जिनेन्द्र वाणी

श्री श्रुतपंचमी विधान

पं. अभयकुमार शास्त्री, देवलाली · विधान पूजा

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मंगलाचरण

अनुष्टुप्

श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वादामोघलांछनम्।जीयात् त्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनम्।।1।।

शार्दूलविक्रीडित

सः श्रीमान् धरसेन-नाम-सुगुरुः श्री जैनसिद्धान्त-सद्-वार्द्धिर्धर्धर-पुष्पदन्त-सुमुनिः श्रीभूतपूर्वो बलिः।एते सन्मुनयो जगत्त्रय-हिताः स्वर्गामरैरर्चिताःकुर्युर्मे जिनधर्मकर्मणि मतिं स्वर्गापवर्गप्रदे।।2।।

अनुष्टुप्

श्रीवीरसेन इत्याप्त-भट्टारक-पृथु-प्रथः।स नः पुनातु पूतात्मा वादि-वृन्दारको मुनिः।।3।।धवलां भारतीं तस्य कीर्तिं च शुचिनिर्मलाम्।धवलीकृत-निःशेष-भुवनां तां नमाम्यहम्।।4।।भूयादावीरसेनस्य वीरसेनस्य शासनम्।शासनं वीरसेनस्य वीरेसन-कुशेशयम् ।।5।।सिद्धानां कीर्तनादन्ते यः सिद्धान्तप्रसिद्ध-वाक्।सोऽनाद्यनन्तसन्तानः सिद्धान्तो नोऽवताच्चिरम्।।6।।

पद्यानुवाद (हरिगीतिका)श्रीयुत परम गम्भीर लक्षण स्याद्वाद अमोघ है।जैन शासन त्रिजगपति का जगत् में जयवन्त है।।1।।

सिद्धान्त-सागर श्री गुरु धरसेन-पद-पंकज नमूँ।मुनिवर धुरन्धर पुष्पदन्त-रु भूतबलि-पद उर धरूँ।।ये सभी मुनिवर त्रिजग हितकर सुर-गुणों से वन्द्य हैं।स्वर्ग-शिव-प्रद धर्मरूपी कर्म में मम मति धरें।।2।।आप्तवत् सुप्रसिद्ध हैं जो वादियों में श्रेष्ठ हैं।वे वीरसेन पवित्र आत्मा मुझे भी निर्मल करें।।3।।भारती जिनकी धवल है कीर्ति भी निर्मल अहो।धवल करती सकल जग को उसे मेरा नमन हो।।4।।वीरसेनाचार्य तक शासन जिनेश्वर वीर का।रचना मुनीश्वर वीर शासन श्री महावीर का।।5।।सिद्ध के गुणगान से जो प्राप्त होता अन्त में।सिद्धान्त कहते हैं उसे यह वचन है चिरकाल से।।6।।

इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्।

जिनवाणी स्तुति

धन्य-धन्य वीतराग वाणी, अमर तेरी जग में कहानी।चिदानंद की राजधानी, अमर तेरी जग में कहानी।। टेक ।।उत्पाद-व्यय अरु ध्रौव्य स्वरूप, वस्तु बखानी सर्वज्ञ भूप।स्याद्वाद तेरी निशानी, अमर तेरी जग में कहानी ।। 1 ।।नित्य-अनित्य अरु एक अनेक, वस्तु कथंचित् भेद-अभेद।अनेकांतरूपा बखानी, अमर तेरी जग में कहानी ।। 2 ।।भाव शुभाशुभ बंधस्वरूप, शुद्ध-चिदानन्दमय मुक्तिरूप।मारग दिखाती है वाणी, अमर तेरी जग में कहानी ।।3।।चिदानंद चैतन्य आनन्द धाम, ज्ञानस्वभावी निजातम राम।स्वाश्रय से मुक्ति बखानी, अमर तेरी जग में कहानी ।।4।।

