जिनेन्द्र वाणी

समाधिमरण पाठ

पं. द्यानतराय · पाठ एवं स्तोत्र

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गौतम स्वामी बन्दौं नामी मरण समाधि भला है ।मैं कब पाऊँ निस दिन ध्याऊँ गाऊँ वचन कला हैं ॥

देव धरम गुरु प्रीति महादृढ़ सप्त व्यसन नहिं जाने ।त्यागि बाईस अभक्ष संयमी बारह व्रत नित ठाने ॥

चक्की उखरी चूलीं बुहारी पानी बस न विराधै ।बनिज करे पर द्रव्य हरे नहिं छहों करम इमि साधै ॥

पूजा शास्त्र गुरुन की सेवा संयम तप चहुँ दानी ।पर उपकारी अल्प अहारी सामायिक विधिज्ञानी ॥

जाप जपै तिहुँ योग धरे दृढ़ तन की ममता टारै ।अन्त समय वैराग्य सम्हारे ध्यान समाधि विचारै ॥

आग लगे अरु नाव डुबै जब धर्म विघन जब आवै ।चार प्रकार अहार त्यागि के मन्त्र सुमन में ध्यावै ॥

रोग असाध्य जहाँ बहु देखे कारण और निहारै ।बात बड़ी है जो बनि आवै भार भवन को डारै ॥

जो न बने तो घर में रह करि सबसों होय निराला ।मात पिता सुत तिय को सौंपे निज परिग्रह अहि काला ॥

कुछ चैत्यालय कुछ श्रावकजन कुछ दुखिया धन देई ।क्षमा क्षमा सबही सों कहिके मन की शल्य हनेई ॥

शत्रुन सों मिलि निजकर जोरै मैं बहु करि है बुराई ।तुम से प्रीतम को दुख दीने ते सब बकसो भाई ॥

धन धरती जो मुख सों मांगे सो सब दे संतोषै ।छहों काय के प्राणी ऊपर करुणा भाव विशेषै ॥

ऊँच नीच घर बैठ जगह इक कुछ भोजन कुछ पय लै ।दूधाधारी क्रम क्रम तजिके छाछ अहार पहेलै ॥

छाछ त्यागि के पानी राखै पानी तजि संथारा ।भूमि माँहि थिर आसन मांडे साधर्मी ढिंग प्यारा ॥

जब तुम जानो यह न जपै है तब जिनवाणी पढिए ।यों कहि मौन लियो सन्यासी पंच परम पद गहिए ॥

चौ आराधन मन में ध्यावै बारह भावन भावै ।दशलक्षण मन धर्म विचारै रत्नत्रय मन ल्यावै ॥

पैंतीस सोलह षट् पन चारों दुई इक बरन विचारै ।काया तेरी दुखकी ढेरी ज्ञानमयी तू सारै ॥

अजर अमर निज गुण सो पूरे परमानन्द सुझावै ।आनन्दकन्द चिदानन्द साहब तीन जगतपति ध्यावै ॥

क्षुधा तृषादिक होय परीषह सहै भाव सम राखै ।अतीचार पाँचों सब त्यागैं ज्ञान सुधारस चाखै ॥

हाड़ मांस सब सूखि जाय जब धर्म लीन तन त्यागै ।अद्भुत पुण्य उपाय सुरग में सेज उठै ज्यों जागै ॥

तहँ तें आवै शिवपद पावै विलसैं सुक्ख अनन्तो ।‘द्यानत’ यह गति होय हमारी जैन धर्म जयवन्तो ॥

॥ जय जिनेन्द्र ॥