श्री वर्धमान स्तोत्र विधान
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी · विधान पूजा
साइट में विधान खोलेंप्रथम वलय
प्रथम वलय कोष्ठोपरि पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि।
श्री वर्धमान जिनदेव पदारविन्द –युग्म-स्थितांगुलिनखांशु-समूहभासि।प्रद्योततेऽखिल-सुरेन्द्रकिरीट-कोटिर्भक्त्या ‘प्रणम्य’ जिनदेव-पदं स्तवीमि ||1||
वर्धमान जिनदेव युगलपद, लालकमल से शोभित हैंजिनके अंगुली की नख आभा, से सबका मन मोहित है।देवों के मुकुटों की मणियां, नख आभा में चमक रहींउन चरणों की भक्ति से मम, मति थुति करने मचल रही ||1||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वातिशय समन्वित चरण कमलाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नाहंकृतेऽहमिति नात्र चमत्कृतेऽपि,बुद्धे: प्रकर्षवशतो न च दीनतोऽहम्।श्रीवीरदेव-गुण-पर्यय-चेतनायांसंलीन-मानस-वशः स्तुतिमातनोमि ||2||
नहीं अहंकृत होकर के मैं, नहीं चमत्कृत होकर केबुद्धी की उत्कटता से ना, नहीं दीनता मन रख के।वीर प्रभू की गुण-पर्यायों, से युत नित चेतनता मेंलीन हुआ है मेरा मन यह, अतः संस्तवन करता मैं ||2||
अर्घ्यॐ ह्रीं शुद्ध गुणपर्यायचैतन्याय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उच्चैः कुल-प्रभवता सुखसाधनानिसोन्दर्य-देह-सुभग-द्रविण-प्रभूतम्।मन्ये न मोक्ष-पथ-पुण्यफलं प्रशस्तंयावन्न भक्तिकरणाय मनः प्रयासः ||3||
उच्च कुलों में पैदा होना, सुख साधन सब पा लेनासुन्दर देह भाग्य भी उत्तम, धन वैभव भी पा लेना।मोक्ष मार्ग के लायक ये सब, पुण्य फलों को ना मानूँभक्ति करन का मन यदि होता, पुण्य फल रहा मैं जानूँ ||3||
अर्घ्यॐ ह्रीं लौकिकालौकिक पुण्यफलप्रदाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तस्मादहं शिवदसाधनसाधनायभक्तेरवश्य – करणाय समुद्यतोऽस्मि।नो चिन्तयामि निज-बुद्धि-कला-स्वशक्तिंतुक् निस्त्रपो भवति मातरि वा समक्षे ||4||
इसीलिए अब मोक्ष प्रदायी, साधन को मैं साध रहामैं अवश्य भक्ति करने को, अब मन से तैयार हुआ।मुझमें बुद्धी छन्द कला वा, शक्ती है या नहीं पतामाँ समक्ष ज्यों बालक करता, तज लज्जा मैं करूँ कथा ||4||
अर्घ्यॐ ह्रीं बुद्धि कलात्मशक्ति वर्धनाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सामायिके श्रुतविचारण-पाठकालेयः सन्मतिं स्मरति नित्यरतिं दधानः।तस्यैव हस्तगत-पुण्य – समस्त-लक्ष्मींदृष्ट्वा न कोऽपि कुरुतेऽत्र बुधस्तथैव ||5||
सामायिक में नित चिन्तन में, शास्त्रपाठ के क्षण में भीजो सन्मति को याद कर रहा, नित्य हृदय रति धर के ही।सकल पुण्य की लक्ष्मी उसके, हाथ स्वयं आ जाती हैऐसा लख फिर किस ज्ञानी को, प्रभु भक्ति ना भाती है? ||5||
अर्घ्यॐ ह्रीं हस्तगत लक्ष्मीकराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सूते च यो जिनकुले स हि वीरवंशोवीरं विहाय मनुतेऽन्यकुलाधिदेवम्।आलोकमाप्य जगतीह रवेः प्रचण्डंजात्यन्धवद् भ्रमति वा किल कौशिकः सः ||6||
जो उत्पन्न हुआ जिन कुल में, वीरवंश का वह है पूतवीर प्रभु को छोड़ अन्य को, मान रहा क्यों तू रे भूत।सूरज का फैला नहिं दिखता, धरती पर चहुँ ओर प्रकाशजन्म समय से अंध बने वे, या फिर उल्लू सा आभास ||6||
अर्घ्यॐ ह्रीं वीरवंशोत्पत्तिकराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
रागादिदोष-युत-मानस-देवतानांसेवा किमप्यतिशयं न ददाति कस्य।सेवां करोतु जिनकल्पतरोः सदैवसेवा किमल्पफलदाऽप्यफलाऽपि तस्य ||7||
राग द्वेष से सहित रहे जो, ऐसे देवों की सेवाक्या अतिशय फल दे सकती है, सेवा शिवसुख की मेवा।श्रीजिनवर हैं कल्पवृक्ष सम, उनकी सेवा सदा करोकल्पवृक्ष की सेवा भी क्या, अल्पफला या निष्फल हो? ||7||
अर्घ्यॐ ह्रीं कल्पवृक्षसमफलप्रदाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ये व्यन्तरादिसुर-भावन-देव-वृन्दाःकृत्वा तु यस्य नमनं सुखमाप्नुवन्ति।देवाधि-देव-शुभ-नाम-पवित्र-मन्त्रोव्याहन्त्यनिष्टमखिलं किमु विस्मयन्ति ||8||
भवनवासि व्यन्तर देवो के, सुर समूह से वन्दित हैंजिनवर के चरणों में झुक वे, सुख पाते आनन्दित हैं।देवों के भी देव प्रभू का नाम, मंत्र है पूजित हैसब अनिष्ट यदि दूर हो गये, बड़ी बात क्यों विस्मित है? ||8||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वानिष्ट विनाशकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वलय अर्घ
विद्याब्धि-सूरि-पद-पङ्कज – सौरभालि-शिष्य – प्रणम्य – मुनिना जिनदेव भक्त्या ।श्री वर्धमान – जिन-संस्तवनं व्यधायितस्यादिमेऽत्र वलयेऽर्चनयोल्लसामि ।
