जिनेन्द्र वाणी

कल्याण मन्दिर स्तोत्र विधान

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी · विधान पूजा

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अभिषेक विधि

मंगलाष्टक-स्तोत्र

हिन्दी अनुवाद- मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

श्री मन्नम्र सुरा-सुरेन्द्र मुकुट - प्रद्योत - रत्नप्रभा,भास्वत् पाद-नखेन्दवः प्रवचनाम् भोधीन्दवः स्थायिनः।ये सर्वे जिनसिद्ध-सूर्यनुगतास् ते पाठकाः साधवः,स्तुत्या योगिजनैश्च पंच गुरवः कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 1॥

जिनके चरण कमल के नख सब, राशि सम उज्ज्वल चमक रहे,देव असुर मुकुटों की मणियों, से शोभित हो विलस रहे।वे अरिहन्त सिद्ध आचारज, पाठक मुनि अविकारी हो,पंच परम परमेष्ठी प्रतिदिन, हमको मंगलकारी हो ॥ 1 ॥

सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तममलं रत्नत्रयं पावनं,मुक्ति-श्री-नगराधिनाथ-जिनपत् - युक्तोऽपवर्गप्रदः।धर्मः सूक्ति-सुधा च चैत्यमखिलं चैत्यालयं श्रयालयं,प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 2॥

सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण, निर्मल रत्नत्रय पावन है,मोक्षप्रदायी यही धर्म है, मुक्तिपुरी का साधन है।जिनआगम जिनप्रतिमा जिनवर, के आलय अघकारी हों,पंच परम परमेष्ठी प्रतिदिन, हमको मंगलकारी हो ॥ 2 ॥

नाभेयादिजिनाः प्रशस्त-वदनाः ख्याताश्चतुर्विंशतिः,श्रीमन्तो भरतेश्वर-प्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश।ये विष्णु-प्रतिविष्णु - लांगलधराः सप्तोत्तरा विंशतिस् ,त्रैकाल्ये प्रथि-तास्त्रि-षष्टि-पुरुषाः कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 3॥

ऋषभदेव से महावीर तक, तीर्थंकर चौबीस महा,बारह चक्री नौ नारायण, प्रतिनारायण नवक रहा।नौ बलभद्र जगत् विख्यात, पुरुष शलाका इन्हें कहो,त्रेसठ ये सब महापुरुष भी, हमको मंगलकारी हो ॥ 3 ॥

ये सर्वौषधि-ऋद्धयः सुतपसां, वृद्धिंगताः पंच ये ,ये चाष्टांग महानिमित्त कुशलाश् चाष्टौ वियच्चारिणः।पंच ज्ञानधरास् त्रयोऽपि बलिनो, ये बुद्धि ऋद्धीश्वराः ,सप्तैते सकलार्चिता मुनिवराः कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 4॥

सर्वौषधि ऋद्धिधारी मुनि, तप ऋद्धि के भी धारक,क्रिया विक्रिया चारण ऋद्धि, बुद्धि ऋद्धि के भी साधक।तप ऋद्धि भी बल ऋद्धि भी, रस ऋद्धि शिवकारी हो,सप्त ऋद्धियों से शोभित मुनि, हमको मंगलकारी हो॥ 4॥

ज्योतिर्व्यन्तर भावनामरगृहे मेरौ कुलाद्रौ स्थिताः,जम्बू शाल्मलि-चैत्य-शाखिषु तथा वक्षार रूप्याद्रिषु।इष्वाकार-गिरौ च कुण्डल-नगे द्वीपे च नंदीश्वरे,शैले ये मनुजोत्तरे जिन-गृहाः कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 5॥

ज्योतिष व्यन्तर भवनवासियों, वैमानिक आवासों में,मेरु कुलाचल चैत्य वृक्ष, वृक्षारों रूप्याचल में।इष्वाकार मानुषोत्तर हो, तेरह अठ गिरिधारी हो,अकृत्रिम सब चैत्यालय भी, हमको मंगलकारी हो ॥ 5 ॥

कैलाशे वृषभस्य निर्वृतिमही वीरस्य पावापुरे,चम्पायां वसुपूज्य सज्जिनपतेः सम्मेदशैलेऽर्हताम्।शेषाणामपि चोर्जयन्त शिखरे नेमीश्वर - स्यार्हतो,निर्वाणावनयः प्रसिद्ध विभवाः कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 6॥

अष्टापद से ऋषभदेव जी, महावीर पावापुर से,गिरनारी से नेमिप्रभु जी, वासुपूज्य चम्पापुर से।शेष बीस तीर्थंकर श्रीजी, गिरि सम्मेद विहारी हो,मोक्षभूमियाँ चौबीसों की, हमको मंगलकारी हो ॥ 6 ॥

सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्प दामायते,सम्पद्येत रसायनं विषमपि प्रीतिं विधत्ते रिपुः।देवा यान्ति वशं प्रसन्न - मनसः, किं वा बहु ब्रूमहे,धर्मादेव नभोऽपि वर्षति नगैः कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 7॥

सर्प हार बन जाये माला, असि विष अमृत बनता,शत्रु मित्र सा प्रेमी बनता, देव स्वयं वश होता है।बहुत कहें क्या रत्न वृष्टि भी, नभ से नित सुखकारी हो,जैन धर्म का है प्रभाव वह, हमको मंगलकारी हो ॥ 7 ॥

यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो,यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो यः केवलज्ञानभाक्।यः कैवल्यपुर - प्रवेश - महिमा सम्पादितः स्वर्गिभिः,कल्याणानि च तानि पंच सततं कुर्वन्तु ते मंगलं॥ 8॥

कल्याणक जो गर्भ समय पर, जन्म समय तीर्थंकर के,दीक्षा ज्ञान महा कल्याणक, सुर नर पूजित पद जिनके।देवों द्वारा मोक्ष समय की, पूजा विस्मयकारी हो,पाँचों कल्याणक श्री जिन के, हमको मंगलकारी हो ॥ 8 ॥

इत्थं श्री-जिन-मंगलाष्टकमिदं सौभाग्य-सम्पत्करं,कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस् तीर्थंकराणामुषः।ये शृण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनै र्धर्मार्थ कामान्विता,लक्ष्मीराश्रयते व्यपाय-रहिता निर्वाण लक्ष्मीरपि॥ 9॥

इस प्रकार सौभाग्य प्रदायी, मंगल अष्टक जो पढ़ता,कल्याणक पूजा विधान के, अवसर पर भी है पढ़ता।अरु प्रभात में सुनता भी जो, धर्म अर्थ कामान्वित हो,मोक्षपुरी को गमन करे वह, सबको मंगलकारी हो ॥ 9 ॥

॥ इति श्री मंगलाष्टक स्तोत्रं समाप्तम्॥

निर्ग्रन्थोनिरतात्मसौख्य-निलयो, मुक्त्यातुरस्तारकस्।तीर्थोद्धारक! वीतकामकलहो, विज्ञोऽपि गोरक्षकः॥

सन्मार्गं हृदि शान्तितो नयति यो, भव्यांश्च मुक्तिश्रिये।विद्यासागर पूज्यपाद कमलं, संस्थाप्य संपूजये॥

विधान प्रारम्भ करने हेतु मंत्रोच्चार विधि

जल शुद्धि

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूँ ह्रौं ह्रः नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पद्म महापद्म तिगिंच्छ केसरि पुण्डरीक महापुण्डरीक गंगा सिन्धु रोहिद्रो-हितास्या हरिद्धरिकान्ता सीता सीतोदा नारी नरकान्ता सुवर्णकूला रूप्यकूला रक्ता रक्तोदा क्षीराम्भोनिधि शुद्ध जलं सुवर्ण घटं प्रक्षालित परिपूरितं नवरत्न गंधाक्षत पुष्पार्चित ममोदकं पवित्रं

कुरु कुरु झ्रं झ्रं झ्रौं झ्रौं वं वं मं मं हं हं क्षं क्षं लं लं पं पं द्रां द्रां द्रीं द्रीं हं सः स्वाहा।

हस्त प्रक्षालन

ॐ ह्रीं असुजर सुजर भव स्वाहा हस्त प्रक्षालनं करोमि। (अमृत स्नान) ( अंजुली में जल लेकर शरीर पर छिड़के )

ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय सं हं झ्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा।

तिलक मन्त्र

( नव तिलक करें - शिखा मस्तक ग्रीवा, हृदय, दोनों भुजायें, पीठ, कान,नाभि, हाथ)

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूँ ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा नमः (मम/यजमानस्य) सर्वांगशुद्धि हेतवः नव तिलकं करोम्यहम्।

अभिषेक विधि

आचार्य श्री माघनन्दि जी कृत

( हिन्दी अनुवाद - मुनि श्री प्रणम्यसागर जी )श्रीमन्-नता-मर-शिरस्तट-रत्न-दीप्ति,तोयाव-भासि-चरणाम्बुज-युग्म-मीशम्।अर्हन्त-मुन्नत-पद-प्रद-माभि-नम्य,तन्मूर्ति-षूद्य-दभिषेक-विधिं-करिष्ये 1॥

नित्य नम्र सुर सिर मुकुटों की, रत्न दीप्ति से दीपित हैं,जिनके चरण कमल जल जैसे, तरल प्रकाशित पूजित हैं।शिवपद दायी अरिहन्तों को, याद करूँ जिनरूप वरूँ,उनकी ही जिन प्रतिमाओं का मंगल श्री अभिषेक करूँ॥ 1॥

(प्रातःकालीन देव वन्दना में पूर्व आचार्यों के अनुक्रम से समस्त कर्मों के क्षयके लिए भाव पूजा, स्तवन, वन्दना सहित श्री पंच महागुरु भक्ति का मैंकायोत्सर्ग करता हूँ। )(एक कायोत्सर्ग अर्थात् नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें। )

अभिषेक प्रतिज्ञा

याः कृत्रिमास् तदितराः प्रतिमा जिनस्य,संस्नापयन्ति पुरुहूत-मुखा-दयस्ताः।सद्भाव-लब्धि-समयादि-निमित्त योगात्,तत्रैव-मुज्ज्वल-धिया कुसुमं क्षिपामि॥ 2॥

जन्मोत्सवादि समयेषु यदीय कीर्ति,सेन्द्राः सुराप्त मदवा रणगाः स्तुवन्ति।तस्याग्रतो जिनपतेः परया विशुद्धया,पुष्पाजंलिं मलय जात मुपाक्षिपेऽहम्॥ 3॥

कृत्रिम अकृत्रिम जिन प्रतिमा, जिनवर की हैं जहाँ कहीं,मुख्य इन्द्र से उनकी होती, नितप्रति ही अभिषेक विधि।अहो परम सौभाग्य हमारा, काल लब्धि वश से आया,पुष्पांजलि क्षेपण करने को, जिनवर निकट चला आया॥ 2.3॥

(पुष्पांजलिं क्षिपामि)

