भव चक्र आज विनशाऊँ, यह नीर चढ़ाने लाया।अरहंत सिद्ध अरु सूरि, पाठक - मुनिगण को वंदूं,जिनबिम्ब – जिनालय जिनश्रुत- जिनधर्म सदा अभिनंदूँ ।।
जलॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः जन्म - जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चारों गतियों की पीड़ा अब मुझसे सही न जाए,भव ताप मिटाने की विधि, पाने तुव शरणा आए।अरहंत सिद्ध अरु सूरि, पाठक - मुनिगण को वंदूं,जिनबिम्ब – जिनालय – जिनश्रुत- जिनधर्म सदा अभिनंदूँ।।
ॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः संसारताप विनाशनाय चदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षय स्वभाव है मेरा, पर क्षत - विक्षत मन भाया,अक्षत से अक्षय जानूँ, अक्षय शुद्धात्म सहारा।अरहंत सिद्ध अरु सूरि, पाठक - मुनिगण को वंदूं,जिनबिम्ब – जिनालय – जिनश्रुत- जिनधर्म सदा अभिनंदूँ।।
अक्षतॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः अक्षय पद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
इच्छाओं की समिधा में, रत्नत्रय सुमन न भाये,यह काम महा दुखदायक, हमको मुनिवर समझायें।।अरहंत सिद्ध अरु सूरि, पाठक - मुनिगण को वंदूं,जिनबिम्ब – जिनालय – जिनश्रुत- जिनधर्म सदा अभिनंदूँ ।।
पुष्पॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः काम कलंक विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
आतम रस कभी न भोगा, विषयों से तृप्ति मानी।शुद्धात्म सदा रसपूरित, जिनवर से महिमा जानी ॥ अरहंत ...।।
नैवेद्यॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अज्ञान अंधेरे वन में, मैंने ज्ञान पुंज न निरखा,पर ज्ञान सूर्य अंतर में, चैतन्य प्रकाश दिखाता ॥ अरहंत ...।।
दीपॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
विषयों की गंध ही भायी, सूना था मेरा उपवन,दश धर्मों की सुरभि से, महके मेरा यह चेतन ॥ अरहंत ...।।
धूपॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
संयोगों की उपलब्धि, सर्वस्व स्वयं का माना,जड़ फल ही मुझे सुहाये, चेतन फल स्वाद न जाना।अरहंत सिद्ध अरु सूरि, पाठक - मुनिगण को वंदूं,जिनबिम्ब – जिनालय – जिनश्रुत- जिनधर्म सदा अभिनंदूँ।।
फलॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जब निरखा श्री जिनवर को, चित्वमत्कार पहचाना,पदवी अनर्घ्य ही शाश्वत, अब छोड़ा पर का बाना।मैं स्वयं सिद्ध हूँ शाश्वत, हूँ गुण अनंत का स्वामी,है धन्य आपकी महिमा, हे जिनवर अंतर्यामी ॥अरहंत सिद्ध अरु सूरि, पाठक मुनिगण को वंदूं,जिनबिम्ब – जिनालय – जिनश्रुत- जिनधर्म सदा अभिनंदूँ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
विनयांजलि
वीर
अंतरंग शुद्धि न हो तो सम्यक् दर्शन ना पाते,सम्यक् दर्शन के बिन चेतन, शिव पथ कैसे अपनाते।काल अनंत ये बीत गया है, चार गति दुख पाए हैं,सम्यक् दर्शन बिन चेतन ने विध – विध कष्ट उठाए हैं।अंतर शुद्धि नहीं हुई तो समकित कैसे पाएंगे,समकित पाये बिना कभी नर, मुक्ति कभी न जाएंगे।समकित पाना है तो पहले स्वाध्याय करना होगा,गहन तत्व अभ्यास पूर्वक, तत्वों का निर्णय होगा।निर्णयपूर्वक तत्वों का फिर भेदज्ञान उर आएगा,सम्यक् दर्शन ज्ञान चरित से, चेतन गौरव पाएगा।रत्नत्रय पावन निधि जानो, मोक्षमार्ग की दाता है,एक देश संयम प्रगटे, चारित्र सहज हो जाता है।
