जिनेन्द्र वाणी

श्री पंच परमेष्ठी विधान

पं. अभयकुमार शास्त्री, देवलाली · विधान पूजा

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समुच्चय पूजा

स्थापना

वीरछन्द

पंचम परम भाव के साधक-साध्य प्रभू को करूँ नमन।मोह महामल प्रक्षालक पाँचों परमेष्ठी को वन्दन।।हे अरहन्त सिद्ध आचार्य-रु उपाध्याय हे साधु महान्।मम निर्मल श्रुतज्ञान-मुकुर में सदा बसो प्रतिबिम्ब समान।।

आह्वाननॐ ह्रीं श्री अरहन्त-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधुपंचपरमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। (इति आह्वानम्।)

स्थापनॐ ह्रीं श्री अरहन्त-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधुपंचपरमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ, ठः ठः । (इति स्थापनम् ।)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री अरहन्त-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधुपंचपरमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् । (इति सन्निधिकरणं पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)

अष्टक

जोगीरासा

मोह-महामल शोधक प्रभुवर ज्ञान-नीर से पूजूँ।रत्नत्रय आराधन करके दोष अठारह नाशूँ ।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजूँ परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

जलॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

भव-आताप निवारक प्रभुवर गन्ध ज्ञान की भाई।धन्य आपकी निर्मल परिणति ज्ञान-कला सिखलाई।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजूँ परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

चंदनॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभु ! अखंड ज्ञायक विलास करते निजसंवेदन में।हे अक्षयपद दर्शक ! अक्षत अर्पित है चरणों में।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजूँ परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

अक्षतॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

हे शिवकामी काम-रहित निष्काम तत्त्व दिखलाते।ब्रह्मभाव के भ्रमर-सुमन से भव्य आपको ध्याते।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजूँ परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

पुष्पॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

अहो ! निजात्म-रसास्वादी तुम तृप्त ज्ञानमय रहते।क्षुधा-वेदना मुक्त प्रभु पद-कमलों में हम रमते।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजूँ परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

नैवेद्यॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

ज्ञान-दीप में ज्ञान प्रकाशित प्रभो! आप दिखलाते।मोह-विनाशक ज्ञान-दीप से हम प्रभु-दर्शन करते।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजूँ परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

दीपॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

ध्यान ध्येय के भेद रहित शुद्धात्म सदा तुम ध्याते।हम निष्कर्म ज्ञान-पद ध्यायें यही भावना भाते।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजूँ परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

धूपॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

शिवफल के भी निर्वांछक प्रभु ! शाश्वत शिवफल भोगें।भक्तिभाव फल अर्पित कर हम भी शिवसाधन साधें।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजित परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

फलॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

हे अनर्घ्य पद आराधक प्रभु ! पद-अनर्घ्य के दाता।निर्मल मति श्रुत अर्घ्य समर्पित निजानंद पद ध्याता।।पाँचों परमेष्ठी प्रभु पूजित परम भाव अभिलाषी।हे प्रभु! मैं भी होऊँ तुम-सम ज्ञान-सरोवर वासी।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्ध्यावलिअरहन्त परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

अरहन्त परमेष्ठी

पीठिका

वीरछन्द

सर्वारम्भ-परिग्रह तज कर जिन-दीक्षा की अंगीकार।निज स्वभाव-साधन द्वारा प्रभु ! चार घातिया कर्म-निवार।।नव केवल-लब्धि से भूषित हे अरहन्त जिनेन्द्र ! महान्।वीतराग सर्वज्ञ और हित-उपदेशी नित करूँ प्रणाम।।

दोहा

लोकालोक विलोकता, सहज आपका ज्ञान।बिन इच्छा वाणी खिरे है उपकार महान्।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)गर्भकल्याणक विभूषित अरहन्त परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

हरिगीतिका

गर्भागमन के पूर्व ही सुर रत्न-वृष्टि कर रहे।स्वर्णमय नगरी सु-रचना हर्ष पूर्वक कर रहे।।माता-पिता की अर्चना भी इन्द्र भक्ति से करें।शुभ स्वप्न सोलह मात देखें नृपति उसका फल कहें।।

