श्री शान्तिनाथ मण्डल विधान
श्री ताराचन्द्र जैन, रेवाड़ी · विधान पूजा
साइट में विधान खोलेंमंगलाष्टक
अर्हन्तो भगवन्त इन्द्रमहिताः सिद्धाश्च सिद्धीश्वरा,आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः, पूज्या उपाध्यायकाः।श्री सिद्धान्तसुपाठका मुनिवरा, रत्नत्रयाराधकाः,पञ्चैते परमेठिनः प्रतिदिनं, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥१॥श्रीमन्नम्र-सुरा-सुरेन्द्र-मुकुट, प्रद्योत-रत्नप्रभा,भास्वत्पादनखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः ।ये सर्वे जिन-सिद्ध-सूर्यनुगता-स्ते पाठकाः साधवः,स्तुत्या योगिजनैश्च पञ्चगुरवः, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥२॥सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तममलं, रत्नत्रयं पावनं,मुक्तिश्री नगराधिनाथ-जिनपत्युक्तोपवर्गप्रदः ।धर्मः सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं, चैत्यालयं श्रालयं,प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥३॥नाभेयादिजिनाः प्रशस्त-वदनाः, ख्याताश्चतुर्विंशतिः,श्रीमन्तो भरतेश्वर-प्रभृतयो, ये चक्रिणो द्वादश।ये विष्णु-प्रतिविष्णु लाङ्गलधराः, सप्तोत्तरा विंशतिस्,त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्टि-पुरुषाः, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥४॥
ये सर्वोषधि-ऋद्धयः सुतपसां, वृद्धिगताः पंच ये,ये चाष्टांग-महानिमित्तकुशलाः, चाष्टौ वियच्चारिणः ।पंचज्ञानधरास्त्रयोऽपि बलिनो, ये बुद्धिऋद्धीश्वराः,सप्तैते सकलार्चिता मुनिवराः, कुर्वन्तु ते मंगलम् ।।५ ।।ज्योतिर्व्यन्तर-भावनामरगृहे, मेरौ कुलाद्रौ स्थिताः,जम्बू-शाल्मलि-चैत्य-शाखिषु तथा, वक्षार रूप्याद्रिषु।इष्वाकार-गिरौ च कुंडल-नगे, द्वीपे च नंदीश्वरे,शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहा, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ६ ॥कैलासे वृषभस्य निर्वृतिमही, वीरस्य पावापुरे,चम्पायां वसुपूज्यसज्जिनपतेः, सम्मेदशैलेऽर्हताम् ।शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे, नेमीश्वरस्यार्हतो,निर्वाणावनयः प्रसिद्धविभवाः, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥७॥सर्पों हारलता-भवत्यसिलता, सत्पुष्पदामायते,सम्पद्येत रसायनं विषमपि, प्रीतिं विधत्ते रिपुः ।देवा यान्ति वशं प्रसन्नमनसः, किं वा बहु ब्रूमहे,धर्मादेव नभोऽपि वर्षति नगैः, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥८ ॥यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां, जन्माभिषेकोत्सवो,यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो, यः केवलज्ञानभाक्।यः कैवल्यपुर-प्रवेश-महिमा, सम्पादितः स्वर्गिभिः,कल्याणानि च तानि पंच सततं, कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥९॥इत्थं श्रीजिन-मङ्गलाष्टकमिदं, सौभाग्य-सम्पत्करं,कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्, तीर्थंकराणामुषः ।ये शृणवन्ति पठन्ति तैश्च सुजनै, र्धर्मार्थ कामान्विता,लक्ष्मीराश्रयते व्यपाय-रहिता, निर्वाण लक्ष्मीरपि ॥१०॥
इति मंगलाष्टकम्
विधान विधि
हस्त प्रक्षालन : ॐ ह्रीं असुजर सुजर स्वाहा।अमृत स्नान : (अंजुलि में जल लेकर इस मंत्र के साथ शरीर पर छिड़कें)
ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षणि अमृतं स्रावय स्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लू ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय सं हं इवीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा।
तिलक मंत्र :
ॐ ह्रां ह्रीं हूँ हौं हः असि आउ सा नमः मम/यजमानस्य सर्वांग शुद्धिं हेतवे नव तिलकं करोम्यहम्। (१. शिखा २. मस्तक ३. ग्रीवा ४. हृदय ५. भुजाद्वय ६. पीठ ७. कर्णद्वय ८. नाभि ९. हस्तद्वय।) दिगबंधन (प्रत्येक दिशा में मुष्टि बंद कर मंत्र के साथ पुष्प या सिद्धार्थ (पीला सरसों )
क्षेपित करें)
ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं ह्रां पूर्वदिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं हीं आग्नेयदिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ हूँ णमो आयरियाणं हूँ दक्षिणदिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं ह्रौं नैऋत-दिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रः णमो लोएसव्वसाहूणं हः पश्चिम-दिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं हां वायव्य दिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं उत्तर-दिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ हूँ णमो आयरियाणं हूँ ईशान-दिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं ह्रौं अधो-दिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रः णमो लोएसव्वसाहूणं हः ऊर्ध्व-दिशात् समागत-विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रां ह्रीं हूँ हौं हः णमो अरिहंताणं हां ह्रीं हूँ ह्रौं हः सर्वदिशतः समागत- विघ्नान् निवारय निवारय मां एतान् सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा। परिचारक मंत्र : ॐ नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूँ नमः स्वाहा। (सात बार)
रक्षा मंत्र : (इस मंत्र से पात्रों पर तीन बार पुष्पक्षेपण करना) ॐ हूँ धूं फट्किरिटिं किरिटिं घातय घातय परविघ्नान् स्फोटय स्फोटय सहस्रखण्डान् कुरु कुरुपरमुद्रां छिन्द छिन्द परमन्त्रान् भिन्द भिन्द क्षां क्षः वः वः हूँ फट् स्वाहा।शान्ति मंत्र :
ॐ नमोऽर्हते भगवते प्रक्षीणदोषकल्मषाय दिव्यतेजो मूर्तये नमः
श्रीशान्तिनाथाय शांतिकराय सर्वविघ्न प्रणाशनाय सर्वरोगापमृत्यु-विनाशनायसर्वपरकृत-क्षुद्रोपद्रव-विनाशनाय सर्वक्षाम-डामरविघ्न विनाशनाय सर्वारिष्टशांतिकराय ॐ ह्रां ह्रीं हूँ ह्रौं हः अ सि आ उ सा नमः सर्व शांतिं कुरु कुरु तुष्टिं पुष्टिंच कुरु कुरु स्वाहा।सकलीकरण(अंगुलियों में पंचपरमेष्ठी की स्थापना करना)
ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं हां अंगुष्ठभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ हूँ णमो आयरियाणं हूँ मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं हौं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ हः णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रः कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रां ह्रीं हूँ हौं हः करतलाभ्यां नमः।
ॐ ह्रां ह्रीं हूँ हौं हः करपृष्ठाभ्यां नमः ।
अंगशुद्धि(दोनों हाथों से अंग स्पर्श करें)
ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं हां मम शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ हूँ णमो आयरियाणं हूँ मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ हौं णमो उवज्झायाणं हौं मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रः णमो लोएसव्वसाहूणं हः मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं हां मम गात्रं रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वस्त्रं रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ हूँ णमो आयरियाणं हूँ मम पूजाद्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ हौं णमो उवज्झायाणं ह्रौं मम स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा।
ॐ ह्रः णमो लोएसव्वसाहूणं हः सर्वजगत् रक्ष रक्ष स्वाहा।
रक्षासूत्रबंधन मंत्र : ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा।यज्ञोपवीत धारण :
ॐ नमः परमशान्ताय शान्तिकराय पवित्रीकरणाय रत्नत्रय-स्वरूपं यज्ञोपवीतं दधामि मम गात्रं पवित्रं भवतु अर्ह नमः स्वाहा।
जल शुद्धि :