तीन कषाय चौकड़ी हरकर, चेतन मुनि हो जाता है,सिद्धोंसा अनंत सुख पाने, अंतरबल खिल जाता है।सिद्धों का लघुनंदन कहते, धन्य-धन्य मुनि का जीवन,धन्य-धन्य है उनकी चर्या, धन्य धन्य है अंतर्मन।महल टूटते रागों के फिर, श्रेणी सहज हो जाती है,प्रबल उग्र पुरुषार्थ देखकर, सब कषाय थर्राती हैं।घाति कर्म फिर क्षय होते, अरिहंत दशा मिल जाती है,केवलज्ञान सूर्य की रश्मि, भविजन कमल खिलाती है।सिद्ध शिला अभिनंदन करती, सुख अनंत वहाँ पाते हैं,सादि अनंतानंत काल तक, फिर प्रभुवर जम जाते हैं।अंतर शुद्ध करें अपना अब, भेद ज्ञान निधियाँ पायें,हरें मोह रागादि भाव को, फिर न लौट भव में आयें।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
काल-सामर्थ्य (कवित्त मनहर)लोहमई कोट केई कोटन की ओट करौ, काँगुरेन तोप रोपि राखो पट भेरिकैं ।इन्द्र चन्द्र चौंकायत चौकस हूँ चौकी देहु, चतुरंग चमू चहुँ ओर रहो घेरिकें ॥तहाँ एक भौहिरा बनाय बीच बैठौ पुनि, बोलौ मति कोऊ जो बुलावै नाम टेरिकैं ।ऐसैं परपंच-पाँति रचौ क्यों न भाँति-भाँति, कैसैं हू न छोरै जम देख्यौ हम हेरिकें ॥ 7 ॥
एक लौहमय किला बनवाइये, उसे अनेक परकोटों से घिरवा दीजिये, परकोटों केकंगूरों पर तोपें रखवा दीजिये, इन्द्र-चन्द्रादि जैसे सावधान पहरेदारों को चौकन्ने होकरपहरे पर बिठा दीजिये, किवाड़ भी बन्द कर लीजिये, चारों ओर चतुरंगिणी सेना का घेराडलवा दीजिये तथा आप उस लौहमय किले के तलघर में जाकर बैठ जाइये, कोई चाहेकितनी ही आवाजें लगावे, आप बोलिये तक नहीं। इसी प्रकार के और भी कितने हीइन्तजामों (तामझाम) का ढेर लगा दीजिए, पर यह हमने खूब खोजकर देख लिया है किमृत्यु कभी नहीं छोड़ती।– जैन शतकअर्ध्यावलिअरिहंत परमेष्ठी
वीर
चार घातिया कर्म को नाशें, श्री अरिहंत कहाते हैं,राग-द्वेष से रहित निराले, सबके मन को भाते हैं।तीन लोक और तीन काल के सब द्रव्यों को जानते,सबके ज्ञाता-दृष्टा रहते, निज में ही सुख मानते।दोष अठारह रहित नाथ हैं, मन-वच-तन से करूँ प्रणाम,मैं भी पद अरहंत सा पाऊँ, चिदानंद में लूँ विश्राम ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री षट्चत्वारिंशत् गुणसंयुक्त श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
सकल विश्व है ज्ञान में, फिर भी निज में लीन ।मन-वच-तन से मैं नमूँ, करूँ कर्म प्रक्षीण ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।सिद्ध परमेष्ठी
चौपाई
सिद्ध दशा मंगल सुखकारी, ज्ञान शरीरी अरु अविकारी।अष्ट कर्म से रहित विराजे, सिद्ध परम पद अद्भुत शोभे।अष्ट स्वगुण तुमने प्रगटाये, देह रहित प्रभु उर्ध्व विराजे ।सिद्ध शिलापति आप कहाये, भव अनंत का कष्ट मिटाये।सिद्ध परम पद मैं भी पाऊँ, फिर न लौटकर भव में आऊँ।चेतन शिव पद का अधिकारी, मन-वच-तन वंदना हमारी।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अष्टगुणसंयुक्त श्री सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