दोहा

अहो ! गर्भ में भी प्रभो वर्ते भेद-विज्ञान।अन्तिम गर्भ लिया अतः पूजे सकल जहान।।

अर्घ्यॐ ह्रीं गर्भकल्याणकविभूषित-अरहन्तपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जन्मकल्याणक विभूषित अरहन्त परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

हरिगीतिका

सुन्दर सुगन्धित देह में मल-मूत्र श्रम-जल भी नहीं।हितमित वचनप्रिय बल अतुल है रुधिर श्वेत रु सहस चिह्न।संस्थान समचतुरस्र अरु संहनन वज्र-वृषभ¹ रहे।सुरपति महा-उत्सव करें बहु हर्ष पूर्वक नाचते।।

दोहा

मति श्रुत अवधि सुज्ञानयुत अंतिम जन्म महान्।महापुण्य से भी प्रभो ! है अलिप्त तव ज्ञान।।

अर्घ्यॐ ह्रीं जन्मकल्याणकविभूषित-अरहन्तपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

1. वज्रवृषभ नाराचदीक्षाकल्याणक विभूषित अरहन्त परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

हरिगीतिका

भावना बारह प्रभो ! भाकर हुए निर्ग्रन्थ हैं।सम्यक् सुदर्शन-ज्ञान-चारित एक ही शिव-पन्थ है।।आए लौकान्तिक सभी सुर कहें प्रभु ! तुम धन्य हो।चैतन्य के निष्काम साधक प्रभो ! आप अनन्य हो।।

दोहा

जातिस्मरण हुआ प्रभो जाना जगत् असार।निज स्वभाव को साधते वेश दिगम्बर धार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं दीक्षाकल्याणकविभूषित-अरहन्तपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

केवलज्ञानकल्याणक विभूषित अरहन्त परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

हरिगीतिका

सब जीव मैत्री ओम ध्वनि निर्मल हुए नभ अरु दिशा।सर्व ऋतु फल-पुष्प, निर्मल भूमि, स्वर्ण कमल रचा।।जय घोष, मन्द-सुगन्ध-वायु-नीर कंटक-हीन भू।सब जीव हर्षित, धर्मचक्र-रु अष्ट मंगल-द्रव्य भी।।1।।एक शत योजन सुभिक्ष-रु नभ-गमन मुख चार हैं।उपसर्ग कवलाहार अदया का नहीं सद्भाव है।।सर्व विद्या-ईश अरु नख-केश भी बढ़ते नहीं।नेत्र-अनिमिष, नहीं छाया-कहे दश अतिशय यही।।2।।अशोक तरु, सुन्दर सिंहासन, छत्र-त्रय भामण्डलम्।सुर पुष्प-वृष्टि करें ध्वनि भी दिव्य खिरती अनुपमम्।।

चौंसठ चँवर, सुर दुन्दुभी जयघोष प्रभु का कर रही।किन्तु प्रभु निरपेक्ष इन सबसे महत्ता है यही।।3।।अनन्त दर्शन-ज्ञान-सुख-बल से विभूषित आप हैं।आपके ही ध्यान से मिटते सभी भव-ताप हैं।।प्रभु द्रव्य-गुण-पर्याय से जो आपको हैं जानते।दृग-मोह उनका क्षीण हो वे आत्मा को जानते।।4।।

दोहा

मोक्षमार्ग नेता प्रभो ! उपदेशी हितकार।द्रव्य-भाव घाति नशे सर्व जीव सुखकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं चतुस्त्रिंशद्-अतिशय-अष्टप्रातिहार्य-अनन्तचतुष्टय-विभूषित- अरहन्तपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मोक्षकल्याणक विभूषित अरहन्त परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

