निर्वाण क्षेत्र पूजा
पं. द्यानतराय · नित्य पूजा क्रम
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सोरठा
परम पूज्य चौबीस, जिहँ जिहँ थानक शिव गये ।सिद्धभूमि निश-दीस, मन वच तन पूजा करौं ॥
आह्वाननॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्राणि ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट् आह्वाननम् ।
स्थापनॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्राणि ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्थापनम् ।
सन्निधिकरणॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्राणि ! अत्र मम सन्निहितानि भवत भवत वषट् स्वाहा सन्निधिकरणम् ।
अष्टक
गीता छन्द
शुचि छीर-दधि-सम नीर निरमल, कनक-झारीमें भरौं ।संसार पार उतार स्वामी, जोर कर विनती करौं ॥
सम्मेदगढ़ गिरनार चम्पा, पावापुरि कैलासकों ।पूजों सदा चौबीस जिन, निर्वाणभूमि-निवासकों ॥
जलॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
केशर कपूर सुगन्ध चन्दन, सलिल शीतल विस्तरौं ।भव-तापकौ सन्ताप मेटो, जोर कर विनती करौं ॥सम्मेद॰ ॥
चंदनॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।
मोती-समान अखण्ड तन्दुल, अमल आनँद धरि तरौं ।औगुन-हरो गुन करौ हमको, जोर कर विनती करौं ॥सम्मेद॰ ॥
अक्षतॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुभ फूल-रास सुवास-वासित, खेद सब मनकी हरौं ।दुख-धाम-काम विनाश मेरो, जोर कर विनती करौं ॥सम्मेद॰ ॥
पुष्पॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
नेवज अनेकप्रकार जोग मनोग धरि भय परिहरौं ।यह भूख-दूखन टार प्रभुजी, जोर कर विनती करौं ॥
सम्मेदगढ़ गिरनार चम्पा, पावापुरि कैलासकों ।पूजों सदा चौबीस जिन, निर्वाणभूमि-निवासकों ॥
नैवेद्यॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यः नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
दीपक-प्रकाश उजास उज्ज्वल, तिमिरसेती नहिं डरौं ।संशय-विमोह-विभरम-तम-हर, जोर कर विनती करौं ॥सम्मेद॰ ॥
दीपॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुभ-धूप परम-अनूप पावन, भाव पावन आचरौं ।सब करम-पुञ्ज जलाय दीज्यौ, जोरकर विनती करौं ॥सम्मेद॰ ॥
धूपॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
बहु फल मँगाय चढ़ाय उत्तम, चार गतिसों निरवरौं ।निहचै मुकति-फल देहु मोको, जोरकर विनती करौं ॥सम्मेद॰ ॥
फलॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यः फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जल गन्ध अच्छत फूल चरु फल, दीप धूपायन धरौं ।‘द्यानत’ करो निरभय जगतसों, जोर कर विनती करौं ॥सम्मेद॰ ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
सोरठा
श्रीचौबीस जिनेश, गिरि कैलाशादिक नमों ।तीरथ महाप्रदेश महापुरुष निरवाणतैं ॥
चौपाई 16 मात्रा
नमों ऋषभ कैलासपहारं, नेमिनाथ गिरनार निहारं ।वासुपूज्य चम्पापुर वन्दौं, सनमति पावापुर अभिनन्दौं ॥1॥
वन्दौं अजित अजित-पद-दाता, वन्दौं सम्भव भव-दुख-घाता ।वन्दौं अभिनन्दन गण-नायक, वन्दौं सुमति सुमतिके दायक ॥2॥
वन्दौं पदम मुकति-पदमाकर, वन्दौं सुपास आश-पासाहर ।वन्दौं चन्द्रप्रभ प्रभु चन्दा, वन्दौं सुविधि सुविधि-निधि-कन्दा ॥3॥
वन्दौं शीतल अघ-तप-शीतल, वन्दौं श्रियान्स श्रियान्स महीतल ।वन्दौं विमल विमल उपयोगी, वन्दौं अनन्त अनन्त सुखभोगी ॥4॥
वन्दौं धर्म धर्म विस्तारा, वन्दौं शान्ति शान्ति मनधारा ।वन्दौं कुन्थु कुन्थु रखवालं, वन्दौं अर अरि हर गुणमालं ॥5॥
वन्दौं मल्लि काम मल चूरन, वन्दौं मुनिसुव्रत व्रत पूरन ।वन्दौं नमि जिन नमित सुरासुर, वन्दौं पास पास भ्रम जगहर ॥6॥
बीसों सिद्धभूमि जा ऊपर, शिखर सम्मेद महागिरि भूपर ।एकबार वन्दै जो कोई, ताहि नरक पशुगति नहिं होई ॥7॥
नरपतिनृप सुर शक्र कहावैं, तिहुँ जग भोग भोगि शिव पावें ।विघन विनाशन मङ्गलकारी, गुण-विलास वन्दौं भवतारी ॥8॥
घत्ता
जो तीरथ जावैं पाप मिटावैं, ध्यावैं गावैं, भगति करैं ।ताको जस कहिये, संपति लहिये, गिरिके गुण को बुध उचरैं ॥9॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो महार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।
(इत्याशीर्वादः इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
॥ जय जिनेन्द्र ॥