सिद्ध प्रभु की वंदना, हरती भव का क्लेश।निज स्वरूप पहचानकर, छोडूं पर का वेश ।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।आचार्य परमेष्ठी
चांद्रायण
श्री आचार्य गुरु को मेरा है नमन,चार संघ के नायक गुरुवर को नमन।गुण छत्तीस सुपालक गुरुवर को प्रणाम,पंचाचार परायण रहते आत्मधाम ।हित – मित – प्रिय उपदेशी गुरुवर श्रेष्ठ हैं,मुनी संघ के नायक गुरुवर ज्येष्ठ हैं।मुनि दीक्षा ले सर्व कर्म बंधन हरुँ,आचार्य को भाव सहित वंदन करूँ ।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री षट्त्रिंशत् गुणसंयुक्त श्री आचार्य परमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
चार संघ नायक नमूँ, मुक्ति मार्ग दातार ।गुण अनंत के संघ का, जानूँ मैं आचार ।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।पद्मपुराणरत्नकरण्डक श्रावकाचारसमयसार
उपाध्याय परमेष्ठी(सरसी)उपाध्याय गुरु को वंदन कर आत्म स्वरूप निहारूँ।जय जय जय जिन श्रुत के दाता परम शांति उर धारूँ।ग्यारह अंग पूर्व चौदह के उपाध्याय श्रुतज्ञानी।हैं पच्चीस गुणों के धारी, परम श्रेष्ठ जगनामी।यति मुनियों को आप पढ़ाते, मोक्षमार्ग सिखलाते।आत्मशुद्धि के महामंत्र दे, वस्तु स्वरूप बताते।ऐसे उपाध्याय मुनियों को, वंदन सदा है मेरा।अब अज्ञान सकल विनशाऊँ, बनूँ मुनि का चेरा ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री पंचविंशति गुणसंयुक्त श्री उपाध्याय परमेष्ठिने अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
आत्म ज्ञान सर्वोत्तम, हरे सकल जंजाल ।उपाध्याय मुनि पद नमूँ, पाऊँ मुक्ति भाल ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
साधु परमेष्ठीसिद्धों की श्रेणी में आने वाला जिनका नाम है।जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है॥जग प्रपंच से रहित मुनीश्वर, आतम अमृत पीते हैं।परम दिगंबर मुद्राधारी, सर्व परिग्रह रीते हैं॥ज्ञान ध्यान वैराग्यमयी गुरु जग निःस्सार बताते हैं।ज्येष्ठ पुत्र सर्वज्ञ प्रभु के, चिदानंद में रहते हैं ॥विषयारंभ रहित है जीवन, मुक्ति एक मुकाम है।जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है॥भोग भुजंग आपने जाने, दीक्षा ले मुनिपद धारा।निज चैतन्य सदन में रहते, निज का जीवन श्रृंगारा ॥पंच महाव्रत समिति पंच को, हर्षित होकर अपनाया।दशधर्मों के धारी गुरुवर, आत्म धर्म अद्भुत पाया ॥लक्ष्य पूर्णता प्राप्त किये बिन, करते नहीं विश्राम हैं।जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है॥
लौकिक रस में नहीं उलझते, वीतरागता मन भाई।चक्रवर्ती भी शीश झुकाए, उसमें क्या गरिमा भाई॥अहो इंद्र का पद भी मुनिवर, तुमको रंच न भाता है।और विश्व का वैभव मुनिवर, तुमको डिगा ना पाता है॥क्षण क्षण में अंतर्मुख होते, शुद्धातम रस धाम है।जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है॥त्रय कम नौ करोड़ मुनियों के, चरण कमल रज को धारूँ।जीवन का श्रृंगार करूँ अरु मोक्षमार्ग पर आ जाऊँ।धन्य आपकी मुद्रा – निद्रा, धन्य मुनी आहार – विहार।धन्य आपकी हितमित वाणी, धन्य आपका निज व्यापार।आत्म रमणता मुनि का जीवन, करते चक्री प्रणाम हैं।जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है॥परम दिगंबर मुनि दर्शन कर, रोम-रोम रोमांच हुआ।चलते फिरते सिद्धों को लख, मोक्षमार्ग का भान हुआ॥यह संकल्प ग्रहण अब करता, जग के सब बंधन त्यागूँ।दीक्षा ले सौभाग्यशालिनी, महापुरुष के पंथ चलूँ॥मैं भी मुनि बन निज में विचरूँ, यह आवश्यक काम है।जग के उन सब मुनिराजों को मेरा नम्र प्रणाम है॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अष्टविंशति गुणसंयुक्त श्री साधुपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
श्री मुनिवर के चरण में, वंदन बारम्बार।परम समाधि प्राप्त कर, होऊँ भव से पार॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।जिनप्रतिमा
ताटंक
आत्म स्वरूप दिखाती हमको, जिन प्रतिमा मंगलकारी।अंतर्मुख होना सिखलाती, जिन मुद्रा अति सुखकारी ॥जो भी जिन दर्शन करता है, पाप-ताप-संताप मिटें।जिन दर्शन से निज दर्शन हो, भव के कष्ट सभी विघटें ॥जिन दर्शन है मंगलकारी, सर्व कषाय दुःखहारी।मानो प्रभु अरहन्त विराजें, साक्षात् शिवपुर धारी ॥मौन रहे जिनप्रतिमा फिर भी, मोक्षमार्ग दिखलाती है।अहो पूर्ण वैभव है निज में, यह संदेश सुनाती है।।अद्भुत जिन सम जिन प्रतिमा है, अद्भुत प्रभुता सुंदर रूप।मोह भागता जिन दर्शन से, पाता चेतन अपना रूप॥महा मनोहर जिन दर्शन कर, अपना रूप अभी निरखूँ।मैं भी हूँ अरिहंत प्रभु सम, यह श्रुत वाक्य अभी परखूँ ॥
सर्व अकृत्रिम कृत्रिम प्रतिमाओं को, मैं वंदन करता।मुक्तिपुरी आमंत्रण दाता, इनका अभिनंदन करता॥जिन दर्शन सौभाग्य हमारा, इसको नहीं भुलाऊँगा।यही प्रतिज्ञा प्रभु दर्शन कर, जिन सम मैं बन जाऊंगा ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री आत्मदृष्टि प्रेरक समस्त कृत्रिम - अकृत्रिम जिनबिम्बेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
जिन दर्शन आनंदमय, दिखलाता निज रूप।जिन दर्शन से मिल रहा, अपना आत्म स्वरूप ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।श्री जिनेन्द्र देव महिमा
सवैया
करनों कछु न करन तैं कारज, तातें पानि प्रलम्ब करे हैं।रह्यौ न कछु पाँयन तैं पैबौ, ताही तें पद नाहिं टरे हैं ।निरख चुके नैनन सत्र यातें, नैन नासिका-अनी धरे हैं।कानन कहा सुनैं यौं कानन, जोगलीन जिनराज खरे हैं ॥3 ॥
जिनेन्द्र भगवान् को हाथों से कुछ भी करना नहीं बचा है, अतः उन्होंने अपनेहाथों को शिथिलतापूर्वक नीचे लटका दिया है; पैरों से चलकर उन्हें कुछ भी प्राप्तकरना शेष नहीं रहा है, अतः उनके पैर एक स्थान से हिलते नहीं हैं, स्थिर हैं; वे सबकुछ देख चुके हैं, अतः उन्होंने अपनी आँखों को नासिका की नोक पर टिका दिया है;तथा कानों से भी अब वे क्या सुनें, इसलिए ध्यानस्थ होकर कानन (वन) में खड़े हैं।– जैन शतकजिन मंदिर
ताटंक
जिन मंदिर सौभाग्य हमारा, मानो कल्पवृक्ष पाया।जिन मंदिर भवि जीवों को शुभ मुक्ति मार्ग देने आया ॥वीतराग प्रभु के दर्शन कर, जागा भाग्य हमारा है।जयवंत रहें जिनमंदिर तीरथ, सबको सदा सहारा है॥निर्मल हों परिणाम हमारे, मोक्षमार्ग की विधि मिले।निर्मल रत्नत्रय भी पायें, चेतन के उर सुमन खिलें ॥सहज सदा स्वयमेव व्यवस्थित, परिणमता यह जग सारा।सहज विश्व की वस्तु व्यवस्था, अहो जैन शासन न्यारा ॥मोहीजन जिन पूजन करते, उनसे भोग वृद्धि चाहें।अहो-अहो अज्ञान महा है, वस्तु स्वरूप न पहचानें॥जिन शासन के गौरव हैं ये, जिन शासन के प्राण हैं।जिन मंदिर सर्वस्व हमारे, जैनों की पहचान हैं॥