हरिगीतिका

प्रभु तेरवें गुणथान में सुख भोगते स्वाधीन को।तीसरा शुक्ल-ध्यान प्रभु ! अंतिम क्षणों में सहज हो।।प्रकृति पचासी नष्ट होतीं चतुर्थम शुक्ल-ध्यान में।क्षण मात्र में जाकर विराजे शाश्वत शिवधाम में।।

दोहा

मुक्ति महा-उत्सव करें इन्द्रादिक सब आय।हर्षित हैं मानो स्वयं में ही मुक्ति दिखाय।।

अर्घ्यॐ ह्रीं मोक्षकल्याणकविभूषित-अरहन्तपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

विशेषार्घ्य

वीरछन्द

स्तुति करूँ अनन्त केवली, तीर्थंकर भगवन्तों की।महाप्राज्ञ रज-मल विहीन, चक्री एवं जग-वन्दित की।।1।।लोक प्रकाशक धर्मतीर्थ-कर्ता जिन को वन्दन करता।चौबिस केवलि-भगवन्तों का ही मंगल कीर्तन करता।।2।।ऋषभ अजित संभव अभिनन्दन एवं सुमति जिनेश्वर को।वन्दूँ पद्मप्रभ सुपार्श्व एवं चन्द्रप्रभ जिनवर को।।3।।सुविधिनाथ या पुष्पदन्त, शीतल, श्रेयांस अरु वासुपूज्य।विमल, अनन्त-रु धर्म शान्ति भगवन्तों को मैं नमन करूँ।।4।।कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लि, मुनिसुव्रत नमि भगवंतों को।वन्दन करूँ अरिष्टनेमि, पारस श्री वीर-जिनेश्वर को।।5।।रज-मल और जरा-मरणान्तक, जो मुझसे स्तुत्य हुए।चौबीसों जिनवर तीर्थंकर भगवन् हों प्रसन्न मुझ पर।।6।।मुझसे कीर्तित, वंदित, पूजित, लोकोत्तम कृतकृत्य जिनेन्द्र।ज्ञान-बोधि-आरोग्य-समाधि-लाभ सदैव प्रदान करें।।7।।जो हैं शशि से भी अति निर्मल रवि से अधिक प्रभामण्डित।सागर-सम गम्भीर, सिद्ध पद प्राप्त, मुझे भी दें सिद्धि।।८।।

दोहा

मुक्ति महा-उत्सव करें इन्द्रादिक सब आय।हर्षित हैं मानो स्वयं में ही मुक्ति दिखाय।।

अर्घ्यॐ ह्रीं अरहन्तपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

1. दशभक्ति में समागत तीर्थंकर भक्ति का पद्यानुवादसिद्ध परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

सिद्ध परमेष्ठी

पीठिका

वीरछन्द

ध्रुव अनुपम अरु अचलगति को प्राप्त सिद्ध को करूँ नमन।दर्पण-सम शुद्धात्म तत्त्व को झलकाते जो उन्हें नमन।।हे शाश्वत सुख के भोगी ! तुम श्रद्धा के श्रद्धेय बनो।रहो ज्ञान के ज्ञेय प्रभो ! तुम सदा ध्यान के ध्येय रहो।।

दोहा

द्रव्य-भाव-नोकर्म बिन हुए सिद्ध भगवन्त।शाश्वत सुख स्वाधीन जो भोगें काल अनन्त।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)

हरिगीतिका

ज्ञानावरण-क्षय के निमित से ज्ञान-केवल खिल उठा।दर्शनावरणी विलय से दृग अनन्त उदित हुआ।।मोह-क्षय कर हे प्रभो ! सुखमय अनन्त विराजते।अन्तराय विलीन से प्रभु बल अनन्त सुशोभते।।

अर्घ्यॐ ह्रीं घातिचतुष्करहिताय-सिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रभु वेदनीय विनाश कर बाधारहित सुख प्राप्त कर।नाश आयु कर्म से अवगाहनत्व हुआ उदय।।नामकर्म विनाश करने से परम सूक्ष्मत्व है।गोत्र कर्म विनाशने से अगुरुलघु पद प्राप्त है।।