पूजा

स्थापना

दोहा

वीर प्रभु गौतम गुरु को कर जोरि प्रणाम।द्वादशांग श्रुत प्रकट हो वर्ते ऐसा ज्ञान।।भाव सहित पूजा करूँ, षट्खण्डागम सार।भेद-प्रभेदों में लखूँ, प्रभो! समय का सार।।धन्य दिवस श्रुत पंचमी हुआ सुश्रुत अवतार।सम्यक् श्रुत-आराधना कर होऊँ भव-पार।।

आह्वाननॐ ह्रीं श्री षट्खण्डागमस्वरूप-प्रथम-श्रुतस्कन्ध ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। ( इति आह्वानम्।)

स्थापनॐ ह्रीं श्री षट्खण्डागमस्वरूप-प्रथम-श्रुतस्कन्ध ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। ( इति स्थापनम्। )

सन्निधिकरणॐ ह्रीं श्री षट्खण्डागमस्वरूप-प्रथम-श्रुतस्कन्ध ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । ( इति सन्निधिकरणम्।)

हरिगीतिका

सिद्धान्त ज्ञान-सुनीर निर्मल, मोह-मल क्षालित करे।जिन-चरण में अर्पित करें, भवि जीव भव-सागर तरें।।षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि-पद युग नमूँ ।।

जलॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय जन्मजरामृत्यु- विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त ज्ञान-सुगन्ध मलयज प्रभु-चरण अर्पित करूँ।शुद्धात्म-आश्रित ज्ञान पाकर भवातप सब क्षय करूँ।।षट्खण्ड आगम ग्रन्थ पढ़, चेतन-अखण्ड स्वपद लखूँ।धरसेन गुरुवर पुष्पदन्त-रु भूतबलि पद युग नमूँ।।

चंदनॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय संसारताप-विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त सूत्र अखण्ड मिथ्या-वादि मद खण्डित करें।प्रभु-चरण में श्रद्धा समर्पित कर अखण्डित पद लहें।। षट्..।।

अक्षतॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त-सुरभित-सुमन भविजन-भ्रमर-चित्त रमावते।निष्काम श्रुत-आराधना कर काम-भाव विनाशते।। षट्..।।

पुष्पॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त-रस के रसिकजन को क्षुधा नहिं पीड़ित करे।प्रभु भक्ति-रस आस्वाद कर भवरोग शीघ्र शमित करे।। षट्..।।

नैवेद्यॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त-दीप-प्रकाश में भवि स्व-पर भेद पिछानते।प्रभु पद-कमल पूजा करें निज चित्-स्वरूप निहारते।। षट्..।।

दीपॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय मोहान्धकार- विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त ज्ञान-सुधूप ले ध्यानाग्नि प्रजलित भवि करें।निष्काम जिनवर-अर्चना कर कर्म-मल सब क्षय करें।। षट्..।।

धूपॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त-बोध-सुवृक्ष पर कैवल्य-फल निश्चित फलें।प्रभु ! भक्ति निर्वाछक फले भवि सहज चिन्मय सुख लहें।। षट्..।।

फलॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्धान्त-वैभव द्रव्यश्रुत यह जगत् में अनमोल है।प्रभु ! भावश्रुत में भासता निज पद अनर्घ्य अमोल है।। षट्..।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री प्रथम-श्रुतस्कन्ध-स्वरूप-षट्खण्डागमग्रन्थाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्ध्यावलि

दोहा

गुरु धरसेनाचार्य के चरणों का धरि ध्यान।पुष्पदन्त अरु भूतबलि को नित करूँ प्रणाम।।षट्खण्डागम शास्त्र की महिमा चित् में लाय।द्वादशांग श्रुतज्ञान को पूजूँ अर्घ्य बनाय ।।भक्तिपूर्वक मैं करूँ वर्णन अति संक्षेप।द्वादशांग श्रुतज्ञान हो मम उर में निक्षेप ।।( इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्। )प्रथम खण्ड 'जीवट्ठाण' समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्य