अर्घ्यॐ ह्रीं अष्टदल कमलाधिपतये श्री वर्धमान जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
द्वितीय वलय
द्वितीय वलय कोष्ठोपरि पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ।आस्तां सुदुःषम-कला-कलिकाल-कालस्त्वन्नाम-दर्श-मननं प्रतिमाप्यलं स्यात्।हस्तंगते गरुड-मन्त्र-विधान-सिद्धेःकालादि-सर्प-कृतयोग-भयेन किं स्यात् ||9||
भले बना हो कलीकाल का, प्रभाव सब पर दुखदायीदर्शन, मनन, सुनाम आपका, बिम्ब मात्र भी सुखदायी।सिद्ध किया ही गरुड़मंत्र ही, जिसके हाथ पहुँच जायेकाल सर्प के योग भयों से, फिर किसका मन डर पाये ||9||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वानिष्ट योग भय निवारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
रागादि-रोग-हरणाय न कोऽत्र वैद्यःकर्माष्ट बन्ध-विघटाय रसायनं न।यो यन्न वेत्ति स न तत्र मतं प्रमाणंवैद्यस्त्वमेव तव वाक्च रसायनं तत् ||10||
राग रोग का नाश करूँ मैं, दिखता वैद्य नहीं कोईअष्ट कर्म बन्धन मिट जाए, नहीं रसायन है कोई।जो जिस विद्या नहीं जानता, नहीं प्रमाणिक वह ज्ञानीवैद्य आप हो अतः बन गई महा रसायन तव वाणी ||10||
अर्घ्यॐ ह्रीं दुर्निवार रोग विनाशाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शस्त्रास्त्रभ्रूविकृतिलोहित-नेत्रवन्तंक्रोड़ीकृताघ-ममतार्त-विरुपरौद्रम्।देवं मनन्ति जगति प्रविजृम्भितेपिचिद्बोधतेजसि सतीह किमन्धता वा ||11||
शस्त्र अस्त्र से सहित हुए जो, भ्रकुटि चढ़ रहीं लाल नयनममता पाप दुःख ले बैठे, देह विरूप क्रूर है मन।लोग इन्हें भी प्रभू मानते, जिस जग में प्रभु आप रहेंचेतन ज्ञान प्रकाश दिखे ना, और अन्धता किसे कहें? ||11||
अर्घ्यॐ ह्रीं मिथ्याग्रहापहरणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुण्योदयेन तव तीर्थकराख्यकर्म-महात्म्यतः कलिलघातिविधिप्रणाशात्।तीर्थोदयोऽभवदिहात्म-हिताय वीर !पुण्यद्विषैर्नु महिमा कथमभ्युपेतः ||12||
तीर्थंकर शुभ नाम कर्म के, पुण्य उदय की महिमा से,चार घातिया पाप नाश से, तीर्थोदय की गरिमा से।पुण्य उदय से उदित तीर्थ ही, वीर! आत्महित का कारणबने पुण्य के द्वेषी उनको, हो तब महिमा क्यों धारण? ||12||
अर्घ्यॐ ह्रीं पुण्यतिर्थोदयाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गर्भोत्सवे प्रतिदिनं पृथुरत्नवृष्टि –र्जन्मोत्सवे सकल-लोक-सुशान्त-वृत्ति:।सर्वातिशायनगुणा दश जन्मनस्तेसूक्ष्मेण को गणयितुं गुणतां तु शक्तः ||13||
गर्भ समय के कल्याणक में, प्रतिदिन रत्नों की वर्षाजन्म समय के कल्याणक में, सकल लोक में सुख हर्षा।सूक्ष्म रूप से तव गुण गण को, गिनने में हो कौन समर्थ?दश अतिशय जो मूर्त रूप हैं, समझो उनमें कितना अर्थ ||13||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वसमृद्धिवर्धकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
निःस्वेदताऽस्ति वपुषो मलशून्यता तेस्वाद्याकृतिः परमसंहननं सुरूपम्।सौलक्ष्य-सौरभ-मपार-समर्थता चसप्रीतिभाषण-मथा-सम-दुग्धरक्तम् ||14||
स्वेद रहित है निर्मल है तनु, परमौदारिक सुन्दर रूपप्रथम संहनन पहली आकृति, शुभलक्षणयुत सौरभ कूप।अतुलनीय है शक्ति आपकी, हित-मित-प्रिय वचनामृत हैंदुग्धरंग सम रक्त देह का, दश अतिशय परमामृत हैं ||14||
अर्घ्यॐ ह्रीं दश जन्मातिशयधारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
क्रोशं चतुःशतमिलाफलके सुभिक्षःशून्यश्च जीववधभुक्त्युपसर्गताया:।विद्येश्वरः खगमनं नख-केश-वृद्धि-छाया-विहीन-मनिमेष-मुखं चतुष्कम् ||15||
कोस चार सौ तक सुभिक्ष है, प्राणी वध उपसर्ग रहितबिन भोजन नित गगन गमन है, नख केशों की वृद्धि रहित।बिन छाया तनु चार मुखों से, निर्निमेष लोचन टिमकारसब विद्याओं के इश्वर हो, दश केवल अतिशय सुखकार ||15||
अर्घ्यॐ ह्रीं दशकेवलज्ञानातिशयधारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जन्मक्षणे प्रथित-पर्वत-मन्दराख्येसौधर्म-देव-विहितस्नपनोपचारे।आनन्दनिर्भररसेन सुविस्मितः सन्‘वीरं’ चकार तव नाम सुरेन्द्रमुख्यः ||16||
जन्म समय पर मन्दर मेरु, पर्वत जो विख्यात रहाजिस पर ही सौधर्म इन्द्र ने, प्रभु का कर अभिषेक कहा।‘वीर’ आपका नाम यही शुभ, धरती पर विख्यात रहेहो आनन्दित विस्मित होकर, देवों के भी इन्द्र कहे ||16||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वानन्दकराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
