सम्यग्दर्शन पूजा
पं. द्यानतराय · पर्व पूजा
साइट में पूजा खोलेंस्थापना
दोहा
सिद्ध अष्ट -गुणमय प्रगट, मुक्त-जीव-सोपान ।ज्ञान चरित जिंह बिन अफल, सम्यक्दर्श प्रधान ॥
आह्वाननॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)
स्थापनॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन !अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः! (स्थापनम्)
सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)
अष्टक
सोरठा
नीर सुगंध अपार, तृषा हरे मल-छय करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥
जलॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥
जल केसर घनसार, ताप हरे शीतल करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥
चंदनॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥
अछत अनूप निहार, दारिद नाशे सुख भरे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥
अक्षतॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥
पुहुप सुवास उदार, खेद हरे मन शुचि करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥
पुष्पॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥
नेवज विविध प्रकार, छुधा हरे थिरता करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥
नैवेद्यॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥
दीप-ज्योति तमहार, घट-पट परकाशे महा ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥
दीपॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥
धूप घ्रान-सुखकार, रोग विघन जड़ता हरे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥
धूपॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥
श्रीफल आदि विथार, निहचे सुर-शिव-फल करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥
फलॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥
जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल फूल चरु ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अष्टांगसम्यग्दर्शनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥
जयमाला
दोहा
आप आप निहचै लखे, तत्त्व-प्रीति व्योहार ।रहित दोष पच्चीस हैं, सहित अष्ट गुन सार ॥1॥
चौपाई मिश्रित गीता छंद
सम्यक् दरशन-रत्न गहीजे, जिन-वच में संदेह न कीजे ।इहभव विभव-चाह दुःखदानी,परभव भोग चहे मत प्रानी ॥2॥
प्रानी गिलान न करि अशुचि लखि, धरम गुरु प्रभु परखिये ।पर-दोष ढंकिये धरम डिगते, को सुथिर कर हरखिये ॥3॥
चहुँसंघ को वात्सल्य कीजे, धरम की प्रभावना ।गुन आठ सों गुन आठ लहि के, इहाँ फेर न आवना ॥4॥
पूर्णार्घ्यॐ श्री अष्टांगसहित-पंचविंशति-दोषरहित-सम्यग्दर्शनाय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
॥ जय जिनेन्द्र ॥