ॐ ह्रां ह्रीं हूँ हौं हः नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पद्म-महापद्म-तिंगिछ- केसरि-पुण्डरीक-महापुण्डरीक-गंगा-सिन्धु-रोहिद्रोहितास्या हरिद्धहरिकान्ता सीता सीतोदा नारी नरकान्ता सुवर्णकूला रूप्यकूला रक्ता रक्तोदा क्षीराम्भोनिधि-शुद्ध जलं सुवर्णघटं प्रक्षालित-परिपूरितं नवरत्न-गंधाक्षत-पुष्पार्चितममोदकं पवित्रं कुरु कुरु झं झं झौं झौं वं वं मं मं हं हं क्ष क्ष लं लं पं पं द्रां द्रां द्रीं द्रीं हं सः स्वाहा।
मंगलकलश स्थापन
ॐ ह्रीं अर्ह असिआउसा नमः मंगलकलशे पूंगादि फलानि प्रभृति वस्तूनि प्रक्षिपामीति स्वाहा। (मंगल कलश में सुपाड़ी, हल्दी आदि रखें)
ॐ क्षां क्षीं क्षं क्षे क्षै क्षों क्षौं क्षः नमोऽर्हते भगवते श्रीमते सर्व रक्ष रक्ष हूँ फट् स्वाहा। (मंगल कलश के ऊपर श्रीफल रखें)
ॐ श्रीमत् अर्हत् परमेश्वरोपदिष्ट-शिष्टेष्ट-इयामूलधर्म-प्रभावक-यष्ट- याजक-प्रभृति भव्यजनानां सद्धर्म-श्री-बलायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धिरस्तु। श्रीमज्जिनशासने भगवतो महति महावीर वर्द्धमान तीर्थंकरस्य धर्मतीर्थे श्री मूलसंघे कुन्दकुन्दाम्नाये मध्यलोके जम्बूद्वीपे सुदर्शन मेरोर्दक्षिण भागे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे भारतदेशे .... नगरे विविधालंकार मंडित यज्ञमण्डपे हुण्डावसर्पिणी काले दुःखमनाम्नि पंचम कालयुगे
प्रवर्तमाने ..... वीर निर्वाण संवत्सरे मासोत्तम मासे .... मासे... पक्षे .... तिथौ .... वासरेजिनप्रतिमायाः सन्निधौ। विधान निर्विघ्न समाप्त्यर्थं सकलाभ्युदय निःश्रेयस सिद्ध्यर्थंशुद्ध्यर्थं द्रव्यशुद्ध्यर्थं पात्र शुद्ध्यर्थं क्रिया शुद्ध्यर्थं शान्त्यर्थं पुण्याहवाचनार्थं नवरत्न-गंध-पुष्पाक्षतादि बीजपूर शोभित शुद्ध प्रासुक जल परिपूरितं मंगल कुम्भं मण्डपाग्रेस्वस्त्यै स्थापनं करोमि इवीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा। (मंगल कलश स्थापित करके चारोंकोनों पर कलश स्थापन करें)कुंभ-सूत्र बंधन :
आह्वाननॐ नमो भगवते असिआउसा ऐं ह्रीं ह्रां ह्रीं संवौषट् त्रिवर्णसूत्रेण शान्ति कुम्भं वेष्ट्यामि।
धूप घट स्थापन :(चारों दिशाओं में) ॐ ह्रीं अष्टकर्म भस्मीकरणाय सर्व दिग्वात सुगंधिकरणाय दशांग धूपक्षेपणार्थं ईशान आग्नेय नैऋत्य वायव्यकोणे धूपघट स्थापनंकरोमि स्वाहा।दीपक स्थापन :
ॐ ह्रीं अज्ञानतिमिर-हरं दीपकं स्थापयामि स्वाहा।
(अनंतर अभिषेक, शांतिधारा, विनयपाठ, पूजापीठिका, देवशास्त्रगुरुपूजा-बीसतीर्थंकर-अकृत्रिमचैत्यालय-चौबीसतीर्थंकर इन चार पूजाओं के अर्घ, सिद्धपूजा फिर शांतिविधान करें।)झल्लरी यंत्र
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा मम स सव्व पावप्पणासणो विघ्न हरणाय सकल शांतिनाथाय ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः एसो पंच णमोयारो
णमो लोएसव्वसाहूणंणमो सिद्धाणंणमोअरिहंताणं
मंगलाणं च सव्वेसिंसर्वोपद्रव शांति आरोग्यं लक्ष्मीआयरियाणंणमोउवज्झायाणं(पाठांतर):पढमं होवइ मंगलंइस झल्लरी यंत्र को तांबे की दो प्लेटों पर बनबाना चाहिये। एक परशांतिधारा करना चाहिये तथा दूसरा यंत्र जिस तरफ नहीं लिखा हो उस तरफलकड़ी के हत्थे से शांतिपाठ पढ़ते समय बजाना चाहिये। इससे सुभिक्ष, शांति,सद्भावना का प्रसार होता है।श्री शान्तिनाथ विधान भाषा (हिन्दी)प्रस्तावनाशंभू छंद :अरिहन्त जिनेश्वर की अनुपम छवि, शान्ति सुधा धर के उर में।शिवनाथ निरंजन कर्मजयी बन, जाय बसे प्रभु शिवपुर में ।।१।।मुनिनाथ तपोनिधि सूरि सुधी, तपलीन रहें नित ही वन में।श्रुत-ज्ञान-सुधा बरसावत हैं गुरु पाठकवृन्द सुभव्यन में ॥२॥रत्नत्रय की चिर ज्योति जगे, तप-ज्वाला कर्म विनाश करे।भव-भोग शरीर विरक्त सदा, इन्द्रिय सुख की नहिं आश करें ।।३।।गन्ध कुटी में विराजित प्रभु हैं, दिव्य ध्वनि उनकी तो खिरी।गणराज ने गूंथ के ज्ञान-सुमन, द्वादश अंगों की माल वरी ॥४॥मंगलमय लोक जिनोत्तम हैं, मंगलमय सिद्ध सनातन हैं।मंगलमय सूरि सुवृत्त धनी, मंगलमय पाठक के गन हैं ।।५।।
दोहा
मंगलमय हैं साधु जन, ज्ञान सुधा रस लीन।जिन प्रणीत वर धर्म है, मंगलमय स्वाधीन ॥६॥सब द्वीपों के मध्य में, जम्बू द्वीप अनूप।लवण नीर-निधि सर्वतः, जहाँ खातिका-रूप ।।७।।
सोरठा
पीछे धातकि-द्वीप है, दुतिय द्वीप श्रुति सार।कालोदधि चहुँ ओर है, परिखा के उनहार ॥८॥पुष्कर नामक द्वीप है, कालोदधि के पार।ताको आधौ भाग ले, ढाई द्वीप सम्हार ।।९।।
ढाई द्वीप त्रिकाल के, असंख्यात जिनराज ।वन्दनीय जे लोक के, वन्दों धर्म जहाज ।।१०।।
शंभू छंदचन्द्रकला सम ज्योति मनोहर, अंग प्रभु के राजत हैं।पद्म पुनीत-प्रभा-सम उज्ज्वल, देह मनोज्ञ विराजत हैं।॥कण्ठ- मयूर सुकञ्चन नीरद, तुल्य सुशोभित अंग विभा।तीर्थेश्वर चौबीस अलौकिक, रूप-विमुग्ध सुरेन्द्रसभा ।।११।।
दोहा
भूत भविष्यत वर्तमान के, चौबीसों जिनराज ।रत्नत्रय से भूषित अनुपम, जग में रहे विराज ।॥१२॥
गीता छंदाअरिहन्त सिद्ध त्रिलोक पूजित, धर्मध्वज आचार्य को।मुनिवृन्द के शिक्षाप्रदायक, पूज्यपाठक आर्य को ॥१३॥उन साधुओं को जो निरन्तर, ज्ञान-ध्यान-प्रवीन हैं।तप शान्ति की शुचि साधना में, जो सदा तल्लीन हैं ।।१४।।करके प्रणाम त्रियोग से मैं, शान्तिनाथ विधान को।प्रारंभ करता हूँ बढ़ाने, भक्ति-श्रद्धा-ज्ञान को ।।१५।।लोक के सब गणधरों को, भक्ति श्रद्धा भाव से।कुन्दकुन्दादिक दिगम्बर, मुनिवरों को चाव से ।।१६।।करता प्रणाम विनय सहित मैं, धर्म की हो नित विजय।निर्विघ्न हो यह पाठ पूरा, है यही मेरी विनय ।।१७।।
दोहा :शान्तिनाथ भगवान् के, गुण हैं अपरम्पार ।वाचस्पति वर्णन करें, तो भी पायें न पार ।।१८ ।।
माहात्म्य या फल
गीता छंद
यह शान्ति नाथविधान किसने, कब कहाँ क्यों कर किया।फल प्राप्ति जो उसको हुई, नरभव सफल उसने किया ।।१।।वृत्तान्त उसका मैं प्रसंग सहित यहाँ वर्णन करूँ ।कल्याण हो सुनकर जगत् का, ध्यान यह मन में धरूँ ॥२॥
शंभू छंदभरत-क्षेत्र के आर्य-खण्ड में, भारत भू विख्यात सुदेश।मथुरा नगर वहाँ का शासक, सूर्यवंश का तिलक नरेश ।।३।।राजनीति में निपुण न्यायप्रिय, वीर प्रजा का पालक भूप।साम-दाम के दण्ड भेद से, शासन-संचालक अनुरूप ।॥४॥एक बार जब दैवयोग से, दुर्विपाक ने किया प्रकोप ।ग्राम देवता ने क्रोधित हो, किया उपद्रव शान्ति विलोप ।।५।।महाभयंकर व्याधि विषम अति, फैलाई जब किन्नर ने।दिन-प्रतिदिन अतिप्रबल वेग से, लोग लगे प्रतिदिन मरने ॥६॥रोग प्रताड़ित हो जनता अरु, शासक ने मथुरा छोड़ी।व्याधी ने कालकृपाण लिए, सब जन की हिम्मत तोड़ी ।।७।।शुक्ल त्रयोदशी के दिन सहसा, सेठ सुमति वहाँ आए।।बादल वर्षा देख सर्वतः, मन में अति ही हर्षाए ॥८॥मथुरा नगरी में प्रवेश कर, मिले नहीं तहाँ नर-नारी।सूनी नगरी देख-सुमति तब, हुए दुखित मन में भारी ॥९॥देख जिनालय, पूज जिनेश्वर, मुनि नायक के युग वन्दे ।दर्शन वन्दन भक्ति विनय कर, निज मन में अति आनन्दे ॥१०॥
प्रश्न किया तब सेठ सुमति ने, नाथ उपाय बता दीजे।होगी शान्ति मुनीश्वर कैसे? विधिपूर्वक समझा दीजे ।।११।।चारण ऋद्धिधारी मुनिवर, कहे वचन अति सुखदाई।शान्तिनाथ जिन शान्ति विधायक, पूज रचो मन हर्षाई।।१२।।मंत्रोद्धार : ॐ नमोऽर्हते भगवते श्री शान्तिनाथाय ॐ ह्रां ह्रीं हूँ ह्रौं हः असिआ उ सा अमुकस्य (जाप करने वाले का नाम) सर्वोपद्रव शान्तिं लक्ष्मीलाभं चकुरु कुरु नमः (स्वाहा)।
विधान के जाप मंत्र का फलइस मन्त्र राज के जपने से, मन शुद्ध शान्त हो जाता है।होते हैं विघ्न विनष्ट सभी, शुभ पुण्यकोष भर जाता है ।।१३ ।।धन सम्पति अधिकार प्राप्त हो, यह तो है साधारण बात ।मन मन्दिर में ज्ञान सूर्य का, होता उज्वल दिव्य प्रभात ।।१४।।
विधान का समयइसका विधि विधान है भव्यो, सुनो शुद्ध मन से धर ध्यान ।सोलह दिवसी शुक्लपक्ष में, प्रथमदिवस से करो विधान ।।१५ ।।जिन पूजा के पूर्व यन्त्र का, संस्थापन पूजन शुभ कार्य।सहसमन्त्र का जाप करो नित, षोडसदिन तक सुविधि सुआर्य ।।१६।॥पूजा के मङ्गल विधान में, दीप धूप फल पुष्प सुगन्ध।भक्तिभावयुत करो समर्पित, अशुभकर्म का होय न बन्ध ।।१७।।
श्री शान्तिनाथ स्तवन
गीता छंद
संसार सागर में भटकते, प्राणियों को हे प्रभो !आपके ही युग चरणशुभ, शरण दे सकते विभो ।।