क्रीडाक्षणे सुरतुकैः सह शैशवेऽपिआयात एव भुवि संगमनाम देवः।नागस्य रूपमवधार्य भयाय रौद्रंनिर्भीरभू- ‘र्महतिवीर’ इति प्रसिद्धिः ||17||
शैशव वय में क्रीड़ा करते, देव बालकों के संग आपसंगम देव तभी आ पहुँचा, देने को प्रभु को संताप।नाग रूप धर महा भयंकर, लखकर वीर न भीत हुए‘महावीर’ यह नाम रखा तब, देव स्वयं सब मीत हुए ||17||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्पादिजन्तुभयनिवारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शङ्कां निधाय ह्रदि तौ गगनं चरन्तौऋद्धीश्वरौ विजय-संजयनामधेयौ।त्वामीश! वीक्ष्य लघु दूरत एव हर्षात्प्रोच्चार्य ‘सन्मति’ सुनाम गतौ विशङ्कौ ||18||
शास्त्र विषय संदेह धारकर, चले जा रहे दो मुनिराजसंजय विजय नाम हैं जिनके, गगन ऋद्धि ही बना जहाज।देख दूर से हर्षित होकर, लख कर ही निःशंक हुएधन्य-धन्य है इनकी मति भी, ‘सन्मति’ कहकर दंग हुए ||18||
अर्घ्यॐ ह्रीं बुद्धिसंदेहवारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तीर्थेश्वरा विगतकाल- चतुर्थकेऽस्मिन्संदीक्षिता बहुलसंख्यक – भूमिनाथैः।जानन्नपि त्वमगमो न हि खेदमेकोवाचंयमो द्विदशवर्षमभी-र्विह्रत्य ||19||
इस चतुर्थ काल में जितने, पहले जो तीर्थेश हुएकई कई राजाओं के संग, दीक्षित हो तपत्याग किए।आप जानते थे यह भगवन, फिर भी आप न खेद किएमौन धारकर एकाकी हो, बारह वर्ष विहार किए ||19||
अर्घ्यॐ ह्रीं जिनदीक्षाधारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्राप्त-क्षयोपशममात्रकषायतुर्योमत्तेऽपि वृद्धि-मुपयाति परं चरित्रम्।त्वं ‘वर्धमान’ इति नाम भुवि प्रपन्नोन्यासे प्रभाव इह नामनि भावमुख्यात् ||20||
चौथी कषाय मात्र का जिनको, क्षयोपशम गत भाव रहाहो प्रमत्त यदि बीच-बीच में, वर्धमान चारित्र रहा।इसीलिए तो नाम आपका, ‘वर्धमान’ भी ख्यात हुआनाम न्यास में भी भावों, से न्यास बना यह ज्ञात हुआ ||20||
अर्घ्यॐ ह्रीं सामायिक चारित्रवृद्धिकराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीक्षोत्सवे तपसि लीनमना बभूवचैको भवान् प्रविजहार सहिष्णुयोगी।उज्जैनके पितृवने समधात् समाधि-मुग्रैरुपद्रवसहेऽ‘प्यतिवीर’ संज्ञा ||21||
तप कल्याणक होने पर प्रभु, तप में ही संलीन हुएएकाकी बन कर विहार कर, सहनशील योगी जु हुए।उज्जैनी के मरघट पर जब, आप ध्यान में लीन हुएउग्र उपद्रव सहकर के ही, नाम लिया ‘अतिवीर’ हुए ||21||
अर्घ्यॐ ह्रीं उग्रोपद्रवनाशकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
या बंधनैश्च विविधैः किल संनिबद्धासंपीडिता विलपिता समयेन नीता।भक्त्योल्लसेन विभुतां प्रविलोकमानासा चन्दना गतभया तव लोकनेन ||22||
नाना विध बंधन ताडन पा, जो पर घर में बंधी पड़ीपीड़ित होकर रोती रहती, कष्ट सहे हर घड़ी-घड़ी।वीर प्रभू का दर्शन पाऊँ, भक्ति और उल्लास भरीदर्शन पाकर वही चन्दना, भय-बन्धन से तब उभरी ||22||
अर्घ्यॐ ह्रीं अनिष्टबंधनविनाशाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञानोत्सवेऽशुभदतीव सभा पृथिव्यागत्वोपरीह जिन! पञ्चसहस्र-दण्डान्।मिथ्यादृशां न भवतो मुख-दर्श-पुण्य-मुच्छ्राय एव भगवन्! सुविराजमानः ||23||
ज्ञानोत्सव होने पर प्रभु की, समवसरण सी सभा लगीपाँच हजार धनुष ऊपर जा, चेतनता जब पूर्ण जगी।मिथ्यादृष्टि जीवों को तव, मुख दर्शन का पुण्य कहाँ?इसीलिए इतने ऊपर जा, शोभित होते बैठ वहाँ ||23||
अर्घ्यॐ ह्रीं उत्कृष्टपदविराजमानाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मानोद्धतः सकलवेदपुराणविद् योमानादिभूस्थजिन-बिम्बमथेन्द्र-भूतेः।मानो गतो विलयतामवलोक्य तेऽस्यसामर्थ्यमन्यपुरुषेषु न दृश्यते तत् ||24||
हुआ मान से उद्धत है जो, सकल पुराण शास्त्र ज्ञातामानस्तम्भ बने जिन-बिम्बों, को लख इंद्रभूति भ्राता।मान रहित हो खड़े रहे ज्यों, भूल गये हों सब कुछ हीछोड़ आपको अन्य पुरुष में, यह प्रभाव क्या होय कभी? ||24||
अर्घ्यॐ ह्रीं मिथ्यामदविनाशाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
साक्षाद् विलोक्य सचराचरविश्वमन्तःकैवल्य-बोधवदनन्तसुखस्य भोक्ता।यैर्मन्यते जिन! सदापरमात्मरूप-मित्थं कथं वद भवेयु-रिहार्तयुक्ताः ||25||
अन्तरंग में निज आतम से, विश्व चराचर देख रहे,केवल ज्ञान साथ जो होता, वह अनन्त सुख भोग रहे।हे जिन! तव परमात्म रूप को, मान रहे जो इसी प्रकारअहो! बताओ कैसे फिर वे, दुःखी रहेंगे किसी प्रकार ||25||
