जिनेन्द्र वाणी

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स्थापना

आठ करोड़रु छप्पनलाख, सहस सत्याणव चतुशतभाख ।जोड़ इक्यासी जिनवर थान, तीन लोक आह्वान करान ॥1॥

आह्वाननॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट् पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयानि अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

अष्टक

क्षीरोदधिनीरं, उज्ज्वल सीरं, छान् सुचीरं, भरि झारी ।अति मधुर लखावन परमसुपावन, तृषाबुझावन गुणभारी ॥

वसुकोटि सु छप्पन लाख सताणव, सहस चारशत इक्यासी ।जिनगेह अकीर्तिम तिहुं जग भीतर, पूजत पद लेऊ अविनाशी ॥

जलॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो जलं नि. ।

मलयागिरि पावन चंदन बावन, तापबुझावन घसि लीनो ।धरि कनककटोरी द्वैकर जोरी, तुमपदओरी चितदीनो । वसु…

चंदनॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो चन्दनं नि. ।

बहु भांति अनोखे तंदुल चोखे, लखि निरदोखे हम लीने ।धरि कंचन थाली तुमगुणमाली, पुंजविशाली कर दीने । वसु…

अक्षतॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो अक्षतं नि. ।

शुभ पुष्पसुजाती है बहुभांति, अलि लिपटाती लेय वरं ।धरि कनक-रकेबी करगह लेवी, तुम पदजुगकी भेटधरं । वसु…

पुष्पॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो पुष्पं नि. ।

खुरमा जु गिंदोडा बरफी पेड़ा, घेवर मोदक भरि थारी ।विधिपूर्वक कीने घृतमय भीने, खंड में लीने सुखकारी । वसु…

नैवेद्यॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो नैवेद्यं नि. ।

मिथ्यात महातम छाय रह्यो हम, निजभव परणति नहिं सूझै ।इह कारण पाकै दीप सजाकै, थाल भराकैं हम पूजें । वसु…

दीपॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो दीपं नि. ।

दशगंध कुटाके धूप बनाके, निजकर लेके धरि ज्वाला ।तसु धूम उड़ाई दशदिशि छाई, बहु महकाई अति आला । वसु…

धूपॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो धूपं नि. ।

बादाम छुआरे श्रीफल धारे, पिस्ता प्यारे द्राख वरं ।इन आदि अनोखे लखि निरदोखे, थालसंजोखै भेट धरं । वसु..

फलॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो फलं नि. ।

जल चंदन तदुंल कुसुम रुनेवज, दीप धूप फल थाल रचौं ।जयघोष कराऊँ बीन बजाऊँ, अर्घ चढ़ाऊँ प्रभु खूब नचौं । वसु…

अर्घ्यॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिमजिन-चैत्यालयेभ्यो अर्घ्य नि. ।

अधोलोक जिन आगम साख, सात कोड़ि अरु बहतर लाख ।श्री जिनभवन महा छवि देई, ते सब पूजौं वसुविधि लेई ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं अधोलोक सम्बन्धि सप्तकोटि-द्विसप्तति-क्षलाकृत्रिम श्रीजिन-चैत्यालयेभ्यो अर्घ्य नि. ॥

मध्यलोक जिन मंदिर ठाठ, साढैं चार शतक अरु आठ ।ते सब पूजों अर्घ चढ़ाय, मन वच तन त्रय जोगमिलाय ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं मध्यलोक सम्बन्धि चतु शताष्टपंचाशत श्रीजिन-चैत्यालयेभ्यो अर्घ्य नि. ।

ऊर्ध्वलोक के माहिं भवन जिन जानिये,लाख चौरासी सहस सत्यानव मानिये ।तापे धरि तेईस जजों शिरनायकैं,कंचन थालमझार जलादिक लायकैं ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं ऊर्ध्वलोक सम्बन्धि चतुरशीतिलक्ष सप्तनवतिसहस त्रयोविंशति श्रीजिन-चैत्यालयेभ्यो अर्घ्यं ।

वसुकोटि छप्पन लाख ऊपर, सहस सत्याणव मानिये ।शतच्यार पै गिनले इक्यासी, भवन जिनवर जानिये ।तिहुं लोक भीतर सासते, सुर-असुर-नर पूजा करैं ।तिन भवन को हम अर्घ लेकै, पूजि है जग दुख हरैं ॥

ॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि - षट्पंचाशल्लक्ष - सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिम

-जिन-चैत्यालयेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि. ।

जयमाला

दोहा

अब वरणूं जय मालिका, सुनो भव्य चितलाय ।जिनमंदिर तिहुं लोक के, देहुं सकल दरशाय ॥

जय अमल अनादि अनंतजान, अनिमितजु अकीर्तमअचल मान ।जय अजय अखण्ड अरूपधार, षट् द्रव्य नहीं दीसै लगार ॥