द्रव्य-भाव-नोकर्म बिन हुए सिद्ध भगवन्त।शाश्वत सुख स्वाधीन जो भोगें काल अनन्त।।

अर्घ्यॐ ह्रीं अघातिचतुष्करहिताय सिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

विशेषार्घ्य¹

वीरछन्द

अशरीरी चैतन्य स्वरूपी दर्शन-ज्ञान सुशोभित हैं।निराकार-साकार सिद्ध प्रभु के प्रसिद्ध ये लक्षण हैं।।1।।मूल और उत्तर प्रकृति के बन्ध-उदय-सत्ता विरहित।मंगलमय गुण अष्ट अलंकृत सिद्ध प्रभु संसार रहित।।2।।नष्ट हुए हैं अष्ट कर्म अरु नित्य निरंजन आनंद-कंद।अष्ट गुणान्वित परम तृप्त लोकाग्र विराजें सिद्ध महन्त।।3।।कर्म-जन्य मल नष्ट हुए प्रविशुद्ध ज्ञानमय सत्तारूप।मुझ पर हों प्रसन्न त्रिभुवन के मुकुटमणि हे सिद्ध प्रभु।।4।।गमनागमन विमुक्त हुए जो किया कर्म-रज का संहार।शाश्वत सुख को प्राप्त सिद्ध प्रभु वन्दनीय हैं बारम्बार।।5।।मंगलमय अरु जयस्वरूप जो निर्मल दर्शन-ज्ञान स्वरूप।तीन लोक के मुकुट सिद्ध भगवन्तों को मैं सदा नमूँ।।6।।समकित दर्शन ज्ञान वीर्य सूक्ष्मत्व और अवगाहस्वरूप।अगुरुलघु अरु अव्याबाधी अष्ट गुणान्वित सिद्ध प्रभु।।7।।तप से सिद्ध तथा नय संयम चारित से जो सिद्ध हुए।ज्ञान और दर्शन से सिद्ध हुए उनको मैं नमन करूँ।।8।।

अर्घ्यॐ ह्रीं सिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

1. दशभक्ति में समागत सिद्ध भक्ति का पद्यानुवादआचार्य परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

आचार्य परमेष्ठी

पीठिका

वीरछन्द

पंचाचार परायण पंचम गति के साधक सूरि महान्।पंचमहाव्रत पंच समितिमय जीवन सहज हुआ अमलान।।क्षमा आदि दश-धर्म विभूषित द्वादश-तप मंगल आचार।षट्-आवश्यक तीन-गुप्ति से निज में गुप्त रहें सुखकार।।

दोहा

निज-स्वरूप की साधना में रत हैं आचार्य।साधु संघ सिरमौर हैं अहो ! परम उपकार।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)

हरिगीतिका

दृग ज्ञान चारित वीर्य तप आचार मंगलकार हैं।शुद्धात्म की आराधना परमार्थ से आचार है।।वैराग्य प्रेरित शिष्य गण के लिए शरणागार हैं।इन साधु संघ नायक गुरु को वन्दना शत बार है।।

अर्घ्यॐ ह्रीं पंचाचारविभूषित-आचार्यपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सब धर्म का जो मूल है सम्यक्त्व के आधार से।क्षमा मार्दव आर्जव अरु शौच सत्य सुशोभते।।संयम सुतप अरु त्याग आकिंचन निजाश्रित साधते।निज ब्रह्म में वे लीन गुरु इन्द्रिय-गजों को वश करें।।

अर्घ्यॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशधर्म-आचार्यपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

तप अनशनं ऊनोदरं अरु वृत्ति परिसंख्यान है।विविक्त-शय्यासन तथा रसत्याग काया-क्लेश है।।विनय प्रायश्चित तथा व्युत्सर्ग वैयावृत धरें।स्वाध्याय और सुध्यान से चैतन्य में प्रतपन करें।।

अर्घ्यॐ ह्रीं द्वादशतपविभूषित-आचार्यपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