अर्घ्यॐ ह्रीं अनन्तज्ञानसुखसहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अभ्यन्तरे बहिरपीश! विभासमानोविश्वं तिरस्कृतमहोऽत्र चिदर्चिषैतत्।हे ज्ञातृवंश-कुल-दीपक! चेतनायांयत् सद् विभाति यदसन्न विभाति तत्र ||26||
बाहर भीतर ईश! आप तो, पूर्ण रूप से भासित होतव चेतन के महा तेज से, तेज समूह पराजित हो।ज्ञातृवंश के हे कुल दीपक!, ज्ञातापन चेतनता मेंजो है वह प्रतिभासित होता, जो ना दिखता ना उसमें ||26||
अर्घ्यॐ ह्रीं चैतन्यपूर्ण-तेजः सहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
त्वं चित्क्रमाक्रमविवर्तविशुद्धि-युक्तःस्वात्मानमात्मनि विभाव्य विभावमुक्तः।वैभाविकं वपुरिदं जिन! पश्यसि स्वंसम्यक्त्वकारणमहो व्यभवत् परेषाम् ||27||
चेतन की गुण-पर्यायों में, तुम विशुद्धि युत होकर केआतम में आतम को पाकर, सब विभाव को तज कर के।निज शरीर को भी हे जिनवर!, वैभाविक ही देख रहेदूजों को वह ही तन देखो!, सम्यगदर्शन हेतु लहे ||27||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वगुणपर्यायज्ञाताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
छत्रत्रयं वदति ते त्रिजगत्प्रभुत्वंशास्ति स्वयं न मुखतो मदगर्वशून्यः।सत्यं सतां विधिरयं हि पराक्रमाणांवीरो जितेन्द्रियमना भगवानसि त्वम् ||28||
तीन लोक में प्रभुता तेरी, तीन छत्र कह देते हैंमद घमण्ड से रहित हुए जो, कैसे कुछ कह सकते हैं।महा पराक्रम धारी सज्जन, इसी रीति से रहते हैंइसीलिए तो वीर जितेन्द्रिय, भगवन तुमको कहते हैं ||28||
अर्घ्यॐ ह्रीं छत्रत्रयधारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सिंहासनोपरि विराजितुमत्र लोभावाञ्छन्त्युपायशतकै र्भुवि चित्तलोभात्।लाभेऽपि तस्य चतुरङ्गुलमूर्ध्वमेतिनिर्लोभता वद भवत्तुलिता क्व चान्यैः ||29||
देखा जाता है लोभी जन, सिंहासन पर बैठन कोकरें उपाय सैकड़ों जग में, मन में लोभ की ऐंठन हो।सिंहासन का लाभ हुआ पर, आप चार अंगुल ऊपरकहो आप सा निर्लोभी क्या, और कहीं हो इस भूपर ||29||
अर्घ्यॐ ह्रीं सिंहासनप्रातिहार्यसहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ऊर्ध्वं मुहु र्गदति याति च निम्नवृत्तिंमायाविनां तु मनसा सम वक्रवृत्तिम्।तेभ्यस्तनु स्तव विभाति सुचामरौघोमायातिशून्यहृदयो भवदन्यना न ||30||
ऊपर जाकर बार-बार, फिर, फिर नीचे आते चामरमायावी जन कुटिल मना ज्यों, मानो वक्रवृत्ति रखकर।चमरों से शोभित प्रभु तन ये, सबसे मानो कहता हैअन्य किसी का हृदय यहाँ पे, बिन माया ना रहता है ||30||
अर्घ्यॐ ह्रीं सुरचामरशोभिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अस्मिन्भवे भविनि रोषविभावभाजिचैतन्यवत्यपि मुखं न बिभर्ति तेजः।भामण्डलं हि परितो तव भासमानंयद् वीर! वक्ति भविसप्त-भवानुगाथाम् ||31||
क्रोध विभाव भाव वाले जो, भव्य जीव संसृति में हैंचेतन होकर के भी उनके, मुख पर तेज नहीं कुछ है।वीर प्रभु तव मुख मण्डल का, तेज बताता भामण्डलभव्य जनों के सप्त भवों की, गाथा गाता है प्रतिपल ||31||
अर्घ्यॐ ह्रीं भामण्डलप्रातिहार्य सहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चित्रं विभो! त्रिभुवनेश! जिनेश! वीर!न्यूने त्वयि द्रुतविहास्य-रतेन देव!दिव्यध्वनिं तदपि कर्णयितुं तु भव्याआयान्ति ते रतिवशादनुयन्ति हास्यम् ||32||
तीन लोक के हो ईश्वर तुम, तुम जिनेश तुम वीर विभूहास्य नहीं है रती नहीं है, तव चेतन में अहो प्रभू।फिर भी दिव्यध्वनि को सुनकर, भव्य जीव रति भाव धरेंतत्त्व ज्ञान पी-पीकर मानो, हो प्रसन्न मन हास्य करें ||32||
अर्घ्यॐ ह्रीं दिव्यध्वनिप्रातिहार्ययुक्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वलय अर्घ
विद्याब्धि-सूरि-पद-पङ्कज-सौरभालि-शिष्य – प्रणम्य – मुनिना जिनदेव भक्त्या ।श्री वर्धमान – जिन-संस्तवनं व्यधायितस्य द्वितीय वलयेऽर्चनयोल्लसामि।
अर्घ्यॐ ह्रीं चतुर्विंशतिदल कमलाधिपतये श्री वर्धमान जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तृतीय वलय
तृतीय वलय कोष्ठोपरि पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि।
सामीप्यतोऽप्यरतिशोकमतिं विहायवैडूर्यपत्र-हरिताभ-मणिप्रशाखः।सम्प्राप्य नाम लभते विटपोऽप्यशोकःशोभां नरोऽपि यदि किं तव भक्तितोऽतः ||33||
नाना विध वैडूर्य मणी की, हरित मणिमयी शाखायेंतव समीपता से ही तज दी, अरति शोक की बाधायें।मानो इसीलिए उस तरु का नाम अशोक कहा जाताक्या आश्चर्य आप भक्ति से, यदि मनुष्य शोभा पाता ||33||
