श्री शांतिनाथ जिन पूजा
कविवर बख्तावरसिंह · तीर्थंकर पूजा
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सर्वारथ सुविमान त्याग गजपुर में आये ।विश्वसेन भूपाल तासु के नन्द कहाये ॥
पंचम चक्री भये मदन द्वादस में राजे ।मैं सेवूँ तुम चरण तिष्ठये ज्यों दुःख भाजे ॥
आह्वाननओं ह्रीं श्री शान्तिनाथ-जिनेन्द्रः अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
स्थापनओं ह्रीं श्री शान्तिनाथ-जिनेन्द्रः अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
सन्निधिकरणओं ह्रीं श्रीशान्तिनाथ-जिनेन्द्रः अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
अष्टक
अथ अष्टकपंचम उदधि तनो जल निरमल कंचन कलश भरे हरपाय ।धार देत हों श्रीजिन सन्मुख जन्म जरामृत दूर भगाय ॥
शांतिनाथ पंचम चक्रेश्वर द्वादश मदन तनो पद पाय ।तिन के चरण कमल के पूजे रोग शोक दुःख दारिद जाय ॥
जलओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं ॥1॥
मलियागिर चंदन कदली नंदन कुंकुम जल के संग घसाय ।भव आताप विनाशन कारण चरचूँ चरण सर्व सुखदाय ॥
शांतिनाथ॰
चंदनओं ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय संसार-ताप-विनाशनाय चंदनं ॥2॥
पुण्यराशि सम उज्ज्वल अक्षत शशि-मरीचि तसु देख लजाय ।पुंज किये तुम चरणन आगे अक्षय पद के हेतु वनाय ॥
शांतिनाथ॰
अक्षतओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ-जिनेन्द्राय अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतान् ॥3॥
सुर पुनीत अथवा अवनी के कुसुम मनोहर लिए मंगाय ।भेंट धरत तुम चरणन के ढिग ततक्षिन काम वाण नस जाय ॥
शांतिनाथ॰
पुष्पओं ह्रीं श्रीशान्तिनाथ-जिनेन्द्राय काम-वाण-विनाशनाय पुष्पं ॥4॥
भांति-भांति के सद्य मनोहर कीने मैं पकवान संवार ।भर थारी तुम सन्मुख लायो क्षुधा वेदनी वेग निवार ॥
शांतिनाथ॰
नैवेद्यओं ह्रीं शांतिनाथ-जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं 5 ।
घृत सनेह करपूर लाय कर दीपक ताके धरे प्रजार ।जग मग जोत होत मंदिर में मोह अंध को देत सुटार ॥
शांतिनाथ पंचम चक्रेश्वर द्वादश मदन तनो पद पाय ।तिनके चरण कमल के पूजे रोग शोक दुख दारिद जाय ॥
दीपओं ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं ॥6॥
देवदारु कृष्णागरु चन्दन तगर कपूर सुगन्ध अपार ।खेऊँ अष्ट करम जारन को धूप धनंजय मांहि सुडार ॥
शांतिनाथ॰
धूपओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय अष्ट कर्मदहनाय धूपं निर्व॰ ॥7॥
नारंगी वादाम सुकेला एला दाड़िम फल सहकार ।कंचन थाल मांहि धर लायो अरचत ही पाऊं शिव नार ॥
शान्तिनाथ॰
फलओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्व॰ ॥8॥
जल फलादि वसु द्रव्य संवारे अर्घ चढ़ाये मंगल गाय ।‘वखत रतन’ के तुम ही साहिब दीजे शिवपुर राज कराय ॥
शांतिनाथ॰
अर्घ्यओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घं निर्व॰ ॥9॥
पंचकल्याणक
छन्द उपगति
भादव सप्तमि श्यामा, सर्वारथत्याग नागपुर आये ।माता ऐरा नामा, मैं पूजूँ ध्याऊं अर्घ शुभलाये ॥
गर्भ कल्याणकओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय भाद्रपद कृष्ण सप्तम्यां गर्भकल्याण प्राप्ताय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ॥
जन्मे तीरथ नाथ, वर जेठ असित चतुर्दशी सोहै ।हरिगण नावें माथ, मैं पूजूँ शांतिचरण युग जोहै ॥