श्रीकार लेखन

श्रीपीठ क्लृप्ते विशदाक्ष तौघैः,श्रीप्रस्तरे पूर्ण-शशांक-कल्पे।श्रीवर्तके चन्द्र-मसीति वार्तां,सत्यापयन्तीं श्रियमा लिखामि॥ 4॥

तीन जगत् में पावन पर्वत, जो सुमेरु हैं शाश्वत हैं,उसके पाण्डुक वन में देखो, रखी शिला भी पाण्डुक है।अक्षत सो वह शशि सम शोभे, जिनवर कारण श्रीयुत जो,उस पर श्री लिखकर के मन में, करूँ प्रतिज्ञा विधि युत हो॥ 4॥

ॐ ह्रीं श्रीकार लेखनं करोमि। (पीठ स्थापना) कनकादि निभं कम्रं, पावनं पुण्य कारणम्। स्थापयामि परं पीठं, जिन-स्नपनाय भक्तितः॥ 5॥

स्वर्ण रजत उत्तम धातु का, जो पावन सिंहासन है,अधर विराजे श्रीजिन फिर भी, नाम धरे सिंहासन है।वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, थाप रहा उस आसन पे,श्री जिनवर प्रतिमा जी को मैं, लाॐगा सिर आसन पे॥5॥

ॐ ह्रीं श्रीपीठ स्थापनं करोमि। (अभिषेक हेतु प्रतिमा स्थापना) भृंगार-चामर-सुदर्पण-पीठ-कुम्भ, ताल-ध्वजा-तप-निवारक-भूषिताग्रे।

वर्धस्व-नन्द जय-पाठ पदा-वलीभिः,सिंहासने जिन भवन्त-महं श्रयामि॥ 6॥

वृषभादि सुवीरान्तान् जन्मातौ जिष्णु चर्चितान्।स्थापयाम्य-भिषेकाय भक्त्या पीठे महोत्सवम्॥

चामर दर्पण आसन कलशा, झारी मंगल द्रव्य रहे,ध्वजा वीजना तथा छत्र भी, आसन आगे शोभ रहे।जयवन्तों जिनदेव सदा ही, जय-जयकार करो उर धार,सिंहासन पर आप पधारो, पाप कर्म का कम हो भार॥ 6॥

ॐ ह्रीं श्री धर्म तीर्थादिनाथ भगवन्निह पाण्डुक शिला पीठे सिंहासने तिष्ठ तिष्ठ। (कलश स्थापना) श्रीतीर्थ कृत्स्न-पन-वर्य, विधौ सुरेन्द्रः, क्षीराब्धि-वारिभि-रपूरय-दुग्ध कुम्भान्।

याँस्ता-दृशा-निव विभाव्य यथा र्हणीयान् ,संस्थापये कुसुम-चन्दन-भूषि-ताग्रान्॥ 7॥

शात कुम्भीय कुम्भौघान्, क्षीराब्धेस् तोय पूरितान्।स्थापयामि जिन स्नान, चन्दनादि सु चर्चितान्॥ 8॥

श्री जिन के जन्माभिषेक की, विधि हुई जो देवों से,वैसी ही प्रतिमाभिषेक विधि, वैभव भक्ति भावों से।स्वर्ण कलश में क्षीरोदधि का, प्रासुक जल लेकर आया,चन्दन केसर कुसुम विभूषित, चार कलश में भर लाया॥ 7.8॥

ॐ ह्रीं अर्हं चतुः कोणेषु चतुः कलश स्थापनं करोमि। (अर्घ्य) आनन्द-निर्भर-सुर-प्रमदादि-गानै, र्वादित्र-पूर-जय-शब्द-कल-प्रशस्तैः॥

उद्गीय-मान-जगतीपति कीर्ति मेनां,पीठस्थलीं वसु-विधार्चन-योल्लसामि॥ 9॥

आनन्दित हो सुर खचरी भी वनिता करतीं मंगलगान,वादित्रों जय-जय तालों से, सब करते जिनवर सम्मान।पुण्यफला अरिहन्ता की यह, पुण्य कीर्ति का महाप्रभाव,वसु-विधि अर्घ्य समर्पित जिनवर, बना रहे पूजन का भाव॥ 9॥

अर्घ्यॐ ह्रीं स्नपनपीठ स्थिताय जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अभिषेक

कर्म-प्रबन्ध-निगडै-रपि हीन-ताप्तं,ज्ञात्वापि भक्ति-वशतः परमादि-देवम्।त्वां स्वीय-कल्मष-गणोन्मथ-नाय देव।शुद्धोदकै-रभि-नयामि महा-भिषेकम्॥ 10॥

कर्म बन्ध से रहित आप हो, परम शुद्ध बाहर भीतर,जान रहा हूँ फिर भी प्रभुवर, भक्ति भाव से होकर तर।अपने मन का कालुष धोने, आप्त देव का न्हवन करूँ,भाव शुद्धि से शुद्ध उदक से, निज-उर जिनवर छवि धरूँ॥ 10॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं एें अर्हं वं मं हं हं सं सं तं तं पं पं वं वं हं हं सं सं तं तं पं पं झं झं क्षीं क्षीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्र-तर-जलेन जिन-मभिषेचयामीति स्वाहा।

तीर्थोत्तम-भवै-र्नीरैः, क्षीर-वारिधि-रूपकैः।स्नपयामि सुजन्माप्तान् , जिनान् सर्वार्थ सिद्धि दान्॥ 11॥

(निम्न मंत्र पढ़ते हुए सभी लोग अभिषेक कर‘ं)

ॐ ह्रीं श्रीं वृषभादिवीरान्तान् जलेन स्नपयामि स्वाहा।

अभिषेक पश्चात् अर्घ्य

पानीय-चन्दन- सदक्षत-पुष्प-पुंज,नैवेद्य-दीपक-सुधूप- फल-ब्रजेन।कर्माष्टक-क्रथन-वीर- मनन्त-शक्तिं,सम्पूजयामि महसा महसां निधानम्॥ 12॥

जल चन्दन अक्षत पुष्पों का, चरुवर दीप धूप फल ले,आठों का इक अर्घ्य बनाकर, जिनवर सम्मुख कर-कर ले।अष्ट कर्म से रहित बनूँ मैं, और बनूँ तुम सम भगवान्,यही भाव से अर्घ्य चढ़ाता, शीघ्र मिले जिनगुण की खान॥ 12॥

अर्घ्यॐ ह्रीं अभिषेकान्ते वृषभादि महावीरान्तेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जिनबिम्ब परिमार्जन

हे तीर्थपा निज यशो धवली कृताशाः,सिद्धौष धाश्च भव-दुःख महा-गदानाम्।सद् भव्य हृज्जनित पंक कबन्ध कल्पा,यूयं जिनाः सतत शान्तिकरा भवन्तु ॥13॥

नत्वा मुहु-र्निज-करै-रमृतोप-मेयैः,स्वच्छै-र्जिनेन्द्र तव चन्द्र करा वदातैः।शुद्धां-शुकेन विमलेन नितान्त-रम्ये,देहे स्थितान् जल-कणान् परिमार्जयामि॥ 14॥

जिन बिम्बों का वस्त्र से, परिमार्जन आनन्द।कौन कह सके धरा पर, कितना पुण्य प्रबन्ध॥

जिन प्रतिमा जिन सारखी, करो नित्य तुम ध्यान,हुआ होएगा इसी से, आतम का कल्याण॥ 13.14॥

ॐ ह्रीं अमलां शुकेन जिन-बिम्ब परिमार्जनं करोमि। (अभिषेक स्तुति) हमने प्रभुजी के चरण पखारे॥ टेक ॥ जनम जनम के संचित पातक, तत्क्षण ही निरवारे॥ हमने.....

प्रासुक जल के कलश श्रीजिन, प्रतिमा ऊपर ढारे॥ हमने.....वीतराग अरहंत देव के, गूँजे जय जयकारे॥ हमने.....चरणाम्बुज स्पर्श करत ही, छाये हर्ष अपारे॥ हमने.....पावन तन मन नयन भये सब, दूर भये अँधियारे॥ हमने.....

पुनः जिनबिम्ब यथास्थान विराजमान करना

स्नानं विधाय भवतोऽष्ट, सहस्र नाम्ना-मुच्चारणेन मनसो वचसो विशुद्धिम्।जिघृक्षु-रिष्टि-मिन तेऽष्ट तयीं विधातु ं,सिंहासने विधि वदत्र निवेशयामि॥ 15॥

धन्य हुआ मैं आज जिनेश्वर, करके पावन श्री अभिषेक,एक हजार आठ नामों से, उच्चारण करता सविशेष।मन वच तन की शुद्धि संभाले, अठ विधि पूजा करने आज,सिंहासन पर पुनः आपको, संस्थापित करता जिनराज॥ 15॥

ॐ ह्रीं श्री सिंहासन पीठे जिन-बिम्बं स्थापयामि। (जिनबिम्ब स्थापना का अर्घ्य) जल गंधाक्षतैः पुष्पैश्, चरु दीप सु धूपकैः। फलै र्रघै र्जिन मर्चेज्, जन्म दुःखा पहानये॥ 16॥

जल चन्दन अक्षत तथा पुष्प चरु औ दीप।धूप फलों के अर्घ्य से, जिन चरणों के समीप ॥ 16॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री पीठ स्थित जिनाय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जिन गन्धोदक धारण करना

नत्वा परीत्य निज नेत्र ललाट योश्च।व्यातु क्षणेन हरता, दघ संचयं मे ॥

शुद्धोदकं जिनपते तव पाद योगाद्।भूयाद् भवा तपहरं, घृत मादरेण ॥ 17॥

मुक्ति श्री वनिता करोदक मिदं, पुण्याङ् कुरोत्पादकं।नागेन्द्र त्रिदशेन्द्र चक्र पदवी, राज्याभिषे कोदकम्॥

सम्यग्ज्ञान चरित्र दर्शन लता, संवृद्धि सम्पादकं।कीर्ति श्री जय साधकं तव जिन, स्नानस्य गन्धोदकम्॥18॥

अति सुगन्धित जिन देह से, संस्पर्शित जल जान।जिन गंधोदक सिर धरूँ, धन्य बना दिन-मान॥ 17.18॥

ॐ ह्रीं श्री जिन गन्धोदकं स्व नेत्र ललाटे धारयामि। इमे नेत्रे जाते, सुकृत जल सिक्ते सफलिते। ममेदं मानुष्यं, कृति जनगणा देयम भवत्॥ मदीयाद् भल्लाटा दशुभतर कर्माटन मभूत्।

सदेदृक् पुण्याह र्मम, भवतु ते पूजन विधौ॥ 19॥

(पुष्पांजलिं क्षिपामि।)

