जिनेन्द्र वाणी

सरस्वती पूजा

पं. द्यानतराय · नित्य पूजा क्रम

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दोहा

जनम जरा-मृतु, क्षय करै, हरै कुनय जड़-रीति ।भवसागर सौं ले तिरै, पूजै जिनवच-प्रीति ॥1॥

ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भूत-सरस्वत्यै पुष्पांजलिं क्षिपामि ।

अष्टक

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त्रिभंगी

क्षीरोदधि गंगा, विमल तरंगा, सलिल अभंगा, सुख संगा ।भरि कंचनझारी, धार निकारी, तृषा निवारी, हित चंगा ॥

तीर्थंकर की ध्वनि, गणधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमई ।सो जिनवर वानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई ॥1॥

जलॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै जन्म-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

करपूर मंगाया, चन्दन आया, केशर लाया रंग भरी ।शारद-पद वंदौं, मन अभिनंदौं, पाप निकंदौं दाह हरी ॥ तीर्थं. ॥2॥

चंदनॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै संसारताप–विनाशनाय चंदनम् निर्वपामीति स्वाहा ।

सुखदास कमोद, धारक मोदं, अति अनुमोदं चंद समं ।बहु भक्ति बढ़ाई, कीरति गाई, होहु सहाई, मात ममं ॥ तीर्थं. ॥3॥

अक्षतॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै अक्षयपद–प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।

बहु फूल सुवासं, विमल प्रकाशं, आनंद रासं लाय धरे ।मम काम मिटायो, शील बढ़ायो, सुख उपजायो दोष हरे ॥ तीर्थं. ॥4॥

पुष्पॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै कामबाण–विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

पकवान बनाया, बहुघृत लाया, सब विध भाया मिष्ट महा ।पूजूँ थुति गाऊँ, प्रीति बढ़ाऊँ, क्षुधा नशाऊँ हर्ष लहा ॥ तीर्थं. ॥5॥

नैवेद्यॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै क्षुधारोग–विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

कर दीपक जोतं, तमक्षय होतं, ज्योति उदोतं तुमहिं चढ़ै ।तुम हो परकाशक, भरम विनाशक हम घट भासक, ज्ञानबढै ॥ तीर्थं. ॥6॥

दीपॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै मोहांधकार–विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

शुभगंध दशों कर, पावक में धर, धूप मनोहर, खेवत हैं ।सब पाप जलावें, पुण्य कमावें, दास कहावें सेवत हैं ॥ तीर्थं. ॥7॥

धूपॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै अष्टकर्म–दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

बादाम छुहारे, लोंग सुपारी, श्रीफल भारी ल्यावत हैं ।मन वाँछित दाता मेट असाता, तुम गुन माता, ध्यावत हैं ॥ तीर्थं. ॥8॥

फलॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै मोक्षफल–प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

नयनन सुखकारी, मृदु गुनधारी, उज्ज्वल भारी, मोलधरैं ।शुभगंध सम्हारा, वसन निहारा, तुम तन धारा ज्ञान करैं ॥ तीर्थं. ॥9॥

अर्घ्यह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै दिव्यज्ञान–प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जल चंदन अक्षत, फूल चरु अरु, दीप धूप अति फल लावे ।पूजा को ठानत, जो तुम जानत, सो नर ‘द्यानत’ सुखपावे ॥ तीर्थंकर. ॥1॰ ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

सोरठा

ओंकार ध्वनिसार, द्वादशांग वाणी विमल ।नमौं भक्ति उर धार, ज्ञान करे जड़ता हरे ॥

चौपाई

पहलो आचारांग बखानो, पद अष्टादश सहस प्रमानो ।दूजो सूत्रकृतं अभिलाषं, पद छत्तीस सहस गुरु भाषं ॥

तीजो ठाना अंत सुजानं, सहस बयालिस पद सरधानं ।चौथो समवायांग निहारं, चौंसठ सहस लाख इक धारम् ॥

पंचम व्याख्या प्रज्ञप्ति दरसं, दोय लाख अट्ठाइस सहसं ।छट्ठो ज्ञातृकथा विसतारं, पाँच लाख छप्पन हज्जारं ॥

सप्तम उपासकाध्यनांगं, सत्तर सहस ग्यारलख भंगं ।अष्टम अंतकृतं दस ईसं, सहस अठाइस लाख तेईसं ॥

नवम अनुत्तरदश सुविशालं, लाख बानवै सहस चवालं ।दशम प्रश्न व्याकरण विचारं, लाख तिरानवे सोल हजारं ॥

ग्यारम सूत्र विपाक सु भाखं, एक कोड़ चौरासी लाखं ।चार कोड़ि अरु पंद्रह लाखं, दो हजार सब पद गुरु भाखं ॥

द्वादश दृष्टिवाद पन भेदं, इकसौ आठ कोड़ि पन वेदं ।अड़सठ लाख सहस छप्पन हैं, सहित पंचपद मिथ्याहन हैं ॥

इक सौ बारह कोड़ि बखानो, लाख तिरासी ऊपर जानो ।ठावन सहस पंच अधिकाने, द्वादश अंग सर्व पद माने ॥

कोड़ि इकावन आठ हि लाखं, सहस चुरासी छह सौ भाखं ।साढ़े इकीस श्लोक बताये, एक-एक पद के ये गाये ॥

दोहा

जा बानी के ज्ञान तैं, सूझे लोकालोक ।‘द्यानत’ जग जयवंत हो, सदा देत हूँ धोक ॥

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

॥ जय जिनेन्द्र ॥

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