जिनेन्द्र वाणी

श्री ऋषिमंडल पूजा

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स्थापना

चौबिस जिनपद प्रथम नमि, दुतिय सुगणधर पाय ।त्रितिय पंच परमेष्ठि को, चौथे शारद माय ॥

मन वच तन ये चरन युग, करहुँ सदा परनाम ।ऋषि मण्डल पूजा रचों, बुधि बल द्यो अभिराम ॥

अडिल्ल छंद

चौबिस जिन वसु वर्ग पंच गुरु जे कहे ।रत्नत्रय चव देव चार अवधी लहे ॥

अष्ट ऋद्धि चव दोय सूर ह्रीं तीन जू ।अरहंत दश दिग्पाल यंत्र में लीन जू ॥

दोहा

यह सब ऋषिमण्डल विषै, देवी देव अपार ।तिष्ठ तिष्ठ रक्षा करो, पूजूँ वसु विधि सार ॥

आह्वाननॐ ह्रीं वृषभादिचौबीसतीर्थंकर, अष्ट वर्ग, अर्हंंतादि पंचपद, दर्शनज्ञानचारित्र- रूपरत्नत्रय, चतुर्निकाय देव, चार प्रकार अवधि धारक श्रमण, अष्ट ऋद्धि, चौबीस सूर, तीन ह्रीं अर्हंत बिम्ब, दश दिग्पाल, यन्त्रसम्बन्धी परमदेव समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं ।

स्थापनॐ ह्रीं वृषभादिचौबीसतीर्थंकर, अष्ट वर्ग,अर्हंंतादि पंचपद, दर्शनज्ञानचारित्र- रूपरत्नत्रय, चतुर्निकाय देव, चार प्रकार अवधि धारक श्रमण, अष्ट ऋद्धि, चौबीस सूर, तीन ह्रीं अर्हंत बिम्ब, दश दिग्पाल, यन्त्रसम्बन्धी परमदेव समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं ।

सन्निधिकरणॐ ह्रीं वृषभादिचौबीसतीर्थंकर, अष्ट वर्ग, अर्हंंतादि पंचपद, दर्शनज्ञानचारित्र- रूपरत्नत्रय, चतुर्निकाय देव, चार प्रकार अवधि धारक श्रमण, अष्ट ऋद्धि, चौबीस सूर, तीन ह्रीं अर्हंत बिम्ब, दश दिग्पाल, यन्त्रसम्बन्धी परमदेव समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं ।

अष्टक

इति स्थापना

गीता छंद

क्षीर उदधि समान निर्मल तथ मुनि चित सारसो ।भर भृंग मणिमय नीर सुन्दर तृषा तुरित निवारसो ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

जलॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥

मलय चंदन लाय सुंदर गंध सों अलि झंकरै ।सो लेहु भविजन कुंभ भरिके तप्त दाह सबै हरै ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

चंदनॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥

इन्दु किरण समान सुन्दर जोति मुक्ता की हरैं ।हाटक रकेबी धारि भविजन अखय पद प्राप्ती करैं ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

अक्षतॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥

पाटल गुलाब जुही चमेली मालती बेला घने ।जिस सुरभितें कलहंस नाचत फूल गुँथि माला बने ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

पुष्पॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥

अर्ध चन्द्र समान फेनी मोदकादिक ले घने ।घृत पक्व मिश्रित रस सु पूरे लख क्षुधा डायनि हने ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

नैवेद्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥

मणि दीप ज्योति जगाय सुन्दर वा कपूर अनूपकं ।हाटक सुथाली मांहि धरिके वारि जिनपद भूपवकं ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

दीपॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥

चंदन सु कृष्णागरु कपूर मंगाय अग्नि जराइये ।सो धूप धूम्र अकाश लागी मनहुँ कर्म उड़ाइये ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

धूपॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥

दाडिम सु श्रीफल आम्र कमरख और केला लाइये ।मोक्षफल के पायवे की आश धरि करि आइये ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

फलॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥

जल फलादिक द्रव्य लेकर अर्घ सुन्दर कर लिया ।संसार रोग निवार भगवन् वारि तुम पद में दिया ॥

जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा ।तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न में दुःख नहिं कदा ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यंत्र-सम्बन्धि-परमदेवाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥

अर्घावली

अडिल्ल छंद

वृषभ जिनेश्वर आदि अंत महावीर जी ।ये चौबिस जिनराज हनों भवपीर जी ॥

ऋषिमण्डल बिच ह्रीं विषैं राजै सदा ।पूजूँ अर्घ बनाय होय नहिं दुःख कदा ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय वृषभादि-चतुा\वशतितीर्थंकर- परमदेवाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

