जिनेन्द्र वाणी

सम्यग्दर्शन पूजा

पं. द्यानतराय · पर्व पूजा

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स्थापना

दोहा

सिद्ध अष्ट -गुणमय प्रगट, मुक्त-जीव-सोपान ।ज्ञान चरित जिंह बिन अफल, सम्यक्दर्श प्रधान ॥

आह्वाननॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)

स्थापनॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन !अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः! (स्थापनम्)

सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)

अष्टक

सोरठा

नीर सुगंध अपार, तृषा हरे मल-छय करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥

जलॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥1॥

जल केसर घनसार, ताप हरे शीतल करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥

चंदनॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥2॥

अछत अनूप निहार, दारिद नाशे सुख भरे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥

अक्षतॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥3॥

पुहुप सुवास उदार, खेद हरे मन शुचि करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥

पुष्पॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥4॥

नेवज विविध प्रकार, छुधा हरे थिरता करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा ॥

नैवेद्यॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥5॥

दीप-ज्योति तमहार, घट-पट परकाशे महा ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥

दीपॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥6॥

धूप घ्रान-सुखकार, रोग विघन जड़ता हरे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥

धूपॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥7॥

श्रीफल आदि विथार, निहचे सुर-शिव-फल करे ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥

फलॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥8॥

जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल फूल चरु ।सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजूं सदा ॥

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अष्टांगसम्यग्दर्शनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥9॥

जयमाला

दोहा

आप आप निहचै लखे, तत्त्व-प्रीति व्योहार ।रहित दोष पच्चीस हैं, सहित अष्ट गुन सार ॥1॥

चौपाई मिश्रित गीता छंद

सम्यक् दरशन-रत्न गहीजे, जिन-वच में संदेह न कीजे ।इहभव विभव-चाह दुःखदानी,परभव भोग चहे मत प्रानी ॥2॥

प्रानी गिलान न करि अशुचि लखि, धरम गुरु प्रभु परखिये ।पर-दोष ढंकिये धरम डिगते, को सुथिर कर हरखिये ॥3॥

चहुँसंघ को वात्सल्य कीजे, धरम की प्रभावना ।गुन आठ सों गुन आठ लहि के, इहाँ फेर न आवना ॥4॥

पूर्णार्घ्यॐ श्री अष्टांगसहित-पंचविंशति-दोषरहित-सम्यग्दर्शनाय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

॥ जय जिनेन्द्र ॥

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