वीरछन्द-दोहा

पहला जीवट्ठाण खण्ड है अष्ट-नुयोग द्वार से युक्त।सत् संख्या अरु क्षेत्र स्पर्शन काल भाव अन्तर से युक्त।।अल्प बहुत्व और चूलिका नौ भी इसमें कही गईं।प्रकृति स्थान महा दण्डक त्रय जघन तथा उत्कृष्ट रची।।

सम्यकोत्पत्ति गति आगति का वर्णन इसमें किया गया।गुणस्थान मार्गणा कथन पद सहस-अठारह में मिलता।।

दोहा

श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।जिसके हैं ये भेद सब, वह अभेद चित् धार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जीवट्ठाणसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

द्वितीय खण्ड 'खुद्दाबन्ध' समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्यखण्ड दूसरा खुद्दा अथवा क्षुल्लक बन्ध कहा जाता।ग्यारह अधिकारों में कर्मबन्ध भेदों की महाकथा।।अंतर काल तथा स्वामित्व-रु भंग विचयत्रय अनुगम द्वार।द्रव्य क्षेत्र स्पर्शन अधिगम नाना जीव-रु भागाभाग।।अनुगम-अल्पबहुत्व ग्यारवाँ, जीव कर्म का बन्ध करे।किन्तु शुद्धनय से यह चेतन कर्मों से नहिं कभी बँधे।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।मैं अबद्धस्पृष्ट हूँ, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री खुद्दाबन्धसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

तृतीय खण्ड 'बन्ध-स्वामित्व विचय' समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्यखण्ड तृतीय बन्ध-स्वामित्व विचय नाम बुधजन ज्ञाता।किसे कौन-सी प्रकृति बन्ध होता है अथवा नहिं होता।।

स्वोदय और परोदय बन्धरूप प्रकृति का वर्णन है।कर्मबन्ध सम्बन्धी सब विषयों का इसमें वर्णन है।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।मैं अबद्धस्पृष्ट हूँ, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री बन्धस्वामित्वविचयसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चतुर्थ खण्ड 'वेदना' समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्यचौथा खण्ड वेदना इसमें कृति एवं वेदना कथन।पाँच शरीरों की संघातन परिशातन कृति का वर्णन।।नाम थापना द्रव्य ग्रन्थ गणना कारण अरु भाव कहे।सात भेद से कृति का वर्णन किन्तु मुख्य गणना ही है।।सोलह अधिकारों में वर्णन करें वेदना का आचार्य।नय निक्षेप नाम अरु द्रव्य क्षेत्र काल प्रत्यय अरु भाव।।गति स्वामित्व वेदना और अनन्तर सन्निकर्ष परिमाण।भागाभाग-रु अल्पबहुत्व सहस सोलह पद रचे सुजान।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।अहो ! अवेदक मैं सदा, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री वेदनाखण्डसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पंचम खण्ड 'वर्गणा' समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्यखण्ड पाँचवाँ नाम वर्गणा बंधनीय अधिकार प्रधान।तेइस एवं कर्मबन्ध के योग्य वर्गणा कहीं सुजान।।

और साथ में सोलह अधिकारों में तेरह स्पर्श बखान।दश प्रकार कर्मों का वर्णन करते ये अधिकार-महान्।।नाम थापना द्रव्य भाव से शील-स्वभाव-प्रकृति वर्णन।सोलह अधिकारों में करते वीरसेन आचार्य-महान्।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूं श्रुत का सार।मैं चिन्मय निष्कर्म हूँ, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री वर्गणाखण्डसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

षष्ठ खण्ड 'महाबन्ध' समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्यभूतबलि भट्टारक ने ही महाबन्ध का रचा विधान।प्रकृति थिति अनुभाग प्रदेश बंध का किया महा व्याख्यान।।महा धवल भी कहते इसको मूल नाम सत्कर्म कहा।अष्टादश अनुयोग द्वार से वर्णन इसमें किया गया।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूं श्रुत का सार।मैं चेतन निर्बन्ध हूँ, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री महाबन्धसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