शांतिधारा

ॐ नमः सिद्धेभ्यः, ॐ नमः सिद्धेभ्यः, ऊँ नमः सिद्धेभ्यः। श्री वीतरागायनमः। श्री जिनशासनाय नमः। श्री अनेकान्त धर्माय नमः। अरिहंता मंगलंभवतु सिद्धा मंगलं भवतु साहु मंगलं भवतु आर्हतधर्मो मंगलं भवतु।

ॐ नमोर्हते भगवते श्री मते श्री (मंदिर के मूलनायक भगवान का नाम) ऋषभनाथ तीर्थंकराय, समवशरण शोभिताय, द्वादशगण-परिवेष्टिताय, परमौदारिक शरीर पवित्राय, अनन्त चतुष्य सहिताय, शुद्धज्ञान चेतनाय, ऋषि-आर्यिका-श्रावक-श्राविका प्रमुख चतुःसंघोपसर्ग हराय श्री शान्तिनाथाय

घातिकर्म रहिता, अघातिकर्म रहिताय, अपवादभयं अपहर-अपहर,अकालमृत्युं अपहर-अपहर, अतिकामं अपहर-अपहर, क्रोधादिकषायंअपहर-अपहर, अग्निवायुभयं अपहर-अपहर, देव-मनुष्य-तिर्यंक्कृतोपसर्गं अपहर-अपहर, प्राकृतिकोपसर्गं अपहर-अपहर, सर्वदुष्टभयंअपहर-अपहर, सर्वक्रूर रोगं अपहर-अपहर, सर्व शूलरोगं अपहर-अपहर,सर्व कुष्ठरोगं अपहर-अपहर, सर्वपशुरोगं अपहर-अपहर, सर्व वृक्षपुष्परोगंअपहर-अपहर,भूकम्पभयं अपहर-अपहर, अतिवृष्टिभयं अपहर-अपहर,अनावृष्टिभयं अपहर-अपहर, सर्वदुर्भिक्षभयं अपहर-अपहर,

सर्वोदरमस्तक व्याधिं अपहर-अपहर, सर्वांगव्याधिं अपहर-अपहर,व्यन्तरादिबाधां अपहर-अपहर, सर्वासाता वेदनायं अपहर-अपहर,सर्वकर्मरोगं अपहर-अपहर,।हे पार्श्व तीर्थनाथ! सर्वेषां (शांतिधारा कर्त्ता का नाम) शातिं कुरू-कुरू सर्वजनानन्दनं कुरू-कुरू, सर्व भव्यानन्दनं कुरू-कुरू, सर्वगोकुलानन्दनं कुरू-कुरू, सर्व लोकानन्दनं कुरू-कुरू। श्री वर्धमान भगवन्!सर्वेषांस्वस्तिरस्तु, कल्याणमस्तु, जयोस्तु, दीर्घायुरस्तु, वीरवंशवृद्धिरस्तु,एेश्वर्याभिवृद्धिरस्तु।

ॐ ह्रीं श्री सिद्धपरमेष्ठिने श्री ऋषभ-अजित-चन्द्रप्रभ-वासुपूज्य- शांतिनाथ-मुनिसुव्रतनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-वर्धमानस्वामिने चतुःषष्टिऋद्धिसमन्वितमुनये अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधु-जिनधर्म- जिनागम-जिनचैत्य जिनचैत्यालय नवदेवताभ्यो नमः।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं एें अर्हं अ सि आ उ सा अनाहत विद्यायै णमो अरहंताणं ह्रौं सर्व विघ्न शान्तिं जिनशासन प्रभावनां कुरू-कुरू। (9 बार मंत्र पढ़ें) सम्पूजकानां प्रतिपालकानमां यतीन्द्र सामान्य तपोधनानां।

देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु शान्तिं भगवान् जिनेन्द्रः।।

नित्य पूजन

विनय पाठ

इह विधि ठाड़ो होय के, प्रथम पढ़े जो पाठ।धन्य जिनेश्वर देव तुम, नाशे कर्म जु आठ॥ 1॥

अनन्त चतुष्टय के धनी, तुम ही हो सिरताज।मुक्तिवधु के कंत तुम, तीन भुवन के राज॥ 2॥

तिहुँ जग की पीड़ा हरन, भवदधि शोषणहार।ज्ञायक हो तुम विश्व के, शिवसुख के करतार॥ 3॥

हरता अघ अंधियार के, करता धर्म-प्रकाश।थिरता-पद दातार हो, धरता निजगुण रास॥ 4॥

धर्मामृत उर जलधि सों, ज्ञानभानु तुम रूप।तुमरे चरण-सरोज को, नावत तिहुँ-जग-भूप॥ 5॥

मैं वन्दौं जिनदेव को, कर अति निर्मल भाव।कर्म-बन्ध के छेदने, और न कछु उपाव॥ 6॥

भविजन को भव-कूप तैं, तुम ही काढ़नहार।दीन-दयाल अनाथपति, आतम गुण भण्डार॥ 7॥

चिदानन्द निर्मल कियो, धोय कर्म-रज मैल।सरल करी या जगत में, भविजन को शिव-गैल॥ 8॥

तुम पद-पंकज पूजतैं , विघ्न-रोग टर जाय।शत्रु मित्रता को धरैं, विष निरविषता थाय॥ 9॥

चक्री खगधर इन्द्र पद, मिलैं आपतैं आप।अनुक्रम करि शिवपद लहैं, नेम सकल हनि पाप॥ 10॥

तुम बिन मैं व्याकुल भयो, जैसे जल बिन मीन।जन्म जरा मेरी हरो, करो मोहि स्वाधीन॥ 11॥

पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेव।अंजन से तारे कुधी, जय जय जय जिनदेव॥ 12॥

थकी नाव भवदधि विषैं, तुम प्रभु पार करेय।खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव॥ 13॥

राग सहित जग में रूल्यो, मिले सरागी देव।वीतराग भेंट्यो अबै, मेटो राग कुटेव॥ 14॥

कित निगोद कित नारकी, कित तिर्यंच अज्ञान।आज धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर थान॥ 15॥

तुमको पूजैं सुरपति, अहिपति नरपति देव।धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेव॥ 16॥

अशरण के तुम शरण हो , निराधार आधार।मैं डूबत भव सिन्धु में, खेव लगाओ पार॥ 17॥

इन्द्रादिक गणपति थके, कर विनती भगवान्।अपनो विरद निहारिकैं, कीजे आप समान॥18॥

तुम्हरी नेक सुदृष्टि तैं, जग उतरत है पार ।हा! हा! डूब्यो जात हों, नेक निहार निकार॥ 19॥

जो मैं कहहूँ और सो, तो न मिटैं उरझार।मेरी तो तोसों बनी, यातैं करौं पुकार॥ 20॥

वन्दों पाँचों परमगुरु, सुरगुरु वंदत जास।विघनहरन मंगलकरन, पूरन परम प्रकाश॥ 21॥

चौबीसों जिनपद नमों, नमों शारदा माय।शिवमग साधक साधु नमि, रच्यों पाठ सुखदाय॥ 22॥

मंगल पाठ

मंगल मूर्ति परम पद, पंच धरो नित ध्यान।हरो अमंगल विश्व का, मंगलमय भगवान्॥ 23॥

मंगल जिनवर पद नमों, मंगल अरहंत देव।मंगलकारी सिद्धपद, सो वन्दों स्वयमेव॥ 24॥

मंगल आचारज मुनि, मंगल गुरु उवझाय।सर्व साधु मंगल करो, वन्दों मन-वच-काय॥ 25॥

मंगल सरस्वती मात का, मंगल जिनवर धर्म।मंगलमय मंगलकरण, हरो असाता कर्म॥ 26॥

या विधि मंगल करनतें, जग में मंगल होत।मंगल “नाथूराम” यह, भवसागर दृढ़ पोत॥ 27॥

अथ् पौर्वाह्निक (मध्याह्निक-आपराह्निक) देव वन्दनायां पूर्वाचार्या -नुक्रमेणसकल कर्म-क्षयार्थं, भावपूजा वन्दनास्तव, समेतं श्री पंच महागुरु भक्ति कायोत्सर्गंकरोम्यहम् । तावकायं पावकम्मं दुच्चरियं वोस्सरामि।(नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें एवं आकुलता न करें)

पूजा पीठिका

ॐ जय जय जय। नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु। णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं॥

ॐ ह्रीं अनादि मूल मन्त्रेभ्यो नमः। ( पुष्पांजलिं क्षिपामि ) चत्तारि मंगलं, अरिहन्त मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहू मंगलं, केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहन्त लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा,

केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहन्त सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणंपव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलि पण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।

ॐ नमोऽर्हते स्वाहा। ( पुष्पांजलिं क्षिपामि ) अपवित्रः पवित्रो वा, सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा। ध्यायेत्पंच-नमस्कारं, सर्व-पापैः प्रमुच्यते॥ 1॥ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

यः स्मरेत्परमात्मानं, स बाह्याभ्यन्तरे शुचिः॥ 2॥

अपराजित-मन्त्रोऽयं सर्व-विघ्न विनाशनः।मंगलेषु च सर्वेषु , प्रथमं मंगलं मतः॥ 3॥

एसो पंच णमोयारो, सव्व-पावप्प-णासणो।मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलम्॥ 4॥

अर्हं-मित्यक्षरं ब्रह्मा, वाचकं परमेष्ठिनः।सिद्ध चक्रस्य सद्बीजं, सर्वतः प्रणमाम्यहं॥ 5॥

कर्माष्टक-विनिर्मुक्तं, मोक्ष लक्ष्मी निकेतनं।सम्यक्त्वादि गुणोपेतं, सिद्धचक्रम् नमाम्यहं॥ 6॥

विघ्नौघाः प्रलयं यान्ति, शाकिनी-भूत-पन्नगाः।विषं निर्विषतां याति, स्तूयमाने जिनेश्वरे॥ 7॥

(पुष्पांजलिं क्षिपामि)

पंचकल्याणक अर्घ्य

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिन गृहे जिन कल्याणक महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री भगवतो गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याणकेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पंचपरमेष्ठी अर्घ्य

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिनगृहे जिन इष्ट(नाथ) महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जिनसहस्रनाम अर्घ्य

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिनगृहे जिननाम महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री भगवज्जिन अष्टोत्तर सहस्र नामेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

तत्त्वार्थसूत्र जी अर्घ्य

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिनगृहे जिनसूत्र महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री उमास्वामी जी कृत तत्त्वार्थ सूत्रं अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

भक्तामर स्तोत्र एवं अन्य समस्त स्तोत्र अर्घ्यउदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिनगृहे जिनस्तोत्र महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री मानतुंगाचार्य जी कृत भक्तामर स्तोत्रं एवं समस्त जिनस्तोत्रं अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पूजा प्रतिज्ञा पाठ