जय निराकार अविकार होय, राजत अनंत परदेस सोय ।जय शुद्धसुगुण अवगाहपाय, दशदिशामाहिं इह विध लखाय ॥

यह भेद अलोकाकाश जान, तामध्य लोक नभ तीन मान ।स्वयमेवबन्यौ अविचल अनन्त, अविनाशि अनादिजु कहत संत ॥

पुरुषाकार ठाडो निहार, कटि हाथ धारि द्वैपग पसार ।दक्षिन - उत्तरदिशि सर्व ठौर, राजू जु सात भाख्यो निचोर ॥

जय पूर्व अपरदिशि घाट बाधि, सुन कथन कहूं ताकोजु साधि ।लखि श्वभ्रतले राजू जु सात, मधिलोक एक राजु रहात ॥

फिर ब्रह्मसुरग राजू जु पांच, भू सिद्ध एक राजू जु सांच ।दश चार ऊंच राजू गिनाय, षट्द्रव्य लये चतुकोण पाय ॥

तसु वातवलय लपटाय तीन, इह निराधार लखियो प्रवीन ।त्रसनाडी तामधि जान खास, चतुकोन एक राजू जु व्यास ॥

राजु उतंग चौदह प्रमान, लखि स्वयं सिद्ध रचना महान् ।तामध्य जीव त्रस आदि देय, निज थान पाय तिष्ठे भलेय ॥

लखि अधो भाग में श्वभ्रथान, गिन सात कहे आगम प्रमान ।षट् थानमाहिं नारकी बसेय, इक श्वभ्रभाग फिर तीन भेय ॥

तसु अधोभाग नारकी रहाय, पुनिऊर्ध्वभाग द्वय थानपाय ।बस रहे भवन व्यंतरजु देव, पुर हर्म्य छजै रचना स्वमेव ॥

तिहथान गेह जिनराजभाख, गिन सातकोटि बहत्तर जुलाख ।ते भवन नमों मनवचन काय, गतिश्वभ्रहरण हारे लखाय ॥

पुनि मध्यलोक गोलाअकार, लखिदीप उदधि रचना विचार ।गिन असंख्यात भाखे जुसंत, लखि संभुरमन सबके जु अंत ॥

इक राजूव्यास में सर्व जान, मधिलोक तनों इह कथन मान ।सब मध्य द्वीप जम्बू गिनेय, त्रयदशम रूचिकवर नाम लेय ॥

इन तेरह में जिनधाम जान, शतचार अठावन है प्रमान ।खग देव असुर नरआय आय, पद पूज जाय शिर नायनाय ॥

जय ऊर्ध्वलोक सुर कल्पवास, तिह थानछजे जिन भवन खास ।जय लाख चौरासी पैं लखेय, जय सहस सत्याणव और ठेय ॥

जय बीसतीन पुनि जोड़देय, जिन भवन अकीर्तम जान लेय ।प्रतिभवन एक रचना कहाय, जिन बिंब एक शत आठ पाय ॥

शतपंच धनुष उन्नत लसाय, पदमासनयुत वर ध्यान लाय ।शिरतीन छत्र शोभित विशाल, त्रयपादपीठ मणिजडितलाल ॥

भामण्डल की छवि कौन गाय, पुनिचंवरढुरत चौंसठि लखाय ।जय दुन्दुभिरव अद्भुत सुनाय, जय पुष्पवृष्टि गंधोदकाय ॥

जयतरुअशोक शोभा भलेय, मंगल विभूति राजत अमेय ।घटतूप छजे मणिमाल पाय, घटधूम्रधूम्र दिग सर्व छाय ॥

जयकेतुपंक्ति सोहे महान्, गन्धर्व देव गन करत गान ।सुर जन्मलेतलखि अवधिपाय, तिहँथान प्रथम पूजन कराय ॥

जिनगेहतनो वरनन अपार, हम तुच्छबुद्धिकिम लहतपार ।जयदेव जिनेसुर जगतभूप, नमि ‘नेम’ मंगै निज देहुरूप ॥

दोहा

तीनलोक में सासते, श्रीजिन भवन विचार ।मनवचतन करि शुद्धता, पूजों अरघ उतार ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं त्रैलोक्य सम्बन्ध्यष्टकोटि षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र चतु शतैकाशीति अकृत्रिम श्रीजिन-चैत्यालयेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

तिहूं जगभीतर श्रीजिनमंदिर, बने अकीर्तम अति सुखदाय ।नर सुर खगकरि बंदनीक जे, तिनको भविजन पाठ कराय ॥

धन-धान्यादिक सम्पति तिनके, पुत्र-पौत्र सुख होत भलाय ।चक्रीसुर खग इन्द्र होयके, करम नाश शिवपुर सुख थाय ॥

इत्याशीर्वादः ।

॥ जय जिनेन्द्र ॥