जन्म कल्याणकओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ-कृष्ण-चतुर्दश्यां जन्म-कल्याण प्राप्ताय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ॥
चौदस जेठ अघयारी, कानन में जाय योग प्रभु लीन्हा ।नवनिधिरत्न सुछारी, मैं वन्दूं आत्मसार जिन चीन्हा ॥
तप कल्याणकओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ-कृष्ण-चतुर्दश्यां तप-कल्याण प्राप्ताय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ॥
पौष दसें उजियारा, अरि घाति ज्ञान भानु जिन पाया ।प्रातिहार्य वसुधारा, मैं सेऊं सुर नर जासु यश गाया ॥
ज्ञान कल्याणकओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय पौष-शुक्ला-दशम्यां ज्ञान-कल्याण प्राप्ताय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ॥
सम्मेद शैलभारी, हन कर अघाति मोक्ष जिन पाई ।जेठ चतुर्दशि-कारी, मैं पूजूँ सिद्धथान सुखदाई ॥
ओं ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ-कृष्ण-चतुर्दश्यां मोक्ष-कल्याण प्राप्ताय अर्घं निवपामीति स्वाहा ॥
जयमाला
छप्पय छन्द
भये आप जिनदेव जगत् में सुख विस्तारे ।तारे भव्य अनेक तिन्हों के संकट टारे ॥
टारे आठों कर्म मोक्ष सुख तिनको भारी ।भारी विरद निहार लही मैं शरण तिहारी ॥
तिहारे चरणन को नमूं दुःख दारिद संताप हर ।हर सकल कर्म छिन एक में, शांति जिनेश्वर शांति कर ॥1॥
दोहा
सारंग लक्षण चरण में, उन्नत धनु चालीस ।हाटक वर्ण शरीर द्युति, नमूं शांति जग ईश ॥2॥
छन्द भुजंग-प्रयात
प्रभो आपने सर्व के फन्द तोड़े,गिनाऊं कछू मैं तिनों नाम थोड़े ।पड़ो अंवु के बीच श्रीपाल राई,जपो नाम तेरो भए थे सहाई ॥3॥
धरो रायने सेठ को सूलिका पै,जपी आपके नाम की सार जापै ।भये थे सहाई तवै देव आये,करी फूल वर्षा सिंहासन वनाये ॥4॥
जवै लाख के धाम वह्नि प्रजारी,भयो पाण्डवों पै महा कष्ट भारी ।जवै नाम तेरे तनी टेर कीनो,करी थी विदुर ने वही राह दीनो ॥5॥
हरी द्रोपदी धातुकी खंड मांही,तुम्हीं वहां सहाई भला और नाहीं ।लियो नाम तेरो भलो शील पालो,वचाई तहां ते सवै दुःख टालो ॥6॥
जवै जानकी राम ने जो निकारी,धरे गर्भ को भार उद्यान डारी ।रटो नाम तेरो सर्व सौख्यदाई,करी दूर पीड़ा सु क्षण ना लगाई ॥7 ।व्यसन सात सेवें करें तस्कराई,सुअ्रजन से तारे घड़ी ना लगाई ।सहे अंजना चंदना दुःख जेते,गये भाग सारे जरा नाम लेते ॥8॥
घड़े वीच में सास ने नाग डारो,भलो नाम तेरो जु सोमा संभारो ।गई काढ़ने को भई फूलमाला,भई है विख्यात सवै दुःख टाला ॥9॥
इन्हें आदि देके कहां लों वखानें,सुनो विरद भारी तिहूँ लोक जानें ।अजी नाथ मेरी जरा ओर हेरो,वड़ी नाव तेरी रती वोझ मेरो ॥1॰ ॥
गहो हाथ स्वामी करो वेग पारा,कहूँ क्या अवै आपनी मैं पुकारा ।सर्व ज्ञान के वीच भासी तुम्हारे,करो देर नाहीं मेरे शांति प्यारे ॥11॥
घत्ता
श्री शांति तुम्हारी, कीरत भारी, सुर नरनारी गुणमाला ।'बख्तावर’ध्यावे, रतन सु गावे, मम दुख दारिद सब टाला 12
अर्घ्यओं ह्रीं श्री शान्तिनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ-पद-प्राप्ताय महार्घं निर्वपामीति स्वाहा ॥
अजी एरा नन्दन छबि लखत ही आप अरण ।धरै लज्जा भारी करत श्रुति सो लाग चरण ॥
करै सेवा सोई लहत सुख सो सार क्षण में ।घने दीना तारे हम चहत हैं बास तिन में ॥
इत्याशीर्वाद ।
॥ जय जिनेन्द्र ॥