श्रीमज्जिनेन्द्र-मभिवंद्य जगत्-त्रयेशं,स्याद्वाद्-नायक-मनन्त-चतुष्टयार्हम्।श्री मूलसंघ सुदृशां सुकृतैक हेतुः ,जैनेन्द्र यज्ञ विधिरेष मयाऽभ्यधायि॥ 1॥

( आगे प्रत्येक स्वस्ति उच्चारण के साथ पुष्प क्षेपण करें )स्वस्ति त्रिलोक-गुरवे जिन-पुंगवाय,स्वस्ति स्वभाव-महिमोदय-सुस्थिताय।स्वस्ति प्रकाश सहजोर्ज्जित-दृङ्मयाय,स्वस्ति प्रसन्न-ललिताद्-भुत-वैभवाय॥ 2॥

स्वस्त्युच् छल-द्विमल-बोध-सुधा-प्लवाय,स्वस्ति स्वभाव-परभाव-विभासकाय।स्वस्ति त्रिलोक-विततैक-चिदुद् गमाय,स्वस्ति त्रिकाल-सकलायत-विस्तृताय॥ 3॥

द्रव्यस्य शुद्धि-मधिगम्ययथानुरूपं,भावस्य शुद्धि-मधिकामधि-गंतुकामः।आलंबनानि विविधान्य-वलम्ब्य वल्गन्,भूतार्थयज्ञ-पुरुषस्य करोमि यज्ञम्॥ 4॥

अर्हत्पुराण-पुरुषोत्तम-पावनानि,वस्तून् यनून मखिलान्य यमेक एव।अस्मिञ्ज्वलद् विमल-केवल-बोध-वह्नौ,पुण्यं समग्र मह मेक मना जुहोमि॥ 5॥

ॐ ह्रीं विधियज्ञ प्रतिज्ञानाय जिन प्रतिमाग्रे परिपुष्पांजलिं क्षिपामि।

स्वस्ति मंगल-पाठ

( आगे प्रत्येक स्वस्ति उच्चारण के साथ पुष्प क्षेपण करें )श्रीवृषभो नः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअजितः।श्रीसम्भवः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअभिनन्दनः।श्रीसुमतिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीपद्मप्रभः।श्रीसुपार्श्वः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीचन्द्रप्रभः।श्रीपुष्पदन्तः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशीतलः।श्रीश्रेयान् स्वस्ति, स्वस्ति श्रीवासुपूज्यः।श्रीविमलः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअनन्तः।

श्रीधर्मः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशान्तिः।श्रीकुन्थुः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअरनाथः।श्रीमल्लिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीमुनिसुव्रतः।श्रीनमिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीनेमिनाथः।श्रीपार्श्वः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीवर्द्धमानः।॥ पुष्पांजलिं क्षिपामि ॥

परमर्षि स्वस्ति मंगल-पाठ

( आगे प्रत्येक स्वस्ति उच्चारण के साथ पुष्प क्षेपण करें )नित्या-प्रकंपाद्-भुत केवलौघाः, स्फुरन्मनः पर्यय शुद्ध बोधाः।दिव्यावधिज्ञान बल प्रबोधाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 1॥

कोष्ठस्थ धान्योप-ममेक बीजं, संभिन्न संश्रोतृ पदानुसारि।चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 2॥

संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरा, दास्वाद-नघ्राण विलोकनानि।दिव्यान् मतिज्ञान बलाद्वहन्तः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 3॥

प्रज्ञा प्रधानाः श्रमणाः समृद्धाः, प्रत्येक बुद्धाः दशसर्व पूर्वैः।प्रवादिनोऽष्टांग निमित्त विज्ञाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 4॥

जंघानल श्रेणी फलांबु तंतु, प्रसून बीजांकुर चारणाह्वाः।नभोऽगण स्वैर विहारिणश्च, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 5॥

अणिम्नि दक्षा कुशला महिम्नि, लघिम्नि शक्ताः कृतिनो गरिम्णि।मनो वपु र्वाग्बलिनश्च नित्यं, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 6॥

सकाम रूपित्व वशित्व मैश्यं, प्राकाम्य मन्तर्द्धि मथाप्तिमाप्ताः।तथाऽप्रतीघात गुण प्रधानाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 7॥

दीप्तं च तप्तं च तथा महोग्रं, घोरं तपो घोर परा क्रमस्थाः।ब्रह्माापरं घोर गुणाश्चरन्तः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 8॥

आमर्ष-सर्वौषधयस्तथाशी-र्विषाविषा दृष्टिविषाविषाश्च।सखिल्ल विड्जल्ल मलौषधीशाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 9॥

क्षीरं स्रवंतोऽत्र घृतं स्रवंतो, मधु स्रवंतो ऽप्य मृतं स्रवंतः।अक्षीण संवास महान साश्च, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥ 10॥

॥ इति परमर्षिस्वस्ति मंगल विधानं परिपुष्पांजलिं क्षिपामि॥

पार्श्वनाथ पूजन

स्थापना

ज्ञानोदय छन्द

सिद्ध शिला पर आप विराजे, मैं चदुगति में भटक रहा,शुद्ध आप प्रभु शुद्ध गुणों से पर परिणति मैं अटक रहा।भक्ति डोर से बाँध आपको, आज बुलाता पारसनाथ,मेरी हृदय वेदिका पर आ, तिष्ठ-तिष्ठ कर मुझे सनाथ॥

आह्वाननॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।

स्थापनॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।

सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्

सन्निधिकरणं। (पुष्पांजलिं क्षिपामि)तन तृष्णा को तनिक मिटाता, नीर बुझाता प्यास नहीं,मन तृष्णा भव पीर बढ़ाती, मुझे किसी की आस नहीं।खास आपका दास बना हूँ, जब से तब से दाह मिटी,इसीलिए जल चरणों में मैं, छोड़ रहा शिवराह मिली॥

जलॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

वामानन्दन तव पूजन का, जगा आज मन संस्पन्दन,भव बन्धन से मुक्तातम में, निज गुण का ही अभिनन्दन।सुनकर अनघ वचन नय गर्भित, मिली हृदय जो शीतलता,वो चन्दन से कहाँ मिलेगी, तव पद में उसको तजता॥

चंदनॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय संसार ताप विनाशनाय चन्दनं निर्व...।

है अखण्ड परिणमन आपका, शुद्ध द्रव्य सा स्वाभाविक,खण्ड-खण्ड मम चेतन धारा, मोह राग से वैभाविक।हो अक्षत सा उज्ज्वल आतम, उज्ज्वल गुण पर्याय मिले,तन्दुल धवल समर्पित करता, शम दम के सुख भाव खिले॥

अक्षतॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्व...।

श्रुत परिचित अनुभूति रही है, काम भोग की बन्ध कथा,सुख लिप्सा में कुसुम गंध में, मरता आया भ्रमर यथा।यौवन वन में काम बढ़ाते, फूल लता गृह मालाएँ,तव चरणन में अतः समर्पित, विषयन की सुख शालाएँ॥

पुष्पॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय काम बाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्व...।

चार अंगुल की रसना इन्द्रिय, चार गति में भटकाती,मधुर सरस व्यंजन अभिलाषा, देह राग में अटकाती।कर्म असाता वेदनीय से, क्षुधा वेदना भारी रोग,अतः समर्पित षट्रस मय चरु, चारु चरण का अनुपम योग॥

नैवेद्यॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्व...।

दीपक की ज्योति सम मेरा, चित् स्वभाव टिमटिम करता,आप ज्ञान में हे पारस प्रभु!, तीन लोक झिलमिल करता।तुच्छ दीप की भेंट चढ़ाता, केवल भानु महा प्रकटे,तव चरणों में दृष्टि रहे नित, भव-दुःख हेतु मोह घटे॥

दीपॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय महा मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्व...।

अहिच्छत्र पावन भूमि पर, चार घातिया कर्म जला,पंच सहस्र धनुष ऊपर जो, आप विराजे इन्द्र हिला।पुनः अघाति कर्म भस्म कर, ध्यानाग्नि से शुद्ध हुए,शुद्धातम का मैं भी पा रस, पारस पाने धूप लिए॥

धूपॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्व...।

तन वैरागी मन एकाकी, वचनों से नित मौन रहे,तब तक ज्ञायक एक अखण्डित, फल सम अनुभव नहीं कहे।पूर्ण मोक्ष फल की अभिलाषा, पूजन से ही प्रकट हुई,इसीलिए पुद्गल जड़ फल ले, मति तव पद के निकट गई॥

फलॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्व...।

अलग-अलग जल चन्दन अक्षत, पुष्प चारु चरु हाथ लिए,दीप धूप फल आठों को ही, मिश्रित कर सब साथ लिए।निज आतम में मेरी परिणति, इसी तरह एकत्वमयी,हो जावे बस यही भावना, शीघ्र मिले वह मोक्ष मही॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्व...।

पंचकल्याणक अर्घ

पार्श्वनाथ भगवान का,गर्भ महोत्सव आज।कृष्ण पक्ष वैशाख की,दूजी तिथि सुख काज॥ 1॥

अर्घ्यॐ ह्रीं वैशाखकृष्णद्वितीयायां गर्भमंगल मंडिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पौष कृष्ण एकादशी,जन्म महोत्सव जान।इन्द्रों ने पूजा करी,मेरू न्हवन महान॥ 2॥

अर्घ्यॐ ह्रीं पौषकृष्ण एकादश्यां जन्ममंगल मंडिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री प्रभु पारसनाथ को,गृह से विरती आय।पौष कृष्णा एकादशी,बारह भावना भाय॥ 3॥

अर्घ्यॐ ह्रीं पौष कृष्ण एकादश्यां तपोमंगल मंडिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अविचल तप कर ध्यान से,पाया केवलज्ञान।चैत्र कृष्ण की चौथ को,बन अरिहंत महान॥ 4॥

अर्घ्यॐ ह्रीं चैत्रकृष्णचतुर्थ्यां केवलज्ञान मंडिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सम्मेदचल पर गए,स्वर्ण भद्र सुख कूट।श्रावण शुक्ला सप्तमी,भव बंधन से छूट॥ 5॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रावण-शुक्ल-सप्तम्यां मोक्षमंगल मंडिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

बैशाख की वह दौज कृष्णा, देवी शिवा के गर्भ में।अवतरण प्रभु का हुआ उत्सव, ज्ञान त्रय ले गर्भ में॥1॥

जन्म कल्याणक महोत्सव, पौष कृष्ण एकादशी।नृप विश्वसेन महान् के घर, रत्न वृष्टि हुई घनी॥2॥

पर्वत सुमेरु पर प्रभु का, इन्द्र जन्मोत्सव किया।काशी पुरी ने ज्ञान का, आनन्द का प्याला पिया ॥3॥

जब वर्ष तीस हुए पूरण, भायी बारह भावना।लौकान्तिकों ने तभी आकर, करी प्रभु की सराहना ॥4॥

रख मौन व्रत दैगम्बरी, दीक्षा समय प्रकटा स्वयं।वह ज्ञान चौथा भाव संयम, ऋद्धियाँ अनुपम परम॥5॥

अहिच्छत्र थी तपस्थली, कपटी कमठ का आगमन।दश भवों पहले बैर का, पापी पुनः करता वमन॥6॥

आक्रोश से तीर्थेश पर, उपसर्ग कर उस दैत्य ने।प्रभु को डिगाने का किया, सब कुछ प्रयास उस देव ने॥7॥

धरणेन्द्र पद्मावती आये, आदेश पाकर इन्द्र का।वे भी विफल तब हो गए, वश ना चला नागेन्द्र का ॥8॥

तब ही सहज तत्क्षण प्रभु को, शुक्ल ध्यान वितान से।कैवल्य का आलोक प्रकटा, संकट हटा निज ज्ञान से॥9॥

तत्क्षण प्रभु बारह सभा के, मध्य अतिशय शोभना।पापी कमठ मिथ्यात्व तज के, प्रभु चरण में रोवना ॥10॥

दिव्योपदेश समान सबको, धर्म तीर्थ प्रवर्तना।करते हुए फिर आ गए, सम्मेद पर्वत पावना॥11॥

सप्तमी श्रावण सुदी को, देह मुक्ति पा लिए।हम धन्य एेसे प्रभु की, गुणमाल थोड़ी गा लिए ॥12॥

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

इति आशीर्वादः पुष्पांजलिं क्षिपामि।

प्रथम वलय

अभय प्रदायी स्तुति

कल्याणमन्दिर मुदार मवद्य-भेदिभीताभय प्रद-मनिन्दित मङ्घ्रि-पद्मम्।संसार-सागर निमज्ज दशेष-जन्तुपोतायमान मभिनम्य जिनेश्वरस्य॥1॥

कल्याणों के मन्दिर दाता अभय प्रदाता हैं निर्दोषश्री जिनवर के चरण कमल ही जगत् पूज्य हर लेते दोष।भव-सागर में डूबे जन को तव पद ही प्रभु एक जहाजभक्ति भाव से अभिवन्दन है शुरु करूँ स्तुति का काज॥ 1॥

अर्घ्यॐ ह्रीं भव-समुद्र पतज्जन्तु तारणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धिदायक स्तुति

यस्य स्वयं सुरगुरु र्गरिमाम्बुराशेःस्तोत्रं सुविस्तृत-मतिर्न विभुर्विधातुम्।तीर्थेश्वरस्य कमठ-स्मय धूमकेतो-स्तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये॥2॥

सुरगुरु सम विस्तृति मति वाले करने को जिनका गुणगानसदा रहे असमर्थ सदा से उन प्रभु का मैं करता गान।दुष्ट कमठ के मान कर्म की भस्म बनाने अनल स्वरूपतीर्थेश्वर श्री पार्श्व प्रभु की गरिमा सम ना दूजा रूप॥ 2॥

अर्घ्यॐ ह्रीं अनन्त गुणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

असमर्थ को समर्थ करने की शक्ति प्रदायी स्तुति

सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-मस्मादृशाः कथमधीश! भवन्त्यधीशाः।धृष्टोऽपि कौशिक-शिशुर्यदि वा दिवान्धोरूपं प्ररूपयति किं किल घर्मरश्मेः॥3॥

रवि प्रकाश के उदय समय में उल्लू हो जाता है अन्धअन्ध बना फिर कैसे रवि का रूप बताये वह मतिमन्द।त्यों प्रभु धीठ हुए हम जैसे कैसे तेरे गुण गानेलायक हो सकते वर्णन को जो थोड़ा भी ना जाने ॥ 3॥

अर्घ्यॐ ह्रीं चिद्रूपाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अतिगहन आत्म गुणों की प्राप्तिदायक स्तुति

मोह-क्षया-दनुभवन्नपि नाथ! मर्त्योनूनं गुणान् गणयितुं न तव क्षमेत।कल्पान्त-वान्त-पयसः प्रकटोऽपि यस्मान्-मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशिः॥4॥

नाश हुआ हो मोह कर्म का प्रकट हुआ हो आतम ज्ञानफिर भी गुण रत्नाकर के गुण गिनने में है किसकी शान।प्रलय पवन ने जिस समुद्र का जल फेंका हो दूर बहुतउस समुद्र के रत्नों को भी क्या गिन सकता मानव मुग्ध ॥ 4॥

अर्घ्यॐ ह्रीं गहन-गुणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्कृष्ट पद प्रदायी स्तुति

अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ! जडाशयोऽपिकर्तुं स्तवं लस-दसंख्य-गुणाकरस्य।बालोऽपि किं न निज बाहु-युगं वितत्यविस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशेः॥5॥

आप असंख्य गुणों से शोभित मैं जड़ बुद्धि निरा अभिमानफिर भी मैं तैयार हुआ हूँ संस्तुति करने को नादान।शक्ति न रहने पर भी बालक बिना विचारे निज मति सेक्या समुद्र को नहीं नापता दोनों कर फैला रति से ॥ 5॥

अर्घ्यॐ ह्रीं परमानन्त गुणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

असाध्य कार्य साधक गुण स्तुति

ये योगिना-मपि न यान्ति गुणास्तवेश!वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाशः।जाता तदेव - मसमीक्षित-कारितेयंजल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि॥6॥

जो प्रत्यक्ष ध्यान से भगवन् करते निज आतम अनुभववे योगी भी हे परमेश्वर! कह न सके तव गुण वैभव।उन्हीं गुणों के कहने का यह बिना विचारा मेरा कार्यज्यों पक्षी अपनी कूँ-कूँ से व्यक्त करें अपना अभिप्राय॥ 6॥

अर्घ्यॐ ह्रीं अगम्य-गुणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अपवाद-अपमान निवारक स्तुति

आस्ता-मचिन्त्य-महिमा जिन! संस्तवस्तेनामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।तीव्रातपोपहत - पान्थ - जनान्निदाघेप्रीणाति पद्म-सरसः सरसोऽनिलोऽपि ॥7॥

जो अचिन्त्य महिमा मण्डित है दूर रहे वह तव गुणगानकिन्तु आपका नाम मात्र ही भवदधि से दे देता त्राण।ग्रीष्मकाल के तीव्र ताप से तप्त पथिक को भी सन्तोषपद्म सरः की शिशिर पवन से क्या तन में ना आता जोश?॥ 7॥

अर्घ्यॐ ह्रीं स्तवनार्हाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

बिच्छु,सर्पादि विष नाशक स्तुति

हृद्वर्तिनि त्वयि विभो! शिथिली - भवन्तिजन्तोः क्षणेन निबिडा अपि कर्म-बन्धाः।सद्यो भुजंगममया इव मध्य-भाग-मभ्यागते वन-शिखण्डिनि चन्दनस्य ॥8॥

कर्म शत्रु के सघन बन्ध भी शिथिल हुए डर-डर जातेजिस प्राणी के हृदय कमल में पार्श्व प्रभु क्षण भर आते।चन्दन तरु का आलिंगन कर लिपटे रहते जो विष नागवन मयूर के आने पर ज्यों इधर-उधर जाते हैं भाग ॥ 8॥

अर्घ्यॐ ह्रीं कर्मबन्ध विनाशकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

प्रथम वलय महाअर्घ्य

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिनगृहे जिननाथ महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं क्लीं बीजाक्षर सहिताय श्रीपार्श्वनाथायं प्रथम वलयाय महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

द्वितीय वलय

भूत-प्रेत बाधा निवारक स्तुति

मुच्यन्त एव मनुजाः सहसा जिनेन्द्र!रौद्रैरुपद्रव-शतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।गो-स्वामिनि स्फुरित-तेजसि दृष्टमात्रेचौरैरिवाशु पशवः प्रपलायमानैः ॥9॥

हे जिनेन्द्र! तव दर्शन से ही रौद्र उपद्रव बाधाएँसहसा कहाँ चली जाती हैं कोई समझ नहीं पाएँ।गोरक्षक मालिक को लख कर गाय चुराने वाले चोरजैसे सहसा तितर-बितर हो भग जाते ना पाते छोर ॥ 9॥

अर्घ्यॐ ह्रीं दुष्ट-अपवर्ग-विनाशकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महान् आपत्तियों से छुटकारा दिलाने वाली स्तुति

त्वं तारको जिन! कथं भविनां त एवत्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्तः।यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नूनमन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः॥10॥

हे जिन! आप भव्य जीवों के तारक कैसे हो सकते ?आप रूप को मन में रख के स्वयं भवोदधि वो तिरते।जल-तल में जो मसक तैरती क्या जल उसे तिराता है ?भीतर भरी पवन ही कारण अजब अनोखा नाता है ॥ 10॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सुध्येयाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मिथ्या अन्धकार को दूर करने की सामर्थ्ययस्मिन्हर प्रभृतयोऽपि हत-प्रभावाःसोऽपि त्वया रति-पतिः क्षपितः क्षणेन।विध्यापिता हुतभुजः पयसाथ येनपीतं न किं तदपि दुर्धर-वाडवेन ॥11॥

किये पराजित कामदेव ने हरि-हर महादेव जैसेवही आपसे हुआ पराजित क्षण में परम पुरुष कैसे ?।जिस जल से अगनी की लपटें बुझ जाती हैं आपों आपउस जल को क्या बड़वानल की लपटें आग न करतीं आप॥ 11॥

अर्घ्यॐ ह्रीं अनंगमथनाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महा आश्चर्यकारी स्तुति

स्वामिन्न-नल्प गरिमाण-मपि प्रपन्ना-स्त्वां जन्तवः कथमहो हृदये दधानाः।जन्मोदधिं लघु तरन्त्यति लाघवेनचिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभावः ॥12॥

अहो बड़ा विस्मयकारी यह आप महा गौरवधारीफिर भी हृदय विराजित जिनके उनका मन लाघवकारी।हलका होकर भक्त आपका शीघ्र तरे भवसागर कोकौन सोच सकता है सम्यक् आप प्रभाव विशारद को॥ 12॥

अर्घ्यॐ ह्रीं अतिशय-गुरुवे क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

क्रोध विनाशक स्तुति

क्रोधस्त्वया यदि विभो प्रथमं निरस्तोध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्म-चौराः।प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोकेनील द्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी ॥13॥

हे स्वामिन्! यदि क्रोध आपने पहले ही कर दिया विनाशकर्मचोर फिर बिना क्रोध के कैसे पाये सत्यानाश।शीतल शिशिर काल का पाला हरे भरे तरुवर वन कोमुरझा देता और जलाता इसमें क्या संशय मन को॥ 13॥

अर्घ्यॐ ह्रीं जितक्रोधाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

कामविकार नाशक स्तुति

त्वां योगिनो जिन! सदा परमात्मरूप-मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज कोष-देशे।पूतस्य निर्मल रुचेर्यदि वा किमन्य-दक्षस्य सम्भव-पदं ननु कर्णिकायाः ॥14॥

