जिनेन्द्र वाणी

स्तुति पाठ

पं. द्यानतराय · पाठ एवं स्तोत्र

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तुम तरण-तारण भव-निवारण, भविक-मन आनन्दनो ।श्री नाभिनन्दन जगत्-वंदन, आदिनाथ निरंजनो ॥

तुम आदिनाथ अनादि सेऊँ, सेय पद-पूजा करूँ ।कैलाशगिरि पर ऋषभ जिनवर, पदकमल हिरदै धरूँ ॥

तुम अजितनाथ अजीत जीते, अष्टकर्म महाबली ।इह विरद सुनकर शरण आयो, कृपा कीज्यो नाथजी ॥

तुम चन्द्रवदन सुचन्द्रलक्षण चन्द्रपुरि परमेश्वरो ।महासेन-नंदन जगत् वंदन, चन्द्रनाथ जिनेश्वरो ॥

तुम शान्ति पाँच, कल्याण पूजों, शुद्ध मन-वच-काय जू ।दुर्भिक्ष चोरी पापनाशन, विघन जाय पलाय जू ॥

तुम बालब्रह्म विवेक-सागर, भव्य कमल विकाशनो ।श्री नेमिनाथ पवित्र दिनकर, पाप-तिमिर विनाशनो ॥

जिन तजी राजुल राजकन्या, कामसैन्या वश करी ।चारित्ररथ चढ़ि भये दूलहा, जाय शिव-रमणी वरी ॥

कंदर्प दर्प सु सर्प-लक्ष्छन, कमठ-शठ निर्मद कियो ।अश्वसेन-नंदन जगतवंदन सकल संघ मंगल कियो ॥

जिन धरी बालकपणे दीक्षा, कमठ-मान विदारकैं ।श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र के पद, मैं नमों शिर नायकै ॥

तुम कर्मघाता मोक्षदाता, दीन जानि दया करो ।सिद्धार्थ-नंदन जगत्-वंदन, महावीर जिनेश्वरो ॥

छत्र तीन सोहै सुर नर मोहै, वीनती अब धारिये ।कर जोड़ि सेवक वीनवै प्रभु, आवागमन निवारिये ॥

अब होउ भव भव स्वामि मेरे, मैं सदा सेवक रहों ।कर जोड़ यो वरदान माँगूँ, मोक्षफल जावत लहों ॥

जो एक माहीं एक राजत, एक माँहिं अनेकनो ।इक अनेकन की नाहिं संख्या, नमूँ सिद्ध निरंजनो ॥

चौपाई

मैं तुम चरण कमल गुण गाय, बहुविधि भक्ति करी मन लाय ।जनम-जनम प्रभु पाऊँ तोहि, यह सेवा फल दीजे मोहि ॥

कृपा तिहारी ऐसी होय, जामन मरन मिटावो मोय ।बार-बार मैं विनती करूँ, तुम सेये भव सागर तरूँ ॥

नाम लेत सब दुख मिट जाय, तुम दर्शन देख्या प्रभु आय ।तुम हो प्रभु देवन के देव, मैं तो करूँ चरण तव सेव ॥

जिन पूजा तैं सब सुख होय, जिन पूजा सम और न कोय ।जिन पूजा तैं स्वर्ग विमान, अनुक्रम तैं पावैं निर्वाण ॥

मैं आयों पूजन के काज, मेरो जन्म सफल भयो आज ।पूजा करके नवाऊँ शीश, मुझ अपराध क्षमहु जगदीश ॥

दोहा

सुख देना दुख मेटना, यही तुम्हारी बान ।मो गरीब की वीनती, सुन लीज्यो भगवान् ॥

पूजन करते देव की, आदि मध्य अवसान ।सुरगन के सुख भोगकर, पावें मोक्ष निदान ॥

जैसी महिमा तुम विषैं, और धरैं नहीं कोय ।जो सूरज में ज्योति है, नहीं तारागण सोय ॥

नाथ तिहारे नाम तैं, अघ छिन माँहिं पलाय ।ज्यों दिनकर परकाश तैं, अन्धकार विनशाय ॥

बहुत प्रशंसा क्या करूँ, मैं प्रभु बहुत अजान ।पूजाविधि जानूँ नहीं, शरण राखि भगवान् ॥

॥ जय जिनेन्द्र ॥