दावाग्नि दुख-संन्ताप की, सर्वत्र धू-धू जल रही।अनुराग माया मोह की छलना निरन्तर छल रही ।।१।।क्रोधित भुजंगम के डसे, बहु प्राणियों के गात्र में।गारुड़ी - विद्या प्रशम करती, है यथा क्षण मात्र में ॥प्रभु आपके चरणाम्बुजों का, ध्यान करते भक्ति से।सब विघ्न बाधाएँ विलय, होतीं निजातम शक्ति से ॥२॥
तप्त स्वर्ण के तुल्य आप के, दिव्य चरण का निर्मल ध्यान।भव-सागर में पड़े प्राणियों, के तारण हित बनता यान ।।
गीता छंद
ज्यों यामिनी के घन-तिमिर में, लुप्त भू-आलोक हो।उद्यद् दिवाकर रश्मियाँ, करतीं प्रकाशित लोक को ॥३॥जब तक नहीं होता उदय, रवि रश्मि का संसार में।तब तक कमलश्री सुप्त रहती, है सतत कासार में ।।जब तक नहीं होती कृपा, भगवान् के युगचरण की।तब तक नहीं यह टूटती, जंजीर जीवन-मरण की ॥४॥समरत्थ लोक-अलोक के, विज्ञान में जिनवर प्रभो।त्रयछत्र की सुषमा विराजित, ज्ञान में दिनकर प्रभो ।।हों पापक्षय क्षणमात्र में, पदपद्म के गुणगान से।दर्पान्ध सिंह-गजेन्द्र भागे, सहज जिनके ध्यान से ।।५।।प्रत्यूष वेला के ललित उज्ज्वल, दिवाकर सा विमल।जिननाथ भा-मण्डल तुम्हारा, सोहता स्वर्णिम कमल ॥दिव्यांगनाओं के नयन मन, कर प्रफुल्लित मोहता।त्रैलोक्य के तम-तोम को, करता विदूरित सोहता ॥६॥
बाधारहित शाश्वत निराकुल, अन्यतम सुख सम्पदा ।नाथ के चरणारविन्दों, के समागम से सदा ।।प्राप्त करते भक्त जन हैं, भक्ति के आधार से ।आश्चर्य क्या यदि पार हों, संसार- पारावार से ।।७।।हे शान्तिनाथ जिनेन्द्र तेरे, भक्त नित पाते कृपा।भवदुःख से सन्तप्त जनके, हेतु बन जाती प्रपा ।।दूर होते दुःख-दारुण, नाथ की शुभ भक्ति से।ज्यों घनतिमिर है दूर होता, रविकिरण की शक्ति से ॥८॥श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्र के, इस संस्तवन को भाव से।जो भव्यजन पढ़ते निरन्तर, हैं विनय से चाव से ।।परिणाम उनके हो विमल, सब विघ्न बाधाएँ टलें।कल्याण मन्दिर के पथिक वे, मुक्ति के पथ पर चलें ॥६॥
विधान प्रारम्भ
समुच्चय पूजा
समुच्चय पूजा - स्थापना
हे शान्तिप्रभो! हे शान्तिप्रभो! मेरे मन-मन्दिर में आओ।अघवर्गविनाशन-हेत प्रभो, निज शान्तदिव्यछवि दर्शाओ ।।१।।कर्मों के बन्धन खुलते हैं, प्रभु नाम निरन्तर जपने से ।।भव-भोग-शरीर विनश्वर तब, क्षण भंगुर लगते सपने से ।।२।।नरजन्म सफल हो जाता है, जब ध्यान हृदय में आता है।आतमस्वरूप में लीन हुआ, भव-सागर से तर जाता है।।३।।
आह्वाननॐ ह्रीं सर्वकर्मबन्धन विमुक्त ! सकलविघ्न शान्तिकर! मंगलप्रद! पंचमचक्रेश्वर! द्वादशकामदेव! अष्टप्रातिहार्यसंयुक्त! षोडशतीर्थङ्कर! श्रीशान्तिनाथ भगवन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
सन्निधिकरणस्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्। पुष्पांजलि क्षिपेत्।
अथ अष्टक
स्वर्ण कलश में जल ले जो, नित जिन पद पूजन करते हैं।निश्चय ही वे राजतिलक की, अनमोल सम्पदा वरते हैं ।।१ ।।
जलॐ ह्रां ह्रीं हूँ हौं हः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
केशर कर्पूर चन्दन द्वारा, जिनवर के चरणों का अर्चन ।जो करते हैं स्वर्गों तक में, सुरभित होते हैं उनके तन ॥२॥
चंदनॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रौं भ्रः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय संसारताप विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु के चरण कमल की पूजा, निर्मल अक्षत से करते।कामदेव सा पा शरीर, वे दीर्घ आयु जीवन धरते ।।३।।
अक्षतॐ म्रां म्रीं मूं म्रौं म्रः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
जो कुन्द चमेली के द्वारा, करते प्रभु पद पङ्कज- पूजन।वे पुष्पोत्तर विमान द्वारा, सम्पूर्ण सफल करते जीवन ॥४॥
पुष्पॐ रां रीं रूं रौं रः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय कामबाण- विध्वंनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
उज्वल स्वर्ण पात्र में लेकर, सद्य पक्व नैवेद्य विमल ।अर्पित करते प्रभु चरणों में, पा जाते कल्प वृक्ष के फल ॥५ ।।
नैवेद्यॐ घ्रां घ्रीं घूं घ्रौं घ्रः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उज्ज्वल कर्पूर दीप द्वारा, जिनवर की सौम्य आरती से।उद्गासित केवल जोति जगे, उसमें सन्दीस भारती से ।।६।।
दीपॐ झांझीं झू झौं झः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन कर्पूर धूप द्वारा, जिनवर की शुभ्र अर्चना से।पाऊँ निरोगतन कान्तिमयी, प्रभु की निशि याम वन्दना से ।।७।।
धूपॐ श्रीं श्रीं श्रृं श्रौं श्रः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
श्रीफल कदली इत्यादिक से, श्री जिनके चरणों का पूजन।वे मन वांछित फल पाते हैं, पूजन जो करते हैं भवि जन ।। ८ ।।
फलॐ खां खीं खूं खौं खः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट द्रव्य मय अर्घ्य विमल ले, शान्तिनाथ प्रभु का पूजन।करते हैं जो भव्य शतेन्द्रों, से वन्दित हों दिव्य चरण ॥६॥
अर्घ्यॐ अ हां सि हीं आ हूँ उ हौं सा हः जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
ज्ञानरूप ओंकार नमस्ते, ह्रीं मध्ये प्रभु शान्ति नमस्ते।स्नातकर्षि अरिहन्त नमस्ते, दया धर्म-परिपूर्ण नमस्ते ।।१।।एकानेक-स्वरूप नमस्ते, श्री मच्चक्राधीश नमस्ते ।शान्ति दीप्ति शिव रूप नमस्ते, ज्ञान गर्भ निज रूप नमस्ते ॥२॥नाना भाषा बोध नमस्ते, आशा पाश विहीन नमस्ते ।पावन-गुण गण गीत नमस्ते, अष्ट कर्म-विध्वंस नमस्ते ॥३॥तीर्थंकर पद पूत नमस्ते, पर संकल्प - विहीन नमस्ते।मुक्ति वधू के कन्त नमस्ते, सम्यक्चारित दक्ष नमस्ते ॥४॥आत्म स्वभावे लीन नमस्ते, रत्नत्रय संयुक्त नमस्ते ।आत्म बोध परिपूर्ण नमस्ते, उभय लोक सुखदाय नमस्ते ।।५।।
करुणा सागर नाथ नमस्ते, वाणी विश्व हिताय नमस्ते।शान्तिनाथ परमेश नमस्ते, तीव्र गरल - हर दक्ष नमस्ते ॥ ६ ॥कुरुवंशे अवतंस नमस्ते, ऋषि चित हर्षित करण नमस्ते।कुल क्रमकारि जिनेन्द्र नमस्ते, सदा विचित्र स्वरूप नमस्ते ।।७।।ह्रीं बीजे वरशायि नमस्ते, धीर वीर भुवनेन्द्र नमस्ते ।विघ्नविनाशक शांति नमस्ते, प्राणि नाथ तव नाम नमस्ते ॥८॥भय हर्ता निर्भीक नमस्ते, दिव्य धुनी शिव रूप नमस्ते।धर्म धुरंधर धीर नमस्ते, निज चैतन्ये लीन नमस्ते ।।६ ।।शान्ति जिनाष्टक को जो भविजन, धारे नित्य हृदय में।सुख सम्पति ऐश्वर्य प्राप्त हो, संशय नहीं विजय में ।।१०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं जगदापद्विनाशनाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्रथम वलय
प्रथम वलय पूजा प्रारम्भ
प्रथम वलयाष्ट - कोष्ठकोपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।हे शान्तिप्रभो! हे शान्तिप्रभो! मेरे मन-मन्दिर में आओ।अघवर्गविनाशन-हेत प्रभो, निज शान्तदिव्यछवि दर्शाओ।।१।।कर्मो के बन्धन खुलते हैं, प्रभु नाम निरन्तर जपने से ।।भव-भोग-शरीर विनश्वर तब, क्षण भंगुर लगते सपने से ।।२।।नरजन्म सफल हो जाता है, जब ध्यान हृदय में आता है।आतमस्वरूप में लीन हुआ, भव-सागर से तर जाता है ।।३।।
आह्वाननॐ ह्रीं सर्वकर्मबन्धन विमुक्त ! सकलविघ्न शान्तिकर! मंगलप्रद! पंचमचक्रेश्वर! द्वादशकामदेव! अष्टप्रातिहार्यसंयुक्त ! षोडशतीर्थङ्कर! श्रीशान्तिनाथ भगवन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्। पुष्पांजलि क्षिपेत्।प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्ता कर्म दलन ।हं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ।।१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं अशोकतरुसत्प्रातिहार्य मण्डिताय अशोकतरुयुक्तपदप्रदाय हम्व्य बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्त्ता कर्म दलन ।भं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ।।२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं सुरपुष्पवृष्टिसत्प्रातिहार्य मण्डिताय सुरपुष्पवृष्टियुक्तपदप्रदाय भ्म्ल्व्यू बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्त्ता कर्म दलन।मं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ।।३।।