हे जिनेन्द्र! योगीजन नित ही हृदय कमल में नित्य नितान्त,आप रूप परमात्म रूप का ध्यान लगाकर बनते शान्त।कमल कर्णिका में ही होता कमल बीज का ज्यों स्थानहृदय कर्णिका छोड़ कहाँ हो त्यों शुद्धातम का स्थान॥ 14॥

अर्घ्यॐ ह्रीं महन्मृग्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

विशुद्धि वर्धक जिन स्तुति

ध्यानाज्जिनेश! भवतो भविनः क्षणेनदेहं विहाय परमात्म-दशां व्रजन्ति।तीव्रानलादुपल भाव-मपास्य लोकेचामीकरत्व-मचिरादिव धातु-भेदाः ॥15॥

जो भविजन तव ध्यान लगाते ज्ञान रूप परमातम कावे क्षणभर में देह छोड़कर पद पाते परमातम का।ज्यों पत्थर मय हुई धातुएँ पाकर तीव्र अनल का योगशुद्ध स्वर्णमय बनीं दमकतीं यह निमित्त का क्रीड़ा योग॥ 15॥

अर्घ्यॐ ह्रीं कर्मकिट्ट दहनाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

खोई हुई वस्तु प्रदायक स्तुति

अन्तः सदैव जिन! यस्य विभाव्यसे त्वंभव्यैः कथं तदपि नाशयसे शरीरम्।एतत्स्वरूप मथ-मध्य-विवर्तिनो हियद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावाः ॥16॥

जिस शरीर के भीतर हे जिन! भक्त आपको ध्याते हैंउस शरीर से रहित हुए नित शुद्ध चिदातम पाते हैं।जो मध्यस्थ सदा रहते हैं राग-द्वेष से दूर सदामहापुरुष वे ही दुष्टों को जीतें समता ही सुखदा॥ 16॥

अर्घ्यॐ ह्रीं देह-देहि-कलह निवारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

विषविकारनाशक स्तुति

आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेद - बुद्ध्याध्यातो जिनेन्द्र! भवतीह भवत्प्रभावः।पानीयमप्यमृत-मित्यनु-चिन्त्यमानंकिं नाम नो विष-विकार-मपाकरोति ॥17॥

जैसा शुद्ध सदा निर्मल है पार्श्व प्रभु का शुद्धातमतैसा ही प्रभु जो ध्याता है बन जाता तव सम आतम।पानी भी जब अमृत बनता मन्त्र निरन्तर मन्थन सेप्राणी परमातम बन जाए क्या विस्मय यदि चिन्तन से॥ 17॥

अर्घ्यॐ ह्रीं संसार विष-सुधोपमाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अघ्य अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मिथ्या अभिप्राय नाशक स्तुति

त्वामेव वीत-तमसं परवादिनोऽपिनूनं विभो! हरि-हरादि-धिया प्रपन्नाः।किं काच-कामलिभिरीश सितोऽपि शंखोनो गृह्यते विविध-वर्ण-विपर्ययेण ॥18॥

हरि-हर-ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर मान आपको सब पूजेंनिर्मल ज्योति परम परमेश्वर जान अन्यमति सब बूझें।क्या न देखते शुक्ल शंख को पीले आदिक रंगों मेंजिन्हें पीलियादिक रोगों ने घेर लिया हो अंगों में॥ 18॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्व जन वन्द्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अशोकवृक्ष प्रातिहार्य - वैभव वर्द्धक स्तुति

धर्मोपदेश समये सविधानुभावा-दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोकः।अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपिकिं वा विबोध-मुपयाति न जीव-लोकः ॥19॥

धर्मामृत उपदेश समय पर प्रभु प्रभाव की सन्निधि होअरु अशोक तरु शोक रहित हो क्या विस्मय प्राणी भी हो।दिनपति उदयागत होने पर तरुवर फूल खिलें जैसेजिनपति के सम्मुख होने पर विकसित ना हो मन कैसे?॥ 19॥

अर्घ्यॐ ह्रीं अशोक-वृक्ष-विराजिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य - श्री संबंधी समस्त रोग नाशक स्तुति

चित्रं विभो कथमवाङ्मुख-वृन्तमेवविष्वक्पतत्य-विरला सुर-पुष्प-वृष्टिः।त्वद्गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि ॥20॥

देवों द्वारा कुसुम वृष्टि हो नित्य निरन्तर चारों ओरपर डंठल नीचे मुख ऊपर करके क्यों पुष्पों का दौर।मानों वे संकेत दे रहे आप निकटता से जगदीशविधि बन्धन ऊपर मुख करके नष्ट हो रहे स्वयं मुनीश॥ 20॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सुर-पुष्प-वृष्टि-शोभिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दिव्यध्वनि प्रातिहार्य - मूक-बधिर-अन्ध नाशक स्तुति

स्थाने गभीर हृदयोदधि सम्भवायाःपीयूषतां तव गिरः समुदीरयन्ति।पीत्वा यतः परम-सम्मद-संग-भाजोभव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम् ॥21॥

अति अगाध हृदयोदधि से जो निकल रही तव दिव्य ध्वनिउसको सब जन अमृत कहते उचित बात यह बहुत बनी।क्योंकि कर्णांजुलि से पीकर अमृतमय जिनवाणी कोपरम भोग को भोग भविकजन पा जाते शिवरानी को॥ 21॥

अर्घ्यॐ ह्रीं दिव्य-ध्वनि विराजिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

चामर प्रातिहार्य - शत्रु को अनुकूल करने वाली स्तुति

स्वामिन् सुदूर-मवनम्य समुत्पतन्तोमन्ये वदन्ति शुचयः सुर-चामरौघाः।येऽस्मै नतिं विदधते मुनि-पुंगवायते नून-मूर्ध्व-गतयः खलु शुद्ध-भावाः ॥22॥

स्वामिन्! समवसरण में सुरगण चँवर ढोरते दोनों ओरनीचे झुककर ऊपर जाते मानो वह कहते कुछ और।जो अरिहन्त परम जिनवर को बार-बार झुक नमन करेंशुद्ध भाव से सिद्ध गति को पाने ऊपर गमन करें॥ 22॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सुर-चामर-विराजमानाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सिंहासन प्रातिहार्य - राजादि पद प्रदायी स्तुति

श्यामं गभीर-गिरमुज्ज्वल-हेम-रत्न-सिंहासनस्थ-मिह भव्य-शिखण्डिनस्त्वाम्।आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चैःचामीकराद्रि-शिरसीव नवाम्बुवाहम् ॥23॥

कनक रत्न मणिमय सिंहासन उस पर श्यामल ललित सुदेहएेसे शोभे ज्यों मेरु की चोटी पर नव काले मेह।हो आनन्द विभोर भव्यजन लखें आपको ज्यों वन मोरवर्षा ऋतु में मेघों को लख नाचें किलकारी कर शोर॥ 23॥

अर्घ्यॐ ह्रीं पीठ-त्रय-नायकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

भामण्डल प्रातिहार्य - कान्ति नीरोग शरीर प्रदायक स्तुति

उद्गच्छता तव शिति-द्युति-मण्डलेनलुप्त-च्छद-च्छविरशोक-तरुर्बभूव।सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि ॥24॥

नील वर्ण की प्रभा पुंज से दीप्त सभा का नीला रंगतरु अशोक के पत्तों की भी रक्ताभा करता नीरंग।वीतराग तव सन्निधि से यदि राग रहित तरु हो जाताकौन सचेतन पुरुष बचेगा वीतराग ना हो जाता॥ 24॥

अर्घ्यॐ ह्रीं भामण्डल-मण्डिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

द्वितीय वलय महाऽर्घ्य

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिनगृहे जिननाथ महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं क्लीं बीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय द्वितीय वलयाय महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

तृतीय वलय

देवदुन्दुभि प्रातिहार्य - नेतृत्व शक्ति प्रदायक स्तुति

भोः भोः प्रमाद-मवधूय भजध्वमेन-मागत्य निर्वृति-पुरीं प्रति सार्थवाहम्।एतन्निवेदयति देव! जगत्त्रयायमन्ये नदन्नभिनभः सुर-दुन्दुभिस्ते ॥25॥

देव दुन्दुभि देवों द्वारा नभ मण्डल में बज कर घोरमानो बुला रही हो सबको कर सचेत नित चारों ओर।मुक्तिपुरी ले जाने वाले सौदागर यह पार्श्व प्रभुतज प्रमाद आओ-आओ जी सेवा करो गूँजती भू ॥ 25॥

अर्घ्यॐ ह्रीं देव-दुन्दुभि-नादाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

छत्रत्रय प्रातिहार्य - कालसर्प योग निवारक स्तुति

उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!तारान्वितो विधुरयं विहताधिकारः।मुक्ता कलाप-कलितोल्ल सितातपत्र-व्याजात्त्रिधा धृत-तनुर्ध्रुव-मभ्युपेतः ॥26॥

तीन लोक जब हुए प्रकाशित हे प्रभु! तव चेतन तन मेंयही देखकर मानो हतप्रभ हुआ चन्द्र तब ही क्षण में।डरकर तत्क्षण तीन छत्र के छल से मानो तीन शरीरधारण कर आया तव शरणा शोभित करता आप शरीर॥ 26॥

अर्घ्यॐ ह्रीं छत्र-त्रय-महिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

कान्ति-प्रताप यश प्रदायी स्तुति

स्वेन प्रपूरित-जगत्त्रय-पिण्डितेनकान्ति-प्रताप-यशसा मिव संचयेन।माणिक्य-हेम-रजत-प्रविनिर्मितेनसालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि ॥27॥

माणिक स्वर्ण रजत निर्मित हैं समवसरण के त्रय प्राकारतीन लोक की सकल सम्पदा मानो मिल लेती आकार।प्रभु की कान्ति प्रताप कीर्ति के मुझ को तीन समूह लगेजिनके मध्य सुशोभित श्री जिन अद्भुत आभावान लगे॥ 27॥

अर्घ्यॐ ह्रीं शालत्रयाधिपतये क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

असमय निधन निवारक स्तुति

दिव्य-स्रजो जिन नमत्त्रिदशाधिपाना-मृत्सृज्य रत्न-रचितानपि मौलि-बन्धान्।पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वाऽपरत्रत्वत्संगमे सुमनसो न रमन्त एव ॥28॥

पारस परमेश्वर के पद में इन्द्रादिक जब प्रणत हुएउनकी रत्न मुकुट मालाएँ मुकुट छोड़ पद शरण लिए।इसमें क्या आश्चर्य प्रभु की संगति सब ज्ञानी चाहेंरमण करें तव युगल चरण में नहीं कहीं जाना चाहें॥ 28॥

अर्घ्यॐ ह्रीं भक्त-जनानवन-पतिराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

