श्री त्रिकाल चौबीसी पूजा
कविवर राजमल पवैया · अन्य पूजा
साइट में पूजा खोलेंस्थापना
श्री निर्वाण आदि तीर्थंकर भूतकाल के तुम्हें नमन ।श्री वृषभादिक वीर जिनेश्वर वर्तमान के तुम्हें नमन ।।महापद्म अनंतवीर्य तीर्थंकर भावी तुम्हें नमन ।भूत भविष्यत् वर्तमान की चौबीसी को करूँ नमन ।।
आह्वाननॐ ह्रीं भरत क्षेत्र संबंधि भूत भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकर समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
स्थापनॐ ह्रीं भूत भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकर समूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
सन्निधिकरणॐ ह्रीं भूत भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकर समूह ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
सात तत्त्व श्रद्धा के जल से मिथ्या मल को दूर करूँ ।जन्म जरा भय मरण नाश हित पर विभाव चकचूर करूँ ।।भूत भविष्यत् वर्तमान की चौबीसी को नमन करूँ ।क्रोध लोभ मद माया हर कर मोह क्षोभ को शमन करूँ ।।भूत.।।
जलॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अष्टक
नव पदार्थ को ज्यों का त्यों लख वस्तु तत्त्व पहचान करूँ ।भव आताप नशाऊँ मैं निज गुण चंदन बहुमान करूँ ।।भूत.।।
चंदनॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
षट्द्रव्यों से पूर्ण विश्व में आत्म द्रव्य का ज्ञान करूँ ।अक्षय पद पाने को अक्षत गुण से निज कल्याण करूँ ।।भूत.।।
अक्षतॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो अक्षयपद प्राप्तयें अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
जानूँ मैं पंचास्ति काय को पंच महाव्रत शील धरूँ ।काम व्याधि का नाश करूँ निज आत्म पुष्पकी सुरभि वरूँ ।।भूत.।।
पुष्पॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्ध भाव नैवेद्य ग्रहण कर क्षुधा रोग को विजय करूँ ।तीन लोक चौदह राजु ऊँचे में मोहित अब न फिरूँ ।।भूत.।।
नैवेद्यॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान दीप की विमल ज्योति से मोह तिमिर क्षय कर मानूँ ।त्रिकालवर्ती सर्व द्रव्य गुण पर्यायें युगपत जानूँ ।।भूत.।।
दीपॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
निज समान सब जीव जानकर षट कायक रक्षा पालूँ ।शुक्ल ध्यान की शुद्ध धूप से अष्ट कर्म क्षय कर डालूँ ।।भूत.।।
धूपॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंच समिति त्रय गुप्ति पंच इन्द्रिय निरोध व्रत पंचाचार ।अट्ठाईस मूल गूण पालूँ पंच लब्धि फल मोक्ष अपार ।।भूत.।।
फलॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
छियालीस गुण सहित दोष अष्टादश रहित बनूँ अरहन्त ।गुण अनन्त सिद्धों के पाकर लूँ अनर्घ पद हे भगवन्त ।।भूत.।।
अर्घ्यॐ ह्रीं भूत, भविष्य वर्तमान जिनतीर्थंकरेभ्यो अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।
भूतकाल चौबीसी
जय निर्वाण, जयति सागर, जय महासाधु, जय विमल, प्रभो ।जय शुद्धाभ, देव जय श्रीधर, श्रीदत्त सिद्धाभ, विभो ।।जयति अमल प्रभु, जय उद्धार, देव जय अग्नि देव संयम ।जय शिवगण, पुष्पांजलि, जय उत्साह, जयति परमेश्वर नम ।।