समता धरें स्तवन करें नित वन्दना जिनदेव को।स्वाध्याय एवं प्रतिक्रमण करते ममत्व न देह में।।परमार्थ से आत्मानुभूति एक आवश्यक कही।दृग-ज्ञान अरु चारित्र की धारा अखंडित बह रही।

अर्घ्यॐ ह्रीं षडावश्यकविभूषित-आचार्यपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

मन-वचन-तन के द्वार से उपयोग पर में भटकता।रागादि के वश में हुआ पर-वस्तु में ही अटकता।।अतएव श्री आचार्यवर ये द्वार तीनों बन्द कर।चैतन्यगढ़ में गुप्त रहकर चिदानन्द भोगें प्रवर।।

अर्घ्यॐ ह्रीं गुप्तित्रयविभूषित-आचार्यपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

विशेषार्घ्य¹

वीरछन्द

देश जाति कुल शुद्ध मनो-वच-तन विशुद्धि से जो संयुक्त।करें आपके पद-पंकज जग में मेरा कल्याण सुनित्य।।1।।

1. दशभक्ति में समागत आचार्य भक्ति का पद्यानुवाद

स्व-पर समय के ज्ञाता हैं जो आगम हेतु जाननहार।श्रुत-स्वरूप के ज्ञाता मुनिवर निज-स्वरूप के जाननहार।।2।।बाल वृद्ध रोगी गिलान आदिक सब मुनियों के अपराध।जानें भलीभाँति अरु उनको दृढ़ चारित्र करावनहार।।3।।गुप्ति समिति व्रत और अन्य को करते हो शिवपथ संयुक्त।उपाध्याय गुण निलय और तुम साधु गुणों से भी हो युक्त।।4।।भू-सम क्षमा-शील हो निर्मल जल-सम रहते सदा प्रसन्न।कर्म-दाह्य को अग्नि-तुल्य हो वायु-समान सदा निःसंग।।5।।गगन-तुल्य निर्लेप, सिन्धु-सम, हो गंभीर गुणों की खान।आचार्यों के चरण-कमल में निर्मल मन से करूँ प्रणाम।।6।।इस संसार भयानक वन में भटक रहे जो भवि प्राणी।तव प्रसाद से ही पाते हैं मोक्षमार्ग नित सुखदानी।।7।।अशुभ लेश्या से विहीन तुम शुभ लेश्याओं से संयुक्त।आर्त-रौद्र दुर्ध्यान रहित हो धर्म-शुक्ल से हो भूषित।।8।।अवग्रह ईहा अरु अवाय धारणा गुणों से भूषित हो।हे श्रुतार्थ भावना सहित गुरु ! भाव सहित मम वन्दन हो।।9।।प्रभो! आपका गुण-स्तवन मुझ अज्ञानी से किया गया।गुरु-भक्ति संयुक्त मुझे, हो बोधि-लाभ उपलब्ध सदा।।10।।

अर्घ्यॐ ह्रीं आचार्यपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

उपाध्याय परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

उपाध्याय परमेष्ठी

पीठिका

वीरछन्द

स्व-संवेदी ज्ञान आपका जिसमें उछले ज्ञायक भाव।द्वादशांग का सार लखें नित एक अखण्ड अभेद स्वभाव।।

विकसित है श्रुतज्ञान आपका जानें पूरे ग्यारह अंग।गुण पच्चीस विभूषित गुरुवर उपाध्याय को है वंदन।।

दोहा

द्वादशांग गर्भित अहो ! ऊँकार ध्वनि सार।मोह-तिमिर नाशक प्रभो ! पाठक मंगलकार।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)

हरिगीतिका

प्रथम आचारांग सूत्र-कृतांग दूजा अंग है।ठानांग समवायांग एवं व्याख्या-प्रज्ञप्ति है।।ज्ञातृकथा अरु उपासकाध्यन अन्तकृत दशांग है।है अनुत्तर-उपपाद एवं प्रश्न-व्याकरणांग है।।