आदि कवर्ग सु अन्तजानि शाषासहा ।ये वसुवर्ग महान यंत्र में शुभ कहा ॥

जल शुभ गंधादिक वर द्रव्य मँगाय के ।पूजहूँ दोऊ करजोर शीश निज नायके ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय कवर्गादि शाषासहा हम्ल्व्र्यूं परमयंत्रेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

कामिनी मोहनी छंद

परम उत्कृष्ट परमेष्ठी पद पाँच को ।नमत् शत इंद्र खगवृन्द पद साँच को ॥

तिमिर अघनाश करण को तुम अर्क हो ।अर्घ लेय पूज्य पद देत बुद्धि तर्क हो ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय पंचपरमेष्ठी परमदेवाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

सुन्दरी छंद

सुभग सम्यग्दर्शन ज्ञान जू, कह चारित्र सु धारक मान जू ।अर्घ सुन्दर द्रव्य सु आठ ले, चरण पूजहुँ साज सु ठाठले ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र-रूपरत्नत्रयाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

गीता छंद

भवनवासी देव व्यंतर ज्योतिषी कल्पेन्द्र जू ।जिनगृह जिनेश्वर देव राजै रत्नके प्रतिबिम्ब जू ॥

तोरण ध्वजा घंटा विराजै चंवर ढरत नवीन जू ।वर अर्घ ले तिन चरण पूजों हर्ष हिय अति लीन जू ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थेभ्यः भवनेन्द्र व्यंतरेन्द्र ज्योतिषीन्द्र कल्पेन्द्र चतुःप्रकार देवगृहेषु श्रीजिनचैत्यालयेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

दोहा

अवधि चार प्रकार मुनि, धारत जे ऋषिराय ।अर्घ लेय तिन चर्ण जजि, विघन सघन मिटजाय ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थेभ्यः चतुःप्रकारअवधिधारकमुनिभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

भुजंगप्रयात

कही आठ रिद्धि धरे जे मुनीशं । महा कार्यकारी बखानी गनीशं ॥

जल गंध आदि दे जजों चर्न नेरे । लहों सुख सबेरे हरो दुःख फेरे ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रवविनाशन-समर्थेभ्यः अष्टऋद्धिसहिताय मुनिभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

सखी छंद

श्री देवी प्रथम बखानी, इन आदिक चौबीसों मानी ।तत्पर जिन भक्ति विषै हैं, पूजत सब रोग नशैं हैं ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थेभ्यः श्री आदि चतुर्विंशतिदेविभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

हंसा छंद

यंत्र विषै वरन्यो तिरकोन, ह्रीं तहँ तीन युक्त सुखभोन ।जल फलादि वसु द्रव्य मिलाय, अर्घ सहित पूजूँ शिरनाय ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थेभ्यः त्रिकोणमध्ये तीन ह्रीं संयुक्ताय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

तोमर छंद

दस आठ दोष निरवारि, छियालीस महागुण धारि ।वसु द्रव्य अनूप मिलाय, तिन चर्न जजों सुखदाय ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थेभ्यः अष्टादशदोष-रहिताय छियालीस-महागुणयुक्ताय अरहंत-परमेष्ठिने अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

सोरठा

दस दिश दस दिग्पाल, दिशा नाम सो नामवर ।तिनगृह श्रीजित आल, पूजों मैं वन्दौं सदा ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थेभ्यः दशदिग्पालेभ्यः जिनभक्ति- युक्तेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

दोहा

ऋषिमण्डल शुभयंत्र के, देवी देव चितारि ।अर्घ सहित पूजहूँ चरन, दुःख दारिद्र निवारि ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थेभ्यः ऋषिमण्डल-सम्बन्धिदेवीदेवेभ्यः अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

दोहा

चौबीसों जिन चरण नमि, गणधर नाऊँ भाल ।शारद पद पंकज नमूँ, गाऊँ शुभ जयमाल ॥

जय आदीश्वर जिन आदिदेव, शत इंद्र जजैं मैं करहुँ सेव ।जय अजित जिनेश्वर जे अजीत, जे जीत भये भव ते अतीत ॥

जय सम्भव जिन भव कूप मांहि, डूबत राखहूँ तुम शर्ण आंहि ।जय अभिनंदन आनंद देत, ज्यों कमलोें पर रवि करत हेत ॥