संकटमोचन स्तुति

त्वं नाथ! जन्म-जलधेर्विपराङ्मुखोऽपियत्तारयस्यसुमतो निज-पृष्ठ-लग्नान्।युक्तं हि पार्थिव-निपस्य सतस्तवैवचित्रं विभो! यदसि कर्म-विपाक-शून्यः ॥29॥

जन्म-मरण के भवोदधि से आप विमुख होकर के भीभक्तजनों को पार लगाते कर्म शून्य होकर के भी।अग्निपाक युत मृतिका घट को बांध पीठ जब जन तिरतेकर्म पाक से रहित आपको हृदय धार सब जन तिरते॥ 29॥

अर्घ्यॐ ह्रीं निज पृष्ट लग्नभय तारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सर्व कार्य विकासक स्तुति

विश्वेश्वरोऽपि जन-पालक दुर्गतस्त्वंकिं वाक्षर-प्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश।अज्ञान-वत्यपि सदैव कथंचिदेवज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्व-विकास हेतुः ॥30॥

विश्वेश्वर होकर जन पालक दुर्गत तुम दुष्प्राप हुएअविनाशी अक्षर होकर भी लेख रहित निर्लेप हुए।अज्ञ प्राणियों के संरक्षक! हे ईश्वर! तव आतम मेंतीन लोक दिखलाने वाला ज्ञान प्रकाशित नित जग में॥ 30॥

अर्घ्यॐ ह्रीं विस्मयनीय मूर्तये क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दुष्टजन संयोग निवारक स्तुति

प्राग्भार-सम्भृत-नभांसि-रजांसि रोषाद्उत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।छायापि तैस्तव न नाथ! हता हताशोग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा ॥31॥

क्रोधित होकर क्रूर कमठ ने नभ मण्डल छूने वालीधूलि उड़ायी तूफानों से तहस-नहस करने वाली।दूर रहे प्रभु देह आपकी छाया को भी छू न सकीमलिन हुआ वह स्वयं कर्म से नभ में थूँके ज्यों सनकी॥ 31॥

अर्घ्यॐ ह्रीं कमठोत्थापित धूलि-उपद्रव-जिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पीड़ा पहुँचाने वाले दुर्जनों से रक्षा करने वाली स्तुति

यद्गर्जदूर्जित-घनौघमदभ्र-भीमभ्रश्यत्तडिन्मुसल-मांसल-घोर-धारम्।दैत्येन मुक्तमथ दुस्तर-वारि दध्रे,तेनैव तस्य जिन! दुस्तर-वारि कृत्यम् ॥32॥

फिर उस दैत्य कमठ ने बादल गरज-गरज करके आवाजकाली रात अंधेरी करके कड़-कड़ करती डाली गा ा।मूसल सम मोटी जल बूँदें पटकी मानों हो तलवारस्वयं कमठ ने अपने ऊपर मानों कीने दुस्तर वार ॥ 32॥

अर्घ्यॐ ह्रीं कमठ-कृत-जलधारा-उपसर्ग निवारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अग्नि भूकम्पादि भय निवारक स्तुति

ध्वस्तोर्ध्व-केश-विकृताकृति-मर्त्य-मुण्डप्रालम्ब-भृद्भयदवक्त्रविनिर्यदग्निः।प्रेतव्रजः प्रति भवन्तमपीरितो यःसोऽस्याभवत्प्रतिभवं भव-दुःख-हेतुः॥33॥

नरमुण्डों की अति डरावनी लम्बी-लम्बी मालाएँबिखरे केश देखकर जिनके डर जाती हों अबलाएँ।मुख से लाल अगनि की लपटें भूत प्रेत का डर दिखलाभव-दुख कारण हेतु कमठ ने जहर स्वयं पर ही उगला॥ 33॥

अर्घ्यॐ ह्रीं कमठ-कृत-पैशाचिक-उपद्रव जितशीलाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

असाध्य रोग विनाशक स्तुति

धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसन्ध्य-माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्यकृत्याः।भक्त्योल्लसत्पुलक पक्ष्मल-देह-देशाःपाद-द्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाजः ॥34॥

हे भुवनाधिप! तीन भुवन में धन्य हुए हैं वे ही लोगतीनों सन्ध्याओं में तुमको हृदय धार कर करते योग।कृत्य सभी जो संसृति कारण तजकर भक्ति भाव उर धाररोमांचित हो तन से मन से आराधक करते भवपार॥ 34॥

अर्घ्यॐ ह्रीं धार्मिक वन्दिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सर्व विपत्ति निवारक स्तुति

अस्मिन्नपार-भव-वारिनिधौ मुनीश!मन्ये न मे श्रवण गोचरतां गतोऽसि।आकर्णिते तु तव गोत्र-पवित्र-मन्त्रेकिं वा विपद्विषधरी सविधं समेति ॥35॥

इस अपार भव-वारिधि में प्रभु जन्म लिये अनगिनत यहाँकिन्तु आपका नाम कभी भी सुना कान से कभी कहाँ ?।यदि तव नाम मंत्र सुन लेता एक बार भी भावों सेविपदाओं की नागिन मुझको कैसे डसती दावों से ?॥ 35॥

अर्घ्यॐ ह्रीं पवित्र नाम ध्येयाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

विजेता बनाने वाली स्तुति

जन्मान्तरेपि तव पाद युगं न देव!मन्ये मया महितमीहित-दान-दक्षम्।तेनेह जन्मनि मुनीश! पराभवानांजातो निकेतनमहं मथिताशयानाम् ॥36॥

एेसा लगता है पारस प्रभु! मुझ पापी ने आप चरणमनवांछित फलदायक तेरे पूजे नहीं कभी इक क्षण।इस कारण इस जन्म में मेरे मन की सारी आशाएँकभी पूर्ण हो सकी न भगवन् बढ़ती और निराशाएँ॥ 36॥

अर्घ्यॐ ह्रीं पूतपादाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अनर्थ निवारक स्तुति

नूनं न मोह तिमिरावृत-लोचनेनपूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्थाःप्रोद्यत्प्रबन्ध गतयः कथमन्यथैते ॥37॥

मोह अन्ध से अन्धा होकर नेत्र सहित होकर भी ईश,देख सका ना कभी आपको पहले कभी कहीं जगदीश।इसीलिए तो हृदय विदारक अति दुर्वार हमारे पाप,बहु अनर्थ करते हैं प्रभुवर! और सताते आपों आप॥ 37॥

अर्घ्यॐ ह्रीं दर्शनीयाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

भगवान् बनाने वाली स्तुति

आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपिनूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।जातोऽस्मि तेन जन-बान्धव! दुःखपात्रंयस्मात्क्रियाः प्रतिफलन्ति न भाव-शून्याः ॥38॥

हे जनबान्धव! मैंने तुमको हो सकता है खूब लखानाम सुना हो और लिया हो पूजा की हो दिखा-दिखा।फिर भी भक्ति भाव से मैंने कभी नहीं चित में धारायही व ाह है दुःखी रहा हूँ भाव शून्य सब बेकारा॥ 38॥

अर्घ्यॐ ह्रीं भक्तिहीन-जन-बान्धवाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दुःखीजनों के रक्षक श्री जिन

त्वं नाथ! दुःखि-जन-वत्सल! हे शरण्य!कारुण्य-पुण्य-वसते! वशिनां वरेण्य।भक्त्या नते मयि महेश! दयां विधायदुःखाङ्कुरोद्दलन-तत्परतां विधेहि ॥39॥

शरणागत प्रतिपालक ईश्वर दुःखीजनों प्रति करुणाधामनाथ आप ही हो योगीश्वर और महेश्वर दया निधान।भक्त आपका सहज भक्ति से स्वयं रुचि से तव पद लीनमेरे दुःख दलने में अब तो जल्दी दया करो लो चीन॥ 39॥

अर्घ्यॐ ह्रीं भक्तजन वत्सलाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सौभाग्य वर्धक स्तुति

निःसंख्य सार शरणं शरणं शरण्य-मासाद्य सादित-रिपु-प्रथितावदानम्त्वत्पाद-पंकजमपि प्रणिधान-वन्ध्योवन्ध्योऽस्मि चेद्भुवन-पावन हा हतोऽस्मि ॥40॥

हे त्रिभुवन पावन! प्रभु रक्षक आश्रय दाता आप अनूपशरणागत प्रतिपालक सबके कर्म विनाशक कीर्ति स्वरूप।पाकर आप चरण कमलों का कर न सका जो नित-प्रति ध्यानएेसा भाग्यहीन नर मैं ही बना अभागा निपट अजान॥ 40॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सौभाग्यदायक पद-कमल युगाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सर्वग्रह निवारक स्तुति

देवेन्द्र-वन्द्य! विदिताखिल-वस्तुसार!संसार-तारक! विभो! भुवनाधिनाथ!।त्रायस्व देव! करुणा-हृद्! मां पुनीहिसीदन्तमद्य भयद-व्यसनाम्बुराशेः ॥41॥

देवेन्द्रों से वन्दनीय हो सकल तत्त्व के जाननहारजगतारक त्रिभुवनपति तुम हो प्रभो दया सागर आधार।दुःख सागर में डूब रहा हूँ देव! बचाओ दया करोआज शरण आए बालक पे दृष्टि डाल मन पूत करो॥ 41॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्व पदार्थ वेदिने क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अचिन्त्य फल प्रदायक स्तुति

यद्यस्ति नाथ! भवदङ्घ्रि-सरोरुहाणांभक्तेः फलं किमपि सन्तत-संचितायाः।तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूयाःस्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि ॥42॥

नाथ आप ही एक मात्र हो मुझ पापी के आज शरणतव चरणों की भक्ति से यदि संचित हुआ पुण्य का कण।तो उसका फल यही चाहता आप चरण ही रहें शरणहे शरण्य! पर भव में भी तुम नाथ बने रहना हर क्षण॥ 42॥

अर्घ्यॐ ह्रीं पुण्य-बहुजन-सेव्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अमंगल-अनिष्ट निवारक स्तुति

इत्थं समाहित-धियो विधिवज्जिनेन्द्र!सान्द्रोल्लसत्पुलक-कंचुकितांग-भागाः।त्वद्विम्ब-निर्मल-मुखाम्बुज-बद्धलक्ष्याये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्याः ॥43॥

ध्यान लगाकर इस प्रकार जो हे जिनेन्द्र! विधिवत् गुणगानतव निर्मल मुख कमल लक्ष्य कर अपलक लखता भव्य महान्।अरु रोमांचित तन मन होकर संस्तुति करने को तैयाररहता है वह भव्य जीव ही पा जाता संसृति का पार॥ 43॥

अर्घ्यॐ ह्रीं जन्म-मृत्यु निवारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

क्रमशः मोक्षफल प्रदायी स्तुति

ते विगलित-मल-निचया अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते ॥ 44॥

