जिनेन्द्र वाणी

श्री सम्मेदशिखर पूजन विधान

विधान पूजा

साइट में विधान खोलें

सम्मेदशिखर पूजा

# श्री सम्मेदशिखर पूजन

दोहा

सिद्ध क्षेत्र तीरथ परम, है उत्कृष्ट सुथान।शिखरसम्मेद सदा नमूँ, होय पाप की हानि॥अगनित मुनि जहंतै गये, लोक शिखर के तीर।तिनके पद-पंकज नमूँ, नाशौं भव की पीर॥

अडिल्ल

है उज्ज्वल यह क्षेत्र सु अति निरमल सही।परम पुनीत सुठौर महागुण की मही॥सकल सिद्धि दातार, महा रमणीक है।वन्दूँ निज सुख हेत अचल पद देत है॥

सोरठा

शिखरसम्मेद महान, जगमें तीर्थ प्रधान है।महिमा अद्भुत जान, अल्पमती मैं किम कहूँ॥

चाल सुन्दर छन्द

सरस उन्नतक्षेत्र प्रधान है, अति सु उज्ज्वल तीर्थ महान है।करहिं भक्ति सु जे गुण गायकै, लहहिं सुख शिव के सुख जायकै॥

अडिल्ल

सुर नर हरि इन आदि और वंदन करैं।भवसागर से तिरैं नहीं भव में परैं॥जन्म-जन्म के पाप सकल छिन में टरैं।सुफल होय तिन जन्म शिखर दरशन करैं॥गिर सम्मेद तैं बीस जिनेश्वर शिव गये।और असंख्या मुनि तहाँ ते सिध भये॥वन्दूँ मन-वच-काय नमूँ शिर नायकै।तिष्ठो श्री महाराज सबै इत आयकै॥

श्री सम्मेदशिखर सदा, पूजूँ मन-वच-काय ।हरत चतुरगति दुःख को, मन वाँछित फलदाय ॥

आह्वाननॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराणामसंख्यातमुनिवराणाञ्च निर्वाणभूमि सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।

स्थापनॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराणामसंख्यातमुनिवराणाञ्च निर्वाणभमि सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।

सन्निधिकरणॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराणामसंख्यातमुनिवराणाञ्च निर्वाणभूमि सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

गीता छन्द

सोना झारी रतन जड़िये माँहि गंगाजल भरों ।जिनराज चरण चढ़ाय भविजन जन्म-मृत्यु-जरा हरों ॥संसार उदधि उबारने को लीजिये सुध भाव सों ।सम्मेदगिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों ॥

जलॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

जाकी सुगन्ध थकी अहो अलि गुंजते आवे घने ।सो मलय संग घसाय केसर पूज पद जिनवर तने ॥भवाताप निवारने को लीजिये सुध भाव सों ।सम्मेद गिरपर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों ॥

चंदनॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।

अक्षत अखंडित अतिहि सुन्दर ज्योति शशिसम लीजिये ।शुभ शालि उज्ज्वल तोय धोय सु पूज प्रभु पद कीजिये ॥पद अक्षयकारण लेय भविजन शुद्ध निरमल भाव सों ।सम्मेदगिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों ॥

अक्षतॐ ह्री विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

है मदन दुष्ट अत्यन्त दुर्जय हते सबके प्रान ही।ताके निवारण हेत कुसुम मंगाय रंजन घ्रान ही॥जाकी सुवास निहार षटपद दौरि आवै चाव सों।सम्मेदगिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों॥

पुष्पॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

रसपूर रसना घ्रान रंजन चक्षु प्रिय अति मिष्ट ही।जिनराज चरण चढ़ाय उत्तम क्षुधा होवे नष्ट ही॥भरि थाल कंचन विविध व्यंजन लीजिये सुध भाव सों।सम्मेदगिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों॥