वीतरागता के आलय हैं, वीतरागता के पोषक ।वीतराग विज्ञान केंद्र हैं, वीतराग के उद्घोषक ।।जिन मंदिर ये शिक्षालय हैं, महिमा इसकी करें नरेन्द्र।जिन मंदिर की महिमा गाते, नहीं अघाते इन्द्र – महेन्द्र ।।तीन लोक के सर्व जिनालय, मन वच तन से अभिनंदूँ।पूजन अर्चन कर जिनवर की, सार्थक अपना जन्म करूँ ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जिनशासन प्रभावक समस्त कृत्रिम - अकृत्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा
जिन शासन के केंद्र हैं, करते जिन उद्घोष।सर्व जिनालय को नर्मू, धारूँ उर संतोष ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्।यः परात्मा स एवाहं, योऽहं स परमस्ततः ।अहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः ॥1॥
जो मैं हूँ वही परमात्मा है, जो परमात्मा है, वह मैं हूँ अतः मेरे द्वारा मैं हीउपासना करने योग्य हूँ। दूसरा कोई भी मेरे द्वारा उपासना करने योग्य नहीं है।जब ध्याता ध्येय में अभेद अद्वैत भाव प्रगट होने लगता है, ध्याता स्व में स्व काअन्वेषण करने में तल्लीन हो जाता है तब सूक्ष्म ध्यान का जप कहलाता है।आचार्य पूज्यपाद स्वामी – समाधि शतकपद्मपुराणतिलोयपण्णतिरत्नकरण्डक श्रावकाचारसमयसारजिनवाणी
दोहा
जिनवाणी भव तारिणी, वस्तु रूप दर्शाय।जो जाने अरु आचरे, संसार पार हो जाए ॥
रोला
स्याद्वादमय द्वादशांगयुत माँ जिनवाणी।जो भी शरणा ले हो जाता केवलज्ञानी ॥हितकारी सुखकारी माता मंगलकारी।भेदज्ञान का सूर्य उदय हो जग हितकारी॥श्री धरसेनाचार्य कृपा हम तक है आई।मिले हजारों शास्त्र जीव को आनंदकारी ॥परम दिगंबर मुनिराजों का श्रम अति भारी।दिव्य लेखनी से प्रसूत है श्री जिनवाणी ॥द्वादश अंग पूर्व चौदह युत श्रुत बतलाते।सूत्र चूलिका प्रकीर्णक परिकर्म सिखाते ॥हैं अनुयोग चार शुभ मनहर जाग्रत करते।भिन्न-भिन्न शैली से सबको बोध कराते ॥
यह प्रथमानुयोग है उत्तम कथा सुनाता।त्रेसठ महाशलाका की गाथा यह गाता ॥दूजा है करणानुयोग परिणाम निरखता।तीन लोक परिणाम कर्म मार्गणा सिखाता ॥तीजा है चरणानुयोग आचरण सिखाता।मुनि श्रावक के योग्य सभी कर्तव्य बताता।।चौथा है द्रव्यानुयोग अति मंगलकारी।सात तत्व छह द्रव्य आत्मा शिवसुखकारी ।।स्याद्वाद के द्वारा वस्तु स्वरूप पिछानो ।एक ज्ञेय श्रद्धेय मात्र निज को ही जानो ॥जिनवाणी की भक्ति करें हम महिमा गाएं।स्वाध्याय के द्वारा जीवन सफल बनाएं ॥रत्नत्रय का अवलंबन ले निज को जानें।मोक्षमार्ग पर चलें निरंतर शिव सुख पायें ॥धन्य-धन्य है भाग्य हमारा जिन श्रुत पाया।आत्मबोधि पाने का दुर्लभ अवसर आया ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री स्याद्वाद - नय गर्भित वस्तु स्वरूप प्रकाशक द्वादशांग जिनवाणीभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