दोहा

सूत्र-विपाक कहा गया है ग्यारहवाँ अंग।पाठक गुरु के ज्ञान में विलसें ये सर्वांग।।दृष्टिवाद है बारवाँ, जिसमें चौदह पूर्व।गूँथे गणधरदेव ने यह श्रुत-लब्धि अपूर्व।।

अर्घ्यॐ ह्रीं एकादशांग-ज्ञानगुण-विभूषित-उपाध्यायपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद- प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

हरिगीतिका

उत्पाद अरु अग्रायणी वीर्यानुवाद सुपूर्व हैं।है अस्ति-नास्ति प्रवाद ज्ञान-रु कर्म सत्य अपूर्व है।।है पूर्व आत्म-प्रवाद प्रत्याख्यान विद्या-कथन भी।कल्याण प्राणनुवाद क्रियाविशाल बिन्दु-लोक है।।

अर्घ्यॐ ह्रीं चतुर्दशपूर्व-ज्ञानगुण-विभूषित-उपाध्यायपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपद- प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महार्घ्य

वीरछन्द

अर्हत् वचनों से प्रसूत गणधर विरचित हैं द्वादश अंग।विविध अनेक अर्थ गर्भित हैं धारें सुधी मुनीश्वर गण।।अग्र-द्वार शिवपुर का मिलता व्रताचार फल, ज्ञेय-प्रदीप।त्रिभुवन सारभूत श्रुत को मैं नितप्रति वन्दूँ भक्ति सहित।।1।।जिन-ध्वनि से निःसृत वचनों को इन्द्रभूति आदिक गणधर-सुनकर धारण करें प्रकाशित, द्वादशांग को करूँ नमन।।2।।कोटि एक सौ बारह एवं लाख तिरासी अट्ठावन-सहस पाँच पद भूषित अंग-प्रविष्ट ज्ञान को करूँ नमन।।3।।अंग-बाह्य श्रुत में पद हैं कुल आठ करोड़ और इक लाख-आठ हजार एक सौ पचहत्तर पद को नित नमता माथ।।4।।अरहन्तों से कहा गया जो गणधर देवों ने गूँथा।भक्ति सहित श्रुतज्ञान महोदधि को मैं नमस्कार करता।।5।।

अर्घ्यॐ ह्रीं उपाध्यायपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

साधु परमेष्ठी के लिए अर्घ्य

साधु परमेष्ठी

पीठिका

वीरछन्द

निज-स्वभाव के साधन हेतु सर्वारम्भ परिग्रह त्याग।तिलतुष मात्र संग नहिं जिनके, मात्र आत्महित का अनुराग।।पंचेन्द्रिय-विस्तार रहित तन-मात्र परिग्रह शेष रहा।बीस-आठ गुणधारी गुरुपद-पंकज में मम चित्त अहा।।1. दशभक्ति में समागत श्रुत-भक्ति का पद्यानुवाद

दोहा

चलते फिरते सिद्ध-सम परम पूज्य मुनिराज।रत्नत्रय साधक अहो ! पावें निज पद राज।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)

हरिगीतिका

भाव एवं द्रव्य-हिंसा त्याग सकल-मृषा तजें।अचौर्य व्रतधारी-महा गुण शील भूषण शोभते।।चौबीस परिग्रह-भार तज विचरें सदा निर्भार हो।इन महाव्रतधारी गुरु को वन्दना शत बार हो।।

अर्घ्यॐ ह्रीं पंचमहाव्रत-विभूषित-साधुपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जीव-रक्षा हेतु गुरुवर समिति ईर्या पालते।हित-मित-वचन प्रिय कहें अरु निर्दोष ही आहार लें।।आदान-निक्षेपण समिति अरु प्रतिष्ठापन पालते।पाँचों समिति भूषित गुरु मम ध्यान में विचरण करें।।

अर्घ्यॐ ह्रीं पंचसमिति-विभूषित-साधुपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