जय ज्ञानेश्वर, जय विमलेश्वर, जयति यशोधर, प्रभु जय जय ।जयति कृष्णमति, जयति ज्ञानमति, जयति शुद्धमति जय जय जय ।।जय श्रीभद्र, अनंतवीर्य जय भूतकाल चौबीसी जय ।जंबूद्वीप सुभरत क्षेत्र के जिन तीर्थंकर की जय जय ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं भरत क्षेत्र संबंधि भूतकाल चतुर्विंशति जिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।
वर्तमान काल चौबीसी
ऋषभदेव, जय अजितनाथ, प्रभु संभव स्वामी, अभिनन्दन ।सुमतिनाथ, जय जयति पद्मप्रभु, जय सुपार्श्व, चंदा प्रभु जिन ।।पुष्पदंत, शीतल, जिन स्वामी जय श्रेयांस नाथ भगवान् ।वासुपूज्य, प्रभु विमल, अनंत, सु धर्मनाथ, जिन शांति महान् ।।
कुन्थुनाथ अरनाथ, मल्लि, प्रभु मुनिसुव्रत, नमिनाथ, जिनेश ।नेमिनाथ, प्रभु पार्श्वनाथ, प्रभु महावीर, प्रभु महा महेश ।।पूज्य पंच कल्याण विभूषित वर्तमान चौबीसी जय ।जंबूद्वीप सुभरत क्षेत्र के तीर्थंकरेभ्यो प्रभु की जय जय ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं भरत क्षेत्र संबंधि वर्तमान चतुर्विंशति जिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।
भविष्य काल चौबीसी
जय प्रभु महापद्म सुरप्रभ, जय सुप्रभ, जयति स्वयंप्रभु, नाथ ।सर्वायुध, जयदेव, उदयप्रभ, प्रभादेव, जय उदंक नाथ ।।प्रश्नकीर्ति, जयकीर्ति जयति जय पूर्ण बुद्धि, निःकषाय जिनेश ।जयति विमल प्रभु जयति बहुल प्रभु, निर्मल, चित्र गुप्ति, परमेश ।।
जयति समाधि गुप्ति, जय स्वयंभू, जय कंदर्प, देव जयनाथ ।जयति विमल, जय दिव्यवाद, जय जयति अनंतवीर्य, जगन्नाथ ।।जंबूद्वीप सुभरत क्षेत्र के तीर्थंकरेभ्यो प्रभु की जय जय ।भूत, भविष्यत् वर्तमान त्रय चौबीसी की जय जय जय ।।
अर्घ्यॐ ह्रीं भरत क्षेत्र संबंधि भविष्यकाल चतुर्विंशति जिनेन्द्राय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
तीनकाल त्रय चौबीसी के नमूँ बहत्तर तीर्थंकर ।विनयभक्ति से श्रद्धापूर्वक पाऊँ निज पद प्रभु सत्वर ।।मैंने काल अनादि गंवाया पर पदार्थ में रच पचकर ।पर भावों में मग्न रहा मैं निज भावों से बच बचकर ।।
इसीलिये चारों गतियों के कष्ट अनंत सहे मैंने ।धर्म मार्ग पर दृष्टि न डाली कर्म कुपंथ गहे मैंने ।।आज पुण्य संयोग मिला प्रभु शरण आपकी मैं आया ।भव भव के अघ नष्ट हो गये मानों चिंतामणि पाया ।।
हे प्रभु मुझको विमल ज्ञान दो सम्यक् पथ पर आ जाऊँ ।रत्नत्रय की धर्म नाव चढ़ भव सागर से तर जाऊँ ।।सम्यक् दर्शन अष्ट अंग सह अष्टभेद सह सम्यक् ज्ञान ।तेरह विध चारित्र धारलूँ द्वादश तप भावना प्रधान ।।
हे जिनवर आशीर्वाद दो निज स्वरूप में रम जाऊँ ।निज स्वभाव अवलम्बन द्वारा शाश्वत निज पद प्रगटाऊँ ।।
पूर्णार्घ्यॐ ह्रीं भरत क्षेत्र संबंधि भूत, भविष्य, वर्तमान जिनतिर्थंकरेभ्यो पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
तीन काल की त्रय चौबीसी की महिमा है अपरम्पार ।मन-वच-तन जो ध्यान लगाते वे हो जाते भव से पार ।।
इत्याशीर्वादः
॥ जय जिनेन्द्र ॥
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर)