सम्यग्ज्ञान पूजा
पं. द्यानतराय · पर्व पूजा
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दोहा
पंच भेद जाके प्रकट, ज्ञेय-प्रकाशन-भान ।मोह-तपन-हर चंद्रमा, सोई सम्यक्ज्ञान ॥
आह्वाननॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)
स्थापनॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान! अत्र तिष्ट तिष्ट ठः ठः! (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)
अष्टक
सोरठा छन्द
नीर सुगंध अपार, तृषा हरे मल-छय करे ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
जलॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥
जल केसर घनसार, ताप हरे शीतल करे ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
चंदनॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥
अछत अनूप निहार, दारिद नाशे सुख भरे ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
अक्षतॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥
पुहुप सुवास उदार, खेद हरे मन शुचि करे ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
पुष्पॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥
नेवज विविधप्रकार, छुधा हरे थिरता करे ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
नैवेद्यॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥
दीप-जोति तम-हार, घट-पट परकाशे महा ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
दीपॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥
धूप घ्रान-सुखकार, रोग-विघन-जड़ता हरे ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
धूपॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥
श्रीफल आदि विथार, निहचे सुर-शिव-फल करे ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
फलॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञानाय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥
जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल-फूल चरु ।सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥
जयमाला
दोहा
आप आप-जाने नियत, ग्रन्थ-पठन व्यौहार ।संशय-विभ्रम-मोह-बिन, अष्ट-अंग गुनकार ॥
चौपाई मिश्रित गीताछंद
सम्यक् ज्ञान रतन मन भाया, आगम तीजा नैन बताया ।अक्षर शुद्ध अर्थ पहिचानो, अक्षर अरथ उभय संग जानो ॥
जानो सुकाल-पठन जिनागम, नाम गुरु न छिपाइये ।तप रीति गहि बहु मौन देके, विनय गुण चित लाइये ॥
ये आठ भेद करम उछेदक, ज्ञान-दर्पण देखना ।इस ज्ञान ही सों भरत सीझा, और सब पट-पेखना ॥
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
॥ जय जिनेन्द्र ॥