पंच इन्द्रिय विषय-विष भी मधुर भासें मूढ़ को।सुख अतीन्द्रिय को भूल इनमें ही सदा मदमस्त हो।।किन्तु गुरु आनंदमय चैतन्य रस के पान में -ही मस्त रहते हैं सदा वे नित बसें मम ध्यान में।।

अर्घ्यॐ ह्रीं पंचेन्द्रियविजयगुण-विभूषित-साधुपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

साम्य-रस पीते सदा वन्दन करें जिनराज को।संस्तवन कर श्रुत-रत रहें अरु दोष का परित्याग हो।।

ममता तजें तन की अहो चैतन्य की आराधना।करते सदा हे गुरु ! मुझे हो आप-सम ही साधना।।

अर्घ्यॐ ह्रीं षडावश्यकगुण-विभूषित-साधुपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

आहार लें इक बार थोड़ा खड़े हो मुनिराजजी।स्नान एवं दन्त-धोवन नहि करें, भू-शयन ही।।जन्मते शिशु-सम रहें निर्वस्त्र लुंचन केश का।।गुरु आपकी यह साधना है धन्य पथ निर्ग्रन्थ का।।

अर्घ्यॐ ह्रीं शेषसप्तगुणालंकृत-साधुपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

विशेषार्घ्य¹

वीरछन्द

जो भव-दुख से डरते हैं अरु अविनाशी सुख को चाहें।पाप शान्त हैं निर्मल मति हैं शीघ्र मुक्ति सुख को पावें ।।वे तेजस्वी प्राणी धारें जिन-भाषित चारित्र महान्।मोक्ष-महल में जाने हेतु जो विशाल अनुपम सोपान।।1।।

हरिगीतिका

सर्व-वेदी वीर-जिन द्वारा कहा यह धर्म है।लोकत्रय के सर्व जीवों को सुहित का मर्म है।।2।।घातिकर्म-विनाशकर्ता, घातिकर्म-विनाश को।चारित्र पाँच प्रकार कहते भव्य जीवों को अहो।।3।।चारित्र-सामायिक कहा अरु छेद-पद-स्थापना।परिहार-शुद्धि और सूक्षम-साम्पराय सुबुध कहा।।4।।1. दशभक्ति में समागत चारित्र-भक्ति का पद्यानुवाद

चारित्र पंचम यथाख्यात तथाख्यात कहें इसे।यह पाँच विध चारित्र मंगल पाप-शोधक भी कहें।।5।।अहिंसादिक पाँच भेद कहें जिनेश्वर व्रत-महा।पाँच समिति पाँच इन्द्रिय का सुनिग्रह भी कहा।।6।।षडावश्यक भू-शयन अस्नान एवं नग्नता।खड़े हो इक बार लें आहार, दन्त न धोवना।।7।।केश-लोंच करें कहे ये मूलगुण अठबीस हैं।धर्म-दश त्रय-गुप्ति एवं शील उत्तर गुण कहे।।8।।बाईस परिषह-जयादिक उत्तर कहे गुण साधु के।अन्य विविध प्रकार सहकारी कहे गुण-मूल के।।9।।यदि राग-द्वेष-विमोह से हो हानि गुण समुदाय में।वन्दना कर सिद्ध की परिहार हो उस दोष का।।10।।सर्व संयम-धर मुमुक्षु दोष के परित्याग से।मोक्ष-सुख पायें त्वरित वे सकल संयम सिद्धि से।।11।।संयम अहिंसा और तपमय धर्म मंगल श्रेष्ठ है।इस धर्म में जो मन लगाये देव भी उसको नमें।।12।।

अर्घ्यॐ ह्रीं साधुपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

महार्घ्य व जयमाला

महार्घ्य

वीरछन्द

जो त्रिभुवन के गुरु हैं जिनने चार घाति का किया विनाश।जिनका ज्ञान त्रिलोक-भवन के सकल पदार्थों का आवास।।1।।एक वही साक्षात् देव हैं उन्हें बन्ध संसार नहीं।उन्हें नहीं है कोई मूर्च्छा और न कोइ विभाव कहीं।।2।।सचमुच इन जिन भगवन्तों में धर्म-कर्म का नहीं प्रपंच।वीतरागमय सदा विराजित अतः अतुल हैं महिमावन्त।।3।।