स्वाध्याय की महिमाविणएण सुदमधीदं जदिवि पमादेण होदि विस्सरिदं।तमुवट्ठादि परभवे केवलणाणं च आवहादि ।।विनय से पढ़ा हुआ शास्त्र किसी समय प्रमाद से विस्मृत हो जाये तो भीवह अन्य जन्म में स्मरण हो जाता है, संस्कार रहता है और क्रम से केवलज्ञान कोप्राप्त कराता है।• मूलाचार/286अहिंसापरस्परोपग्रहो जीवानाम्जिनधर्म
दोहा
जिनशासन जयवंत हो, महिमा चित में आय।लहराये यह विश्व में, यही भावना भाय॥
वीर
यह अनादि का धर्म जगत् में, जिन शासन सुखकार महा ।भव अभाव की विधि बतलाता, चिंतामणि सम इसे कहा ॥जिन शासन के मंत्र अनेकों, मुक्ति मार्ग उद्घाटक हैं।भव का कष्ट मिटाने वाले, सबको मंगलदायक हैं ।।यह अनादि का विश्व जगत् में, कोई ना कर्ता हर्ता है।जैसा करता वैसा पाता, सबकी सहज व्यवस्था है ।॥छः द्रव्यों का सहज परिणमन, श्री जिनवर बतलाते हैं।पुण्य - पाप दोनों बंधन है, ज्ञानी गुरु फरमाते हैं ।॥सब द्रव्यों की सब पर्यायें, निश्चित हैं ऐसा मानो ।पर में कुछ ना कर सकते हैं, अपनी मर्यादा जानो ॥उपादान से कार्य स्वयं हो, तब निमित्त हाजिर रहता।जैसा उपादान हो जग में, वैसा कार्य सहज होता ॥
निश्चय और व्यवहार शैली को, जानो समझो चित लाओ।जिनवाणी की विधि को समझो, व्यर्थ जगत् न भरमाओ॥धन्य – धन्य यह जिनशासन है, निज ज्ञायक की प्रीत हो।पाकर सार्थक करो देह नर, यदि जग से भयभीत हो॥जो आश्रय लें लेंगे निज का, जग में न भरमायेंगे।जिनशासन की जय – जय गूंजे, फिर ना लौटकर आयेंगे।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री भव संहारक - मोक्ष प्रदायक जिनधर्माय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
दोहा
नव देवों की साधना, करो पूर्ण साकार।मुक्ति की हुंकार हो, मिटे जगत् व्यापार ॥
वीर
अखिल विश्व में सब अनित्य हैं, एक नित्य आतम सुखकार।जग में शरणा कोई नहीं है, आत्मशरण शिव मंगलकार।भ्रमें सभी संसार में प्राणी, धुव्र स्वभाव को न जानें।आय अकेला मरे अकेला, एक रूप निज पहचानें।देह विनाशी - मैं अविनाशी, यह अन्यत्व भावना रूप।अशुचि रूप तन कारागृह है, एक शुद्ध परमात्म अनूप।।मोह कषाय आस्रव कारण, सदा निरास्रव शुद्धातम।संवर भाव सदा सुख हेतु, कहते हैं श्री परमातम॥आत्मसाधना से ही होती, कर्म निर्जरा शिवसुखकार।उर्ध्व, मध्य अरु अधो लोक में, शुद्धातम है जग में सार ॥
बोधि भाव दुर्लभ नहीं जग में, निश्चय आत्म स्वरूप है।श्री सर्वज्ञ देव वर्णित है, धर्म सकल सुख रूप है॥जन्म मृत्यु अरु जरा रोग को, तन का धर्म सदा जानो।सकल रोग से विरहित निज, ज्ञायक की महिमा पहचानो॥सदा भावना भाऊँ बारह, एक भाव निज ज्ञायक संग।रहे समाधि भावना मेरी, है त्रिकाल ज्ञायक निःस्संग ॥शत्रु – मित्र अरु यश – अपयश में, या विपरीत व्यवस्था में।खोवे नहीं आत्मबल मेरा, अति प्रतिकूल अवस्था में ॥गुणीजनों की महिमा आवे, दुखीजनों पर हो करुणा।सर्व कषाय क्षीण हो मेरी, निज ज्ञायक लागे अपना।नव देवों का रहे स्मरण, आत्म भावना हो साकार।यही शरण है तीन लोक में, जीव मात्र को मंगलकार ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री नवदेवेभ्योः अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इस मंत्र 9 बार जाप करें।