अर्घ्यॐ ह्रीं दिव्यध्वनिसत्प्रातिहार्य मण्डिताय दिव्यध्वनियुक्तपदप्रदाय म्म्ल्व्यू बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्त्ता कर्म दलन ।रं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ॥४॥
अर्घ्यॐ ह्रीं चामरोत्तोलनसत्प्रातिहार्य मण्डिताय चामरोत्तोलनयुक्तपदप्रदाय र्म्ल्व्यू बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्त्ता कर्म दलन ।घं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ।।५ ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं सिंहासनसत्प्रातिहार्य मण्डिताय सिंहासनयुक्तपदप्रदाय घ्म्व्यू बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्त्ता कर्म दलन।झं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ॥६॥
अर्घ्यॐ ह्रीं भामंडल सत्प्रातिहार्य मण्डिताय भामंडल युक्तपदप्रदाय झम्व्यू बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्त्ता कर्म दलन ।सं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ।।७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं दुन्दुभिसत्प्रातिहार्य मण्डिताय दुन्दुभियुक्तपदप्रदाय स्म्ल्यूँ बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणि मात्र की बाधाओं के, हर्ता कर्त्ता कर्म दलन ।खं बीजाक्षर का आश्रय ले, करता शान्तिनाथ पूजन ॥८ ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं छत्रत्रयसत्प्रातिहार्य मण्डिताय छत्रत्रययुक्तपदप्रदाय खम्व्यू बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
ह भ म र घ झ स ख बीजयुत, वर्णन कर भरपूर ।स्तोत्र अर्घ्य से पूजते, विघ्न वर्ग हों दूर ।।६ ।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं अष्टप्रातिहार्य सहिताय अष्टबीजमंडनमण्डिताय सर्वविघ्नशांतिकराय श्रीशान्तिनाथाय पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
द्वितीय वलय
द्वितीय वलय पूजा प्रारम्भ
द्वितीय वलय-षोडशकोष्ठकोपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।हे शान्तिप्रभो! हे शान्तिप्रभो! मेरे मन-मन्दिर में आओ।अघवर्गविनाशन-हेत प्रभो, निज शान्तदिव्यछवि दर्शाओ।॥१॥कर्मो के बन्धन खुलते हैं, प्रभु नाम निरन्तर जपने से ।।भव-भोग-शरीर विनश्वर तब, क्षण भंगुर लगते सपने से ।।२।।
नरजन्म सफल हो जाता है, जब ध्यान हृदय में आता है।आतमस्वरूप में लीन हुआ, भव-सागर से तर जाता है ॥३॥
आह्वाननॐ ह्रीं सर्वकर्मबन्धन विमुक्त ! सकलविघ्न शान्तिकर! मंगलप्रद! पंचमचक्रेश्वर! द्वादशकामदेव ! अष्टप्रातिहार्यसंयुक्त ! षोडशतीर्थङ्कर! श्रीशान्तिनाथ भगवन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । पुष्पांजलि क्षिपेत्।भक्ति भाव युत प्रभु पूजन को, इन्द्र जिनालय जावें।तीर्थंकर पदवी के कारण, श्री जिनके गुण गावें ॥श्री जिन प्रभु के पद पङ्कज की, पूजा इन्द्र रचावें।दर्शन ज्ञान अनन्त सुखामृत, बल विक्रम वे पावें ।॥१॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे भरतैरावत-विदेहादि-शतैक-सप्तति- क्षेत्रार्यखण्डे भूत- भविष्यद्- वर्तमानसर्व अर्हत्परमेष्ठि- पदपंकजे सन्मति- सद्भक्त्युपेतामलतर-खण्डोज्झित-निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट कर्म से मुक्त निरंजन, सिद्ध स्वरूपी राजे।क्षायिक सम्यक् आदि गुणोत्तम, सीमातीत विराजें ।।भूत भविष्यत् वर्तमान के, सिद्ध अनन्त निरंजन ।निजस्वरूपमें लीन प्रभू का, करता पूजन वंदन ॥ २ ॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे भरतैरावत-विदेहादि-शतैक-सप्तति- क्षेत्रार्यखण्डे भूत-भविष्यद्-वर्तमान-सर्वसिद्ध-परमेष्ठि-पदपंकजे सन्मति- सद्भक्त्युपेतामलतर-खण्डोज्झित-निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पञ्चाचार - विभूषित गुरुवर, आतम-ज्योति जगावें।ज्ञान तपो निधि कर्म दलन को, ध्यान-कुठार उठावें ।।शान्ति सुधाकर की शुचि शीतल, रश्मि-प्रकाश प्रसारें।संघ चतुर्विध के अधिनायक, काम-महारिपु मारें ॥३॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे भरतैरावत-विदेहादि-शतैक-सप्तति- क्षेत्रार्यखण्डे भूत-भविष्यद्-वर्तमान-सर्वाचार्य-परमेष्ठि-पदपंकजे सन्मति- सद्भक्त्युपेतामलतर-खण्डोज्झित-निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
द्वादश अंग विभूषित मुनिवर, पाठक साधु सुधी के।मान विमर्दन करते निर्मद, आत्म सुधा रस पी के ॥ध्याना-ध्ययन निरन्तर जिनके, शिव-साधन दशविं ।इष्टा-निष्ट संयोग वियोगे, हर्ष-विषाद नशावें ।।४ ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे भरतैरावत-विदेहादि-शतैक-सप्तति- क्षेत्रार्यखण्डे भूत-भविष्यद्-वर्तमान-सर्वपाठक-परमेष्ठि-पदपंकजे सन्मति- सद्भक्त्युपेतामलतर-खण्डोज्झित-निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान ध्यान तप लीन निरन्तर, समता-स्वादक योगी।विषयातीत-स्वरूप जितेन्द्रिय, आत्म स्वरस के भोगी ।।ध्यान कृपाण लिए मुनि योगी, कर्म-महारिपु मारें।गुण श्रेणी युत करें निर्जरा, निज गुण रूप विचारें ।।५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे भरतैरावत-विदेहादि-शतैक-सप्तति- क्षेत्रार्यखण्डे भूत-भविष्यद्-वर्तमान-सर्वसाधु-परमेष्ठि-पदपंकजे सन्मति- सद्भक्त्युपेतामलतर - खण्डोज्झित-निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पच्चीस दोषों से रहित, अष्टाङ्ग सम्यग् दर्शनम् ।अर्हन्त आगम गुरुवरों का, मैं करों नित अर्चनम् ।।६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे शुद्धसम्यक्त्वामलतर-खण्डोज्झित- निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। बैंक नए किराण
द्वादशाङ्ग जिनेन्द्र-वाणी, ज्ञान-दोष- विवर्जितम् ।सम्यग्विभूषित आत्म ज्योति, प्रकाश को शत वन्दनम् ॥७॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे शुद्धसम्यग्ज्ञानामलतर-खण्डोज्झित- निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गुप्तियाँ त्रय समिति पाँचों, और पञ्च महाव्रतम् ।तेरह प्रकार चरित्र सम्यक्, का करों मैं पूजनम् ।।८ ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जगदापद्विनाशनहेतवे शुद्धसम्यक्चारित्रामलतर- खण्डोज्झित-निदान-बंधनाय कृतेज्याय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञाना-वरणी पञ्च प्रकृतियाँ, प्रभु ने सर्व विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।९।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री ज्ञानावरण-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव- निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दर्शनावरणी कर्म प्रकृति नव, प्रभु ने सर्व विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।१०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री दर्शनावरण-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव- निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
वेदनीय विधि सुख-दुख दायक, प्रभु ने उभय विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।११।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री वेदनीय-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव- निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अष्टा-विंशति प्रकृति मोह की, प्रभु ने सर्व विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।१२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री प्रचण्डमोहनीय-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्म-विपाको- द्भवोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
आयु कर्म की प्रकृति चार हैं, प्रभु ने सर्व विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।१३।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री आयु-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव- निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