नैवेद्यॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

त्रैलोक्यगर्भित ज्ञान जाको मोह निजवस कर लियो।अज्ञान तममें पड्यो चेतन चतुरगति भरमन कियो॥छिन माँहि मोह विध्वंस होवै आरती कर चाव सों।सम्मेदगिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों॥

दीपॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

शुभ अगर अम्बर वास सुन्दर धूप प्रभु ढिग खेवही।ए दुष्ट कर्म प्रचण्ड तिनको होय ततछिन छेवही॥सो धूप वसु विधि जरत कारण लीजिये सुध भाव सों।सम्मेदगिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों॥

धूपॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

बादाम श्रीफल लौंग पिस्ता लेय शुद्ध सम्हालही।सहकार दाख अनार केला तुरत टूटे डाल ही॥

भवि लेय उत्तम हेत सिवके छूट विधि के दाव सों ।सम्मेदगिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों ॥

फलॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

छप्पय

जन्म मृत्यु जल हरैं, गंध आताप निवारै ।तन्दुल पद के अक्षय मदन कूं सुमन विदारै ॥क्षुधा हरन नैवेद्य दीप तें ध्वान्त नसावै ।धूप दहै वसु कर्म मोक्ष सुख फल दरसावै ॥ए वसु द्रव्य मिलायकै अर्घ्य रामचन्द्र कीजिये ।कर पूजा गिरशिखर की नरभव का फल लीजिये ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं विंशतितीर्थंकराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्योऽनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रत्येक अर्घ्य

सोरठा

सकल कर्म हनि मोक्ष, परिवा सित बेसाख की ।जजौं चरण गुण घोख, गये समेदाचल थकी ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रज्ञानधरकूटतैं श्रीकुन्थुनाथजिनेन्द्रादिमुनि छयानवे कोड़ाकोड़ी छयानवे कोडि बत्तीसलाख छयानवे हजार सातसौ बियालीस सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दोहा

जेठ सुकल चउदस दिवस, मोक्ष गये भगवान ।जजौं धर्म जिन के चरण, कर करि बहु गणगान ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुदत्तकूटतैंधर्मनाथजिनेन्द्रादिमुनि उन्नीस कोडा कोडी उन्नीसकोडि नौलाख नौहजार सातसौ पंचानवे सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

चैत सुकल एकादशी, शिवपुर में प्रभु जाय।लहि अनन्त सुख थिर भये, आतमसूं लव ल्याय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रअविचलकूटतैंसुमतिनाथजिनेन्द्रादि मुनि एक कोडाकोडी चौरासीकोडि बहत्तरलाख इक्यासीहजार सातसौ सिद्धप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जेठ सुकल चउदस दिना, सकल कर्म क्षय कीन।सिद्ध भये सुखमय रहैं, हुए अष्टगुण लीन॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रशान्तिप्रभकूटतैं शान्तिनाथजिनेन्द्रादि मुनि नौकोडा- कोडी नौलाख नौहजार नौसौ निन्यानवे सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

बदि अषाढ़ अष्टमि दिवस, मोक्ष गये मुनि ईश।जजूँ भक्ति तें विमल प्रभु, अर्घ्य लेय नमि शीश॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवीरकुलकूटतैं श्रीविमलनाथजिनेन्द्रादि मुनि सत्तरको- डि सातलाख छहहजार सातसौ व्यालीस सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

फागुन सुदि सप्तमि दिना, हनि अघातिया राय।जगत फाँस कूं काटकै, मोक्ष गये जिनराय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रप्रभासकूटतैं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्रादि मुनि उनचास कोडाकोडि चौरासीकोडि बहत्तरलाख सातहजार सातसौ बियालिस सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चैत सुकल पंचमि दिना, हनि अघातिया राय।मोक्ष गये सुरपति जजैं, मैं जजहूँ गुणगाय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसिद्धवरकूटतैं अजितनाथजिनेन्द्रादि मुनि एक अरब अस्सीकोटि चौवनलाख सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