ॐ ह्रीं श्री अरहंतादि नवदेवेभ्योः नमः।
महार्घ्य
वीर
पंच परम पद पूजूँ मंगल, पूजूँ मैं जिनवाणी को।जिन मंदिर को नमन करूँ मैं, नमन करूँ जिन प्रतिमा को॥जग में मंगल शरण है उत्तम जिनशासन है मंगलकार।दशधर्मों का आराधन कर, पाऊँ एक निजातम सार॥जिन शासन के गौरव हैं, जिन तीर्थ सिद्ध अतिशय मंगल।भाऊँ सदा मैं षोडश कारण, अरु प्रसाद से आतम बल॥
नंदीश्वर अरु पंचमेरु की, अकृत्रिम प्रतिमा वंदूँ।सभी बिम्ब कृत्रिम जो राजे, चित् स्वरूप को अभिनन्दूँ।।तीन लोक के सभी पूज्य पद, करूँ वंदना शिव सुखकार।महा शांति के रथ पर चढ़कर, जाऊँ मैं भवदधि के पार ॥
दोहा
तीन लोक के पूज्य पद, भाव सहित शिर नाय।करूँ आत्म आराधना, शिवपुर पथ दरशाय ॥
ॐ ह्रीं श्री अरहन्तसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो, द्वादशांगजिनवाणीभ्यो
उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय, दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यो, सम्यग्दर्शनज्ञान -चारित्रेभ्यः त्रिलोकसम्बन्धीकृत्रिमाकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो,पंचमेरौ अशीति – चैत्यालयेभ्यो, नन्दीश्वरद्वीपस्थद्विपंचाशज्जिनालयेभ्यो,श्री सम्मेदशिखर, गिरनारगिरि, कैलाशगिरि, चम्पापुर, पावापुर-आदिसिद्धक्षेत्रेभ्यो,अतिशयक्षेत्रेभ्यो, विदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरादिविद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यो,ऋषभादिचतुर्विंशति-तीर्थकरेभ्यो, भगवज्जिनसहस्राष्टनामेभ्येश्चअनर्घ्यपदप्राप्तये महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।ये जिनेन्द्रं न पश्यन्ति पूजयन्ति स्तुवन्ति न ।निष्फलं जीवनं तेषां तेषां धिक् च गृहश्रमम् ।।जो प्रतिदिन श्री. जिनेन्द्र का दर्शन और स्तवन नहीं करते,उनका जीवन निष्फल है और उनके गृहस्थाश्रम को धिक्कार है।
पुण्याहवाचनविधान में शामिल सभी महानुभाव शान्तिधारा करते हुएनिम्नानुसार पुण्याहवाचन करें :
ॐ पुण्याहं पुण्याहं लोकोद्योतनकरा अतीतकालसंजाता निर्वाण-सागरप्रभृतयः चतुर्विंशतिपरमदेवाः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ सम्प्रतिकालसंभवा वृषभादिवीरान्ताश्चतुर्विंशतिपरम जिनेन्द्राः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम्। (धारा) ॐ भविष्यत्कालाभ्युदयप्रभवा महापद्मादिचतुर्विंशतिभविष्यत्परमदेवाः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ विंशति परमदेवाः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ वृषभसेनादिगणधरदेवा वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम्। (धारा)
ॐ सप्तर्द्धिविशोभिताः कुन्दकुन्दाद्यनेकदिगम्बरसाधुचरणाः वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम्। (धारा) (पुष्प क्षेपण करें) इह वान्यनगरग्रामदेवतामनुजाः सर्वे गुरुभक्ताः जिनधर्मपरायणा भवन्तु । दानतपोवीर्यानुष्ठानं नित्यमेवास्तु । सर्वजिनधर्मभक्तानां धनधान्यैश्वर्यबलद्युतियशः प्रमोदोत्सवाः प्रवर्तन्ताम्।