नाम कर्म की प्रकृति नवति त्रय, प्रभु ने सर्व विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।१४।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री नाम-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव- निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गोत्र कर्म की प्रकृति शुभाशुभ, प्रभु ने सर्व विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।१५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री गोत्र-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव- निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अन्तराय विधि पञ्च प्रकृतियाँ, प्रभु ने सर्व विनाशी।शांति जिनेश दया के सागर, पूजों पद अविनाशी ।।१६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री अंतराय-कर्मबंध-बंधनकृते सति तत्कर्मविपाकोद्भवोपद्रव- निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दर्शन ज्ञान चरण से भूषित, पञ्च परम पद पाऊँ।शान्ति नाथ जिन के चरणों में, नित प्रति अर्घ चढ़ाऊँ ।।१७।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठि-पदप्रदाय दर्शन-ज्ञान-चारित्र-कारकाय अष्टकर्मनिवारणाय श्रीशान्तिनाथाय पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
तृतीय वलय
तृतीय वलय पूजा प्रारम्भतृतीय वलय-द्वात्रिंशत्-कोष्ठकोपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।हे शान्तिप्रभो ! हे शान्तिप्रभो! मेरे मन-मन्दिर में आओ।18 अघवर्गविनाशन-हेत प्रभो, निज शान्तदिव्यछवि दर्शाओ ।।१।।कर्मो के बन्धन खुलते हैं, प्रभु नाम निरन्तर जपने से ॥भव-भोग-शरीर विनश्वर तब, क्षण भंगुर लगते सपने से ।।२।।नरजन्म सफल हो जाता है, जब ध्यान हृदय में आता है।आतमस्वरूप में लीन हुआ, भव-सागर से तर जाता है।॥३॥
आह्वाननॐ ह्रीं सर्वकर्मबन्धन विमुक्त ! सकलविघ्न शान्तिकर! मंगलप्रद ! पंचमचक्रेश्वर! द्वादशकामदेव! अष्टप्रातिहार्यसंयुक्त ! षोडशतीर्थङ्कर! श्रीशान्तिनाथ भगवन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । पुष्पांजलि क्षिपेत्।निज-परिवार सहित असुरों के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं असुरकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित नागों के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥२॥
अर्घ्यॐ ह्रीं नागकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित विद्युत् के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥३॥
अर्घ्यॐ ह्रीं विद्युत्कुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित सुपर्ण के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।४।।
अर्घ्यॐ ह्रीं सुपर्णकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित पावक के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं अग्निकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित मारुत के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं वातकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित मेघों के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं स्तनितकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित सागर के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।८।।
अर्घ्यॐ ह्रीं उदधिकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित द्वीपों के, इन्द्र जिनालय आवें ।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥६॥
अर्घ्यॐ ह्रीं द्वीपकुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित दिक्सुर के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं दिक्कुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज-परिवार सहित किन्नर के, इन्द्र जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।११।।
अर्घ्यॐ ह्रीं किन्नरेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
किम्पुरुषों के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं किम्पुरुषेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
महोरगों के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१३।।
अर्घ्यॐ ह्रीं महोरगेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गंधर्वो के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१४।।
अर्घ्यॐ ह्रीं गन्धर्वेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
यक्षसुरों के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं यक्षेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
राक्षसगण के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं राक्षसेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
भूतसुरों के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं भूतेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
सुरपिशाच के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१८।।
अर्घ्यॐ ह्रीं पिशाचेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
ज्योतिषियों के इन्द्र सहित, परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।१६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं चंद्रनामकेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्योतिषिदेव प्रतीन्द्र सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥२०॥
अर्घ्यॐ ह्रीं भास्करेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
इंद्रामर सौधर्म स्वर्ग के भक्त जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।२१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं सौधर्मेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
इंद्रामर ईशान स्वर्ग के भक्त जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।२२।।
ॐ ह्रीं ईशानेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव
पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।सनत स्वर्ग के इन्द्र सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।॥२३॥
अर्घ्यॐ ह्रीं सनत्कुमारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
इन्द्रामर माहेन्द्र स्वर्ग के, भक्त जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥२४॥
अर्घ्यॐ ह्रीं माहेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
ब्रह्मस्वर्ग के इन्द्र सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥२५॥
अर्घ्यॐ ह्रीं ब्रह्मेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
लान्तव के सुर इन्द्र सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।२६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं लान्तवेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शुक्र स्वर्ग के इन्द्र सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।२७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं शुक्रेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैवपदप्रदायश्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शतारेन्द्र शुभभाव सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।२८।।
अर्घ्यॐ ह्रीं शतारेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ॥
आनतेन्द्र शुभभाव सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥२९॥
अर्घ्यॐ ह्रीं आनतेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्राणतेन्द्र शुभभाव सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ॥३०॥
अर्घ्यॐ ह्रीं प्राणतेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