जुगल नाग तारे प्रभु, पार्श्वनाथ जिनराय।सावन सुदि सातें दिवस, लहे मुक्ति शिव जाय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवर्णकूटतैं श्रीपार्श्वनाथादिमुनि बियासी करोड़ चुरासी लाख तैंतालिसहजार सात[सैं] बियालीस सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सोरठा

हनि अघाति शिव थान, चतुर्दशी वैसाख वदि ।जजूं मोक्ष कल्यान, गये समेदाचल थकी ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रमित्रधाकूटतैं नमिनाथजिनेन्द्रादिमुनि नौसौकोड़ाकोड़ी एकअरब पैंतालिसलाख सातहजार नौसौ ब्यालिस सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

सरव करम हनि मोक्ष, चैत अमावस शिव गये ।मैं जजहूँ वसु धोक, चतुर निकाय सुरा जजैं ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रनाटककूटतैं अरनाथजिनेन्द्रादिमुनि निन्यानवेलाख निन्यानवैहजार सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दोहा

फागुन पंचमि सुकल ही, शेष कर्म हनि मोक्ष ।गए समेदाचल थकी, शिवपद हित गुण धोक ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसंवलकूटते श्रीमल्लिनाथतीर्थंकरादि छानवेकोड़ि मुनि सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

सोरठा

हनि अघाति शिवथान, सावन सुदि पूनम गए ।जजूँ मोक्षकल्यान, सुर नर खगपति मिलि जजैं ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसंकुलकूटतैं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्रादि मुनिछयानवे- कोडाकोडी छयानवेकोडि छयानवेलाख नवहजार पाँचसौबियालीस सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

गये पुष्प निरवान, भादव सुदि अष्टम दिना ।पूजूँ मोक्षकल्यान सब सुर मिल पूजा करी ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुप्रभकूटतैं पुष्पदन्तजिनेन्द्रादिमुनि एककोडाकोडी- निन्यानवेलाख सातहजार चारसौ अस्सी सिद्धपदप्राप्तेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

हनि अघाति जिनराय, चौथ कृष्ण फागुन विषैं ।जजूँ चरण गुणगाय, मोक्ष समेदाचल थकी ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रमोहनकूटतैं पद्मप्रभजिनेन्द्रादिमुनि निन्यानवेकोडि सतासीलाख तेतालीसहजार सातसौ नब्बे सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

हनि अघाति निरवान, फागुन द्वादशि कृष्ण ही ।जजूँ मोक्षकल्यान, गए सुरासुर पद जजों ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेनिर्जराकूटतैं मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्रादि मुनि निन्यानवै- कोड़ाकोड़ी सत्तानवे कोडि नौलाख नौसौ निन्यानवे सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

शेष कर्म हनि मोक्ष, फागुन सुकल जु सप्तमी ।जजूँ गुणनि के धोक, गये समेदाचल थकी ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रललितकूटतैं चन्द्रप्रभजिनेन्द्रादिमुनि चौरासीकोड़ाकोड़ी बहत्तरकोड़ि अस्सीलाख चौरासीहजार पाँचसौ पचपन सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

गये मोक्ष भगवान, अष्टम सित आसौज की ।देहु देहु शिवथान, वसु विधि पद पंकज जजूँ ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रविद्युतवरकूटतैं श्री शीतलनाथतीर्थंकरादि अठारह कोड़ाकोड़ि बयालीस कोडि बत्तीस लाख बयालिस हजार नौ सौ पाँच मुनि सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

दोहा

चैत कृष्ण पूनम दिवस, निज आतम को चीन ।मुक्ति स्थानक जायकैं, हुए अष्ट गुण लीन ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रस्वयंभूकूटतैं अनन्तनाथजिनेन्द्रादिमुनि छयानवे- कोड़ाकोडि सत्तरलाख सत्तरहजार सातसौ सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