अर्घ्यॐ ह्रीं अशोक वृक्ष प्रातिहार्य सहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यान्ति क्व भो! भविजना भयभीतवश्यात्कुर्वन्ति किं निजहतिं च जुगुप्सया वा।संप्राप्नुवन्त्वभयता-मभय-प्रसिद्ध-पाद-द्वयं वदति वादितदुन्दुभिस्ते ||34||
अरे-अरे ओ भविजन क्यों तुम, क्यों इतने भयभीत हुएआत्मग्लानि से आत्मघात को, करने क्यों तैयार हुए।अभय प्रदायी चरण कमल को, प्राप्त करो अरु अभय रहोदेव दुन्दुभि बजती-बजती, यही कह रही वीर प्रभो ||34||
अर्घ्यॐ ह्रीं देवदुन्दुभिप्रातिहार्य क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्पाणि सन्ति सकलानि नपुंसकानिहर्षन्ति तानि वनिता-नर-संगयोगात्।कामस्त्रिवेदसहितः पततीह कामंदेवेन्द्रपुष्पपतनाच्छलतोऽभिमन्ये ||35||
पुष्प रूप में खिले जीव सब, भाव नपुंसक वेद धरेंतभी कभी नर से हर्षित हों, नारी संग भी हर्ष धरें।देवेन्द्रों की पुष्प वृष्टि जो, प्रभु सम्मुख नित गिरती हैतीन वेद से सहित काम यह, गिरता है यह कहती है ||35||
अर्घ्यॐ ह्रीं सुरपुष्पवृष्टि शोभिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तीर्थंकर-प्रकृतिपुण्य-वशेनभुमि-र्दृष्टाऽतिकान्त-मणिकाभरणैक-कान्ता।स्वच्छा च भावनसुरैर्विहितोपकाराधान्यादि-पुष्पविभवै-र्हसतीव नारी ||36||
पुण्य प्रकृति तीर्थंकर से ही, भूमि रत्नमय स्वयं हुईभवनवासि देवों के द्वारा, स्वच्छ दिख रही साफ हुई।पुष्प फलों से भरी दिख रही, धान्यादिक से पूर्ण तथातीर्थंकर की गमन देखकर, भूनारी यह हँसे यथा ||36||
अर्घ्यॐ ह्रीं देवातिशयपवित्राय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वायुः प्रभोः पथविहारदिशानुसारीवायुः सुगन्धघन-मिश्रित-सौख्यकारी।वायुः सुगन्ध-जल-वर्षण-चित्तहारीवायुः सुरस्त्रिदशराज-निदेश-धारी ||37||
जिधर दिशा में गमन आपका, उसी दिशा में वायु बहेअति सुगन्धमय पवन सूंघकर, अचरज करता विश्व रहे।मन्द-मन्द अति जल वर्षा में, भी सुगन्ध सी आती हैवायु कुमार देव से सेवा, इंद्राज्ञा करवाती है ||37||
अर्घ्यॐ ह्रीं चतुर्णिकायदेवपूजिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
न्यासो हि यत्र चरणस्य विनिर्मितानिपद्मानि सौरभमयानि सुवर्णकानि।देवैर्नभांसि विहृतौ कुसुमार्पितानिध्यानान् मनांसि यदि मेऽपि किमद्भुतानि ||38||
देवों द्वारा पद विहार में, नभ में कमल रचे जातेवही कमल फिर स्वर्णमयी हों, अरु सुगन्ध से भर जाते।आप चरण के न्यास मात्र से, कुसुम इस तरह होते हैंअद्भुत क्या यदि आप ध्यान से, मनः कमल मम खिलते हैं ||38||
अर्घ्यॐ ह्रीं पादन्यास कमलरचिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दिव्यध्वनि-र्वहति यस्तु मुखारविन्दा-दर्धं च तस्य खलु मागधजातिदेवाः।दूरं तु वीर! सहजेन विसर्पयन्तिमैत्रीं मिथः सदसि भूरि विभावयन्ति ||39||
आप मुख कमल से हे भगवन! दिव्य ध्वनि जो खिरती हैमागध जाति देव से आधी, वही दूर तक जाती है।इसीलिए वह अर्ध मागधी, कहलाती सुखकर भातीतथा परस्पर में मैत्री भी, जीवों में देखी जाती ||39||
अर्घ्यॐ ह्रीं मैत्री प्रसारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नैर्मल्यभाव-मभितो धरतीशमाप्तंदिग् राजिका दश विभो! गगनं विधूल्यः।सर्वर्तु-पुष्प-फल-पूरित-भूरुहाश्चव्याह्वान-मर्पित-सुरौघ इतः करोति ||40||
अरु विहार के समय गगन भी, निर्मल भाव यहाँ धरतादशों दिशायें धूलि बिना ही, नभ चहुँ ओर सदा करता।सभी ऋतू के पुष्प फलों से, वृक्ष लधे इक संग दिखतेआओ-आओ इधर आप सब, देव बुलावा भी करते ||40||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वदिक् तमोहराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नाशीर्वचः प्रहसनं प्रविलोकवार्तातीर्थप्रवर्तनपरो जगतोऽधिनाथः।पश्यन्तु तस्य ककुभन्तर-भासमानंतेजोधिकाग्र-गमनं पृथुधर्मचक्रम् ||41||
नहीं कोई आशीष वचन हैं, हँसे देख कर बात नहींफिर भी तीर्थ प्रवर्तन होता, तीन जगत के नाथ यही।देखो-देखो यही दिखाने, धर्म चक्र आगे चलताअति प्रकाश चहुँ ओर फैलता, सभी दिशा जगमग करता ||41||
अर्घ्यॐ ह्रीं धर्मचक्रप्रवर्तकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चित्तं मदीयमिह लीनमुत त्वयि स्यात्त्वद्रूपभा मयि मनः-परमाणु-देशे।जानामि नो किमिति संघटते समेतिकिं वाम्रबीज-गणनेन रसं बुभुक्षोः ||42||
मेरा चित्त आप में हे प्रभु! लीन हुआ क्या पता नहींया फिर आप रूप की आभा, मन में आती पता नहीं।कैसा क्या यह घटित हो रहा, नहीं पता कुछ मुझको देव!आम गुठलियों को क्या गिनना रस चखने की इच्छा एव ||42||