आरणेन्द्र शुभभाव सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।३१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं आरणेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अच्युतेन्द्र शुभभाव सहित परिवार जिनालय आवें।शांतिप्रभु के पद पङ्कज की, पूजा नित्य रचावें ।।३२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं अच्युतेन्द्रेण स्वपरिवारसहितेन पादपद्मार्चिताय-जिननाथाय तथैव पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
बत्तीस इन्द्रों से प्रपूजित, शान्तिनाथ जिनेश को।परिपूर्ण अर्घ चढ़ाय पाऊँ, हे प्रभो! शिवलोक को ॥३३॥
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं चतुर्णिकायदेवेन्द्रपूजिताय श्रीशान्तिनाथाय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चतुर्थ वलय
चतुर्थ वलय पूजा प्रारंभ
चतुर्थ वलय-चतुःषष्ठि-कोष्ठकोपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।हे शान्तिप्रभो! हे शान्तिप्रभो! मेरे मन-मन्दिर में आओ।अघवर्गविनाशन-हेत प्रभो, निज शान्तदिव्यछवि दर्शाओ ।।१।।
कर्मों के बन्धन खुलते हैं, प्रभु नाम निरन्तर जपने से ।।भव-भोग-शरीर विनश्वर तब, क्षण भंगुर लगते सपने से ॥ २ ॥नरजन्म सफल हो जाता है, जब ध्यान हृदय में आता है।आतमस्वरूप में लीन हुआ, भव-सागर से तर जाता है।॥३॥
आह्वाननॐ ह्रीं सर्वकर्मबन्धन विमुक्तः सकलविघ्न शान्तिकर! मंगलप्रद! पंचमचक्रेश्वर! द्वादशकामदेव ! अष्टप्रातिहार्यसंयुक्त ! षोडशतीर्थङ्कर! श्रीशान्तिनाथ भगवन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः
स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । पुष्पांजलि क्षिपेत्।वसंततिलका छंदमन के विकार सब नाशन हेतु तेरी,पूजा प्रशांत करती लगती न देरी।हे शान्तिनाथ भगवन! भवतापहारी,सादर प्रणाम तुमको अघ नाशकारी ।। १ ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं मानसिक विकारोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
वाणी प्रयत्नकृत दोष निवारने को,पूजा समर्थ भविजन्म सुधारने को ।हे शान्तिनाथ भगवन! भवतापहारी,सादर प्रणाम तुमको अघ नाशकारी ।।२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं वाचनिक विकारोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
काया कुठार कृत पाप प्रणाशकारी,अर्चन सशक्त सर्वत्र प्रदोषहारी ।हे शान्तिनाथ भगवन! भवतापहारी,सादर प्रणाम तुमको अघ नाशकारी ।।३।।
अर्घ्यॐ ह्रीं कायिक-पापोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
राज्यश्री, पुर, गेह, नाश सों, होय उपद्रव भारी।उनके नाशन हेतु प्रभु की, पूजा मंगलकारी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥४॥
अर्घ्यॐ ह्रीं राज-लक्ष्मी-पुर-गेह-पदभ्रष्टोद्-भवोपद्रव-निवारकाय श्री शान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पूर्वोपार्जित कर्म उदय सों, घोर विपत्ति सतावे ।लक्ष्मी हीन दरिद्री नर नित, तीव्र महा दुःख पावे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं दारिद्रोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
भीम भगंदर कुष्ट जलोदर, आदिक रोग घनेरे ।व्याधि उपद्रव कर्म विनाशन, हेतु जजों पद तेरे ॥शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं भीम-भगंदर-गलितकुष्ट-गुल्म-जलोदर-रक्त-पित्त-कफ-वात- स्फोटकाद्युपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
इष्ट वियोग अनिष्ट योग से, जीव महा दुःख पावे।निज परिणति को भूले मोही, आर्त रौद्र उपजावे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं इष्टवियोगा-निष्टसंयोगोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज सेना वा पर सेना कृत, घोर उपद्रव आवें।धर्माराधन ध्यान विमुख तब, प्राणि महा दुःख पावें ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।८।।
अर्घ्यॐ ह्रीं स्वचक्र-परचक्रोद्भवोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
नाना आयुध देह विनाशक, घोर उपद्रव आवें ।आर्त रौद्र की परिणति व्यापै, कोई नहीं बचावें ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।९।।
अर्घ्यॐ ह्रीं विविधायुधोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जलचर प्राणी दुष्ट नक्र औ, मत्स्य महा भयकारी।कर्म उदय जल बीच सतावें, व्याकुल हों नरनारी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं दुष्टजलचरजीवोद्भवोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
वन पर्वत के मध्य चतुष्पद, सिंह गजादिक प्रानी।आक्रामक वन नित्य सतावें, करें दुष्ट मनमानी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।११।।
अर्घ्यॐ ह्रीं व्याघ्र-सिंह-गजादिक-वन-पर्वत-वासिश्वापदाद्युपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
भूचर खेचर क्रूर जीव कृत, तीव्र उपद्रव आवें ।आशापाश बंधा यह प्राणी, परपरणति लिपटावें ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।॥१२॥
अर्घ्यॐ ह्रीं भूचर-गगनचर-क्रूर-जीवोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
भीम भुजंगम वृश्चिक भीषण, घोर विषैले प्राणी।विषम हलाहल दंत दशन से, पीड़ित हों जग प्राणी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१३।।
अर्घ्यॐ ह्रीं व्याल-वृश्चिकादि-विष-दुर्द्धरोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
नख श्रृंगादिक तीक्ष्ण विषैले, जीवों के दुःख कारी।कर्म असाता प्रेरित प्राणी, भुगते दुःख अति भारी ॥शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१४।।
अर्घ्यॐ ह्रीं दुष्टजीव-पद-कर-नखोद्भवोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
वन पशुओं के दाढ़ सींग नख, अति विकराल घनेरे।चंचु तुंड दंतादिक कृत दुःख, घोर असाता घेरे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१५।।
ॐ ह्रीं चंचु-तुंड-दाढ़-कंटकोद्भवोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय
अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।दावानल वन मध्य भयंकर, खग मृग वृक्ष जलावें।जीव असाता कर्मोदय से, घोर महा दुःख पावें ॥शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं दावानलोद्भवोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
घोर प्रचंड पवन का दुर्जय, वेग भयंकर धावे ।सागर मध्य प्रचंड लहर की, भीम भँवर लहरावे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं प्रचण्ड-पवनोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
नौका पोत स्फोट उदधि में, दारुण दुःख प्रदाता।सागर मध्य पतन जब होवे, कर्म विपाक असाता ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१८।।
अर्घ्यॐ ह्रीं नौका-स्फोट पतनोद्भवोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
वन पर्वत भूमंडल मध्ये, उदित उपद्रव भारी।प्रभु पूजा से दूर सभी हों, फल हो मंगलकारी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।१९।।
अर्घ्यॐ ह्रीं वन-नग-मेदिनी-भयंकरोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
सरिता सागर कूप सरोवर, झील जलाशय वापी।इनके उपसर्गो से रक्षण, पाता पीड़ित प्राणी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥२०॥
अर्घ्यॐ ह्रीं नदी-सरोवराब्धि-कूप-हृदोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
विद्युत्पात भयंकर वर्षा, ओला पाला पानी।दैव विपाक अनेक उपद्रव, पीड़ा की मनमानी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।२१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं विद्युत्पातादि-भीमाम्बु-वृष्ट्युपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
युद्धस्थल के मध्य शत्रु दल, शस्त्र अनेक चलावें।कर्म असात अकाल मरण दुःख, सब ही प्राणी पावें ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥२२॥
अर्घ्यॐ ह्रीं संग्राम-स्थलादिनिकटोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
डाकिनि शाकिनि भूत प्रेत अरु, चोर पिशाच घनेरे।कर्मों के परिपाक विषम सों, रहते निशदिन घेरे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।॥२३॥