जय सुमति सुमति दाता जिनन्द, जै कुमति तिमिर नाशन दिनन्द ।जय पद्मालंकृत पद्मदेव, दिन रयन करहुँ तव चरन सेव ॥

जय श्री सुपार्श्र्व भवपाश नाश, भवि जीवन कूँ दियो मुक्तिवास ।जय चंद्र जिनेश दया निधान, गुण सागर नागर सुख प्रमान ॥

जय पुष्पदंत जिनवर जगीश, शत इंद्र नमत नित आत्मशीश ।जय शीतल वच शीतल जिनंद, भवताप नशावत जगत चंद ॥

जय जय श्रेयांस जिन अति उदार, भवि कंठ माँहि मुक्ता सुहार ।जय वासुपूज्य वासव खगेश, तुम स्तुति करि नमि हैं हमेश ॥

जय विमल जिनेश्वर विमलदेव, मल रहित विराजत करहुँ सेव ।जय जिन अनंत के गुण अनंत, कथनी कथ गणधर लहे न अंत ॥

जय धर्म धुरंधर धर्मधीर, जय धर्म चक्र शुचि ल्याय वीर ।जय शांति जिनेश्वर शांतभाव, भव वन भटकत शुभ मग लखाव ॥

जय कुंथु कुंथवा जीव पाल, सेवक पर रक्षा करि कृपाल ।जय अरहनाथ अरि कर्म शैल, तपवङ्का खंड लहि मुक्ति गैल ॥

जय मल्लि जिनेश्वर कर्म आठ, मल डारे पायो मुक्ति ठाठ ।जय मुनिसुव्रत सुव्रत धरंत, तुम सुव्रत व्रत पालन महंत ॥

जय नम्मि नमत सुर वृन्द पाय, पद पंकज निरखत शीश नाय ।जय नेमि जिनेन्द्र दयानिधान, फैलायो जग में तत्त्वज्ञान ॥

जय पारस जिन आलस निवारि, उपसर्ग रुद्र कृत जीत धारि ।जय महावीर महा धीरधार, भवकूप थकी जग तैं निकार ॥

जय वर्ग आठ सुन्दर अपार, तिन भेद लखत बुध करत सार ।जय परम पूज्य परमेष्ठि सार, सुमरत बरसे आनंद धार ॥

जय दर्शन ज्ञान चरित्र तीन, ये रत्न महा उज्ज्वल प्रवीन ।जय चार प्रकार सुदेव सार, तिनके गृह जिन मंदिर अपार ॥

वे पूजें वसुविधि द्रव्य ल्याय, मैं इत जजि तुम पद शीश नाय ।जो मुनिवर धारत अवधि चारि, तिन पूजैं भवि भवसिन्धु पार ॥

जो आठ ऋद्धि मुनिवर धरंत, ते मौपे करुणा करि महन्त ।चौबीस देवि जिन भक्ति लीन, वंदन ताको सु परोक्ष कीन ॥

जे ह्रीं तीन त्रैकोण मांहि, तिन नमत सदा आनंद पांहि ।जय जय जय श्रीअरहंत बिम्ब, तिन पद पूजूँ मैं खोई डिंब ॥

जो दस दिग्पाल कहे महान्, जे दिशा नाम सो नाम जान ।जे तिनके गृह जिनराज धाम, जे रत्नमई प्रतिमाभिराम ॥

ध्वज तोरण घंटा युक्तसार, मोतिन माला लटके अपार ।जे ता मधि वेदी हैं अनूप, तहाँ राजत हैं जिन राज भूप ॥

जय मुद्रा शांति विराजमान, जा लखि वैराग्य बढ़े महान् ।जे देवी देव सु आय आय, पूजें तिन पद मन वचन काय ॥

जल मिष्ट सु उज्ज्वल पय समान, चंदन मलियागिरि को महान् ।जे अक्षत अनियारे सुलाय, जे पुष्पन की माला बनाय ॥

चरु मधुर विविध ताजी अपार, दीपक मणिमय उद्योतकार ।जे धूप सु कृष्णागरु सुखेय, फल विविध भाँति के मिष्ट लेय ॥

वर अर्घ अनूपम करत देव, जिनराज चरण आगे चढ़ेव ।फिर मुखतें स्तुति करते उचार, हो करुणानिधि संसार तार ॥

मैं दुःख सहे संसार ईश, तुमतैं छानी नांही जगीश ।जे इह विध मौखिक स्तुति उचार, तिन नशत शीघ्र संसार भार ॥

इह विधि जो जन पूजन कराय, ऋषिमंडल यंत्र सु चित्त लाय ।जे ऋषि मण्डल पूजन करंत, ते रोग शोक संकट हरंत ॥

जे राजा रण कुल वृद्धि जान, जल दुर्ग सुजग केहरि बखान ।जे विपत घोर अरु कहि मसान, भय दूर करै यह सकल जान ॥

जे राजभ्रष्ट ते राज पाय, पद भ्रष्ट थकी पद शुद्ध थाय ।धन अर्थी धन पावै महान्, या में संशय कछु नाहिं जान ॥

भार्या अर्थी भार्या लहन्त, सुत अर्थी सुत पावे तुरंत ।जे रूपा सोना ताम्र पत्र, लिख तापर यंत्र महा पवित्र ॥

ता पूजै भागे सकल रोग, जे वात पित्त ज्वर नाशि शोग ।तिन गृह तैं भूत पिशाच जान, ते भाग जांहि संशय न आन ॥

जे ऋषिमंडल पूजा करंत, ते सुख पावत कहिं लहै न अंत ।जब ऐसी मैं मन मांहि जान, तब भाव सहित पूजा सुठान ॥

वसुविधि के सुन्दर द्रव्य ल्याय, जिनराज चरण आग चढ़ाय ॥

फिर करत आरती शुद्ध भाव, जिनराज सभी लख हर्ष आव ।तुम देवन के हो देव देव, इक अरज चित्त में धारि लेव ॥

हे दीन दयाल दया कराव, जो मैं दुखिया इह जग भ्रमाय ।जे इस भववन मैं बास लीन, जे काल अनादि गमाय दीन ॥

मैं भ्रमत चतुर्गति विपिन मांहि, दुख सहे सुक्ख को लेश नांहि ।ये कर्म महारिपु जोर कीन, जे मनमाने ते दुःख दीन ॥

ये काहुू का नहि डर धराय, इनतैं भयभीत भयो अघाय ।यह एक जन्म की बात जान, मैं कह न सकत हूँ देवमान ॥

जब तुम अंनत परजाय जान, दरशायो संसृति पथ विधान ।उपकारी तुम बिन और नांहि, दीखत मोकों इस जगत मांहि ॥

तुम सब लायक ज्ञायक जिनंद, रत्नत्रय सम्पति द्यो अमंद ।यह अरज करूँ मैं श्री जिनेश, भव भव सेवा तुम पद हमेश ॥

भव भव में श्रावक कुल महान्, भव भव में प्रकटित तत्त्वज्ञान ।भव भव में व्रत हो अनागार, तिस पालन तैं हों भवाब्धि पार ॥

ये योग सदा मुझको लहान, हे दीनबंधु करुणा-निधान ।‘‘दौलत आसेरी’’ मित्र दोय, तुम शरण गही हरषित सुहोय ॥

घत्ता

जो पूजै ध्यावै, भक्ति बढ़ावै, ऋषिमंडल शुभ यंत्र तनी ।या भव सुख पावै सुजस लहावै परभव स्वर्ग सुलक्ष धनी ॥

पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय रोग-शोक-सर्व-संकट- हराय सर्व-शांतिपुष्टिकराय, श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकर, अष्ट वर्ग अरहंतादि पंच-पद, दर्शनज्ञानचारित्र, चतुर्णिकाय देव, चार प्रकार अवधिधारक श्रमण, अष्ट ऋद्धि संयुक्त ऋषि, बीस चार सूर, तीन ह्रीं, अर्हंतबिम्ब, दशदिग्पाल यंत्र संबंधि परमदेवाय जयमाला-पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

-आशीर्वाद-ऋषिमंडल शुभ यंत्र को, जो पूजे मन लाय ।ऋद्धि सिद्धि ता घर बसै, विघन सघन मिट जाय ॥

विघन सघन मिट जाय, सदा सुख सो नर पावै ।ऋषिमंडल शुभ यंत्र तनी, जो पूज रचावै ॥

भाव भक्ति युत होय, सदा जो प्राणी ध्यावै ।या भव में सुख भोग, स्वर्ग की सम्पत्ति पावै ॥

या पूजा परभाव मिटे, भव भ्रमण निरन्तर ।यातैं निश्चय मानि करो, नित भाव भक्तिधर ॥

॥ इत्याशीर्वादः । पुष्पांजलिं क्षिपेत् ॥

॥ जय जिनेन्द्र ॥