अर्घ्यॐ ह्रीं अतितृप्तिकराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भक्तिश्च सा स्मर-रुषाग्रि-घनौघवर्षामुक्तिश्च सा स्तवनतः स्वयमेति हर्षात्।शक्तिश्च तृप्यतितरां गुणपूर्णतायांज्ञप्तिश्च विंदति भृशं तव चेतनाभाम् ||43||
भक्ति वही जो काम क्रोध की, अग्नि बुझाने वर्षा होमुक्ति वही जो संस्तुति करते, स्वयं आ रही हर्षित हो।आप गुणों की पूर्ण प्राप्ति में, तुष्ट करे जो शक्ति वहीआप चेतना की आभा का, अनुभव करता ज्ञान वही ||43||
अर्घ्यॐ ह्रीं आत्मगुणवर्धकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
भृत्योऽपि भूपतिमरं तु सदाश्रयामिप्रोत्थाय मस्तक-मतीव-मदेन याति।त्रैलोक्यनाथ-पद-पंकज-भक्ति-भक्तोनिश्चिन्तितां यदि दधाति तु विस्मयः किम् ||44||
मैं राजा के निकट रह रहा, यही सोचकर नौकर भीअपना मस्तक ऊँचा करके, गर्व धारकर चले तभी।तीन लोक के नाथ आपके, चरण कमल भक्ती वालाभक्त यहाँ निश्चिन्त बना यदि, क्या विस्मय प्रभु रखवाला ||44||
अर्घ्यॐ ह्रीं भक्तचिन्तापहरणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सत्यं त्वया सुविहिताऽत्र मुनेरहिंसाबाह्यान्तरङ्ग-यम-माप्य समाचरत् ताम्।अन्तः प्रभाव इति केवलबोध-सूति-र्यज्ञार्थ-हिंसन-निवृत्ति-बहि-र्विभूतिः ||45||
सत्य कहा है आप वीर ने, मुनि का एक अहिंसा धर्मभीतर बाहर संयम पाकर, आप बढ़ाये उसका मर्म।उसी धर्म से अन्तरंग में, केवलज्ञान प्रकाश हुआयज्ञों की हिंसा रुक जाना, बाहर धर्म प्रभाव हुआ ||45||
अर्घ्यॐ ह्रीं अहिंसा-स्वभावाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञानस्य वा सुखगुणस्य च कस्यचिच्चपर्यायमात्र कलिकामह-माप्तुकामः।अन्तस्त्वयि स्वगुण-पर्यय-भासमाने-प्यस्मादृशः कथमहो नु भवेत् सतृष्णः ||46||
सुख गुण या ज्ञान गुणों की, किसी गुणों की भी पर्यायएक समय की कणी मात्र ही, तव गुण की मुझमे आ जाय।अपनी ही गुण-पर्यायों से, भीतर आप प्रकाशित होफिर भी मुझ जैसा कैसे यूं, तृष्णा पीड़ित रहे अहो ||46||
अर्घ्यॐ ह्रीं सर्वमनोरथपूर्तिकराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अत्यंत-पूत-चरणं तव सर्व-वन्द्यंचित्ते निधाय यदहं स्वमुखं विपश्यन्।उल्लासयामि मुखदर्पण-दर्शनात्तेसीदामि साम्यविकलात् स्वमुखेऽतिवीर! ||47||
अति पवित्र जो चरण कमल हैं, वन्दनीय नित सदा रहेउनको चित में धारण करके, अपना मुख हम देख रहे।अति उल्लासित मम मन होता, किन्तु आप मुख दर्पण देखआप सरीखा साम्य हमारे, मुख पर नहीं देख कर खेद ||47||
अर्घ्यॐ ह्रीं साम्यमुखाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सद्-द्रव्यसंयम-पथे प्रथमं प्रयुज्यस्वं भावसंयमनिधौ तदनुव्यधायि।नोल्लंघयन् क्रमविधिं क्रमविद् विधिज्ञोमार्तण्डवच्चरति वै महतां स्वभावः ||48||
पहले आप द्रव्य संयम के, पथ पर खुद को चला दिएतभी भाव संयम की निधि भी, आप स्वयं ही प्राप्त किए।जो क्रम जाने विधि को जाने, क्या उल्लंघन कर सकतामहापुरुष का यह स्वभाव है, सूरज सम पथ पर चलता ||48||
अर्घ्यॐ ह्रीं द्रव्यभावसंयम निधि प्राप्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सापेक्षतोऽपि निरपेक्षगतोऽसि नूनंबद्धोपि मुक्त इव मुक्तिरतोऽसि बद्धः।एकोऽप्यनन्त इति भासि न ते विरोधःस्वात्मानुशासनयुते जिनशासनेऽपि ||49||
होकर के सापेक्ष आप प्रभु, सबसे ही निरपेक्ष हुएकर्म बन्ध से बद्ध मुक्त से, मुक्ती में रत बद्ध हुए।होकर एक अनन्त भासते, इसमें कोई विरोध नहींआतम अनुशासन से युत हो, जिनशासन से युक्त वहीं ||49||
अर्घ्यॐ ह्रीं परस्पर-विरुद्ध-धर्मसहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दृष्टोऽपि नो श्रुतिगतो न कदापि पूर्वंस्पृष्टो मया न महिमानमहं न वेद्मि।देवेश! भक्तिरसनिर्भर-मानसेऽस्मिन्प्रत्यक्षतोऽप्यधिकरागमतिः परोक्षे ||50||
पहले नहीं आपको देखा, नहीं सुना है कभी कहींनहीं छुआ है कभी आपको, जानी महिमा कभी नहीं।भक्ति सुरस से भरे हुये इस, मेरे मन में आप मुनीशनहीं हुए प्रत्यक्ष तथापि, मति में राग अधिक क्यों ईश ||50||
अर्घ्यॐ ह्रीं आश्चर्यकर महिमा सहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अद्यापि ते प्रवचनाम्बु मनः पिपासापीत्वाऽपि तृष्यति विलोक्य पुन-र्दिदृक्षा।एतन्मनोरथयुगस्य यदा हि पूर्तिःसाक्षाद् भवेन्मम विमुक्तिकथा तदाऽलम् ||51||
तेरे वचन नीर को पीने, की इच्छा पी-पी कर भीतृप्त नहीं होता मेरा मन, पुनः देखना लख कर भी।दो ही मेरी मनो कामना, जब पूरण होंगी साक्षात्मुक्ति कथा भी मेरी पूरी, हो जाएगी मेरी बात ||51||