तुष्टिरस्तु, पुष्टिरस्तु, वृद्धिरस्तु, कल्याणमस्तु, अविघ्नमस्तु, आयुष्यमस्तु,आरोग्यमस्तु, कर्मसिद्धिरस्तु, इष्टसम्पतिरस्तु, काममांगल्योत्सवाः सन्तु,पापानि शाम्यन्तु, घोराणि शाम्यन्तु, पुण्यं वर्धताम्,धर्मोवर्धताम्, श्रीवर्धताम्, कुलं गोत्रं चाभिवर्धेताम् स्वस्ति भद्रं चास्तु,आयुष्यमस्तु, क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा।श्रीमज्जिनेन्द्रचरणारविन्देष्वानन्दभक्तिः सदास्तु ।अब शान्तिपाठ और विसर्जन पाठ पढ़ें।शांति पाठ
चांद्रायण
जिनपूजन की मैंने अति उत्साह से,यही भावना बचूँ शुभाशुभ भाव से।आह्वानन सुस्थापन का नहीं ज्ञान है,पूजन विधि का भी ना पूरा भान है ।क्षमा भाव धारण करता हूँ हृदय में,तुव प्रसाद से जाऊँ अपने निलय में ।पूजक पूज्य भेद का नहीं अब भाव हो,द्रव्य दृष्टि से सभी सदा सम भाव हो ।आत्म शांति हो विश्व शांति हो भावना,सभी जीव हों सुखी यही बस प्रार्थना।एक अखंड त्रिकाली ध्रुव आराध्य हो,करूँ वहीं विश्राम भावना सिद्ध हो।(सभी शांतिपूर्वक 9 बार णमोकार मंत्र के माध्यम से पंच परमेष्ठी का स्मरण करें।)
विसर्जन
विसर्जन पाठ
दोहा
सकल जगत् में शांति हो, जानें ज्ञायक रूप।निज स्वभाव की दृष्टि हो, मिले सहज चिद्रूप ॥
परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमोगणी,मंगलं कुंदकुंदार्यो, जैन धर्मोस्तु मंगलम् ॥सर्व मंगल मांगल्यं, सर्व कल्याण कारकम्,प्रधानं सर्वधर्मानां, जैनं जयतु शासनम्॥
मेरी भावना
अब दुख नहीं, कोई शोक नहीं,बस आगे ही बढ़ना होगा।कोई द्वंद नहीं, कोई द्वेष नहीं,अब सबको ही तजना होगा।संयोग सभी विघटित होते,वस्तु व्यवस्था जानी है।है पर्यायों का काल क्षणिक,बस सबकी यही कहानी है।जो भी अनादि से भूल हुई,उसको नहीं दोहराना है।जिस आत्म स्वरूप को न समझा,बस उसको सही समझना है।आत्मज्ञान – अनुभव के बिन,यूं चक्र जगत् का चलता है।फिर भी मदहोश मुग्ध प्राणी,बेखौफ जगत् में रहता है।हर पल यम की ही आहट है,पदचाप सुनूं और पहचानूं।ज्ञायक सर्वस्व स्वरूप मेरा,बस इससे ही जीवन मानूं।– विराग, 15 मई 2026
समाधि भावनातर्ज - दिन-रात मेरे स्वामी मैं भावना ये भाऊँयह भावना है स्वामी, आराधना विचारूँ।शुद्धात्म सेवी बनकर, अंतर को बस निहारूँ ।।नर देह पाई उत्तम, जिन धर्म सुकुल पाया।संयोग सारे मंगल, फिर भी ना आत्म भाया ।।सार्थक करूँ ये जीवन, चैतन्य को संवारूँ।शुद्धात्म सेवी बनकर, अंतर को बस निहारूँ ।। 1।।
शत्रु कोई ना दीखे, सब जीव सिद्ध जैसे।अंतर स्वरूप देखा, सब जीव एक जैसे ।।सबको क्षमा करूँ मैं, सबसे क्षमा कराऊँ।शुद्धात्म सेवी बनकर, अंतर को बस निहारूँ ।। 2 ।।
भोगे जो भोग पहले, उनको न मन में लाऊँ।दुर्भावना नहीं हो, निज भाव शुद्ध पाऊँ ।।अंतर में होवे थिरता, ध्रुव आत्म को ही ध्याऊँ।शुद्धात्म सेवी बनकर, अंतर को बस निहारूँ ।। 3 ।।
पीड़ा यदि है तन में, यह देह का धरम है।मैं स्वस्थ आत्म देखूँ, जिनदेव का वचन है ।।जिनसूत्र औषधि है, मैं देह को भुलाऊँ।शुद्धात्म सेवी बनकर, अंतर को बस निहारूँ ।। 4 ।।
यह जीर्ण - शीर्ण तन तो, किंचित नहीं है मेरा।मैं देह से रहित हूँ, चैतन्य भाव न्यारा ।।आत्म का बल न छोहूँ, निज नाथ अब मैं पाऊँ।शुद्धात्म सेवी बनकर, अंतर को बस निहारूँ ।। 5 ।।
- विराग - 17 मई 2026
॥ जय जिनेन्द्र ॥
स्रोत: जिनदेशना, जबलपुर