कसायपाहुड़ समन्वित द्वादशांग के लिए अर्घ्यज्ञानप्रवाद पूर्व की दसवीं वस्तु महा अधिकार महान्।तीजा प्राभृत कसायपाहुड़ का गुणधराचार्य को ज्ञान।।पेज्ज-दोष पाहुड़ भी कहते राग-द्वेष वर्णन विस्तार।हैं चौबिस अनुयोग द्वार से कहे गए पन्द्रह अधिकार।।

श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।मैं अकषाय स्वरूप हूँ, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री कषायपाहुडसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पंच परमागम के लिए अर्घ्य

हरिगीतिका-दोहा

कलिकाल में सर्वज्ञवत् गुरु कुन्दकुन्दाचार्य हैं।शिवमग प्रकाशक पंच परमागम सु-रचनाकार हैं।।नव तत्त्व में गत आत्मज्योति है समय के सार में।ज्ञान-सुख अरु ज्ञेय का वर्णन सु-प्रवचनसार में।।मार्ग एवं मार्ग-फल वर्णन नियम के सार में।षट् द्रव्य और पदार्थ नौ व्याख्या पंचास्तिकाय में।।अष्टपाहुड़ में विविध वर्णन किया शिवमार्ग का।ये पंच परमागम दिखाते मार्ग शिव-सुख प्राप्ति का।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।शिव-रमणी रमनार हूँ, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री पंचपरमागमसमन्वित-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ्यावली

प्रथमानुयोग के लिए अर्घ्य

हरिगीतिका-दोहा

मन्दबुद्धि जीवों को यह प्रथमानुयोग जिनवर कहते।पौराणिक पुरुषों के जीवन की घटना वर्णन करते।।

पुण्य-पाप का फल बतलाकर उसे दुखद बतलाते हैं।वीतरागता सुखदायी कह निज हित रुचि जगाते हैं।।असद्भूत व्यवहार से ही यह जानन योग्य।भेदज्ञान की पुष्टि ही, इसमें करने योग्य।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधू श्रुत का सार।निज चैतन्य स्वभाव ही, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री 'जिनमुखोद्भूत-प्रथमानुयोगशास्त्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

करणानुयोग के लिए अर्घ्य

सूक्ष्मबुद्धि जीवों को यह करणानुयोग जिनवर कहते।कर्मप्रकृतियों से बन्धन अरु उदय आदि वर्णन करते।।पर-आश्रित परिणाम जीव को दुखदायी बतलाते हैं।तीन लोक रचना का भी श्री गुरुवर ज्ञान कराते हैं।।असद्भूत व्यवहार से ही यह जीव स्वरूप।ज्ञान-राग की भिन्नता, मात्र प्रयोजनभूत।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधू श्रुत का सार।द्रव्य भाव नोकर्म बिन, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री 'जिनमुखोद्भूत-करणानुयोगशास्त्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

चरणानुयोग के लिए अर्घ्य

साधक जीवों के जीवन में होता है कैसा व्यवहार।इसका वर्णन करते गुरुवर यह चरणानुयोग सुखकार।।

श्रावक और श्रमण की बाह्य-क्रिया इसमें गुरु बतलाते।किन्तु मात्र उपचरित धर्म है यह रहस्य गुरु समझाते ।।जीव क्रिया करता, कहे असद्भूत व्यवहार।करता है निज भाव का, कहता नय परमार्थ।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधू श्रुत का सार।निष्क्रिय चिन्मय तत्त्व ही, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री 'जिनमुखोद्भूत-चरणानुयोगशास्त्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

द्रव्यानुयोग के लिए अर्घ्य

नौ पदार्थ छह द्रव्य बताता यह द्रव्यानुयोग सुखकार।भेदज्ञान अरु वीतरागता ही शिव-पथ कहते आचार्य।।मलिन और निर्मल पर्यायों का भी इसमें कथन किया।पर्यायों से भिन्न त्रिकाली ध्रुव दृष्टि में बसा लिया।।आत्मज्ञान ही ज्ञान है, द्वादशांग का सार।चिन्मय ज्ञायक भाव ही, मात्र समय का सार।।श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।ज्ञानमात्र निज भाव ही, पद अनर्घ्य अविकार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री 'जिनमुखोद्भूत-द्रव्यानुयोगशास्त्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