शेष कर्म निरवान, चैत शुकल षष्टम विषैं ।जजों गुणोघ उचार, मोक्ष वरांगना पति भये ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रधवलकूटतैं सम्भवनाथजिनेन्द्रादिमुनि नौकोडा- कोडीबहत्तरलाखब्यालीसहजारपाँचसौ सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

अष्टम सित वैशाख की, गए मोक्ष हनि कर्म।जजूँ चरन उर भक्ति कर, देहु देहु निज धर्म॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रआनन्दकूटतैं अभिनन्दनजिनेन्द्रादिमुनि बहत्तरकोडा-कोडि सत्तरकोडि छत्तीसलाख व्यालीसहजार सातसौ सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चौपाई

माघ असित चउदश विधि सैन, हनि अघाति पाई शिव दैन।सुर नर खग कैलाश सुथान, पूजैं मैं पूजूँ धर ध्यान॥

दोहा

रिषभ देव जिन सिध भये, गिर कैलाश से जोय।मन-वच-तन कर पूज हूँ, शिखर नमूँ पद सोय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीआदिनाथतीर्थंकराद्यसंख्यमुनिवराणां निर्वाणभूमिकैलाशगिरि सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

वासुपूज्य जिनकी छबी, अरुन वरन अविकार।देहु सुमति विनती करूँ, ध्याऊँ भवदधितार॥वासुपूज्य जिन सिध भये, चम्पापुर से जेह।मन-वच-तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यतीर्थंकराद्यसंख्यमुनिवराणां निर्वाणभूमिचम्पापुर सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सुकल षाढ़ सप्तमि दिवस, शेष कर्म हनि मोक्ष।शिव कल्याण सुरपति कियो, जजूँ चरण गुण धोक॥नेमनाथ जिन सिद्ध भये, सिद्धक्षेत्र गिरनार।मन-वच-तन पद पूजहूँ, भवदधि पार उतार॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथतीर्थंकरादि बहत्तरकरोड सातसौ मुनिवराणां निर्वाण भूमिगिरनार-सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

कार्तिक वदि मावस गये, शेष कर्म हनि मोक्ष।पावापुरतें वीरजी, जजूँ चरण गुण धोक॥महावीर जिन सिद्ध भये, पावापुर से जोय।मन-वच-तन कर पूजहूँ, शिखर नमूँ पद दोय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानतीर्थंकराद्यसंख्यमुनिवराणां निर्वाणभूमि पावापुर सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सुधर्मादि गणेश गुरु, अन्तिम गौतम नाम।तिन सबकूँ लै अर्घ्य तै, पूजूँ सब गुणधाम॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीसुधर्मादिगौतमगणधराणां निर्वाणभूमि गुणावाग्रामोद्यानादि विभिन्न निर्वाणक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

या विधि तीर्थ जिनेश के, बन्दूँ शिखर महान।और असंख्य मुनीश जे, पहुँचे शिवपद थान॥सिद्ध क्षेत्र जे और हैं, भरत क्षेत्र के माँहि॥और जे अतिशय क्षेत्र हैं, कहे जिनागम माँहि॥तिनके नाम सु लेत ही, पाप दूर हो जाय।ते सब पूजूँ अर्घ्य ले, भव-भव को सुखदाय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीभरतक्षेत्रस्थ सिद्धक्षेत्रेभ्यो अतिशयक्षेत्रेभ्यश्च अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सोरठा

दीप अढ़ाई माँहि, सिद्धक्षेत्र जे ओर हैं।पूजूँ अर्घ्य चढ़ाय, भव भव के अघ नाश हैं॥

अडिल्ल

पूजूँ तीस चौबीस महासुख दाय जू।भूत भविष्यत वर्तमान गुण गाय जू॥कहे विदेह के बीस नमूँ सिरनाय जू।और अर्घ्य बनाय सु विघन पलाय जू॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री तीस चौबीसी और भूत, भविष्यत, वर्तमान और विदेह क्षेत्र के बीस जिनेन्द्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा

कृत्याकृत्यम जे कहे, तीन लोक के माँहि।ते सब पूजूँ अर्घ्य ले, हाथ जोर सिरनाय॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोक मध्यलोक पाताललोक सम्बन्धी चैत्यालयेभ्यो नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

तीरथ परम सुहावनूँ, शिखर सम्मेद विसाल।कहत अल्प बुधि युक्ति से, सुखदाई जयमाल॥

पद्धरि

जय प्रथम नमूँ जिन कुन्थदेव।जय धर्म तनि नित करत सेव॥जय सुमति सुमति सुध बुद्ध देत।जय शान्ति नमूँ नित शान्ति हेत॥ १॥

जय विमल नमूँ आनन्दकन्द।जय सुपार्स नमूँ हनि पास फन्द॥जय अजित गये शिव हानि कर्म।जय पास करी जुग उग्र सर्म॥ २॥

पश्चिम दिस जानूँ टोंक एव।बन्दे चहुँगति को होय छेव॥नर सुर पद की तो कौन बात।पूजे अनुक्रमतैं मुक्ति जात॥ ३॥

जय नेमि तनूं नित धरूँ ध्यान।जय अरि हर लीनों मुक्ति थान॥जय मल्लि मदन जय शील धार।जय श्रेयांस गये भव पार-पार॥ ४॥

जय पुष्प सुमति-दाता महेश।जय पद्म नमूँ तमहर दिनेश॥जय मुनिसुब्रत गुणगण गरिष्ट।जय चन्द्र करै आताप नष्ट॥५॥जय शीतल जय भवको आताप।जय अनन्त नमूँ नस जात पाप॥जय सम्भव भव की हरो पीर।जय अभय करो अभिनन्दन वीर॥६॥पूरब दिस द्वादस कूट जान।पूजन होवत है असुभ हान॥फिर मूल मन्दिर कूं करूँ प्रनाम।पावै शिवरमनी वेग धाम॥७॥श्री सिद्ध सु क्षेत्रं, अति सुख देतं, तुरतं भव-दधि पार करं।अरि कर्म बिनासन, शिव सुख कारन, जय गिरवर जगतातारं॥८॥

छप्पय

प्रथम कुन्थु जिन धर्म सुमति अरु शान्ति जिनन्दा।विमल सु पारस अजित पार्श्व मेटै भवफंदा॥श्री नमि अरह जु मल्लि श्रेयांस सुविधि निधिकन्दा।पद्मप्रभु महाराज और मुनिसुव्रत चन्दा॥शीतलनाथ अनन्त किन सम्भव जिन अभिनन्दनजी।बीस टोंक पर बीस जिनेश्वर भाव सहित नित वन्दनजी॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री विंशतितीर्थकराणामसंख्यमुनिवराणांच निर्वाणभूमि-सम्मेदशिखर- सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

सवैया इकतीसा

शिखर सम्मेद जी के बीस टोंक सब जान।तासो मोक्ष गये ताकी संख्या सब जानिये॥

चउदासौ कोडा कोड़ि पेंसठ ता ऊपर जोड़।छियालीस अरब ताको ध्यान हिये आनिये ॥बारा सै तिहत्तर कोड़ि लाख ग्यारासै बैयालीस।और सातसै चौंतीस सहस बखानिये ॥सैंकड़ा है सातसै सत्तर एते हुए सिद्ध।तिनकू सु नित्य पूज पाप कम हानिये ॥ १ ॥

दोहा

बीस टोंक के दरश फल, प्रोषध संख्या जान।एकसौ तेहत्तर मुनी, गुणसठ लाख महान ॥

(धत्तानन्द)ए बीस जिनेश्वर नमत सुरासुर मघवा पूजन कूं आवैं।नरनारी ध्यावैं सब सुख पावैं रामचन्द्र नित सिर नावैं ॥(इति पुष्पांजलिं क्षिपेत्)