अर्घ्यॐ ह्रीं डाकिनी-शाकिनी-भूत-प्रेत-पिशाचादि-भय-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
उच्चाटन सम्मोहन थम्भन, घोर उपद्रव आवें ।विद्या दुष्ट विविध रूपों में, आकर नित्य सतावें ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥२४॥
अर्घ्यॐ ह्रीं मोहन-स्तम्भनोच्चाटन-प्रमुख-दुष्टविद्योपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दुष्ट नवग्रह कृत पीड़ाएँ, कर्म उदय से आवें।अज्ञानी मिथ्यात्वी मूरख, कुगुरु कुदेव मनावें ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥२५॥
अर्घ्यॐ ह्रीं दुष्टग्रहाद्युपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
लोह श्रृंखला के दृढ़ बंधन, अंग उपांग दुखावें ।पीड़ित जीव महा दुःख पाकर, हाहाकार मचावें ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।॥ २६॥
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रृंखलाद्युपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अल्प आयु कृत कर्म योग से, जन्म मरण दुःख भारी।मन में व्याप्त प्रचंड विकलता, दुखिया सब संसारी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥२७॥
अर्घ्यॐ ह्रीं अल्पमृत्युपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
कर्म उदय दुर्भिक्ष उपद्रव, अन्नाभाव सतावे ।जठरानल की भीषण ज्वाला, प्राणी को बिखलावे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥२८॥
अर्घ्यॐ ह्रीं दुर्भिक्षोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अंतराय यह लाभ विरोधी, कर्म उदय जब आवे।व्यापारादिक वृद्धि न होवे, धन सम्पत्ति नशावे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ॥२९॥
अर्घ्यॐ ह्रीं व्यापारवृद्धि-राहित्योपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
संबंधी परिवार भ्रात सुत, बने अकारण बैरी।घोर उपद्रव करें निरंतर, व्यापे विपद घनेरी ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।।३०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं बंधुत्वोपद्रव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अकुटुम्बी संतान बिना नित, अति संक्लेशित होवे।मिथ्या मोह उदय से प्रेरित, प्राणी रोवे धोवे ।।शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें ।॥३१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं अकुटुम्बत्वोपद्रव निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पाप उदय अपकीर्ति दुखद हो, आकुलता उपजावे।मन संताप महा दुख ज्वाला, सब सुख शांति जलावे॥शान्तिनाथ के पद पंकज जो, मन मन्दिर में धारें।मुक्ति वधू के कंत जिनेश्वर, लोकालोक निहारें॥३२॥
अर्घ्यॐ ह्रीं अपकीर्त्युद्भव-निवारकाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
विश्व हिताय उदार भावना, निर्मल मंगलकारी।सम्यक्दर्शन ज्ञान चरित यह, हो सदैव हितकारी॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना॥३३॥
अर्घ्यॐ ह्रीं सम्पूर्णकल्याण-मंगलप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चिंतामणि के तुल्य लाभप्रद, शांति प्रभु को ध्यावें।करें अर्चना नित्य चाव से, अतिशय शुभ फल पावें॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना॥३४॥
अर्घ्यॐ ह्रीं चिंतामणिसमान-चिंतित-फलप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कल्पवृक्ष के समफल दाता, पाप-ताप विनशाये।शांति जिनेश्वर का आराधन, शुभ मंगल महकाए॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना॥३५॥
अर्घ्यॐ ह्रीं कल्पवृक्षोपमकल्पितार्थ-फलप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कामधेनु के तुल्य अनुपम, सर्व मनोरथ दाता।यही अर्चना मंगलकारी, सुख आनंद प्रदाता॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना॥३६॥
अर्घ्यॐ ह्रीं कामधेनूपमकामार्थपूर्ण-फलप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परम समुज्ज्वल ध्यान धरे तो, मेटे पथ की बाधा।यही अर्चना मंगलकारी, हर लेती दुःख बाधा॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना॥३७॥
अर्घ्यॐ ह्रीं परमोज्ज्वल-धर्मध्यान-बाधारहिताय-अनवद्यबोधप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
त्रैलोक्य के सब प्राणियों को, नेत्र का उत्सव करें।मनसिज सदृश सौन्दर्य पावें, जो प्रभु पूजा करें॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना॥३८॥
अर्घ्यॐ ह्रीं कामदेवस्वरूपप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कर्पूर चंदन अगरु पंकज, तुल्य सुरभित देह हो।यदि शांति जिन की अर्चना में, अमल निश्चल नेह हो॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना॥३९॥
अर्घ्यॐ ह्रीं सुगंधितशरीरप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भव्याम्बुजों को नित प्रफुल्लित, नाथ का भामण्डलम् ।रवि रश्मिवत् करता प्रकाशित शांतिजिन गुणमंडलम् ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं त्रैलोक्यनाथाह्लाद-कारक-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
क्षीर सागर की समुज्ज्वल, अमल लहरों से धवल ।देवता गाते निरंतर आपके सद्गुण विमल ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं परमोज्ज्वल-गुणगण-सहित-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
वाचस्पति के तुल्य निर्मल, विशद-प्रतिभादायिनि ।आपकी है अर्चना ज्यों, पूर्णिमा की चाँदनी ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं वाचस्पतिसमान-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
नवनिधि चतुर्दश रत्न का, स्वामित्व जो चक्रेश को।नर देव इंद्र नरेन्द्र वंदित, पूजता तीर्थेश को ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४३।।
अर्घ्यॐ ह्रीं चक्रवर्ति-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोनों कुलों की कीर्तिको, निज गुण विभूषित जो करें।मुक्ति रमा वरती उन्हें जो, शांतिजिन पूजा करें ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४४।।
अर्घ्यॐ ह्रीं उभयकुल-कमल-विकासन-प्रतिष्ठित-गुणमंडिताय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अर्चना शुभभाव से, अरिहंत की जो नित करें।श्रावकोत्तम व्रतधरन, सद् बुद्धि को वे नर वरें ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रावक-सद्वृत्तकरण-बुद्धिप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शारदी नव ज्योत्सना सम, कीर्ति का विस्तार हो।प्रभु अर्चना ही मात्र इक जो प्राण का आधार हो ।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४६।।
अर्घ्यॐ परमोज्ज्वल-कीर्तिप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
कल्याण कर्त्री राज लक्ष्मी, धनद सम वे नर वरें।जिन राज की शुभ भावना से, जो सतत पूजा करें ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं कल्याणकर-राजधनदसम-लक्ष्मीप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
तिर्यंच नारक भव कभी, जिन भक्त को मिलता नहीं।नर देव भव शुभ लोक में, प्रभु भक्त पाते हर कहीं ॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।॥ श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४८।।
अर्घ्यॐ ह्रीं नरक-तिर्यंच-गतिरहित-नर-सुर-गतिसहित-भवप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। जाजानशीथ भावना षोडश विमल प्रभु, अर्चना से प्राप्त हों। तीर्थंकर पदवी मिले, जिससे कि निश्चय आप्त हों ।। तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।
श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।४९।।
अर्घ्यॐ ह्रीं षोडशकारण-भावना-साधन-बलप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
लोक दुर्लभ स्वप्न सोलह, नाथ माता देखती।एक जननी पद प्रसव, पूजा सहित अवलोकती ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं जिनजननी-तुल्यैकजननी-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