और कहूँ क्या संस्तुति का फल हे पारस! प्रभु हे दातार!तुमको लख विकसित होते हैं नयन कुमुद जिन चन्द्र अपार।भक्त आपके निश्चित पाते स्वर्ग सुखों का वैभव योगअष्ट-कर्म बल नष्ट करन से शीघ्र मुक्ति का मिलता योग॥ 44॥

अर्घ्यॐ ह्रीं कुमुदचन्द्र-यतिसेवित-पादाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

तृतीय वलय महाअर्घ्य

उदक चंदन तंदुल पुष्पकैश्, चरु सुदीप सुधूप फलार्घ्य कैः।धवल मंगल गान रवाकुले, जिनगृहे जिननाथ महं यजे॥

अर्घ्यॐ ह्रीं क्ली बीजाक्षर सहिताय श्री पार्श्वनाथाय तृतीय वलयाय महाऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला व महाअर्घ्य

कल्याणों के मन्दिर जय हो, कमठ मान भस्मासुर जय।रवि प्रकाश सम उज्ज्वल जय हो, गुण रत्नाकर की हो जय॥1॥

गुण असंख्य धारी की जय हो, योगिगम्य जिनवर जय हो।जय हो महिमा मण्डित जिनवर, जय-जय कर्म शत्रु प्रभुवर॥2॥

रौद्र उपद्रव बाधा नाशी, भव्य जीव तारक काशी।काम पराजित आतम की जय, गौरवधारी प्रभु की जय॥3॥

क्रोध विनाशी जिनवर जय हो, ध्येय रूप प्रभु की जय हो।ध्यान रूप परमातम की जय, शुद्ध चिदातम धारी जय ॥4॥

आप रूप करने वाले जिन, हरिहर नहीं कोई तुम बिन।धर्मामृत उपदेशक जय हो, कुसुम वृष्टि शोभित जय हो॥5॥

दिव्यध्वनि दायक की जय हो, चँवर सुशोभित जिनवर जय हो।सिंहासन राजित जिन जय हो, तरु अशोक विलसित की जय॥6॥

देव दुन्दुभि धारक जय हो, तीन छत्र धारी जय हो।जय जय हो नित समवसरण की, इन्द्र प्रणुत चरणन की जय ॥7॥

भविजन तारक नित जयवन्तो, विश्वेश्वर जन पालक जय हो।जय हो दुष्ट कमठ विजयी की, दैत्य कमठ विजयी की जय ॥8॥

भूत-प्रेत निर्भय जिन जय हो, धन्य भक्त जिन की जय हो।नाम मन्त्र जिनका उनकी जय, मनवांछित दायक की जय॥9॥

मोह विनाशी जिनवर जय हो, हे जनबान्धव! जय जय हो।शरणागत प्रतिपालक जय हो, त्रिभुवन पावन की जय हो॥10॥

देवन्द्रों से वन्दनीय जय, हे शरण्य जग में जय-जय।सौम्य कमलमुख जिनवर की जय, नित “प्रणम्य” पारस की जय॥11॥

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री निर्वाणक्षेत्र का अर्घ्य

जल गंध अक्षत पुष्प चरु फल, दीप धूपायन धरौं।“द्यानत” करो निरभय जगत सौं, जोरकर विनती करौं॥

सम्मेदगढ़ गिरनार चम्पा, पावापुरी कैलाश कों।पूजों सदा चौबीस जिन, निर्वाण भूमि निवास कों॥

अर्घ्यॐ ह्रीं चतुर्विंशति तीर्थंकर निर्वाण क्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

समुच्चय महाअर्घ्य

मैं देव श्री अरहन्त पूजूँ, सिद्ध पूजूँ चाव सों।आचार्य श्री उवझाय पूजूँ, साधु पूजूँ भाव सों॥

अर्हन्त भाषित बैन पूजूँ, द्वादशांग रची गनी ।पूजूँ दिगम्बर गुरु चरण शिव, हेत सब आशा हनी॥

सर्वज्ञ भाषित धर्म दश-विधि, दयामय पूजूँ सदा।जजि भावना षोडश रत्नत्रय, जा बिना शिव नहिं कदा॥

त्रैलोक्य के कृत्रिम अकृत्रिम, चैत्य चैत्यालय जजूँ।पंचमेरु नन्दीश्वर जिनालय, खचर सुर पूजित भजूँ॥

कैलाश श्री सम्मेद गिरी, गिरनार मैं पूजूँ सदा।चम्पापुरी पावापुरी पुनि, और तीरथ सर्वदा॥

चौबीस श्री जिनराज पूजूँ, बीस क्षेत्र विदेह के।नामावली इक सहस-वसु जय, होय पति शिवगेह के॥

दोहा- जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय।सर्व पूज्य पद पूजहूँ , बहु विधि भक्ति बढ़ाय॥

ॐ ह्रीं भावपूजा भाववन्दना त्रिकालपूजा त्रिकालवन्दना करै करावै भावना भावै श्रीअरहन्त जी, सिद्ध जी, आचार्य जी,उपाध्याय जी, सर्व साधु जी पंच-परमेष्ठिभ्यो नमः। प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः। दर्शन विशुद्धयादि षोडश कारणेभ्यो नमः। उत्तम

क्षमादि दशलाक्षण धर्मेभ्यो नमः। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्रेभ्योनमः। जल के विषै, थल के विषै, आकाश के विषै, गुफा के विषै, पहाड़के विषै, नगर नगरी विषै, उर्ध्वलोक, मध्य लोक, पाताल लोक विषैविराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन चैत्यालय जिन बिम्बेभ्यो नमः। विदेहक्षेत्रे विद्यमान बीस तीर्थंकरेभ्यो नमः। पाँच भरत, पाँच एेरावत दश क्षेत्रसंबंधी तीस चौबीसी के सात सौ बीस जिनबिम्बेेभ्यो नमः। नंदीश्वरद्वीपसंबंधी बावन जिन-चैत्यालयेभ्यो नमः। पंचमेरु संबंधी अस्सी जिनचैत्यालयेभ्यो नमः। श्री सम्मेद शिखर, कैलाश, चम्पापुर, पावापुर,

गिरनार, सोनागिरि, तारंगा, मथुरा आदि सिद्ध क्षेत्रेभ्यो नमः। जैनबद्री,मूड़बद्री, देवगढ़, चन्देरी, पपौरा, हस्तिनापुर, अयोध्या, राजगृही, तारंगा,चमत्कार, महावीरजी, पद्मपुरी, तिजारा, अंतरिक्ष पारसनाथ, मक्सी आदिअतिशय क्षेत्रेभ्यो नमः। श्री चारण ऋद्धिधारी सप्त परमर्षिभ्यो नमः।श्रीजिन सहस्रनामेभ्यो नमः। (अपने नगर का नाम) नगर में स्थित समस्तजिनमन्दिर, जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो नमः अनर्घ्य-पद प्राप्तयेसम्पूर्ण अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शान्तिपाठ व विसर्जन

शान्तिनाथ मुख शशि उनहारी, शील गुण-व्रत संयम-धारी।लखन एक सौ आठ विराजैं, निरखत नयन कमल-दल लाजैं॥

पंचम चक्रवर्ति पद-धारी, सोलम तीर्थंकर सुखकारी।इन्द्र-नरेन्द्र पूज्य जिन नायक, नमो शान्ति-हित शान्ति-विधायक॥

दिव्य विटप पहुपन की वरषा, दुन्दुभि आसन वाणी सरसा।छत्र चमर भामण्डल भारी, ये तुव प्रातिहार्य मनहारी॥

शान्ति जिनेश शान्ति सुखदाई, जगत् पूज्य पूजौ सिरनाई।परम शान्ति दीजै हम सबको, पढ़ैं तिन्हें पुनि चार संघ को॥

पूजैं जिन्हें मुकुट-हार किरीट लाके,इन्द्रादि देव अरु पूज्य पदाब्ज जाके।सो शान्तिनाथ वर वंश जगत् प्रदीप,मेरे लिये करहिं शान्ति सदा अनूप॥

संपूजकों को प्रतिपालकों को, यतीनकों औ यतिनायकों को।राजा प्रजा राष्ट्र सुदेश को ले, कीजे सुखी हे जिन! शान्ति को दे॥

होवै सारी प्रजा को सुख, बलयुत हो धर्मधारी नरेशा।होवै वर्षा समय पै, तिलभर न रहे व्याधियों का अन्देशा॥

होवै चोरी न जारी, सुसमय वरतै हो न दुष्काल मारी।सारे ही देश धारैं, जिनवर वृषको जो सदा सौख्यकारी॥

घातिकर्म जिन नाश करि, पायो केवलराज।शान्ति करो सब जगत् में, वृषभादिक जिनराज॥

अब हाथ जोड़कर भगवान् से प्रार्थना करें

शास्त्रों का हो पठन सुखदा, लाभ सत्संगती का।सद्व्रतों का सुजस कहके, दोष ढाकूँ सभी का॥

बोलूँ प्यारे वचन हित के, आपका रूप ध्याऊँ।तोलों सेऊ चरण जिनके, मोक्ष जो लों न पाऊँ॥

तव पद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में।तबलौं लीन रहूँ प्रभु , जबलौं न पाया मुक्ति पद मैंने।अक्षर पद मात्रा से दूषित, जो कछु कहा गया मुझसे।क्षमा करो प्रभु सो सब करुणा करि पुनि छुड़ाहु भव दुःख से॥

हे जगबन्धु जिनेश्वर! पाऊँ तव चरण शरण बलिहारी।मरण समाधि सुदुर्लभ, कर्मों का क्षय सुबोध सुखकारी॥

पुष्पांजलिं क्षिपामि (कायोत्सर्ग करें)

विसर्जन पाठ

बिन जाने वा जानके, रही टूट जो कोय।तुम प्रसाद तैं परम गुरु, सो सब पूरण होय॥ 1॥

पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान।और विसर्जन हूँ नहीं, क्षमा करो भगवान्॥ 2॥

मन्त्रहीन धनहीन हूँ , क्रियाहीन जिनदेव।क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव॥ 3॥

आये जो-जो देवगण, पूजे भक्ति प्रमाण।ते अब जावहुँ कृपाकर, अपने-अपने थान॥ 4॥

श्री जिनवर की आशिका, लीजे शीश चढ़ाय।भव-भव के पातक कटें, दुःख दूर हो जाय॥

नौ बार णमोकार मन्त्र का जाप करें

परिक्रमा विनती (जिनस्तुति

मैं तुम चरण-कमल गुणगाय, बहु विधि भक्ति करी मन लाय।जनम जनम प्रभु पाऊँ तोहि, यह सेवाफल दीजे मोहि॥

कृपा तिहारी एेसी होय, जामन मरण मिटावो मोहि।बार-बार मैं विनती करूँ, तुम सेवा भवसागर तरूँ॥

॥ जय जिनेन्द्र ॥

स्रोत: आर्हत विद्या प्रकाशन, घाटगाँव (जबलपुर)