देव-शास्त्र-गुरु अर्घ्य

क्षण भर निजरस को पी चेतन, मिथ्यामल को धो देता है।काषायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है ॥अनुपम सुख तब विलसित होता, केवल-रवि जगमग करता है।दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह ही अरहन्त अवस्था है ॥यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु, निज गुण का अर्घ्य बनाऊँगा।और निश्चित तेरे सदृश प्रभु, अर्हन्त अवस्था पाऊँगा ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्ध पूजा

# सिद्ध पूजन

दोहा

चिदानन्द स्वातमरसी, सत् शिव सुन्दर जान।ज्ञाता-दृष्टा लोक के, परम सिद्ध भगवान ॥

आह्वाननॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।

स्थापनॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।

सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते ! सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्

ज्यों-ज्यों प्रभुवर जल पान किया, त्यों-त्यों तृष्णा की आग जली।थी आश कि प्यास बुझेगी अब, पर यह सब मृगतृष्णा निकली ॥आशा-तृष्णा से जला हृदय, जल लेकर चरणों में आया।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिनेजन्म-जरा-मृत्युविनाशनायजलं नि. स्वाहा ।

तन का उपचार किया अब तक, उस पर चंदन का लेप किया।मल-मल कर खूब नहा करके, तन के मल का विक्षेप किया ॥अब आतम के उपचार हेतु, तुमको चन्दन सम है पाया।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

चंदनॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतयो सिद्धपरमेष्ठिने संसारतापविनाशनाय चन्दनं नि. स्वाहा ।

सचमुच तुम अक्षत हो प्रभुवर, तुम ही अखण्ड अविनाशी हो।तुम निराकार अविचल निर्मल, स्वाधीन सफल संन्यासी हो ॥ले शालिकणों का अवलम्बन, अक्षयपद ! तुमको अपनाया।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

अक्षतॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं नि. स्वाहा ।

जो शत्रु जगत का प्रबल काम, तुमने प्रभुवर उसको जीता।हो हार जगत के वैरी की, क्यों नहिं आनन्द बढ़े सब का ॥प्रमुदित मन विकसित सुमन नाथ, मनसिज को ठुकराने आया।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

पुष्पॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि. स्वाहा ।

मैं समझ रहा था अब तक प्रभु, भोजन से जीवन चलता है।भोजन बिन नरकों में जीवन, भरपेट मनुज क्यों मरता है ॥तुम भोजन बिन अक्षय सुखमय, यह समझ त्यागने हूँ आया।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

नैवेद्यॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि. स्वाहा।

आलोक ज्ञान का कारण है, इन्द्रिय से ज्ञान उपजता है।यह मान रहा था पर क्यों कर, जड़ चेतन-सर्जन करता है ॥मेरा स्वभाव है ज्ञानमयी, यह भेदज्ञान पा हरषाया।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

दीपॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि. स्वाहा।

मेरा स्वभाव चेतनमय है, इसमें जड़ की कुछ गंध नहीं।मैं हूँ अखण्ड चिद्पिण्ड चण्ड, पर से कुछ भी सम्बन्ध नहीं ॥यह धूप नहीं, जड़-कर्मों की रज आज उड़ाने मैं आया।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

धूपॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूपं नि. स्वाहा।

शुभ कर्मों का फल विषय-भोग, भोगों में मानस रमा रहा।नित नई लालसायें जागीं, तन्मय हो उनमें समा रहा ॥रागादि विभाव किए जितने, आकुलता उनका फल पाया।होकर निराश सब जगभर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

फलॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिनेमोक्षफल प्राप्तये फलं नि. स्वाहा।

जल पिया और चन्दन चरचा, मालायें सुरभित सुमनों की।पहनीं, तन्दुल सेये व्यंजन, दीपावलियाँ की रत्नों की ॥सुरभी धूपायन की फैली, शुभ-कर्मों का सब फल पाया।आकुलता फिर भी बनी रही, क्या कारण जान नहीं पाया ॥जब दृष्टि पड़ी प्रभुजी तुम पर, मुझको स्वभाव का भान हुआ।सुख नहीं विषय-भोगों में है, तुम को लख यह सद्ज्ञान हुआ ॥