अर्घ्यॐ ह्रीं साक्षात् दर्शनकराय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
पुण्यं त्वयोदित-तपोयम-पालनेनभक्त्योर्जितेन भविनां शिवसाधनं ते।पुण्यं निदानसहितं सुरसौख्यकामंबन्धप्रदं न हि नयं समवैति जैनः ||52||
कहा आपने जैसा जिनवर, मान उसे तप व्रत धरताभव्यजनों की भक्ति का वह, पुण्य मोक्ष साधन बनता।सुर सुख को जो चाह रहा हो, कर निदान यदि करता पुण्यवही बन्ध का कारण है नय, नहीं जानते जैनी पुण्य ||52||
अर्घ्यॐ ह्रीं सकलनय विलसिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सम्यक्त्वमेव जिनदेव तवैव भक्ति-र्ज्ञानं तदेव चरितं व्यवहारमित्थम्।तावत् करोतु भविकस्त्वदभेदबुद्धयामुक्त्यंगना-रमणतात्म-सुखं न यावत् ||53||
हे जिन! भक्ति आपकी नित ही, सम्यग्दर्शन कही गईवही ज्ञान है वही चरित है, यह व्यवहारी बुद्धि रही।रख अभेद बुद्धि से जिन में, तब तक यह व्यवहार करोमुक्ति वधू की रमण आत्म सुख, जब तक ना तुम प्राप्त करो ||53||
अर्घ्यॐ ह्रीं रत्नत्रयपूर्णाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
रूपेण मुह्यसि जनं त्वममोह इष्टोलोभं विवर्धयसि भूरि निशाम्य वाचम्।तत्राप्युशन्ति सुजनं सुजना भवन्तंदोषा गुणाय ननु चन्द्रकरैर्निदाघे ||54|
मोहित करते आप रूप से, सभी जनों को हे निर्मोह!सुन कर वचन और सुनने का, लोभ बढ़ाते हे निर्लोभ!।फिर भी श्रेष्ठ पुरुष हैं कहते, श्रेष्ठ पुरुष केवल हैं आपदोष गुणों के लिए हरे ज्यों, निशा चन्द्रमा से संताप ||54||
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीगणधरमुनि सेविताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तुभ्यं ददामि कथयन् प्रददाति कश्चिन्मौनेन दित्सति भवानति-गुप्तरुपात्।सार्वाय वा रविरिहैव निरीह-बन्धु-र्भव्याय तेन भुवने परमोऽसि दाता ||55||
तुमको देता हूँ यह कहता, तब कोई कुछ देता हैकिन्तु आप दें गुप्त रूप से, मौन धार यह देखा है।ज्यों रवि सबका हित करता है, बिन इच्छा के बन्धु बनाउसी तरह भव्यों के हित में, तुम सम दाता कोई ना ||55||
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री सार्वाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दित्सा प्रभो! त्वयि यदि प्रविदातुमस्तिदातव्य एव मम वै मनसि स्थितार्थः।दाता समो न तव मत्सम-याचको नकांक्षाम्यहं किमपि नो भवतो भवन्तम् ||56||
फिर भी यदि तुम इच्छा करते, देने की मुझको कुछ भीदे ही देना आप प्रभू जी, जो मेरे मन में कुछ भी।दाता तुम सम और नहीं है, और नहीं याचक मुझ साचाह नहीं कुछ तुमसे चाहूँ, तुमको या बनना तुम सा ||56||
अर्घ्यॐ ह्रीं अयाचकवृत्तये क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
एवं चतुर्दशतिथा-वपहृत्य योगान्ध्यानात् तुरीयशुभशुक्ल-वशात् प्रमुक्तः।पावापुर-प्रमद-पद्म-सरोवरस्थोनिर्वाण-माप्य भुवनस्य शिरः प्रतस्थे ||57||
योगों को संकोचित करके, इस विधि चौदस की तिथि कोचौथे शुक्ल ध्यान को ध्याकर, आप विमुक्त किए खुद को।पावापुर के पद्म सरोवर, पर संस्थित प्रभु होकर केआप महा निर्वाण प्राप्त कर, ठहरे लोक शिखर जा के ||57||
अर्घ्यॐ ह्रीं पावापुर पद्म सरोवर स्थित निर्वाण प्राप्ताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नष्टाष्टकर्मरिपुबाधक! ते नमोस्तुस्वर्गापवर्ग-सुखदायक! ते नमोस्तु।विश्वैक-कीर्ति-गुण नायक! ते नमोस्तुविघ्नान्तराय-विधि-वारक! ते नमोस्तु ||58||
अष्ट कर्म रिपु बाधक नाशक, हे प्रभु तुमको नमन करूँस्वर्ग मोक्ष सुख के हो दायक, हे प्रभु तुमको नमन करूँ।आप कीर्ति गुण नायक जग में, हे प्रभु तुमको नमन करूँअन्तराय विघ्नों के वारक, हे प्रभु तुमको नमन करूँ ||58||
अर्घ्यॐ ह्रीं अनन्तचतुष्टय सहिताय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जेता त्वमेव समनः सकलेन्द्रियाणांनेता त्वमेव गुणकांक्षि-तपोधनानाम्।भेत्ता त्वमेव घनकर्ममहीधराणांज्ञाता त्वमेव भगवन्! सचराचराणाम् ||59||
मन से सहित सकल इन्द्रिय के, तुम ही एक विजेता होजो गुण चाहें ऐसे मुनि के, एक मात्र तुम नेता हो।घनी भूत जो कर्म शैल थे, उनको तुमने तोड़ दियासकल चराचर के ज्ञाता हो, निज में निज को जोड़ लिया ||59||
अर्घ्यॐ ह्रीं लोकालोकज्ञायकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हे वीर! सिद्ध-गतिभूषण! वीतकाम!तुभ्यं नमोऽन्त्य-जिन-तीर्थकर! प्रमाण!।सर्वज्ञदेव! सकलार्तविनाशकायतुभ्यं नमो नतमुनीन्द्र-गणेशिताय ||60||
