सम्यक्चारित्र पूजा
पं. द्यानतराय · पर्व पूजा
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दोहा
विषय-रोग औषध महा, दव-कषाय जल-धार ।तीर्थंकर जाको धरे सम्यक् चारित्र सार ॥
आह्वाननॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
स्थापनॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
सन्निधिकरणॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
अष्टक
सोरठा
नीर सुगन्ध अपार, तृषा हरे मल छय करे ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
जलॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥
जल केशर घनसार, ताप हरे शीतल करे ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
चंदनॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥
अछत अनूप निहार, दारिद नाशे सुख भरे ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
अक्षतॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥
पुहुप सुवास उदार, खेद हरे शुचि करे ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
पुष्पॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥
नेवज विविध प्रकार, छुधा हरे थिरता करे ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
नैवेद्यॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥
दीप-ज्योति तम-हार, घट-पट परकाशे महा ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
दीपॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥
धूप घ्रान-सुखकर रोग विघन जड़ता हरे ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
धूपॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥
श्रीफल आदि विथार निहचे सुर-शिव फल करे ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
फलॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥
जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल फूल चरु ।सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा ॥
अर्घ्यॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥
जयमाला
दोहा
आप आप थिर नियत नय, तप संजम व्यौहार ।स्व-पर-दया दोनों लिये, तेरहविध दुखहार ॥
चौपाई
सम्यक् चारित रतन संभालो, पांच पाप तजिके व्रत पालो ।पंचसमिति त्रय गुपति गहिजे, नरभव सफल करहु तन छीजे ।छीजे सदा तन को जतन यह, एक संजम पालिये ।बहु रुल्यो नरक-निगोद माहीं, विष-कषायनि टालिये ॥
शुभ करम जोग सुघाट आयो, पार हो दिन जात है ।द्यानत धरम की नाव बैठो, शिवपुरी कुशलात है ॥
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
समुच्चय-जयमाला
दोहा
सम्यक् दरशन-ज्ञान-व्रत, इन बिन मुकति न होय ।अन्ध पंगु अरु आलसी, जुदे जलैं दव-लोय ॥ 1 ।
चौपाई
जापै ध्यान सुथिर बन आवे, ताके करम-बंध कट जावें ।तासों शिव-तिय प्रीति बढ़ावे, जो सम्यक् रत्न-त्रय ध्यावें ॥2॥
ताको चहुं गति के दुख नाहीं, सो न परे भव-सागर माहीं ।जनम-जरा-मृतु दोष मिटावे, जो सम्यक् रत्न-त्रय ध्यावे ॥3॥
सोई दश लक्षनको साधे, सो सोलह कारण आराधे ।सो परमातम पद उपजावे, जो सम्यक् रत्न-त्रय ध्यावे ॥4॥
सो शक्र-चक्रिपद लेई, तीन लोक के सुख विलसेई ।सो रागादिक भाव बहावै, जो सम्यक् रत्न-त्रय ध्यावे ॥5॥
सोई लोकालोक निहारे, परमानंद दशा विस्तारे ।आप तिरै औरन तिरवावे, जो सम्यक् रत्न-त्रय ध्यावे ॥6॥
अर्घ्यॐ ह्रीं सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्रेभ्यः महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
दोहा
एक स्वरुप-प्रकाश निज, वचन कह्यो नहिं जाय ।तीन भेद व्योहार सब, द्यानत को सुखदाय ॥7॥
॥इत्याशिर्वाद ॥
॥पुष्पांजलि क्षिपित ॥
॥ जय जिनेन्द्र ॥