जल से फल तक का वैभव यह, मैं आज त्यागने हूँ आया ।होकर निराश सब जग भर से, अब सिद्ध शरण में मैं आया ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा ।

जयमाला

दोहा

आलोकित हो लोक में, प्रभु परमात्म-प्रकाश ।आनन्दामृत पान कर, मिटे सभी की प्यास ॥

पद्धरि

जय ज्ञान मात्र ज्ञायक स्वरूप, तुम हो अनन्त चैतन्य रूप ।तुम हो अखण्ड आनन्द पिण्ड, मोहारि दलन को तुम प्रचण्ड ॥रागादि विकारी भाव जार, तुम हुए निरामय निर्विकार ।निर्द्वन्द निराकुल निराधार, निर्मम निर्मल हो निराकार ॥नित करत रहत आनन्द रास, स्वाभाविक परिणति में विलास ।प्रभु शिव-रमणी के हृदय हार, नित करत रहत निज में विहार ॥प्रभु भवदधि यह गहरो अपार, बहते जाते सब निराधार ।निज परिणति का सत्यार्थभान, शिवपद दाता जो तत्त्वज्ञान ॥पाया नहि मैं उसको पिछान, उल्टा ही मैंने लिया मान ।चेतन को जड़मय लिया जान, तन में अपनापा लिया मान ॥शुभ-अशुभ राग जो दुःखखान, उसमें माना आनन्द महान ।प्रभु अशुभ कर्मको मान हेय, माना पर शुभ को उपादेय ॥जो धर्म-ध्यान आनन्द रूप, उसको माना मैं दुःख स्वरूप ।मनवांछित चाहे नित्य भोग, उनको ही माना है मनोग ॥इच्छा-निरोध की नहीं चाह, कैसे मिटता भव-विषय-दाह ।आकुलतामय संसार सुख, जो निश्चय से है महा-दुःख ॥

उसकी ही निश-दिन करी आश, कैसे कटता संसार पाश ।भव-दुख का पर को हेतु जान, पर से ही सुख को लिया मान ॥मैं दान दिया अभिमान ठान, उसके फल पर नहिं दिया ध्यान ।पूजा कीनी वरदान माँग, कैसे मिटता संसार स्वाँग ॥तेरा स्वरूप लख प्रभु आज, हो गये सफल सम्पूर्ण काज ।मो उर प्रगट्यो प्रभु भेदज्ञान, मैंने तुम को लीना पिछान ॥तुम पर के कर्ता नहीं नाथ, ज्ञाता हो सब के एक साथ ।तुम भक्तों को कुछ नहीं देत, अपने समान बस बना लेत ॥यह मैंने तेरी सुनी आन, जो लेवे तुम को बस पिछान ।वह पाता है कैवल्यज्ञान, होता परिपूर्ण कला-निधान ॥विपदामय परपद है निकाम, निजपद ही है आनन्द-धाम ।मेरे मन में बस यही चाह, निजपद को पाऊँ हे जिनाह ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्य नि. स्वाहा ।

दोहा

पर का कुछ नहिं चाहता, चाहूँ अपना भाव ।निज-स्वभाव में थिर रहूँ मेटो सकल विभाव ॥(इति पुष्पांजलि क्षिपेत्)

महावीर स्वामी अर्घ्य

महावीर स्वामी का अर्घ्य

इस अर्घ्य का क्या मूल्य है, अनअर्घ्य पद के सामने ।उस परम-पद को पा लिया है, पतित पावन आपने ॥संतप्त-मानस शान्त हों, जिनके गुणों के गान में ।वे वर्द्धमान महान जिन, विचरें हमारे ध्यान में ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री महावीर-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

॥ जय जिनेन्द्र ॥