सिद्धगति के भूषण तुम हो, काम रहित हो तुम हो वीरहे अन्तिम जिन तीर्थंकर प्रभु, तुम प्रमाण मम हर लो पीर।सभी दुखों के नाशक तुमको, देव हमारे तुम्हें नमनगणधर और मुनीश्वर नमते, हे परमेश्वर तुम्हें नमन ||60||
अर्घ्यॐ ह्रीं वीतराग सर्वज्ञदेवाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ते तीर्थपुण्यजलमञ्जनशुद्धभूताभव्याः पुरा समभवन् कलिपापपूताः।नाना-नयोपनय-सप्त-विभङ्ग-भङ्गेतीर्थे निमञ्जनविधेः किमु वञ्चितः स्याम् ||61||
आप तीर्थ के पुण्य नीर में, डूब डूब कर शुद्ध हुएभव्य हुए जितने भी पहले, धो कलि पाप विशुद्ध हुए।नाना नय उपनय अरु जिसमें, सप्त भंग की लहरें होंऐसे तीरथ में डुबकी हम, लेने में क्यों वंचित हों? ||61||
अर्घ्यॐ ह्रीं धर्म-तिर्थाधिपतये क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
बालेऽपि पालक इति प्रतिभासते योयो यौवनेऽपि मदकाम-भटाभिमर्दी।संसार-सागर-तट-स्थित-पुण्यभाजांसिद्धिं प्रपित्सुरभवत् तमहं नमामि ||62||
बाल्य अवस्था में भी पालक, से प्रतिभासित होते आपभर यौवन में भी मदमाते, काम सुभट को जीते आप।पुण्यवान जो खड़े हुए हैं, संसृति सागर के तट परउन्हें सिद्धि में पहुँचाते थे, नमन आप को कर शिर धर ||62||
अर्घ्यॐ ह्रीं श्रीं भवभयनिमज्जनतारकाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
लोकोत्तमोऽसि जगदेकशरण्यभूतःश्रेयान् त्वमेव भवतारकमुख्यपोतः।ध्यानेऽपि चिन्तनमतौ सुकथा-प्रसङ्गेत्वां संस्मरामि विनमामि च चर्चयामि ||63||
तीन लोक में उत्तम तुम हो, पूर्ण जगत में एक शरणभव तरने को इक जहाज हो, श्रेष्ठ तुम्ही हो करूँ वरण।चिन्तन में भी ध्यान समय भी, और कथा के करने मेंतुमको याद करूँ मैं प्रणमूँ, चर्चा करूँ सदा ही मैं ||63||
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री लोकोत्तमशरणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यः संस्तवं प्रकुरुते भुवि भावभक्त्यासंस्थाप्य चित्त-कमले श्रृणुतेऽत्र चैतम्।विघ्नं विहत्य सफलीभवतीष्टकार्ये,ज्ञानं सुखं स लभते क्षणवर्धमानम् ||64||
भाव भक्ति से इस प्रकार जो, वीर प्रभू का यह संस्तवहृदय कमल में धार आपको, करता सुनता तव वैभव।विघ्नों को वह नष्ट करे अरु, इष्ट कार्य में रहे सफलहर क्षण बढ़ते ज्ञान सुखों का, पाओ तुम ‘प्रणम्य’ शिव फल ||64||
अर्घ्यॐ ह्रीं श्री प्रतिक्षणवर्धमान-ज्ञानसुखादिगुणाय क्लीं महाबीजाक्षर सहिताय श्री वर्धमान-महावीर-जिनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वलय अर्घ
विद्याब्धि-सूरि-पद-पङ्कज-सौरभालि-शिष्य – प्रणम्य – मुनिना जिनदेव भक्त्या ।श्री वर्धमान – जिन – संस्तवनं व्यधायितस्य त्रिरत्र वलयेऽर्चनयोल्लसामि ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं द्वात्रिंशत्दल कमलाधिपतये श्री वर्धमान जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
महार्घ्य व जयमाला
आर्या छन्द
श्री वर्धमानसंस्तुति – रियं कृता प्रणम्यवार्धिना मुनिना ।आचार्य प्रमुखार्य-प्रगुरु – विद्यावार्धि – शिष्येण । ।
वीरे निर्वाणगते शून्य चतुः पञ्चद्वितमे वर्षे ।मालवभूरतलामे पौषे मासि सितसप्तम्याम्।।
अर्घ्यॐ ह्रीं चतुः षष्टि ऋद्धि सहित वर्धमान जिनेन्द्राय महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
( जाप मंत्र 108 बार लौंग अथवा पीले चावल से)
ॐ ह्रीं चतुः षष्टि ऋद्धि सहित वर्धमान जिनेन्द्राय नमः ।
जयमाला
वर्धमान जिनदेव की जय त्रिशला नन्दन वीर की जय
निज चेतन की परिणत में रत ज्ञानानन्द स्वभाव रहासामायिक में ध्यान समय में जिनको चेतन भाव रहा।ज्ञान चेतना में केलि कर शुद्धातम महावीर की जय ।
राग रोग के हरने वाले काम क्रोध मद नाशन हारे ।भव सागर से पार लगाते सन्मति दायी वीर की जय ।।
सब जीवों पर करुणा धरते शत्रु पर भी समता रखतेउग्र परिषह विजयी मुनिवर महावीर भगवान की जय ।।
बारह वर्ष तपे तप प्रतिदिन केवलज्ञान स्वभाव लियापीर हरी चन्दनबाला की उपकारी जिनवर की जय ।।
गौतम गणधर लख के जिनको सुध-बुध खुद की भूल गए।शिष्य बन गए यतिवर सबही वर्धमान भगवान की जय ।।
जिनकी पूजा भाव लिए चल मेंढक देव महान बनाश्रेणिक, प्रीतिंकर लाखों जन ज्ञान लिए जिनराज की जय ।।
ऋजुकूला नदी के तट पर ग्राम जृंभिका में उपजा।केवलज्ञान प्रकाशित जग में श्रमण प्रमुख जिनराज की जय।।
पावापुर निर्वाण भूमि पे तुमने सिद्ध प्रयाण किया।जन्म मरण तारक जिनवर वर्धमान भगवान की जय ।।
ॐ ह्रीं श्रीं वीरसन्मति वर्धमानातिवीर महावीर पंचनामधेयाय वर्धमान जिनेन्द्राय…
॥ जय जिनेन्द्र ॥
स्रोत: pranamyasagar.guru