निज-सुख में हैं लीन सदा वे, शोभावन्त श्री भगवान्।ज्ञान-ज्योति से पूर्ण लोक में छाये मुक्ति-वधू के नाथ।।4।।घाति कर्म चौ' नष्ट हुए हैं दर्शन ज्ञान वीर्य सुखरूप।शुभ तन स्थित शुद्ध आत्मा चिन्तनीय अरहन्त स्वरूप।।5।।अष्टकर्म तन-रहित जानते और देखते लोकालोक।लोक शिखरथित पुरुषाकार आत्मा सिद्ध, ध्यान के योग्य।।6।।दर्शन ज्ञान प्रधान वीर्य तप चारित पंचाचारों में।निज-पर को संयुक्त करें वे मुनि आचार्य ध्यान के योग्य।।7।।जो रत्नत्रय युक्त सदा धर्मोपदेश में लीन रहें।वे आत्मा हैं उपाध्याय यतिश्रेष्ठ उन्हें हम नमन करें।।8।।दर्शन ज्ञान सहित जो मुक्ति-मार्गरूप चारित्र अहो।नित्य शुद्ध है उसे साधते वे मुनि साधु नमूँ उनको।।9।।

दोहा

अर्हत् सिद्धाचार्य अरु उपाध्याय मुनिराज।परिणति है शुद्धात्म की तीन भुवन सरताज।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अरहन्त-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधु-पंच- परमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

वीरछन्द

वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर हित उपदेशी आप्त महान्।दर्श ज्ञान सुख वीर्य अनन्त चतुष्टय भूषित हैं भगवान्।।मोक्षमार्ग के नेता जिनवर स्याद्वाद विद्या दाता।इच्छा रहित दिव्यध्वनि खिरती भविजन पर उपकार महान्।।1।।

द्रव्य भाव नोकर्म रहित हे सिद्धालय वासी भगवान्।आतम को प्रतिबिम्बित करते शाश्वत स्वयं सिद्ध गुणखान।।हे शाश्वत सुख के भोगी तुम योगी योग रहित निजधाम।हे शुद्धात्म विलासी ज्ञायक के प्रतिभासी सिद्ध महान्।।2।।गुण छत्तीस सुपालक गुरु तुम साधु संघ के शरणागार।द्वादश तप दश धर्म गुप्ति आवश्यक एवं पंचाचार।।हे चैतन्य विहारी गुरुवर ! करते चिदानन्द रसपान।शाश्वत सुखमय वचन प्रदाता गुरुवर बारम्बार प्रणाम।।3।।द्वादशांग का सार निजातम-बोध विभूषित हे गुणखान।गुण पच्चीस सुशोभित पूर्ण द्रव्य श्रुतधारी गुरु महान्।।स्याद्वादनय सप्तभंगमय अनेकान्तमय वस्तुस्वभाव।व्यय उत्पाद ध्रौव्य उद्घोषक आराधक निजज्ञायक भाव।।4।।निज स्वभाव साधनरत साधु परम दिगम्बर वनवासी।तीन कषाय चौकड़ी विरहित निज परिणति के अभिलाषी ।।सहज मूलगुण अट्ठाइसमय सर्वारम्भ परिग्रह-त्याग।पावन-पद में सादर वन्दन रागमात्र अभिलाषा त्याग।।5।।

दोहा

शिव-पथ दर्शायक प्रभो! अर्घ्य समर्पित आज।पंच परम गुरु चरण में, पाऊँ निज-पद राज।।6।।

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री अरहन्त-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधुपंचपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दोहा

पाँचों परमेष्ठी प्रभो! पंचम गति दातार।पंचम भाव सम्हारिकैं, होऊँ भव से पार।।7।।(इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्)

॥ जय जिनेन्द्र ॥