पूर्णार्घ्य

जोगीरासा

परिणामों को धवल बनाने धवलत्रयी पहचानूँ।इक शत बासठ सहस श्लोक हैं इसकी महिमा जानूँ ।।

सोलह खण्डों में धवला टीका षट्खण्डागम की।श्लोक बहत्तर सहस रचे जय हो जय जिन आगम की।।1।।सोलह खण्डों में जयधवला है कषायपाहुड़ की।वीरसेन जिनसेन सूरि की रचना साठ हजारी।।भूतबली कृत महाबन्ध ही महाधवल कहलाता।तीस सहस श्लोक रचे जो सूक्ष्म बुद्धि पढ़ पाता।।2।।उनतालिस भागों में ये सब ग्रन्थ आज हैं मिलते।नय-व्यवहार कथन से ज्ञानी परमारथ को लखते।।परमारथ के ज्ञान-हेतु हस्तावलम्ब व्यवहारा।अतः बहुत कथनी इस नय की कहे जिनागम सारा।।3।।परमागम के सारभूत निज ज्ञायक को पहचानूँ।उसमें ही अपनापन करके भेदों को बस जानूँ।।वीतरागता की पोषक है श्री जिनवर की वाणी।है चारों अनुयोग कथन की शैली निज कल्याणी।।4।।

श्रुतभक्ति का अर्घ्य ले, शोधूँ श्रुत का सार।मोक्ष-महल में आइये, प्रिय चैतन्य कुमार।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भूत-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला

हरिगीतिका

षट्खण्ड-आगम ग्रन्थ की महिमा जगत्-विख्यात है।यह प्रथम श्रुतस्कन्ध जिसमें जैनशासन व्याप्त है।।ज्यों चक्रवर्ती जीतते षट्खण्ड को पुरुषार्थ से।त्यों जानकर षट् द्रव्य भविजन सुख लहें निज अर्थ से।।1।।

धरसेन गुरु कुछ अंग एवं पूर्व के ज्ञाता हुए।गिरनार गिरि पर शुद्ध आतम के परम ध्याता हुए।।गुरु भूतबलि अरु पुष्पदन्त महामुनि निर्ग्रन्थ थे।सूक्ष्म प्रज्ञा के धनी वे पथिक थे शिवपंथ के।।2।।श्रुतज्ञान पा धरसेन गुरु से उभय मुनिवर धन्य थे।षट्खण्ड-आगम ग्रन्थ रचना कर निजात्म अनन्य थे।।वीरसेन महामुनि टीका रची धवला महा।जिसका पठन कर धवल-धी से भव्य सुख पाते अहा।।

अर्घ्यॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भूत-द्वादशांगश्रुतज्ञानाय अनर्घ्यपदप्राप्तये जयमालापूर्णार्थ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा

श्रुत-सेवनमय अर्घ्य यह, भविजन को सुखकार।जिन आगम अभ्यास ही, पद अनर्घ्य दातार।।( इति पुष्पांजलिं क्षिपामि/क्षिपेत्। )जाप्य मन्त्र - ॐ ह्रीं श्रीसम्पूर्णद्वादशांगाय नमः।

जिनवाणी स्तुति

महिमा है, अगम जिनागम की ।। टेक ।।जाहि सुनत जड़ भिन्न पिछानी, हम चिन्मूरति आतम की ।।1 ।।रागादिक दुख कारन जानैं, त्याग बुद्धि दीनी भ्रम की ।।2।।ज्ञान-ज्योति जागी उर अन्तर, रुचि बाढ़ी पुनि शम-दम की ।।3 ।।कर्मबंध की भई निरजरा, कारण परम पराक्रम की ।।4।।‘भागचन्द' शिव-लालच लाग्यो, पहुँच नहीं है जहँ जम की ।।5 ।।

॥ जय जिनेन्द्र ॥

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