तीर्थेश वन सुर शैल पर, होता विशद अभिषेक है।जिन अर्चना का हृदय जिनके, प्रकट विमल विवेक है।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं मेरुशिखरे-स्नानयुक्त-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
संसार भोग शरीर से निर्वेद दीक्षा दायकम् ।नर जन्म प्रभु की अर्चना से मिले शुभशिव कारकम् ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं सिद्धसाक्षि-दीक्षाकारि-भवप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिन चंद्र के सालोक शासन, के असीम प्रभाव से।संहनन वज्र वृषभ तथा, नाराच पूजन भाव से ।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५३।।
अर्घ्यॐ ह्रीं वज्रवृषभनाराच संहनन-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रयामृत से विभूषित ध्यान के उपयोग से।निर्मल यथा विख्यात हो जिन अर्चना के योग से ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५४।।
अर्घ्यॐ ह्रीं यथाख्यत-रत्नत्रयाचरण-युक्त-बलप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निज ध्यान में तल्लीन आतम, स्वाद अमृत चख सके।तीर्थेश शांति जिनेश पूजन, से निजातम लख सके ।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं स्वात्म-ध्यानामृत-स्वादसहित-भवप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
राजतीं बारह सभा जिन, समवशरणें सर्वदा ।त्रैलोक्य पति की अर्चना से, प्राप्त होती सुख प्रदा ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं समवशरण-विभूति-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिनराज प्रभु की दिव्य ध्वनि, दिनरात में चौबार हो।जिसका श्रवण कर भविक को, कैवल्य अपरंपार हो ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५७।।
अर्घ्यॐ ह्रीं सत्केवलज्ञान-विभूति-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अष्ट कर्मों से रहित, गुण अष्ट युत परमात्मा ।निर्भय निरंजन सिद्ध पद, पाता सुधी धर्मात्मा ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५८।।
अर्घ्यॐ ह्रीं निरंजन-पदप्रदाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
चित्त को आनंद देती, नाथ की दिव्यार्चना ।प्रभु के पुजारी की करें, सुर लोक में सुर वंदना ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।५६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं चिदानंद-करणसमर्थीय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिनके विमल मुखचंद्र से, अमृतवचन अनुपम झरें।त्रैलोक्य की निधियाँ सकल, प्रभु के पुजारी को वरें ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।६०।।
अर्घ्यॐ ह्रीं वचनानंद-करणसमर्थीय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिननाथ के तन की अलौकिक, दिव्य अणु अणु की प्रभा।देखकर होती प्रफुल्लित, हर्ष से बारह सभा ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।।६१।।
अर्घ्यॐ ह्रीं कायानंद-करण-समर्थाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
सर्वार्थ वर्गों का प्रशाधक, नाथ मनसा चिंतनम् ।तीर्थेश की दिव्यार्चना का, है महत् अतिशय फलम् ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।। ६२।।
अर्घ्यॐ ह्रीं अर्थवर्ग-सिद्धि-साधन-करणसमर्थाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु के गुणों का संस्तवन, निज वाणि वीणा से करें।वे काम वर्ग प्रसाधिनी, उत्कृष्ट महिमा को वरें ।॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ॥६३॥
अर्घ्यॐ ह्रीं कामवर्ग-सिद्धि-साधन-करणसमर्थाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिननाथ पूजा से सफल, निज देह को जो नर करें।आश्चर्य क्या यदि मोक्ष लक्ष्मी, को सहज ही वे वरें ।।तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।। ६४।।
अर्घ्यॐ ह्रीं मोक्ष-पुरुषार्थ-सिद्धि-साधन-करणसमर्थाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद- प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
निर्लिप्त श्री जिनराज, चौसठ, ऋद्धियों के नाथ हैं।शत इंद्र के झुकते सतत, पद पंकजों में माथ हैंतीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभु की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ।। ६५।।
अर्घ्यॐ ह्रीं चतुःषष्ठि-ऋद्धिसमानांगाय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
शत एक विंशति तीर्थंकर, जिनचंद्र की पूजा करों।विघ्नौघ के शान्त्यर्थ मैं, पूर्णार्घ्य चरणों में धरों ॥तीर्थेश चक्रि अनंग पद भूषित प्रभू की अर्चना ।श्री शान्तिनाथ जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना ॥६६।।
अर्घ्यॐ ह्रीं शतैकविंशति-कोष्ठ-स्थापिताय श्रीशान्तिनाथाय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अरिहंत के अतिरिक्त कोई, है नहीं जग में शरण ।संसार सागर में प्रभु के, चरण हैं तारण तारण ।।इतीष्टप्रार्थनां कृत्वा पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।(निम्नांकित मंत्र का १०८ बार जाप या आहुतियाँ देवें)
ॐ ह्रीं जगच्छान्तिकराय श्रीशान्तिनाथाय नमः सर्वोपद्रव-शांतिं कुरु कुरु स्वाहा।
जयमाला व आरती
जयमाला
दोहा : शान्तिनाथ भगवान् के गुण हैं अपरंपार ।निराधार संसार में भक्तों के आधार ।।१।।पंचम श्री चक्रीश हैं, द्वादशवें रतिनाथ ।षोडशवें तीर्थेश को सदा नवाऊँ माथ ॥२॥पद्धरि छंदजय शांति प्रभो चिद्रूपराज, जग जल निधि में अद्भुत जहाज ।जय कर्म विनाशक शान्तिनाथ, जय विघ्न विनाशक शान्तिनाथ ।।जय गुण वारिधि हे शान्तिनाथ, जय मुक्तिवधू के प्राणनाथ।जय आत्म हितंकर शान्तिनाथ, जय कर्म विनाशक शान्तिनाथ ।।जय पाप विनाशक शान्तिनाथ, भुवनत्रय-ज्ञायक शान्तिनाथ ।जय सम्यक् दायक शान्तिनाथ, शिवमार्ग-विधायक शान्तिनाथ ।।जय भवगृहभंजन शान्तिनाथ, जय अलख निरंजन शान्तिनाथ ।जय ऐरासुत श्री शान्तिनाथ, त्रिभुवनत्राता हितु शान्तिनाथ ।।जय शान्तिनाथ शिव के दायक, जय हित-संदेशक अघहारक।जय जन्म-जरा-मृतु-संहारक जय रोगशोक हर सुखदायक ।।शिव सुख के साधन शान्तिनाथ, भव भय के भंजक शान्तिनाथ ।जय मानबली के मद मर्दक, जय शान्तिनाथ गुण गणवर्धक ॥कर्मों के दुःख संहारक हो, भय भूत पिचाश निवारक हो।नवग्रहकृत बाधा दूर करो, व्यालादि विपति चकचूर करो ।।जय भव्य सरोज दिवाकर हो, जय शिव सुख पदम प्रभाकर हो।भवि जीवन तारण कारण हो, श्री शान्तिनाथ शिव नायक हो ।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं जगच्छान्तिकराय श्रीशान्तिनाथाय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पाप पंक में मग्न, विश्व के हैं सब प्राणी।मल प्रक्षालन हेतु, नाथ की मंगल वाणी ।।प्रभु पद पंकज में जलधारा, अर्पित करते जो प्राणी।होती निश्चय नित्य विश्व में, शांतिसुधा वह कल्याणी ।।॥ ॐ शांतये शांतिधारा ॥-- ० --
आरती शान्तिनाथ भगवान् की
जय जिनवर देवा, प्रभु जय जिनवर देवा ।।शांति विधाता शिव सुख दाता शान्तिनाथ देवा ।।ऐरा देवी धन्य जगत् में, जिस उर आन बसे ।विश्वसेन कुल नभ में मानों, पूनम चन्द्र लसे ।। टेक ।।कृष्ण चतुर्दशी जेठ मास की आनन्द करतारी।हस्तिनापुर में जन्म महोत्सव, ठाठ रचे भारी ।। जय ।।बाल्य काल की लीला अद्भुत सुरनर मन भाई।न्याय नीति से राज्य कियो चिर, सबको सुखदाई ।। जय ।।पंचम चक्री काम द्वादशम, सोलम तीर्थंकर ।त्रय पदधारी तुमहि मुरारी, ब्रह्मा शिव शंकर ।। जय ।।भवतन भोग समझ क्षणभंगुर, मुनि व्रत धार लिए।षट्खण्ड नवनिधि रतन चतुर्दश तृणवत् छोर दिये ।। जय ।।दुर्द्धर तपकर कर्म निवारे केवल ज्ञान लहा।दे उपदेश भविक जन बोधे, ये उपकार किया ।। जय ।।शान्तिनाथ है नाम तिहारा, सब जग शांति करो।अरज करे 'शिवराम' चरन में, भव आताप हरो ।।जय जिनवर देवा, प्रभु जय जिनवर देवा ।।शांति विधाता शिव सुख दाता शान्तिनाथ देवा ।। जय ।।-- ० --
॥ जय जिनेन्द्र ॥